गुरुवार, 28 सितंबर 2006

आखिर इन पुरानी, विंटेज ग़ज़लों में क्या कमी थी?

पच्चीस साल पुरानी ग़ज़लें...

जब फुरसतिया जी ने अपनी पंद्रह साल पुरानी रचना धो-पोंछकर बाहर निकाली, उसे प्रकाशित किया और तमाम तालियाँ भी (टिप्पणियाँ) बटोर लीं , तो मुझे भी खयाल आया कि ऐसी पंद्रह क्या, मेरे पास तो बीस-पच्चीस बरस पुरानी, ‘विंटेज' करार दी जा चुकी रचनाएँ हैं, और उन्हें प्रकाशित कर मैं भी ‘एकाध' टिप्पणी तो लूट ही सकता हूँ. लिहाजा आप सभी के लिए मेरी पच्चीस साल पुरानी ग़ज़लें प्रस्तुत हैं. ये ग़ज़लें तब की हैं, जब प्रेम परवान चढ़ा हुआ था, उतार-चढ़ाव की हिलोरें ले रहा था, और, जैसे कि कहावत है, सावन में हर ओर हरा ही हरा नजर आता है - एक युवा, प्रेम में पगे कवि को हर ओर प्रेम-प्यार ही नजर आता है. वह बिजली के खम्भे को भी उसी प्रेम-मयी तीव्रता से देखता है जितना अपनी प्रेयसी को.

तो, इन ग़ज़लों में भले ही स्तरीयता न मिले, ‘ग़ज़ल' के बजाए ‘कूड़ा-करकट' महसूस हो, स्थापित लोग इन्हें ग़ज़ल के नाम पर कलंक मानें या सिर्फ घटिया तुकबंदी, मगर ये प्रेम प्यार में वैसे ही तीव्र अहसास से लिखी गई हैं जैसे ज्येष्ठ माह में चातक वर्षा की बूंदों के लिए रखता है.

और, जैसा कि फुरसतिया को अपनी पंद्रह साला पुरानी रचना के लिए मलाल था कि उस रचना ने उन्हें क्यों महान रचनाकार की पदवी नहीं दिलवाई, मुझे भी मलाल है कि मेरी इन ग़ज़लों ने मुझे स्थापित ग़ज़लकार क्यों नहीं बनाया?

बहरहाल, उन कारणों को मैं आज भी ढूंढ रहा हूं. तब तक आप पढ़ें इन अ-संपादित, अब तक अप्रकाशित ग़ज़लों (न, न - ये व्यंज़ल नहीं हैं, और न ही हास्य-ग़ज़ल.) को.

//*//
ग़ज़ल 1

इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं है अब
दिल के धड़कने का कोई सहारा नहीं है अब

सोचा था के मुहब्बत में सुकून पाएंगे हम
एक लम्हा भी खुशी का हमारा नहीं है अब

आदत पड़ी हुई है तेरे जुल्म-ओ-सितम की
तेरा प्यार भी तो हाए, गवारा नहीं है अब

हुए हैं जंग दुनिया में इक प्यार की खातिर
तेरे सिवा दुनिया में कोई प्यारा नहीं है अब

खाए थे कसमें संग वफा की राह में चलने के
तेरे नशेमन से वैसा कोई इशारा नहीं है अब

तेरी राह में गुजरेंगे बाकी बरस जिंदगी के
तेरी याद के सिवा कोई किनारा नहीं है अब

पहले तो आप थे, फिर तुम से तू हुए
तुझे कहने को रवि तुम्हारा नहीं है अब

**-**

ग़ज़ल 2

मय क्या है मयकशीं क्या है तेरी आँखों में डूब के जाना
दिल क्या है दिल-लगी क्या है तुझसे दिल लगा के जाना

लोग तो खाते रहे हैं कसमें और वादे सदियों से वफा के
वफ़ा क्या है कसमें वादे क्या है प्यार निभा के जाना

किसी बन्दे से पूछो खुदा क्या है खुदा की बन्दगी क्या है
खुदा और खुदा की बन्दगी तुझको खुदा मान के जाना

सुना था किसी से बिगड़ी लहरों में कश्ती डूबने की बातें
कश्ती और बिगड़ी लहरें क्या हैं तुझसे प्यार निभा के जाना

चाहत में मंजिल तो क्या, राहबर को भी भुला बैठे
राह क्या है राह-ए-मंजिल क्या है ये तुझे पा के जाना

तेरे न मिलने के बहानों में है एक वो जमाने की बातें
जमाना क्या है बहाने क्या हैं ये तुझसे मिल के जाना

एक ख्वाहिश थी के अपना भी कोई गुलिस्तां हो रवि
गुलिस्तां क्या है ये तुझे अपने दर पे पा के जाना

//*//

ग़ज़ल 3

हमको यकीं नहीं था कि इंतजार का हर एक लम्हा है मौत के बराबर
अब तलक गुमां था पर्वत के उस पार है धरती आस्मां के बराबर

जरा नजरों से अपनी किसी को किसी और अंदाज से देखा कीजिए
कुछ पता भी है आपको कि आपकी ये नजर है नश्तर के बराबर

अपने गेसुओं के खम इस तरह निकाला न कीजिए जनाब
दम निकलता है हर खम पर - हर जुल्फ़ है नागिन के बराबर

अंदाजे बयां तेरी इजहारे मुहब्बत का कोई तो तुझ से सीखे
एक गुस्से भरी निगाह है तेरी हजार मुहब्बत के बराबर

वो आए एक लम्हे के लिए चलो आए तो सही दर पे रवि
जमाना चाहे न माने हमें यकीं है वो लम्हा है जिंदगी के बराबर

वो जब चलते हैं तो मचल उठती है धरती और कांपता है आसमां
उनका हर कदम उठता गिरता है एक जलजले के बराबर

खत्म हो गई रौशनी चरागों की जो उनने उठाया आँचल जरा सा
उनके दीदार का सामना करे कैसे कोई वो है सौ बर्क के बराबर

**-**
बर्क = बिजली का चमकना

.

.

**.-**
ग़ज़ल 4

कर उनसे कोई बात जिगर थाम के
उनका जल्वा ए हुस्न देख जिगर थाम के

मर ही गए उनपे क्या बताएँ कैसे
डाली थी नजर उनपे जिगर थाम के

इतना तो है कि बहकेंगे हम नहीं
पी है मय हमने तो जिगर थाम के

पता नहीं महफ़िल में बहक गए कैसे
पी थी मय हमने तो जिगर थाम के

मेरी आवाज लौट आती है तेरे दर से
चिल्लाता हूँ बार-बार जिगर थाम के

वो दिन भी दूर नहीं जब तू आएगी
इंतजार है कयामत का जिगर थाम के

रवि ये इश्क है जरा फिर से सोच ले
चलना है इस राह पे जिगर थाम के

**-**

ग़ज़ल 5

किसी बहाने याद कर रंजिश ही सही
जिए जा रहे हर हाल गर्दिश ही सही

जिंदगी जीने को तो मुहाल है यहाँ
मौत के ले बहरहाल फुर्सत ही सही

तेरा प्यार न पाने का है ग़म नहीं
मुहब्बत न सही तो इबादत ही सही

मुद्दत से है खुशी नहीं मयस्सर
पीते हैं ग़म हो पीना मुश्किल ही सही

तरसते हैं तेरे इक इक दीदार को
चलो सपनों की मुलाकात ही सही

जमाना क्या है मेरी तेरी इक बात
मेरी न सही सिर्फ तेरी बात ही सही

रवि पूछे क्या फ़र्क है रोने हँसने में
ये बात न हो तो वो बात ही सही
**-**

ग़ज़ल 6

तेरी आँखों में अपनी निशानी देखी
तेरे लिखे हर्फ में अपनी कहानी देखी

तेरे जल्वा-ए-हुस्न का चर्चा है हर तरफ
ये चर्चा कई दफ़ा लोगों की जबानी देखी

तेरे मेरे मिलने में लफ़ड़े हैं कई हजार
इन लफ़ड़ों के बीच दुनिया बेमानी देखी

मेरे दर से तू गुजरती है इस तरह
के जाते हुए सिर्फ तेरी नादानी देखी

उम्र का तकाजा अपने साथ न रहा कभी
तुझे सामने देख हमने अपनी जवानी देखी

उस दिन से खुदा के हो गए हैं कायल
जब से तुझे देखा तेरी रवानी देखी

रवि आज तक समझ न सका कि क्यों
सारी दुनिया सिर्फ तेरी दीवानी देखी

//*//

ग़ज़ल 7


इस कदर तन्हा हैं के साया भी हमसे दूर है
दिल जिगर था जो खयालों में हमसे दूर है

हर वक्त मोहब्बत के दम पे जिए थे अब तक
वो खुदा मोहब्बत का बहुत हमसे दूर है

क्या करें यादों को मंजिल बनाए बैठे हैं
दीदार-ए-यार की वो कयामत घड़ी हमसे दूर है

मेरे हर लफ़्ज में तेरी कहानी भरी हुई है
जिसे सुनाएँ हाल-ए-दिल वो शख्स हमसे दूर है

हमने जलाए थे चराग करो यकीं हम पे
दवा क्या करें जो तकदीर हमसे दूर है

या खुदाया, क्या तेरी यही खुदाई है
तेरा नाम लेके चाहा वो ही हमसे दूर है

बड़े अरमां से जहर तूने पिया था रवि
ग़म से बचें कैसे जो मृत्यु हमसे दूर है

**-**

ऊपर प्रकाशित ग़ज़लों की पंक्तियाँ आपको कैसी लगीं? बीस बरस का, प्रेम में अंधा इसके सिवा और क्या लिख सकता है?

अब जरा मेरी लिखी ये ताज़ी पंक्तियाँ पढ़ें -

हुआ है इधर एक अजीब सा हादसा
शहर के कुत्ते सब सियार हो गए

वक्त आपकी आँखें खोल देता है और आप बहुत सी चीजें देखने लग जाते हैं. परंतु, फिर भी, अंधेपन का अपना, अलग मजा है!

आज का कार्टून स्ट्रिप:


3 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. वाह भई वाह, आप तो तब भी बेहतरीन लिखते थे. यूँ भी हम आज आपके व्यंजल के कायल हैं, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत साहस का काम किया आपने कि पुराने'कारनामों'को बयान करने वाली गजलों को कीबोर्ड और मानीटर मुहैया कराकर हम तक पहुंचाया.बहुत खूब,बधाई.

    जैसा कि फुरसतिया को अपनी पंद्रह साला पुरानी रचना के लिए मलाल था कि उस रचना ने उन्हें क्यों महान रचनाकार की पदवी नहीं दिलवाई,
    यह दर्द मेरा नहीं है.यह दर्द मेरी रचनाऒंका है कि
    दो साल में फुरसतिया तो ब्लागर से शुरू करके महाब्लागर हो गये लेकिन लेख बेचारा लेख ही रहा महालेख नहीं बन पाया.हम मलाल रहित हैं.
    आगे भी अपना पुराना स्टाक क्लियर करते रहें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. गज़ल सुनते समय आपको वाह..वाह.. करना पढता हैं. तो हमने भी हर दो पंक्तियों के बाद वाह..वाह.. करते हुए सारी पढ़ मारी.
    स्टोक बचा हो तो, दे मारो. आह.. नहीं वाह ही करेंगे.
    कार्टून वाला फंडा मौलिक और मजेदार हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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