महाब्लॉगर को जन्म दिवस की महा-बधाईयाँ...

सर्वाधिक पढ़े जाने वाले, सर्वप्रिय हिन्दी चिट्ठाकार, अनूप शुक्ला 'फ़ुरसतिया' जी के जन्मदिवस 15 सितम्बर पर उन्हें ढेरों बधाईयाँ! यथा - नाम -विपरीत गुण को साकार करते हुए फ़ुरसतिया जी इस दिन इतने व्यस्त रहे कि मेरे और प्रत्यक्षा के ईपत्रिया साक्षात्कार के जवाब देर रात तक प्रेषित कर पाए. वैसे, ग़लती हमारी भी थी जो हमने सोचा कि हम प्रश्न टिकाएँगे और चैट में हासिल प्रत्युत्तर की तरह दन्न से जवाब हासिल हो जाएगा.


बहरहाल, बहुतों के बड़के भैया और बहुतों के समस्या-सलाहकार , महाब्लॉगर अनूप शुक्ला के रविरतलामी और प्रत्यक्षा द्वारा लिए गए ईपत्रिया साक्षात्कार जिसे 15 सितम्बर को जन्मदिवस शुभकामना स्वरूप यहाँ पोस्ट होना था, एक दिन की देरी प्रस्तुत है. अनूप तथा पाठकों से क्षमायाचना सहित.


अनूप को एक बार फिर जन्म दिवस की ढेरों बधाईयाँ, और चिट्ठा-शुभकामनाएँ कि वे अपने चिट्ठा लेखन में नित नए आयाम बनाएँ, नए रिश्ते बनाएँ, और चिट्ठाकारों को नई दिशाएँ दें.

रविरतलामी के प्रश्न:

प्रश्न - अपने जन्म दिवस के खास मौक़े पर महाब्लॉगर किस विषय पर लिखना चाहेगा?

उत्तर- चाहता तो यह हूं कि ऐसा कुछ लिखूं कि यह 'महाब्लॉगर' की उपाधि से मुक्ति मिल जाय। पता नहीं देबाशीष को हमसे क्या नाराजगी रही कि मात्र दो साल की 'बाली उमर' के लेखन के पाप के कारण हमारे ऊपर यह उपाधि थोप दी । कानपुर में 'महा' आमतौर पर कानपुर में 'पुरुष' के पहले लगता है या बदमाश' के पहले। हम दोनों से ही बहुत दूर होने के भ्रम में हैं। लेकिन यह अपने बस में नहीं है।लोग आम तौर पर वे उपाधियां ही आपके ऊपर थोप देते हैं जिनसे आप सबसे ज्यादा बिदकते हैं। जातिवाद,कर्मकांड से बिदकने वाले नेहरूजी को सरे आम 'पंडितजी' बना दिया गया और कांग्रेस की अध्यक्षता(नेतागिरी) छो़ड़ने के लिये मजबूर होने वाले सुभाषचंद्र बोस 'नेताजी' कहलाये ।

तो जब इतने महान लोग अपने ऊपर लादी उपाधियां ढोने के सिवा कुछ न कर पाये तो हमारी क्या बिसात!तो कुछ और लिखेंगे जिसमें सबसे पहले सबेरे-सबेरे चिट्ठाचर्चा और समय मिला शाम को तो एक पोस्ट और किसी विषय पर टिका देंगे। विषय क्या होगा यह हमें खुदै नहीं पता तो आप को क्या बतायें?

प्रश्न -आप अकसर चिट्ठाकारों के आत्मसम्मान के झगड़े सुलझाते दिखाई-सुनाई पड़ते हैं?

उत्तर -यह आरोप सही नहीं है और मैं इसमें दोषी नहीं हूं। अपने किसी भी चिट्ठाकार दोस्त को अभी तक मैंने आत्मसम्मान जैसी बाहियात चीज के लिये झगड़ते नहीं देखा। हां,कभी-कभी कुछ दोस्त अपनी बेवकूफियां जाहिर करने के अधिकार को अपना मूल अधिकार मानकर उसका प्रयोग करते पाये गये। अपने को दूसरे से बड़ा बेवकूफ साबित करने में जान लगा देते हैं। अब चूकिं कक्षा ६ में हमने मूल अधिकारों के बारे में अच्छी तरह रट्टा लगाया था तो हम बता देते हैं कि भाई बेवकूफी का अधिकार मूल अधिकार में अभी तक शामिल नहीं हुआ तथा यह अभी केवल नेताऒ ,ऊंचे नौकरशाहों का ही विशेषाधिकार है। लोग मेरी बात मानकर बेवकूफियां बंद कर देते हैं तो इसमे हमारा क्या दोष?

प्रश्न - आपका चिट्ठा सर्वाधिक पठनीय होने के साथ सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला तथा सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त करने वाला चिट्ठा है। आपको कैसा महसूस होता होगा यह तो हमें पता है, लेकिन इसके लिए जो जुगत आप भिड़ाते हैं वह हमें बताएँ तो औरों का भी कुछ भला हो ।

उत्तर - पहले भी हमसे इस बारे में लोग पूछ चुके हैं। समीरजी और रत्नाजी ने पूछा था कि मैं इतना अच्छा कैसे लिख लेते हैं? ये और दूसरे तमाम लोग वे लोग हैं जिनका लिखा मैं मुग्ध होकर पढ़ता हूं।तो भैया ,मुझे तो यह आरोप मेरे साथ ज्यादती लगती है। वैसे आमतौर पर अगर लोग मेरे ब्लाग पर टिप्पणी करते हैं तो उसका कारण शायद मात्र लेखन नहीं है। इसका कारण लेखन के अलावा पाठकों से निस्वार्थ आत्मीयता के भाव के संबंध हैं जो आपस में बिना मुलाकात के भी बने हुये हैं। हमारे ब्लाग को अपना समझना उनकी उदारता का परिचायक है हमारी किसी अच्छाई का नहीं। इसके लिये हमें कोसना बेकार है रवि भाई!

प्रश्न - अभी हाल ही में आपने अपने नियमित चिट्ठालेखन का शानदार दो वर्ष पूरा किया और अपने चिट्ठापोस्टों का दो सैकड़ा भी पूरा किया. आगे कुछ योजनाएँ है दिमाग में?

उत्तर -योजना जैसी तो कुछ खास नहीं लेकिन यह सोच है कि मैं नियमित लेखन करता रहूं तथा निरंतर,चिट्ठाचर्चा जैसे आयोजनों को नियमितता प्रदान करने में सहयोग करता रहूं। इसके अलावा जो भी सहयोग चिट्ठा जगत मुझसे चाहे मैं अपनी क्षमता के अनुसार उसमें सहयोग कर सकूं। हिंदी के उत्कृष्ट लेखन तथा अपने शहर कानपुर के बारे में अधिकाधिक जानकारी नेट पर उपल्ब्ध कराने का भी विचार है।

प्रश्न - अकसर आप अपने चिट्ठाकारी के लिए रविरतलामी को दोष देते हैं और हिन्दी चिट्ठा जगत में किसी पंगे के लिए जीतू को. इन दोनों से आपकी क्या दुश्मनी है?

उत्तर:-हम सच बोलनें में भले हकलायें लेकिन लिखने में घबराते नहीं हैं। रवि रतलामी ने हमें ब्लाग लेखन की राह से रूबरू कराया तो हम इसका दोष उनको देते हैं। अब इसका वो चाहे बुरा माने या भला ! यही बात जीतेंदर के लिये सही है। जैसे जहां आग लगती है तो वहां धुआं जरूर होता है वैसे ही अगर कहीं कुछ भी लफडा़ ब्लाग जगत में होता है तो समझ लो जीतेंद्र वहां मौजूद हैं। जैसे बिना आक्सीजन के आग नहीं जल सकती वैसे ही बिना जीतेंदर के कोई पंगा आगे बढ़ ही नहीं सकता। अब अगर मैं अपने दोस्तों की खूबियों के बारे में जानता हूं और दोस्तों को इस बारे में बताता हूं तो इसमें दुश्मनी जैसे बात कहां से आ गयी यह हमें समझ में नही आ रहा है।

प्रश्न - ऐसी कौन सी चीज है जो आपको अपना चिट्ठा नियमित लिखने को प्रेरित करती रहती है? खासकर तब जब आपको पता होता है कि आपका चिट्ठा इने-गिने सौ-दो-सौ लोग ही पढ़ते हैं, और आपको यह भी पता होता है कि आने वाले दो-चार सालों तक इस स्थिति में कोई खास तबदीली भी नहीं आने वाली है?

उत्तर:-अपने ब्लाग में मैंने अपने लिखने का कारण बताया है-लिखने का कारण यहभ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुर्सत है। ये जो हमारे लेखन और गिने-चुने सौ-दो सौ पाठकों गठबंधन है वह वास्तव में शुरुआती घरेलू माहौल टाइप का है जहां किसी भी लेखक की झिझक मिटती है। हमें और हमारे तमाम दोस्तों को पता है कि हम लोग हमेशा अच्छा नहीं लिखते लेकिन पाठक जो है वो हमें घर के बुजुर्गों की तरह वाह बेटा बहुत खूब कहकर पीठ ठोंकता रहता है। लोग वर्तनी की तमाम गलतियां करते हैं ,बेतुकी बातें लिखते हैं, अच्छा-खराब लिखते हैं लेकिन कुल मिलाकर माहौल किसी घर में अलाव के आसपास बैठकर किस्सा हांकती चौपाल सा है जहां लोग एक दूसरे की पीठ ठोंकते-ठोंकते घायल कर देते हैं। ऐसे माहौल से चाहकर भी दूर नहीं हुआ जा सकता है। दो-चार दिन दूर रहना भी मुश्किल लगता है। लोगों की हालत -"जैसे उड़ि जहाज को पंक्षी,पुनि जहाज पर आवै" वाली हो जाती है। शायद यही बात प्रेरित क्या कहें मजबूर करती हैं नियमित लेखन के लिये।

प्रश्न - चिट्ठों या चिट्ठाकारों के नाम अते पते तो आपसे नहीं पूछते हैं, चूंकि इससे पंगा होने का खतरा है, मगर यह तो बता ही सकते हैं कि आपको किस विषय के चिट्ठे पढ़ने में ज्यादा आनंद देते हैं।

उत्तर:-कोई भी विषय जो मजेदार अंदाज में लिखा गया हो हम मजे से पढ़ते हैं। तकनीकी विषयों में अपना हाथ तंग होने के कारण कम भाते हैं।उनको हम पढ़ भले लें लेकिन समझने के लिये बाद के लिये छोड़ देते हैं फिर कभी नहीं समझते। लेखन में किस्सागोई के साथ-साथ शब्द संयोजन भी आकर्षित करता है। मजेदार होने के बावजूद,एक दम खुला मसाला पढ़ते हुये लगता है कि लेखक को पाठक पर भरोसा नहीं है ।मेरे ख्याल में पाठक को तब ज्यादा मजा आता है जब पढ़ने के साथ उसको लगे कि उसके दिमाग का भी प्रयोग हो रहा है । बिना दिमाग लगाये समझ में आने वाल सपाट लेखन को पाठक दुबारा नहीं पढ़ता। यह कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे मूंगफ़ली छीलकर खाने में जो मजा आता है वह छिले हुये दाने चबाने में कहां!

प्रश्न - देबाशीष का कहना है कि आप नित्य, अपडेट हुए तमाम चिट्ठों को पढ़ते हैं, चिट्ठों पर टिप्पणियाँ देते हैं. चिट्ठाचर्चा भी लिखते हैं. साथ ही नियमित, लंबे पोस्ट भी लिखते हैं.साथ में नौकरी, बीवी, बच्चे ...भी! समय प्रबंधन का जो नया तरीका आपके पास है उसे हम जानना चाहते हैं। या फिर, क्या आप दफ़्तर में चिट्ठाकारी का कार्य करते हैं?यदि हाँ तो इस प्रश्न का उत्तर देने से आप मना कर सकते हैं।

उत्तर:- समय संयोजन का कोई गुप्त तरीका नहीं है। यह सारी खुराफाते हम करते हैं उन्ही चौबीस घंटों में जो सबको मिलते हैं। हां यह बात है कि हम जब कोई काम करते हैं तो चाहे जितने सिरफिरेपन का हो हम उसे निपटा के ही छोड़ते हैं। दफ्तर में चिट्ठाकारी संभव नहीं है। हमारी ज्यादातर पोस्टें देर रात की लिखी हैं। स्वामी जी की सबसे पसंदीदा पोस्ट-ये पीली वासंतिया चांद हमने २६ जनवरी को रातभर लिखी और सबेरे पांच बजे पोस्ट की ।फिर नास्ता करके झंडा फहराने गये और फिर अतुल के पिताजी से मुलाकात करने गये तथा लौटकर सोये। कल रात को हम अनूप भार्गव से मिलने लखनऊ गये। बतियाते रहे ।रात केवल तीन घंटे सोये सबेरे लौटे ।लेकिन जवाब देने हैं तो दे रहे हैं। इसे भेजने के बाद घोड़े बेच देंगे।

तो मुझे लगता है कि दिनचर्या में नियमित अनियमितता के कारण ही नियमित लेखन होता है। इससे घर वालों के साथ जरूर कुछ अन्याय हो जाता है लेकिन नौकरी पर कोई नकारात्मक असर हम नहीं आने देते ।

प्रश्न - आपके चिट्ठों के जरिए तमाम दुनिया में आपके नए रिश्ते बन गए हैं आप चिट्ठाकारों के बड़े भाई बन गए हैं. वे आपकी बातें मानने-सुनने लगे हैं। आपके घर पर आपके चिट्ठों का क्या कोई धनात्मक प्रभाव दिखाई देता है?

उत्तर:-यह अतुल ,सागर और दूसरे साथियों का बड़प्पन है कि वे हमारी बात मान लेते हैं और अक्सर अपने मन के विपरीत होने के बावजूद हमारी बात को तरजीह देते हैं। अब अगर उन लोगों में अच्छाइयां हैं तो इसमे हमारा क्या दोष? वैसे सच तो यह है कि कोई भी सम्बंध एकतरफा नहीं बनता और न ही एकतरफा प्रयासों से बना रहता है। कोई भी संबंध बनाये रखने के लिये 'न्यूनतन आपसी ईमानदारी' होना नितान्त आवश्यक होता है। बेवकूफ से बेवकूफ व्यक्ति भी चालाक से चालाक व्यक्ति की हरकतें समझता है ,कहे भले न। मुझे यही लगता है कि चूंकि हमारे संबंधों में आपस में कोई स्वार्थ नहीं है और न ही प्रतिस्पर्धा जैसी बात तो यह अपनापा बना हुआ है। इसका जितना श्रेय मुझे है उससे ज्यादा उन लोगों को है जो हमारी सही गलत बातों को झेलते हुये भी निबाहते रहते हैं। हमारे घर पर हमारे चिट्ठों का कोई तात्कालिक धनात्मक प्रभाव जैसा कुछ नहीं दिखाई देती लेकिन जैसे अतुल,स्वामी,सागर,जीतेन्द्र हमें झेलते रहते हैं वैसे ही घर वाले भी निबाहते हैं।

प्रश्न - चिट्ठा लिखने के लिए आप कोई विषय कैसे तय करते हैं कि चलो 'इस' पर लिख ही दिया जाए. और जो सोचते हैं उस पर लिख ही लेते हैं हर बार? चिट्ठा पोस्ट लिख लेने के बाद क्या आप उसे संपादित परिवर्धित करते हैं या फिर जैसा लिखा वैसा चिपका दिया की तर्ज पर पोस्ट कर देते हैं?

उत्तर:- आम तौर पर संपादन परिवर्द्धन का काम करने के बजाय एक बार में लिख कर पोस्ट कर देते हैं। वर्तनी की गलतियों के अलावा पोस्ट में कुछ जोड़ते हैं तो ऐसे कि पता रहे क्या लिखा है। एकाध बार कुछ दोस्तों ने कुछ कमियां बताईं(राकेश खंडेलवाल ,भोलानाथ उपाध्याय आदि) तो हमने उसे काट कर सही किया। एक बार लिखकर पोस्ट कर देने तथा बाद में अपना लिखा पढ़कर-ये लिखने की क्या जरूरत थी ,क्या बकवास बात लिखी है सोचने में जो मजा है वह संपादन,संसोधन ,परिवर्द्धन करने में कहां?

प्रश्न - नंदन जी के बारे में यह बताने के लिए कि वे आपके मामा लगते हैं, आपने चिट्ठाकारी के पूरे दो वर्ष क्यों ले लिए? फ़ुरसतिया का लेखन इतना संकोचमय तो कभी नहीं रहा।

उत्तर:- नंदनजी हमारे मामा हैं यह हमारे कुछ दोस्तों को पता था ।फिर उनके बारे में जब उचित समय आया तब लिखा भी। संकोच जैसी बात नहीं लेकिन मुझे यह लगता रहा कि लोग ब्लाग हमारा पढ़ते हैं नंदनजी का भान्जा होने के कारण नहीं। वैसे कारण शायद यह भी रहा कि मामाजी से हमारा उतना साथ नहीं रहा जितना लाड़-दुलार वाले ये रिश्ते होते हैं। उनके काम की व्यस्तता और हमारे मिलन में अंतराल काफ़ी रहे। मुलाकातें कम हुईं समय और दूरी के कारण ।वैसे उनका मामा वाला रूप हमारे लिये उतना मह्त्वपूर्ण नहीं हो पाया जितना कि उनका रचनाकार वाला रूप और एक संघर्षशील व्यक्ति का। भयंकर अभावों में बचपन बिताते हुये अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ना ,बंबई के दिनों में धर्मयुग में भारती जी के तमाम अत्याचार सहते हुये भी पुराने संबंधों की गरिमा और मर्यादा निबाहते हुये उनका सम्मान करना ,फिर दिल्ली आकर प्रतिष्ठा-प्रभाव के शीर्ष तक पहुंचना और अब दोनों किडनी खराब होने तथा हफ्ते में दो डायलिसिस के बावजूद निरंतर सक्रिय बने रहना और इस तरह की तमाम बाते हैं जिनको देखकर आश्चर्य होता है कि कहां से लाते हैं इतनी जिजीविषा वे।यह सब सोचकर गर्व भी होत है कि वे हमारे मामा हैं । पहले क्यों नहीं बताया का कोई जवाब नहीं है सिवाय इसके कि किसी ने पूछा ही नहीं। वैसे और भी तमाम बाते हैं जो शायद आप बाद में कहें कि पहले काहे नहीं बताया!

प्रश्न - आपने अपने चिट्ठापोस्टों में व्यंग्य के कई बेहतरीन नमूने प्रस्तुत किए हैं। आपने लिखने व छपने की कोशिशें पहले क्यों नहीं कीं?

उत्तर:- पहले भी कुछ लेख लिखे लेकिन कहीं छपने के लिये नहीं दिये। नियमित लेखन इधर ब्लागिंग के कारण ही हुआ। अब छपाने का विचार है लेकिन आलस्य है और यह तय करना बहुत मुश्किल कि क्या छपने लायक है और क्या नहीं! कोई बहादुरी दिखाने वाला हो तो खोजे कि कौन से लेख छपाने लायक हैं। प्रश्न - 'फ़ुरसत का कोई दिन' का अर्थ आपके लिए क्या होगा? उत्तर:- 'फुरसत का दिन' का मतलब खाये-पिये-सोये। सोते-सोते थक गये तो थक कर फिर सो गये। तमाम काम की योजना बनाना और जब योजना पक्की बन जाये तो सोचना कि अब योजना पर अमल अगली फुरसत में किया जायेगा। वैसे फुरसत का एक दिन यह भी हो सकता है जब सबेरे से ही लगे कि सारा दिन बीत गया बेकार-

सबेरा अभी हुआ नहीं है लेकिन यह दिन भी सरक गया हाथ से हथेली में जकड़ी बालू की तरह अब, सारा दिन फ़िर इसी अहसास से जूझना होगा।

प्रश्न - चिट्ठाकारी के अतिरिक्त आपको और क्या करना सुहाता है?

उत्तर:- पढ़ना,दोस्तों से मिलना-जुलना, गपियाना। बीच में चैटिंग भी बहुत दिन मन रमा तमाम देश,दुनिया के लोगों से। आफिस का काम पूरा करना प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। पढ़ने का शौक इतना है कि रात में कभी बिना कुछ पढ़े कभी नहीं सोता।

प्रश्न - हिन्दी चिट्ठाकारी का व्यवसायिक भविष्य भले ही आपको नहीं दीखता हो, परंतु उसका कुछ तो भविष्य आपको दीखता होगा. आपके विचार में कैसा रुप होगा उसका?

उत्तर:- हिंदी चिट्ठाकारी का व्यवसायिक भविष्य नहीं दिखता यह बात सही नहीं है। मेरा सवाल यह है कि व्यवसायिकता के बारे में जो दावे किये जाते हैं उनको लेकर हैं। भविष्य को लेकर मेरे जो सवाल हैं उसमें आपको जवाब देना है कि सच क्या है? मेरा सोच सही है कि गलत। व्यवसायिकता के बारे में विचार यह है कि ब्लाग पर विज्ञापन दिखें न कि विज्ञापन पर ब्लाग पोस्ट। ऐसा न हो लेखन को विज्ञापन के बीच से बिन-बटोर कर पढ़ना पड़े। कुछ गरिमा रहे। मुझे याद है कि एक बार प्रो.यशपाल ऐसे सूर्यग्रहण के बारे में बता रहे थे जो सैकड़ों सालों में एक बार पड़ता है। ऐन ग्रहण के समय जब दुनिया ऐतिहासिक क्षणों का दीदार कर रही थी तब टेलीविजन वाले 'कामर्शियल ब्रेक' ले रहे थे।इस पर प्रो.यशपाल बहुत खीझे लेकिन 'ब्रेक' ब्रेक नहीं हुआ। ऐसी व्यवसायिकता से हमें बचना होगा। जहां चिट्ठाकारी के भविष्य के बारे में बात है ,समय के साथ लोग और आयेंगे। विविधता बढ़ेगी,शायद अराजकता भी।अभी जो आत्मीयता है उसमे शायद बाद में कुछ दूसरे मत वाले आयें। हो सकता है कोई नया क्षमतावाल लेखक आये और बोरिस येल्तिसिन की तरह टैंक पर चढ़कर पूरा माहौल कब्जियाने का प्रयास करे। अभी नारद के अपना सर्वर के विचार के धनात्मक परिणाम शायद आयें कि काफ़ी लोग और मसाला एक जगह आ जाये।

प्रश्न - चिट्ठाकारों को कोई संदेश देना चाहेंगे? वह इसलिए कि आपका दर्जा बड़े भाई जैसा है - लोगबाग आपकी बातें आदेश समझकर मानते हैं।

उत्तर:- मैंने पहले भी बताया कि हमारे साथी बहुत क्षमतावान हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं। तकनीक के मामले में किसी से कमतर नहीं हैं। मेहनत में किसी से कम पसीना नहीं बहाते। लोगों में आपस में लगाव है,सम्मान की भावना है। यह स्थिति अंग्रेजी ब्लागर्स के मुकाबले बहुत अच्छी है जहां कि एक ब्लागर्स के एंटी ब्लाग भी हैं। लोगों के आपसी संबंध इतने नजदीकी बन गये हैं कि घरेलू हो गये हैं। एक तरह की विरल अंतरंगता है आपस में। ये संबंध और प्रगाढ़ बनें यही कामना है।

कभी-कभी दूरी के कारण और विचारों में मतभेद होने के कारण आपस में गर्मा-गरमी भी होती है। जिसे रोकना न सम्भव है न जरूरी। लेकिन मेरी यही इच्छा और गुजारिश है कि दूसरे का पक्ष और मजबूरी जानने की कोशिश ईमानदारी से करते रहें तो मन में मैल नहीं जमेगा। जितने भी बार आपस में लोगों में कहा सुनी सुनी उसमें बहुत कुछ गैर इरादतन ,न्यूटन के नियमानुसार हुयी। लेकिन उसको लेकर बैठे रहना बचकानापन है। यह समझना चाहिये कि हर एक में अच्छाई का प्रतिशत हमेशा अधिक होता है।संबंधों में सौ दिन के सद्व्यवहार पर एक दिन का खराब व्यवहार नहीं हावी होने देना चाहिये।

इसके अलावा जब मौका मिले धांस के लिखें और जब लिखें तो यही समझें कि हम सबसे अच्छा लिख रहे हैं। लगातार लिखते रहने के लिये यह भ्रम बहुत जरूरी है।

प्रत्यक्षा के प्रश्न:

1) फुरसतिया को इतनी फुरसत कैसे रहती है ?

निरंतर अनियमित जीवन चर्या के बीच फुर्सत का समय पसरा रहता है।

2) आपके अंदर परसाई जी की आत्मा कब प्रवेश करती है ?

तब जब अपनी कथा लिख रहे होते हैं या तब जब दूसरों से मज़े ली जा रही होती है ? मुख्य बात मजे लेने की है। चाहे वो अपने आप से ली जा रही है या दूसरे से। वैसे अपने से मौज ले लेना एक सुरक्षात्मक और शातिराना तरीका इस बात की गारन्टी का कि दूसरे आपसे मौज न ले पायें।

3) ब्लॉग्गर समूह में बढते भाईचारे का श्रेय किसको देते हैं ?

लोगों के आपसी समझदारी को।और लोगों में अच्छे गुणों की बहुतायत और फिलहाल किसी स्वार्थ से रहित आपसी लगाव को। वैसे सच तो यह है कि भाईचारा इस लिये बढ़ता जा रहा है क्योंकि ज्यादातर ब्लागर पुरुष हैं। जब महिलाब्लागरों का बहुमत होगा तो ब्लागर समूह में 'बहानापा' बढे़गा।

4)आपने टिप्पणियाँ बाँटी , लोगों की प्रेमपूर्वक खींचाई की , व्यंग परोसे ,बदले में महाबलॉग्गर के पदनाम से आपको नवाज़ा गया । ये लेनदेन बराबरी की रही या नहीं?

यह ऐसा समीकरण है जिसका कोई हल नहीं है। लिहाजा फायदा-नुकसान की गणना नहीं की जा सकती है।

5)किसको लिखने में ज्यादा मज़ा आता है , आपबीती या जगबीती ?

जगबीती लिखने में ज्यादा मजा आता है उसमे ज्यादा मौज ली जा सकती है।

6) आपके पोस्ट इतने लम्बे क्यों होते हैं ?

क्योंकि हमें ऐसा लगता है हमारी छो॔टी पोस्ट लोग पढेंगे नहीं।वैसे सच यह है कि जो हम लिख देते हैं उसको काटने छांटने का सऊर अभी आया नहीं है इसी चक्कर में लंबाई बढ़ जाती है.

7) कवितायें मुझे पसंद नहीं ,ऐसा आप अकसर कहते पाये जाते हैं । फिर हर पोस्ट में 'मेरी पसंद' में एक कविता क्यों रहती है ?

यह बात सरासर झूठ है कि कविता हमें पसंद नहीं है। हम कविता पसंद करते हैं लेकिन हमें यह गलत फहमी भी है कि हमें कविता समझने की तमीज है। इसी भरम के मारे हमें लगता है कि तमाम कवितायें जो लोगों को अच्छी लगती हैं हमें समझ में नहीं आतीं। मुक्तिबोध ने कामायनी एक पुनर्विचार में कामायनी की आलोचना की थी और लोग बताते हैं कि अकेले में कामायनी के पद गुनगुनाते थे। ब्लाग जगत में ज्यादातर कवितायें मैं,तुम और वो को लेकर लिखा जाती हैं या फार्मूलाई अन्दाज में समाज के दोष खोजे जाते हैं। ऐसी कवितायें अक्सर वो मजा नहीं देती हैं जिसकी अपेक्षा रहती है। मेरी पसंद की कवितायें वे कवितायें हैं जो मुझे अच्छी लगती हैं और शायद मेरे दोस्तों को भी ।

8) आप पर आरोप है कि कुछ बेचारे बेगुनाह , बेकसूर लोग हैं जिनकी आप खिंचाई करते रहते हैं । अपनी सफाई में आपको क्या कहना है ?

हमें यही कहना है कि हमारे खिलाफ लगाये गये आरोप निराधार हैं। बेगुनाह,बेकसूर लोगों की खिंचाई हम कभी नहीं करते हैं।जिन लोगों के बारे में लिखने की आप बात कर रहे हैं वह असल में उनके गुणों का बखान होता है,उनका प्रचार होता है। अगर यह न करें तो उनका मानसिक संतुलन नारद की तरह हो जाये। मजबूरी में उनके प्रति प्रेमप्रदर्शन करना पड़ता है।

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टिप्पणियाँ

  1. भाई फ़ुरसतिया जी को ढ़ेरो शुभकामनाऎं और आपको उनके विचार विभिन्न विषयों पर हम तक पहुंचाने के लिये साधुवाद. बहुत बेहतरीन प्रस्तुति रही, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बधाई - अनूप जी को जन्म दिन की और आपको इस सुन्दर लेख के लिये

    उत्तर देंहटाएं
  3. अनूप जी का इनटरव्यू पढ़ कर और विचार जान कर मन प्रसन्न हुआ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. रवि रतलामी ,प्रत्यक्षाजी और दूसरे साथियों की शुभकामनाऒं के लिये शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं
  5. Badhiya interview raha aur Anup ke jawab hamesha ki tarah lajawaab :) Anup, der se sahi, janamdin ki dheron shubhkamnayein.

    उत्तर देंहटाएं
  6. अनूप जी को जन्मदिन की बधाई और शुभ कामनायें। रवि जी साक्षत्कार बहुत सुन्दर हैं। जैसे राम या कृष्ण जी जब किसी को मार देते थे तो भी वह स्वर्ग जाता था वैसे ही फुरसतिया जब किसी के चिटठे को लताड़ते भी हैं तो भी चिटठा जगत में उसका नाम रोशन हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. उत्कृष्ट साक्षात्कार, मैं तो चूक गया था.. किंतु आज पढ़कर आनंदित हुआ. ये जुगलबंदी बहुत भायी.. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेनामी11:49 am

    रतलाम का नाम जितना रतलामी सेंव ने बडा किया है, उतना ही रवि जी आपने भी किया है। रतलाम को आपने विश्‍व पटल पर ला दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  9. अनूप जी हिन्दी चिट्ठे जगत के अनमोल रत्न हैं। उनको जन्मदिन की बधाई। मुझे तो यह गीत याद आता है,
    तुम जियो हजारों साल,
    साल में दिन हो हजार

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