बुधवार, 20 दिसंबर 2006

आय से अधिक, अनुपातहीन संपत्ति भी कोई वस्तु होती है?

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तू कितना कमाता है रे ललुआ?

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मुझे तो आज तक आय से अधिक संपत्ति का फंडा समझ में ही नहीं आया. मेरी मां मुझसे पूछा करती थी, जब पहले पहल नौकरी लगी थी - तू कितना कमाता है रे ललुआ. मां के लिए उसका बच्चा हमेशा ललुआ ही रहता है. मैं शर्माता था कि मेरी आय मेरे हिसाब से, मेरी औकात से कम है, और मैं उसमें कुछ भत्ते इत्यादि को भी जोड़कर बता देता था. शायद यह था आय से अधिक संपत्ति.

परंतु किसी के पास आय से अधिक संपत्ति कैसे जमा हो सकती है भला. जितनी जिसकी आय होती है, उतनी ही या उससे कम ही तो वह जमा कर पाएगा ना? सरल सा गणित है, मान लो कि आपकी आय एक्स है. अब उस एक्स आय में से आपने वाय खर्च कर दिया तो जो संपत्ति आपके पास जमा होगी तो वो तो एक्स ऋण वाय होगी ना? आप लाख कृपण हों, अपनी आय में से कुछ भी खर्च नहीं करते हैं, तब, मान लिया कि खर्च, यानी कि वाय, शून्य है. ऐसी स्थिति में भी जो संपत्ति आपके पास जमा होगी वह एक्स माइनस जीरो यानी की एक्स - आपकी पूरी आय ही तो होगी, उससे अधिक नहीं. इससे यह सीधे-सीधे सिद्ध होता है कि आय से अधिक संपत्ति तो हो ही नहीं सकती. अगर ऐसा होने लगा तो नया गणित पैदा हो जाएगा, गणित के नए नियम बन जाएंगे, अपने तो सारे फंडे फेल हो जाएंगे. न्यायाधीश इतने बेवकूफ़ तो थे नहीं जो इतना सीधा सरल गणित नहीं समझते. इसीलिए उन्होंने गणित के हिसाब से सही निर्णय दिया है - आय से अधिक संपत्ति कैसे होगी? हो ही नहीं सकती. सीबीआई के अफ़सरों का गणित के साथ-साथ आई क्यू भी कमजोर है लगता है जो वे ऐसे गलत गणित वाले अभियोग लगाते रहते हैं. जबरन पॉलिटिकल एजेंडा लेकर अभियोग लगाते फिरते हैं.

मैंने तो देखा, सुना और भुगता है - आय से अधिक खर्च को. आय इधर आई नहीं और खर्च हुई नहीं. कई दफ़ा तो आय के आने से पहले ही खर्च हो चुका होता है - उधार और लोन लेकर. ऊपर से, हर कहीं मुफ़्त में मिल रहे क्रेडिट कार्ड ने आय और संपत्ति का गणित भयंकर रूप से गड़बड़ा दिया है. आय है नहीं, आने वाले समय में आय का कोई जरिया दिखता नहीं, मगर जेब में रखा क्रेडिट कार्ड मचलता रहता है - किसी मशीन में स्वाइप होने को - खर्च हो जाने को.

आप कहेंगे - राजनीतिज्ञों की, नेताओं की आय का अलग फंडा होता है, और उनमें गणितीय नियम लागू नहीं होते. ठीक है, मान लिया, परंतु आय और खर्च का फंडा तो वहां भी होता है. जितना खर्च चुनाव में जीतने के लिए किया गया होता है - यानी की ‘इनवेस्टमेंट मनी' उसे तो ब्याज सहित वसूलना होता है कि नहीं? और क्या जीवन में एक ही बार चुनाव लड़ना होता है? अगले चुनाव में लड़ने के लिए खर्चा कहाँ से आएगा? अतः अगला व पिछला हिसाब बराबर करने के लिए आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक, और अधिक स्रोतों से आय प्राप्त की जाती है. इसे आय से अधिक संपत्ति कैसे कहेंगे? ऊपर से, माना कि कुछ ऊपरिया आय अभी दिख गई नजर में, मगर भैये, अगले चुनाव के लिए खर्चे में तो वह पहले ही डला हुआ है - फिर आय से अधिक संपत्ति कैसे हुई?

इसी तरह, क्या कोई ग्यारंटी है कि अगले चुनाव में जीत ही जाएंगे? आजकल जनता भी होशियार हो गई है. बदल-बदलकर मुँह का जायका ठीक करने की तर्ज पर नेताओं को भी आजमाने लगी है. तब आज के राजशाही ठाठ-बाठ भला दस पंद्रह हजार के पेंशन में बना रह पाएगा भला? तो, यदि हार गए, तो आने वाले वर्षों में जब तक फिर से किसी लाभ के पद का जुगाड़ नहीं हो जाता, उस राजशाही ठाठ-बाठ को बनाए रखने के लिए पैसा कहाँ से आएगा? यह खर्चा भी तो आय के ब्यौरे में पहले से ही डला हुआ है. आय ठीक से हुई नहीं और आप यह सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि आय से अधिक संपत्ति है!

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व्यंज़ल

आय कम खर्च ज्यादा है

फिर भी पीने का इरादा है


इस दौर में पहचानें कैसे

कौन राजा कौन प्यादा है


यहाँ चेहरे सबके एक हैं

ओढा सभी ने लबादा है


अब न करेंगे कोई इरादा

बचा एक यही इरादा है


मुसकराहटों में अब रवि

विद्रूपता जरा ज्यादा है

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संबंधित आलेख - लालू आरती

तथा लालू आरती2

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3 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. बेनामी8:17 pm

    आपको बिहार प्रदेश में स्कूली पाठयक्रम के लिये गणित की पुस्तक लिखने निमंत्रित किया जाता है. :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी8:21 pm

    आपको बिहार प्रदेश में स्कूली पाठयक्रम के लिये गणित की पुस्तक लिखने निमंत्रित किया जाता है. :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. समीर जी,
    बहुत-2 धन्यवाद! अहोभाग्य मेरे!!

    उत्तर देंहटाएं

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