शनिवार, 25 नवंबर 2006

क्या है ये जीरो बेस्ड सिस्टम?

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हमें भी चाहिए जीरो बेस्ड सिस्टम...

लालू की रेल देश भर में एक दिसम्बर से जीरो बेस्ड समय सारिणी लागू कर रही है. ये जीरो बेस्ड क्या होता है? दरअसल, भारत की सभी ट्रेनों को शून्य यानी रात के बारह बजे पर प्रारंभ होता मान लिया जाता है और फिर कम्प्यूटर सिमुलेशन के जरिए रेल पटरी की उपलब्धता, स्टेशन पर रुकने का समय, गति, कॉशन आर्डर, इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नई समय सारिणी बनाई गई है. यही शून्य आधारित समय सारिणी है. बताते हैं कि इसे लागू करने से ट्रेनों की गति में इजाफ़ा होगा और जो ट्रेन 500 किमी की दूरी 8 से 10 घंटे में तय करती थी अब वह 1 दिसम्बर से 5 से 7 घंटे में तय करेगी.

अगर सचमुच ऐसा है तब तो यह जीरो बेस्ड सिस्टम बहुत अच्छा है. भारत में सरकार के हर विभाग में इसे लागू करना चाहिए. हर विभाग की गति इधर बहुत धीमी हो गई है. कोई फ़ाइल, सरकारी नियम के अनुसार 5 से 7 दिन में एक सेक्शन से दूसरे में खिसक जाना चाहिए, पर वह बिना वज़न के एक तो खिसकती ही नहीं और बहुत से कॉशन ऑर्डरों के साथ ले देकर 50 से 70 दिन में खिसक पाती है. जीरो बेस्ड सिस्टम से निश्चित ही इसमें कमी आएगी.

भारतीय संसद में भी जीरो बेस्ड सिस्टम लागू किया जाना फलदायी रहेगा. घंटेभर का शून्यकाल तो है ही वहां - हंगामा करने के लिए. शून्य आधारित संसद काल बन जाएगा तो सारे समय ही हंगामा होता रहेगा. संसद सदस्यों के फायदे ही फायदे रहेंगे. हंगामा करो और खबरों में बने रहो. दुनिया को दिखाओ, अपने संसदीय क्षेत्र में दिखाओ कि देखो हम कैसा इंटेंस काम करते हैं. और अब तो संसद से सीधा प्रसारण के दो-दो चैनल हैं - चौबीसों घंटे चलने वाले. वैसे भी संसद कौन सा चल पाता है. जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह दिखावा करती है कि संसद चलाना है. और जो पार्टी विपक्ष में होती है वह दिखावा करती है कि संसद नहीं चलाना है. और, जाहिर है संसद तो है कि चलने पर नहीं चले जब तक कि उसमें जीरो बेस्ड सिस्टम लागू नहीं हो.

भारत में जीरो बेस्ड सिस्टम का नया संविधान लागू कर दिया जाना चाहिए. सबकी जाति और सबका धर्म जीरो मानकर नया संविधान बनाया जाए. कोटा-आरक्षण का लफड़ा इस जीरो बेस्ड सिस्टम से तो खतम ही हो जाएगा. इस जीरो बेस्ड सिस्टम में या तो हंड्रेड परसेंट आरक्षण हो जाएगा, या आरक्षण जड़ से ही मिट जाएगा तब कौन हल्ला करेगा. परंतु इसे कोई लागू नहीं करेगा. इससे राजनीतिक पार्टियों के बेस जीरो हो जाने का खतरा जो है.

जीरो बेस्ड सिस्टम के नए नए प्रयोग किये जा सकते हैं. मसलन किसी विभाग में घूस और परसेंटेज की वर्तमान दर को जीरो बेस्ड मानकर आगे के वर्षों के लिए दर तय किए जा सकते हैं. भई, चहुँ ओर मंहगाई जो बढ़ रही है - ऐसे में यह जीरो बेस्ड तंत्र बहुत काम का होगा.

मुझे और अजीब खयालात आ रहे हैं. मैं अपनी इस चिट्ठा प्रविष्टि को जीरो बेस्ड मानकर यहीं से शुरूआत मानूं तो हो सकता है कि मेरे लेखन में और तेज़ी आएगी. दिन में दो-दो पोस्टें करने लगूं. परंतु फिर पाठकों के खोने का खतरा है. पाठक भी जीरो बेस्ड सोचने लगेंगे - क्या सुबह शाम रोज रोज लिखता है ! इतना कोई कैसे पढ़ेगा! इसको जीरो करो.

जीरो बेस्ड तंत्र के और अधिक अनुसंधान में मैं अभी भी लगा हुआ हूँ...

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3 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. ये अच्छी खबर है कि समय की बर्बादी की ओर ध्यान गया है और उसको दूर करने का प्रयत्न किया जा रहा है। यदि लालू यह कर दिखाते हैं तो देश के लिये यह एक और बड़ी उपलब्धि होगी। इसका सभी क्षेत्रों मे अनुसरण किया जाय तो क्या कहने? समय की बर्बादी और भ्रटाचार का गठबन है। इसमें से किसी को खत्म करने से दूसरा अपने-आप खत्म हो जायेगा।

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  2. लालूजी ने रेलवे के लिए जो किया है और कर रहे हैं वह वाकई सराहनीय है। आशा है उनके कार्यकाल में रेलवे विकास के नये आयाम छुएगा।
    अच्छी जानकारी है। शुक्रिया।

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  3. लालू ने इस क्षेत्र में तो कम से कम अनुसरणीय कार्य किया है.
    आपके अनुसंधान के लिये ढ़ेरों शुभकामनाऐं और लगे रहें, मुन्ना भाई!!

    -अच्छी जानकारी है, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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