गुरुवार, 9 नवंबर 2006

इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए

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इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए - गौरवशाली 150 वां अंक

विज्ञान और सूचना तकनीक का ज्ञान बांटने वाली पत्रिका - ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' भोपाल (मध्यप्रदेश) से पिछले 19 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है. 7 नवंबर को इसके 150 वें अंक के लोकार्पण के अवसर पर मेरा भी एक प्रस्तुतिकरण था. विषय था - ‘हिन्दी कम्प्यूटिंग - भूत, वर्तमान और भविष्य'. रवीन्द्र भवन के खचाखच भरे हाल में जब हिन्दी की गाथा सुनाई गई, तो सुई-टपक सन्नाटा छाया रहा. लोग कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करते तो हैं, परंतु कम्प्यूटरों में हिन्दी भी छा चुकी है, यह उन्हें पता ही नहीं है!

प्रस्तुतीकरण में विंडोज, लिनक्स तथा गूगल (खोज व मेल) के साथ साथ हिन्दी चिट्ठा जगत के कुछ स्क्रीनशॉट दिखाए गए तो सभागार प्रफुल्लित हो उठा. और देर तक तालियाँ बजती रहीं.

‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' पत्रिका का प्रकाशन भोपाल की संस्था आईसेक्ट (आल इंडिया सोसाइटी फ़ॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कम्प्यूटर टेक्नॉलाज़ी) करती है. आईसेक्ट की परिकल्पना आज से बीस वर्ष पूर्व संतोष चौबे ने की थी. वे अभियांत्रिकी में स्नातक थे और आईएएस के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा में थे. उन्होंने जब देखा कि सरकारी कार्यों में हाथ बंधे होते हैं तो उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और कम्प्यूटर सिखाने की इस संस्था आईसेक्ट की नींव डाली. आज यह संस्था और इस संस्था के कम्प्यूटर शिक्षा के मॉडल इतनी प्रगति पर हैं कि भारत सरकार आईसेक्ट मॉडल की तर्ज पर गांवों में एक लाख कम्प्यूटर शिक्षा केंद्र खोल रही है. आईटी क्षेत्र में इनके योगदान के फलस्वरूप संतोष चौबे को वर्ष 2005 का भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त इंडियन इनोवेशन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है.

कार्यक्रम के दौरान ही डॉ. वि. वि. गर्दे जी से मुलाकात हुई. बीएचईएल भोपाल में पहले पहल कम्प्यूटरों को लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. सत्तर वर्ष से अधिक की उम्र हो चुकी है, और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से वर्तमान में वे पैरों से चलने से लाचार हैं, फिर भी कई नामी कंपनियों के सलाहकार मंडल में अभी भी हैं. आप 1964 से कम्प्यूटरों का प्रयोग करते आ रहे हैं और उस जमाने से बीएचईएल जैसी सरकारी संस्था में पूर्ण कम्प्यूटरीकरण का ख्वाब देखा करते थे.

गर्दे जी ने कम्प्यूटरों के इस्तेमाल के बारे में कुछ मनोरंजक बातें भी बताईं. वे केड-केम के लिए कुछ कम्प्यूटरों का आयात करना चाहते थे. तब रीफ़ॉर्म नहीं थे, और भारत सरकार से आयात की अनुमति लेना होती थी. जाहिर है, उन्हें आयात की अनुमति नहीं मिली. तब उन्होंने दूसरा रास्ता निकाला - उन्होंने सेवा का करार किया, और कम्प्यूटर किराए पर लाए. इसमें सरकार को कोई आपत्ति नहीं थी, भले ही किराया साल भर में खरीद कीमत से भी ज्यादा हो रहा था.

बहरहाल, काम जारी रहा, और कुछ साल भर बाद बीएचईएल के वित्त विभाग के अफ़सरों का फरमान आ गया कि आप जो कम्प्यूटरों पर खर्च कर रहे हैं उसके एवज में आपका परिणाम क्या रहा और कम्प्यूटरों के एवज में क्यों न कुछ कर्मचारी कम कर दिए जाएं? गर्दे जी ने परिणाम दिखाने के लिए एक साल की मोहलत मांगी. उस एक साल में उन्होंने चतुराई भरा पहला काम यह किया कि वित्त विभाग का सारा कार्य कम्प्यूटरों पर स्थानांतरित कर दिया. तब सारा कार्य कोबोल में होता था और प्रायः हर चीज की इन-हाउस प्रोग्रामिंग करनी पड़ती थी.

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साल भर के भीतर ही वित्त विभाग पूरी तरह से कम्प्यूटरों पर निर्भर हो गया. लंबे लंबे आंकड़ों की गणना कैल्कुलेटरों से करने में और रपट बनाने में वित्त विभाग को पसीना आता रहता था, जिसे कम्प्यूटरों के इस्तेमाल ने दूर कर दिया था. साल भर बाद जब वित्त विभाग से फिर पूछा गया कि परिणामों को गिनाएँ तो गर्दे जी ने उत्तर दिया कि परिणाम भौतिक रूप में तो गिनाए नहीं जा सकते हैं, इनका प्रभाव लंबे समय बाद देखा जा सकेगा, परंतु अगर वित्त विभाग समझता है कि यह निवेश अ-वित्तीय है तो हम कम्प्यूटरीकरण का काम खुशी खुशी बंद कर सकते हैं.

वित्त विभाग में हड़कंप मच गया. कम्प्यूटरों पर पूरी तरह निर्भर हो चुके वित्त विभाग ने अपनी स्वीकृति दे दी. फिर इसके बाद तो बीएचईएल भोपाल पूरे देश में केड-केम का अग्रणी केंद्र बन गया और करोड़ों रुपयों का लाभ भी होने लगा.

कम्प्यूटरों के इस्तेमाल से संबंधित एक और मनोरंजक बात उन्होंने बताई. जब बीएचईएल भोपाल में नए नए कम्प्यूटर आए तो उनको चलाना सिखाने के लिए अधिकारियों/अभियंताओं की टोलियाँ बनाई गई. गर्दे जी ने शीघ्र ही अनुभव किया कि वरिष्ठ अधिकारी इनमें कोई रूचि नहीं ले रहे हैं. मामले की तह पर जाने से पता चला कि कम्प्यूटरों के भय के चलते व परफ़ॉर्मेंस एंक्जाइटी के कारण वरिष्ठ अफ़सर अपने कनिष्ठ अफ़सरों के साथ कम्प्यूटर कक्षा में जाना ही नहीं चाहते थे. लिहाजा एक जैसे स्तर के अधिकारियों को ही एक बैच में लिया गया, और फिर मामला बढ़िया चला.

कार्यक्रम में पत्रिका ने अपने लेखकों का भी सम्मान किया. विज्ञान व तकनीकी लेखकों से अनौपचारिक चर्चा में पता चला कि - कुछ पाठ्य पुस्तकों में ‘ज्ञानी अनुवादकों' ने बढ़िया, नायाब अनुवाद कर दिए हैं. कुछ उदाहरणार्थ नमूने प्रस्तुत हैं-

Organic manure - लैंगिक खाद

Animal Husbandry - पशुपतित्व

Villium Hunter - विलियम शिकारी

इत्यादि.

बहरहाल, केडीई में (*निक्स का विंडो वातावरण) एक अनुप्रयोग है जिसका नाम है - KColorChooser. इसका अनुवाद क्या होगा? याद रखें यह एक ‘नाम' है. के-कलर-चूसर? , के-रंग-चयनक या कुछ और?

2 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. लेख पढ़ कर लगता है पुस्तक ही खरीदनी पड़ेगी।

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  2. क्या अनुवाद है…इतिहास को भूगोल में बदल देने के लिए नई ईजाद है…

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