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इंटरनेट बुराइयों की जड़ है...

मैं अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। तब इंटरनेट नहीं था, ईमेल नहीं था (और न ही पॉर्न साइटें थीं)। आज के शोध छात्रों के विपरीत, मुझे अपनी परियोजना फ़ाइलों को पूरा करने के लिए विद्यालय के ग्रंथालय तक नित्य दौड़ लगानी होती थी, सैकड़ों भारी भरकम पुस्तकों को उठापटक कर हजारों पृष्ठों में से मसाला खोजना होता था, टीप लिख-लिख कर रखना होता था, अपने प्रोफ़ेसर के साथ घंटों बैठकर दिमाग खपाकर प्रत्येक महत्वपूर्ण बात को दुबारा-तिबारा ढूंढ ढांढ कर लिखना होता था।

तब अगर आज की तरह मेरे पास इंटरनेट होता तो मुझे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं होती। मैं अपने शोध विषय के कुछ शब्दों को लेकर गूगल पर कुछ खोजबीन करता और कम्प्यूटर तंत्र की सबसे बढ़िया ईजाद - ‘नक़ल कर चिपका कर’ यानी कि कॉपी/पेस्ट के जरिए देखते ही देखते मेरा बेहतरीन, तथ्यपरक, मौलिक शोध ग्रंथ तैयार हो जाता। किसी तरह की कोई झंझट नहीं होती। आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास इंटरनेट है। गूगल है।

आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास गूगल है।

मैं किसी सूरत अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। पुराने दिनों में चिट्ठियों को बड़े ही सोचविचार कर लिखना होता था, दो चार बार तो उन्हें पढ़ना होता था और फिर आवश्यक बदलाव कर, डाकटिकट चिपकाकर उन्हें पोस्ट करना होता था। क्या पता किसी चिट्ठी में गलत भाषा या कुछ गलत लिख लिखा गया हो और सामने वाले को समस्या हो जाए? डाक के डब्बे के मुँह पर डालते समय भी अगर मुझे कुछ याद आता था तो वह पत्र फाड़ कर नए सिरे से फिर से अच्छी भाषा में अच्छी बात लिख कर चिट्ठी भेजता था। कई ख़तों से इत्र की खुशबु आती थीं जो सामने वाले अपना अभिन्न समझ कर पत्र में खुशबू लगाकर मुझे भेजते थे, परंतु उन्हें यह नहीं पता होता था कि मुझे हर किस्म के इत्र से एलर्जी है। मैं पत्रों के जरिए फैलने वाले एंथ्रेक्स किस्म के वायरस जन्य बीमारियों तथा बढ़ते आतंकवाद के चलते पार्सल बम के फोबिये से भी ग्रसित था। धन्य है इंटरनेट। इसने मेरी सारी समस्या का समाधान कर दिया है।

अब तो मुझे अपना पत्र लिखने और पत्र का प्रत्युत्तर देने के लिए लिफ़ाफ़े और डाकटिकट तो क्या, सोचने की जरूरत ही नहीं होती। अब मैं अपने कम्प्यूटर के ईमेल क्लाएंट पर ‘जवाब भेजें’ बटन को क्लिक करता हूँ, एसएमएस जैसी संक्षिप्त किस्म की नई, व्याकरण-वर्तनी रहित, स्माइली संकेतों युक्त भाषा में संदेशों को लिखता हूँ, और ‘भेजें’ बटन को क्लिक कर देता हूँ। मेरा ईपत्र दन्न से सामने वाले के कम्प्यूटर पर हाजिर हो जाता है।

वैसे भी, स्पैमों की मार से मर चुके ‘बेचारे’ सामने वाले के पास आपके ईपत्र की भाषा और वर्तनी के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ होता है! वह आपके ईपत्र को पढ़ ले यही आपके लिए बहुत है। पहले मैं पत्र लिखने में कोताही करता था। तमाम झंझटें थीं। पत्र लिखो, सुधारो, लिफ़ाफ़े में डालो, चिपकाओ, टिकट चिपकाओ, लाल डिब्बे में डालो। अब ईपत्र तो मुफ़्त में उपलब्ध है बिना झंझट। लिहाजा हर संभव ईपत्र को अपने सभी जानने वालों को अग्रेषित करता रहता हूँ। मेरे इस काम में कुछ वायरस भी मेरा हाथ बटाते हैं जो मेरे नाम से कई परिचितों-अपरिचितों को अपनी ही प्रतिकृति युक्त ईपत्र भेजते रहते हैं।

अहा! इंटरनेट। जीवन आज से पहले इतना आसान कभी नहीं था। पहले मुझे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के यहाँ उनसे मिलने - जुलने - बोलने - बताने - खेलने - गपियाने हेतु आवश्यक रूप से जाना होता था। कितना कष्टप्रद होता था भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़कों पर से गुजर कर अपने अनन्य के पास जाना। उन तक पहुँचते-पहुँचते सारा उत्साह ठंडा हो जाता था और मन में अपराध बोध-सा आ जाता था कि ऐ अनन्य मित्र हमने तेरी खातिर कितने कष्ट सहे! परंतु अब तो मुझे सिर्फ इंटरनेट से जुड़ा एक अदद कम्प्यूटर और एक वेबकैम चाहिये बस। अब मैं अपने ही कयूबिकल से ही विश्व के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति से रूबरू बात कर सकता हूँ, उसके साथ रूबरू शतरंज खेल सकता हूँ और अगर सामने वाला दोस्त राज़ी हो तो कुछ दोस्ती यारी और प्यार रोमांस की भी बातें कर सकता हूँ - और यह सारा कुछ अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट से! मैं एक साथ, चैट और मैसेंजर के जरिए दर्जनों लोगों से, दर्जन भर अलग अलग विषय पर, जो दर्जन भर अलग अलग जगह से होते हैं, एक ही समय में एक साथ बात कर सकता हूँ। और देश-काल-भाषा-संस्कृति और समय की सीमा से परे बातें करते रह सकता हूँ।

मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ।

यहाँ तक कि मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ। जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठकर आराम से चाय के घूँट सुड़कता हुआ चैट के जरिए लोगों से बातें कर सकता हूँ तो फिर इसके लिए उनके पास जाकर बात करने की आवश्यकता ही क्या है? इसी तरह से अब जब मैं अपने घर से इंटरनेट के जरिए पिज्जा हट से घर पर ही पिज्जा मंगवा सकता हूँ - तो क्या मैं बेवकूफ हूं जो इसे खरीदने के लिए चार मोहल्ला पार कर भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़क पार कर पिज्जा खरीदने पिज्जा हट जाऊँ? हट!

इंटरनेट उपयोक्ता के रूप में मैं अपने आपको एलीट श्रेणी यानी कि - उस श्रेष्ठी वर्ग में गिनता हूँ - जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। विश्व में अब दो ही किस्म के लोग हैं - एक जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं। प्रगतिशील, समृद्ध, श्रेष्ठी वर्ग इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। गरीब फ़ूहड़ इंटरनेट इस्तेमाल नहीं करता है। इंटरनेट के जरिए मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन पर तमाम विश्व की ताज़ा जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं और विश्व के ताज़ा समाचार मेरी उंगलियों पर रहते हैं। अपने कुंजीपट के कुछ कुंजियों को दबाने की देर होती है बस। धन्यवाद इंटरनेट।

इंटरनेट के जरिए जब आप सही में वैश्विक हो जाते हैं, तो फिर आपको ये छोटे मोटे बेकार के घरेलू या आसपड़ोस की घटनाओं से क्या लेना देना। इज़राइल की गाज़ा पट्टी पर ताज़ा हमले और ओसामा के नए वक्तव्य के समाचार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बजाए इस समाचार के कि पड़ोस के सूने मकान में पिछली देर रात तब चोरी हो गई जब मैं चैट में व्यस्त था। वैसे, कुछ खटपट की आवाजें मैंने भी सुनी थीं, परंतु उससे मुझे क्या - भई, यह तो स्थानीय पुलिस का काम है खोजबीन करे और चोरों को पकड़े। और, वैसे भी, मुझे तो अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ना था, ढेरों ईपत्रों का जवाब देना था और कुछ चिट्ठों पर टिप्पणियाँ करनी थीं - कुछ चिट्ठाकार टिप्पणियाँ नहीं करने से नाराज से चल रहे दीखते हैं।

इंटरनेट ने लाखों लोगों को लाखों तरीकों से रोजगार दिया हुआ है। अगर इंटरनेट नहीं होता तो सैकड़ों फ़िशर्स, स्पैमर्स, वायरस लेखक तो भूखे ही मर जाते। हैकरों और क्रैकरों का क्या होता। पॉर्न इंडस्ट्री कहां जाती? इंटरनेट - तेरा भला हो, तूने आधी दुनिया को भूखे मरने से बचा लिया। अगर हैकर्स और क्रैकर्स नहीं होते तो दुनिया में पायरेसी कहाँ होती और पायरेसी नहीं होती तो दुनिया में कम्प्यूटर और इंटरनेट का नामलेवा भी नहीं होता - यह मात्र अभिजात्य वर्ग की रखैल माफ़िक बन रहती। धन्यवाद इंटरनेट। तमाम तरह के कीज़ेन व क्रेक के जरिए मेरे कम्प्यूटर में लाखों रुपयों के सॉफ़्टवेयर संस्थापित हैं - भले ही उनकी आवश्यकता मुझे हो या न हो - मैं और मेरा कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के मामले में अमीर तो हैं ही! अगर इंटरनेट नहीं होता तो मैं विश्व के बहुत से महान सॉफ़्टवेयर जिनमें ऑडियो वीडियो सीडी नक़ल करने के औजार व कम्प्यूटर खेल इत्यादि भी सम्मिलित हैं, का इस्तेमाल ही नहीं कर पाता।

इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है।

इंटरनेट ने दुनिया को मनोरंजन युक्त जानकारियों का नया, नायाब माध्यम दिया है। हजारों लाखों पॉर्न साइटों के जरिए आप चीन और चिली की सभ्यता के प्रेम-प्यार के आचार-व्यवहार-बर्ताव का बढ़िया और बारीकी से अध्ययन कर सकते हैं। इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है। आप इंटरनेट से हर चीज मुफ़्त में पा सकते हैं - एमपी3 से लेकर वीडियो तक। और यदि कोई चीज मुफ़्त नहीं मिल रही हो तो उसे मुफ़्त करने का क्रैक चुटकियों में पा सकते हैं। इंटरनेट इज़ अ ग्रेट लेवलर।


ले दे कर अभी तीन-चार साल ही हुए हैं मुझे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए और मैं तो इसके पीछे पागल हो रहा हूँ। मैं भोजन के बगैर कुछ दिनों तक जी लूंगा, पानी के बगैर कुछ घंटों जी लूंगा, शायद हवा के बिना भी कुछ मिनट टिक जाउं। परंतु इंटरनेट के बगैर, एक पल भी नहीं! इंटरनेट तो अब मेरी मूलभूत आवश्यकता में शामिल हो गया है। भोजन, पानी और हवा की सूची में पहले पहल अब इंटरनेट का नाम आता है।

और आप चाहते हैं कि मैं कहूँ - इंटरनेट बुराइयों की जड़ है? माफ़ कीजिएगा महोदय, मेरे विचार आपसे मेल नहीं खाते। बिलकुल मेल नहीं खाते!

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(निरंतर [वर्तमान में उपलब्ध नहीं,] पर नवंबर 06 में पूर्व प्रकाशित)

टिप्पणियाँ

  1. यह भी खुब रही. सेम्पल दिखा कर ग्राहक बटोरे जा रहे हैं. :)

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  2. ये रिडारेक्शन की स्टाईल पसंद आई, अगर ये न होता तो बेहतरीन लेख तो छूट ही गया था हमसे!! साधुवाद, नये नये तरीके इजाद करते रहने के लिये..:)

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  3. बेनामी10:40 pm

    "इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है। आप इंटरनेट से हर चीज मुफ़्त में पा सकते हैं - एमपी3 से लेकर वीडियो तक। और यदि कोई चीज मुफ़्त नहीं मिल रही हो तो उसे मुफ़्त करने का क्रैक चुटकियों में पा सकते हैं। इंटरनेट इज़ अ ग्रेट लेवलर।"

    लेख काफ़ी अच्छा लगा। सच्चाइ के बिलकुल करीब

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  4. मैं इस व्यंग्य से सहमत नहीं हूँ। अपनी सहमती मैं अपने ब्लॉग पर ही व्यक्त करुँगा।

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  5. बिलकुल पते की और गिन गिन कर बाते बताईं आपने -इन्टरनेट जिंदाबाद !

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  6. पूर्ण रूपेण सहमत नही, किन्‍तु यर्थात से परे भी नही।

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  7. पहले मै भी इसे बुराई ही मानता था लेकिन अब ये ज़रुरत मे शामिल हो गया है।

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  8. राज की सच्चाई को व्यंग रूप देना बहुत लाजवाब है ये आलेख और आपसे मै भी सहमत हूँ आभार

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  9. हमारी टिप्पणी भी यहाँ रीठेल है ही तो अब क्या लिखें, उसे ही फिर से दिया हुआ मान लें.

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  10. सही है। इंटरनैट के लिए तो यही गीत गा सकते है:
    ओ साथी रे! तेरे बिना भी क्या जीना......

    इंटरनैट पर निर्भरता कुछ इस कदर बढ गयी है, इंटरनैट के बिना जीवन के बारे मे सोचना भी मुश्किल है।

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  11. bahut achha lekh laga,suvidha bahut hai,magar wo din beete huye purane khat ke yaad aate hai,

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  12. मज़ा आया. लेकिन रवि जी, मैं यह जानने को उत्सुक हूं कि नवम्बर 06 (जब यह लेख लिखा गया था) से अब तक आपके सोच में क्या परिवर्तन हुआ है? एक पुनश्च: लिख डालें.

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  13. इन्टरनॆट एक क्रन्तिकारी खोज है. इसमे बुराई कि अपेक्षा अच्छाइया ज्यादा है.

    हा इससे अश्लीलता को बहुत बढावा मिला है.

    आप google में लिखे हिन्दी कहानी,मेरि कहानी आदि और आगे पेजो पर जाये.

    पढने वाला शर्म से...........

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  14. बस, बहुत। यह लास्ट टिप्पणी। और कमरे से निकल घूम कर आता हूं बाहर एक राउण्ड!

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  15. मजा तो तब आयेगा जब नेट पर मिलने के बाद वही आदमी मोहल्ले में दिखेगा । अरे! यहीं रह्ते हैं ।

    यही है ग्लोबलाइज़शन का कमाल, सब बराबर दूरी पर ।

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  16. बोलो इण्टरनेट जी की जय !

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  17. लगता है आपने अपने रायपुर प्रवास के दौरान मेरे मन को पढ़ कर यह लिखा है ;)

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  18. रवि भाई व्यंग मे ही सही सच्ची बात कह गये. रायपुर मे यही कहने वाले थे क्या?

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  19. आप चाहे जो कहें, मुझे अन्तरजाल की सबसे खराब बात यह लगती है कि यह वास्तविक दुनिया से दूर करता है आपको एक कमरे में बन्द कर देता है। यही हाल टेलीविज़न का है।

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  20. इण्टरनेट का प्रयोग समझदारी से करने से आपको किसने रोका है? मुझे तो किसी ने नहीं रोका। इतनी बड़ी सुविधा का लाभ उठा रहे हैं तो थोड़ी कीमत सावधानी और सतर्कता के रूप में देना पड़ेगा ही। फिर भी सौदा बुरा नहीं है।

    रही बात इस पर आधारित व्यवसाय की तो इसकी सस्टेनेबिलिटी के लिए कोई तो सपोर्ट चाहिए जो हमारी मुफ़्तखॊरी की भरपायी कर सके।

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  21. बहुत हद तक ठीक भी है लेकिन समस्या आप जानते ही होंगे कि आदमी शायद मशीन होने लगता है, निर्जीव मशीन…फिर भी हम भी कुछ इसी वर्ग में हैं, ऐसा मान लेते हैं…अग्रवाज जी ने कब लिखा है, यह तो नवम्बर 06 में ही पढ़ रहा हूँ। शायद आपने टिप्पणी में दिन या तारीख नहीं रखा है, इसी से पता नहीं चलता…

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