सोमवार, 2 जनवरी 2006

अक्तूबर 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

क्या आपने खाया है गब्बर सिंह का झन्नाटे दार...



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अरे भाई, यहां पर शोले के गोलियों की बौछारों की बात नहीं हो रही है. बल्कि भेल-पूरियों और पानी-बताशे की बातें हो रही हैं.

मालवी-झन्नाट की परिभाषा यहाँ देखें, और इस चित्र को देखते हुए काल्पनिक ही सही, झन्नाट आनंद लें या फिर दौड़ लगाएँ बाज़ार की ओर...

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पहली नौकरी पहला प्यार – 4



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प्यार किस चिड़िया का नाम है? हर एक शख्स ने, जो जरा-सा भी चिंतन-मनन करता है, प्यार की परिभाषा अपने हिसाब से देने की कोशिश की है. किसी नर्ड के लिए उसका प्यार उसका लॅपटॉप हो सकता है जिसमें उसका प्रोग्राम कोड हो, जिसे वह अपने जी-जान से भी ज्यादा चाहता है, और जिसे वह अपने सीने से लगाए फिरता रहता है. अगर उसका लॅपटॉप खो जाए या चोरी हो जाए तो जैसे उसकी तो दुनिया ही समाप्त-सी हो जाएगी. एक बच्चे के लिए उसका प्यार उसका नया नवेला, हाल ही में प्राप्त किया खिलौना हो सकता है, जिसे वह सोते जागते और यहाँ तक कि खाते-हगते भी अपने गले से लगाए फिरता है. जरा कोशिश कर देखिए उसके हाथ से खिलौना छुड़ाने की, और वह जमीन-आसमान एक कर देता है.

पर यहाँ एक स्त्री और एक पुरुष के बीच के प्यार की बातें हो रही हैं. कभी-कभी होता यह है कि हम किसी को एक झलक भी देख लेते हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है. और, कभी-कभी यह भी होता है कि किसी को देखते ही दिमाग में घृणा और रिपल्शन की खुजली मचने लगती है. ऐसा इंस्टंट होता है, बिना किसी पूर्वाग्रह के. इसी को लोग इंस्टंट केमिस्ट्री का नाम देते हैं. किसी व्यक्ति को आप देखते ही पसंद कर लेते हैं और किसी से आपको मिलते ही तमाम नफ़रतें होने लगती हैं. इसके पीछे किसी सिक्स्थ सेंस की तरह का कोई सेवंथ फ़ैक्टर अवश्य ही होता होगा.

तो, उन, दो रिवोल्यूशनरी बालाओं में से एक, जिसका नाम था – रेखा कान्तम् उसे देख कर मेरा मन भी प्रसन्न हो जाया करता था. परंतु चूंकि लड़कों के स्कूल में सिर्फ चंद लड़कियाँ थीं, अतः जाहिर है, मेरे जैसे अन्य ढेरों लड़कों का मन भी ऐसे ही प्रसन्न हो जाया करता होगा. और उन ढेरों, सैकड़ों लड़कों के बीच में उसके लिए मेरा अस्तित्व तो था ही नहीं. अतः यह कहना मुश्किल था कि उसके मन में मुझे देखकर प्रसन्नता की लहर दौड़ती भी थी या नहीं. दरअसल, मुझे तो लगता था कि लड़कों की भीड़ में शायद ही कभी उसने मुझे देखा हो. हमारी कक्षाएँ एक थी, परंतु सेक्शन अलग (मेरा गणित, उसका जीवविज्ञान था) होने के कारण परिचय भी नहीं था, और हममें बोलचाल भी नहीं था. दरअसल, कस्बे-नुमा शहर होने के कारण वहाँ की संस्कृति में यह रचा बसा था कि - अगर वे रिश्तेदार नहीं हों तो - कोई लड़का किसी लड़की से बात ही नहीं करता था. भले ही साथ में पढ़ते हों, एक स्कूल में पढ़ते हों. जब कक्षा में शिक्षक आते थे तो शिक्षक के साथ ही छात्राएँ भी आती थीं और उनके साथ ही चली जाती थीं. लड़कियों का एक कॉमन रूम बना हुआ था, वे सब वहीं रहती थीं. ऐसे अनुशासन में किसी लड़की का किसी लड़के से गप्पें लड़ाना तो नामुमकिन सा ही था. प्रेम-प्यार की बातें तो बाद की बातें हैं. ऊपर से कुछ दुस्साहसी लोगों की शिक्षकों द्वारा भयंकर पिटाई और उनकी इज़्ज़त उतरती देख अमूमन लोग प्रेम-प्यार जैसी कल्पनाओं को अपने मन में रचने-बसने ही नहीं देते थे.

उसी दौरान टॉकीज़ में मैं जब कभी कोई फ़िल्म देख लेता था, और अपने आप को हीरो की तरह मान कर दिवास्वप्न देखता था, तो मन में स्क्रीन की हीरोइन के बजाए रेखा कान्तम् की कल्पना यदा कदा चली आती थी. परंतु बात इससे आगे बढ़ी नहीं, मामला एक तरफा ही बना रहा- क्योंकि मेरे पैर धरातल पर थे – पढ़ाई और कैरियर – पहली प्राथमिकताएँ थीं.

स्कूल से निकलते ही दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए. मैं पढ़ने बाहर चला गया. उसने बीएससी में वहीं, राजनांदगांव में दाखिला ले लिया. पर, मैं जब भी घर आता, कहीं रास्ते चलते, बाजार में अगर वह दिख जाती, तो जाने क्यों मन दिनों-सप्ताहों-महीनों के लिए प्रसन्न हो जाता. दरअसल, बाजार के कामों का जिम्मा उसका था और वह अकसर साइकिल लेकर शाम के समय बाजार आया करती थी. हम लड़के तो काम-बिना-काम यूँ ही सड़कों पर मंडराया करते थे. तब पूरे शहर में एक ही बड़ा सा बाजार था और एक सड़क – सिनेमा लाइन जहाँ शहर की तमाम दुकानें थीं. उस सड़क से उस शहर का हर बाशिंदा दिन में एक बार कभी न कभी तो निकलता ही था.

कॉलेज में कई सहपाठी मित्रों के कई सच्चे-झूठे और धुंआधार किस्म के प्रेम-प्रकरणों के बीच जब कभी भी मैं अपनी प्रेयसी की कल्पना करता तो धुंधला सा रूप रेखा का ही दिखता. किसी लड़की से बातचीत में, या उसकी दोस्ती के बीच मैं रेखा को ढूंढता रहता. शायद यही प्यार था. रेखा के प्यार का बीज मेरे मन में पड़ चुका था और इस बीज के एकतरफा अंकुरण को रेखा के मन में भी डालना जरूरी हो गया था. इस बीच मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और रेखा ने राजनांदगांव के पास ही, खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय में फ़ाइन आर्ट्स में डिग्री के लिए एडमीशन ले लिया था.

खैरागढ़ तकनीकी विद्यालय में समय काटने के लिहाज से पढ़ाने के लिए चुनने के पीछे रेखा से मिलते रहने का आकर्षण ही रहा था. रेखा के साथ ही मेरे मित्र की बहन, सुनीता ने भी दाखिला ले लिया था, और वह प्रेम सम्बन्ध में सेतु बनाने का काम बखूबी करने लगी. सुनीता को मेरी भावनाएँ पता थीं, और वह मौके-बे-मौके मेरी तारीफ़ें रेखा को सुनाया करती थी. विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में उनसे यदा-कदा मुलाकातें होती रहती थीं. मगर वहां बातें सिर्फ फ़ॉर्मल ही होती थीं पढ़ाई लिखाई की बातें – प्रेम प्यार की बातों की शुरुआत करने में पता नहीं क्यों मेरे मन में डर-सा बैठ जाता था, मुँह सूख जाता था और फिर किसी और दिन का सोच कर मामला वहीं अटक जाता था.

वहाँ, विश्वविद्यालय में भी कड़क अनुशासन था. हॉस्टल से बाहर जाने की लड़कियों को अनुमति ही नहीं थी. बहुत हुआ तो लाइब्रेरी या फिर विश्वविद्यालय कैंपस के बगीचे में कहीं घूम लो. बस.

सुनीता और रेखा से दो-चार बार की लगातार मुलाकात को देखकर विश्वविद्यालय के कुछ लड़कों ने एकदिन मुझे घेर लिया. उनमें से एक ने मुझसे पूरी धृष्टताई से पूछा कि कहीं इन लड़कियों में से किसी से मेरा कोई चक्कर तो नहीं है. वे सब वहीं के लोकल गुंडे थे, जो स्थानीय जमींदार घराने से सम्बद्ध थे. जाहिर है, मेरे प्यार की पींगें तो एकतरफा ही थीं, सामने की तरफ तो बढ़ी ही नहीं थी – या बढ़ी भी हों, अंकुरित भी हुई हो, तो मुझे पता नहीं था, इसलिए मुझे नकारने में देर नहीं लगी. उनमें से एक जाते-जाते मुझे बोल गया- ध्यान रखना ये छोटी जगह है- हमें बात मालूम होते देर नहीं लगेगी, फिर सोच लेना कि क्या होगा.

जल्दी ही वह सत्र समाप्त हो गया और अगली जुलाई आते-आते मेरी पक्की नौकरी विद्युत मंडल में लग गई. मैं अम्बिकापुर पहुँच गया था. मैं वहां अकेला रहता था. अकसर घोर तनहाई के आलम में खैरागढ़ के वे हसीन लमहे बार-बार जेहन में आते. यह कहा जाता है कि दूरी स्मृतियों को मिटाती है- परंतु मुझे तो लगता है कि दूरी – भयंकर कशिश पैदा करती है. उसी दौरान मेरे मन में यह बैठ-सा गया था कि रेखा को मेरी प्रेयसी तो बनना ही होगा, उसे मेरी जीवन संगिनी भी बनना होगा.

अंततः मेरे भीतर के लेखक ने, ऐसी ही तनहाई में, कशिश का शिकार होकर, किसी दिन जोर मारा, और मैंने बड़े जतन से एक प्रेम-पत्र लिखा और रेखा को उसके विश्वविद्यालय के पते पर पोस्ट कर दिया. प्रेम-पत्र से प्रेम का इजहार करने में इस बात की सुविधा तो है कि आप अपने शब्दों का बड़ी बारीकी से चयन कर सकते हैं, उसका बारंबार संपादन कर सकते हैं. अपने प्रेम का बयान-बखान करते समय आपकी जबान नहीं सूखती, और, सबसे बड़ी बात, आपको जूते खाने का भय – रिजेक्शन का भय नहीं रहता.

मुझे पता था कि वह पत्र हॉस्टल के वार्डन के पास ही जाएगा. ऐसा ही हुआ. रेखा को वार्डन ने बुलाया- और पूछा, यह क्या है. रेखा ने अनभिज्ञता जाहिर की. वार्डन ने वह पत्र उसके के सामने ही फाड़ दिया. परंतु, उस पत्र ने अपना काम कर दिखाया. उसने रेखा के मन में प्यार का बीज बो ही दिया. सुनीता के साथ रेखा की बातें होती रहती थीं – इस बार मेरी चिट्ठी को लेकर भी हुई... गंभीर किस्म की बातें... कई दिनों तक होती रहीं ये बातें...

और, कई दिनों बाद, एक हसीन दिन उसका जवाबी अंतर्देशीय खत मेरे पास आ ही गया...

(समाप्त)

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धर्मनिरपेक्षता – एक नई सोच



(यह निबन्ध इंडियन एक्सप्रेस समूह द्वारा आयोजित प्रतियोगिता हेतु लिखा गया था. परंतु कोई पुरस्कार लायक, यहाँ तक कि प्रतियोगिता में शामिल करने लायक भी नहीं समझा गया :) )

मनुष्य मात्र के लिए ‘धर्म’ एक गढ़ी गई, अनावश्यक रूप से लादी गई, विकृत परंपरा है. दरअसल, मनुष्य को अन्य जीव-जन्तुओं के विपरीत, सभ्य आचरण करने के लिए, ईश्वर के प्रति जवाबदेह बनाने के नाम पर कुछ परंपराओं का सहारा आदिम काल से लिया जाता रहा है – जिसे धर्म का नाम दिया गया है. मनुष्य, जन्म से बे-धर्मी होता है - उसका कोई धर्म नहीं होता. पीढ़ियों से चले आ रहे परंपराओं के अनुसार वह पालक के धर्म का, या बाद में किसी विचार से प्रभावित हो, किसी अन्य धर्म का अनुयायी बन जाता है. विश्व के तमाम धर्मों में ईश्वर की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए उसकी प्राप्ति के अलग अलग जरिए अपनाए जाते हैं – कोई प्रार्थना करता है, कोई इबादत पढ़ता है और कोई आरती गाता है.

समस्या यहीं उत्पन्न होती है. किसी को किसी की प्रार्थना में थोथापन नज़र आता है तो किसी को किसी की इबादत में फूहड़ता दिखाई देती है तो किसी को किसी की आरती में ढकोसला दिखाई देता है. और हर कोई समझता है कि उसका धर्म, उसके ईश प्राप्ति का तरीका ही सर्वश्रेष्ठ है. नतीजतन, वह निरपेक्ष नहीं रह पाता. अकसर, सियासतें इन विचारों में आग में घी डालने का काम करती हैं. और, पंडित-मौलवी-पादरी-ग्रंथी अपने क्षणिक, व्यक्तिगत लाभों के लिए समाज में इस अ-निरपेक्षता के अलाव को जलाए रखते हैं.

धर्म क्या है ?
अगर ईश्वर नहीं भी है, तो ‘मनुष्य’ को मनुष्य बनाए रखने के लिए हमें ईश्वर को सृजित करना ही होगा. ईश्वर का भय ही मनुष्य को मनुष्यत्व के करीब लाता है. आज से तीन हजार साल पहले धर्म नाम की चीज इस पृथ्वी पर नहीं थी. मनुष्यों में सर्वत्र अराजकता फैली रहती थी. उसका पशुवत् व्यवहार पृथ्वी के अन्य जीव जंतुओं से उसे अलग नहीं करता था.

क्रमश: मनुष्य सभ्य होता गया. कुछ विचारकों ने प्रकृति की अदृश्य, कल्पित महाशक्ति को ईश्वर का नाम दिया. प्राचीन मनुष्य को वायु के थपेड़ों में, वर्षा के झोंकों में, जंगल के दावानल में, और तो और, शारीरिक बीमारियों में - ईश्वरीय शक्ति नजर आती थी, चूंकि उनके पास इन्हें पारिभाषित करने का कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं था. धार्मिक परंपराओं की नींव उसी दौरान पड़ी. परंतु यह विडंबना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य प्रकृति को जानने समझने लगा, अवैज्ञानिक धार्मिक परंपराएँ उससे भी ज्यादा तेज़ी से अपनी जड़ें समाज में जमाने लगीं. दरअसल, मनुष्य के ज्ञान का बड़ा हिस्सा समाज के विशाल हिस्से में पहुंच ही नहीं पाता है – जिससे वह आदिम काल के मनुष्य की तरह अंध विश्वासों से युक्त धर्मांध बना रहता है. और, धर्मांध मनुष्य कभी भी, अन्य धर्म के प्रति निरपेक्ष नहीं रह सकता.

धर्मनिरपेक्षता क्या है ?

धर्मनिरपेक्षता (सेक्यूलरिज़्म) शब्द का पहले पहल प्रयोग बर्मिंघम के जॉर्ज जेकब हॉलीयाक ने सन् 1846 के दौरान, अनुभवों द्वारा मनुष्य जीवन को बेहतर बनाने के तौर तरीक़ों को दर्शाने के लिए किया था. उनके अनुसार, “आस्तिकता-नास्तिकता और धर्म ग्रंथों में उलझे बगैर मनुष्य मात्र के शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक, बौद्धिक स्वभाव को उच्चतम संभावित बिंदु तक विकसित करने के लिए प्रतिपादित ज्ञान और सेवा ही धर्मनिरपेक्षता है”
दूसरे शब्दों में, धर्मनिरपेक्षता मनुष्य जीवन के लिए वह कर्तव्य संहिता है जो पूरी तरह मानवीय आधार लिए हुए तो है ही, जो धर्म के अनिश्चित, अपर्याप्त और प्रायः अविश्वसनीय तत्वों को नकारता है. जॉर्ज जेकब हॉलीयाक द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता के तीन मूल तत्व हैं :-

1. भौतिक संसाधनों द्वारा मनुष्य के जीवन मूल्यों में समुचित, सम्पूर्ण विकास,
2. आधुनिक युग में मनुष्य के लिए “विज्ञान” का स्वरूप विधाता की तरह है,
3. भलाई में ही अच्छाई है.

जॉर्ज जेकब हॉलीयाक ने ये सिद्धांत तब बताए जबकि इंग्लैंड में चर्च का अपरोक्ष शासन चलता था, और दूसरे धर्मों का कोई वज़ूद वहाँ नहीं था. अकसर उनके विचारों को नास्तिकता का जामा पहनाया जाकर सिरे से नकारने की कोशिश की जाती थी. जबकि जॉर्ज का कहना था कि धर्मनिरपेक्षता ईसाईयत के ख़िलाफ़ कतई नहीं है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा थोड़ी वृहद हो चुकी है. अब धर्मनिरपेक्षता को कुछ इस तरह भी पारिभाषित किया जाता है-

1. व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने-अपनाने की पूरी स्वतंत्रता हो
2. धर्म और राजनीति पूरी तरह अलग रहें
3. सार्वजनिक स्रोतों के जरिए धर्म को प्रश्रय न दिया जाए तथा,
4. सार्वजनिक जीवन में धर्म का स्थान महत्वपूर्ण न हो.


धर्मनिरपेक्ष देशों में, जिनमें भारत भी सम्मिलित है, धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए तमाम तरह के संविधानिक क़ायदे कानून हैं. परंतु प्रायः राष्ट्रों के ये क़ायदे क़ानून समय-समय पर अपना स्वरूप बहुसंख्य जनता के धार्मिक विश्वासों से प्रेरित हो बदलते रहते हैं, या उचित स्तर पर इन कानूनों का पालन नहीं होता, या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष स्तर पर इनमें ढील दी जाती रहती हैं. यह छद्म धर्मनिरपेक्षता है. छद्म धर्मनिरपेक्षता के कई उदाहरण हैं - अयोध्या मंदिर में पूजा अर्चना का सवाल हो या शाहबानो प्रकरण – धर्मनिरपेक्ष सरकार द्वारा धार्मिक समुदायों के आगे अकसर हथियार डाला जाता रहा है.
धर्मनिरपेक्षता के सत्व:

मनु स्मृति में मनु कहते हैं-

धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥

अर्थात्, धर्म के दस लक्षण हैं- धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , स्वच्छता, इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना. हर धर्म में मूलत: इन्हीं बातों को घुमाफिरा कर कहा गया है. महर्षि वेद व्यास धर्म की व्याख्या कुछ इस तरह करते हैं-
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रूत्वा चैव अनुवर्त्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषाम् न समाचरेत् ॥

अर्थात्, धर्म के सर्वस्व को सुन-समझ कर उस पर चलो. जो आचरण अपने को प्रतिकूल प्रतीत होते हैं, वैसा कदापि दूसरों के साथ न करो.
तुलसी दास कहते हैं-
परहित सरिस धरम नहिं भाई।

अन्य किसी भी धर्म में चाहे, ईसाई हो, इस्लाम हो या जैन-बुद्ध – सभी में इन्हीं बातों पर, धर्म के इन्हीं सत्वों को अपनाए रखने पर जोर दिया गया है. जो मनुष्य धर्म के इन प्रतीकों का गंभीरता से पालन करता है, वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, वह वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होता है. आधुनिक युग के तमाम धर्मगुरु चाहे जिस धर्म के हों, अपने प्रवचनों में अपने भक्तों को प्राय: इसी तरह के संदेश देते हैं. परंतु बात जब किसी दूसरे धर्म की होने लगती है, तो उनकी भृकुटियाँ तन जाती हैं – नतीजतन भक्त जन भी दूसरे धर्मों को, दूसरे धर्मावलम्बियों को उन्हीं निगाहों से देखने लगते हैं.

धर्मनिरपेक्षता का मूल सत्व यह है कि व्यक्ति अपने धार्मिक ज्ञान और क्रिया कलापों में वैज्ञानिकता, आधुनिकता, तार्किकता तो शामिल करे ही, वह विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता भी रखे.

धर्मनिरपेक्षता और व्यक्ति
कोई भी धार्मिक व्यक्ति निरपेक्ष हो ही नहीं सकता. निरपेक्ष होने के लिए उसे धर्म को त्यागना होगा. यहाँ बात आस्तिकता और नास्तिकता की नहीं हो रही है. व्यक्ति धर्म को अपनाए बिना भी पूर्ण ईश्वर वादी और आस्तिक हो सकता है. बस, उसे धर्म के सियाह और संगीन पन्नों से अपने को दूर करना होगा. धार्मिकता में वैज्ञानिकता, सांसारिकता और व्यवहारिकता लानी होगी तभी सच्ची व्यक्तिगत धर्मनिरपेक्षता हासिल की जा सकेगी. आधुनिक युग के व्यक्ति को, हजारों साल पुरानी, बारबेरिक युग में कही गई, आज के युग के लिए अप्रासंगिक हो चुकी बातों को ईश्वर, ईशु या अल्लाह द्वारा कही गई बातें न मानकर, मात्र ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखे, उसका आदर करे तो वह सम्पूर्ण धर्मनिरपेक्षता को प्राप्त कर लेगा. ऊपर से, धर्म के ठेकेदार अपने स्वार्थों के चलते समूचे समाज को कु-शिक्षित बनाने का बेलगाम-कुत्सित प्रयास किए जा रहे हैं. धार्मिक रूप से कु-शिक्षित मनुष्य धर्मनिरपेक्ष कैसे होगा?

धर्मनिरपेक्षता और राज्य
इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में राज्य कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे. यूरोप में पोप की सत्ता अदृश्य सत्ता केंद्र होती थी. स्वतंत्रता से पहले दक्षिण और उत्तरी कैरोलिना राज्यों में धर्म और राजनीति के लिए विपरीत क़ानून थे. भारत में मुसलमान शासकों ने तमाम तरह से दमन कर मुसलिम धर्म को फैलाया. सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में लगे रहे. अंग्रेजों के आगमन से भारत में ईसाईयत का फैलाव हुआ. इन धर्मों के धर्मावलम्बी दूसरे धर्मों के प्रति अनुदार तो थे ही, इनके अपने ही धर्मों के विभिन्न पंथों में संघर्ष होते रहे – जो किसी न किसी रूप में आज भी जारी है. ईसाईयों में कैथोलिक-प्रोटेस्टेन्ट, मुसलमानों में शिया-सुन्नी, हिन्दुओं में ब्राह्मण-शूद्रों के बीच के अहम् का टकराव कमोबेश अब भी जारी हैं.
धीरे से राज्य प्रजातांत्रिक होते गए. जनता और उनके प्रतिनिधियों के हाथों में राज्य आने के फलस्वरूप धार्मिक सोचों में परिवर्तन होने लगा. वैश्विक परिदृश्य में राजनीति व धर्म का सम्बन्ध खत्म होने लगा. इस अवधारणा को स्वीकारा गया कि धर्म मनुष्य की निजी सम्पत्ति है और उसमें राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. व्यक्ति अपने लिए धर्म को चुनने के लिए स्वतंत्र था – प्राचीन राज शाही परंपराओं की तरह अब उसके धर्म के परिपालन पर कोई पाबंदी नहीं थी. इस अवधारणा को धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया गया. बहुत से आधुनिक सोच के राज्य पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हो गए – अब जनता बिना किसी भय-बाधा के विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच अपने-अपने धर्म को मानते हुए, और दूसरों के धर्म का आदर करते हुए शांति से जीवनयापन कर सकती थी. भारत ने भी स्वतंत्रता के पश्चात् धर्मनिरपेक्षता की इस अवधारणा को आत्मसात किया.

धर्मनिरपेक्षता और भारत
कोई दो हजार साल के लगातार राजनीतिक उथल-पुथल और प्राचीन काल के राज्य और धर्म के सम्मिश्रण के कारण भारत में विश्व के सभी बड़े धर्मों के अनुयायी बड़ी संख्या में बसते हैं. प्रजातांत्रिक राष्ट्र होने के नाते स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने धर्मनिरपेक्ष राज्य का चोला पहना. कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, परंतु फिर इसमें विकृतियाँ आने लगीं. धर्मनिरपेक्षता के विकृत मायने निकाल कर धार्मिक अन्ध भक्तों को प्रश्रय दिया जाने लगा है. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में खास तबके के लोगों के लिए आरक्षण का मसला – राज्य के धर्मनिरपेक्षता से पूरी तरह से भटकने का सबूत है.– शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक पार्टियाँ खुलेआम हिन्दुत्व का प्रचार कर वोट मांगती हैं. समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल हर तरीके से मुसलिमों का वोट प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध रहती हैं. छुद्र राजनीतिक स्वार्थों के चलते भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षता पनपने लगी है. गोधरा कांड और उसके प्रतिक्रिया स्वरूप एक सम्पूर्ण राजतंत्र का बेलौस, बेलगाम दुष्कर्म किस तरह की धर्मनिरपेक्षता है ? धर्म के आधार पर राज्यों में आरक्षण की अंधी दौड़ जारी हो चुकी है और संवैधानिक रूप से भारत कहलाता है एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र. धर्मनिरपेक्षता की यह नई, भारतीय परिभाषा है.

उपसंहार
एक कहावत है – मनुष्य पोथी पढ़कर जानकार तो बन सकता है, ज्ञानी नहीं. धर्मनिरपेक्षता को सही रूप में अपनाने के लिए व्यक्ति, समाज और राज्य को ज्ञानी बनना होगा. समय के पहिए के साथ-साथ कदमताल मिलाकर ही समग्र मनुष्य मात्र का भला हो सकता है, यह उसे समझना होगा और इसके लिए उसे अपने तमाम धर्म और तमाम धार्मिक आडंबरों को सिरे से निकाल कर फेंक देना होगा. अपनी सोच में व्यापकता लानी होगी उसे, अन्यथा सामाजिक-धार्मिक संघर्षों के फल स्वरूप सारे संसार का नुकसान होगा. धर्मनिरपेक्षता की नई सोच यह बताती है मनुष्य, मनुष्य बने, धार्मिक नहीं; और धर्मांध तो कतई नहीं. सब का एक ही धर्म हो मनुष्यत्व, और यह तभी हो सकता है – जब वह सचमुच का ज्ञानी बन जाए – उसे बुद्ध की तरह ज्ञान की प्राप्ति हो जाए – वह कु-शिक्षित न बना रहे. आमीन.

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आपके अंदर का कलाकार छुपा बैठा है एक माउस क्लिक में!




कुछ अन्य डिज़िटल कलाकृतियाँ आप यहाँ देख सकते हैं:

कलाकृति01 कलाकृति02 कलाकृति03 कलाकृति04 कलाकृति05


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आइए, आज हम आपको सिखाने की कोशिश करते हैं कि आप देखते ही देखते डिजिटल आर्टिस्ट कैसे बन सकते हैं

आवश्यक सामग्रियाँ:
कैनवस, रंग, तूलिका तथा रंगदानी पर बेकार का पैसा खर्च करने के बजाए अब आप अपने कंप्यूटर स्क्रीन और माउस (या डिजिटल पेन) पर भरोसा करना प्रारंभ कर दीजिए. ये आपके लिए नए, नायाब, अत्यंत आश्चर्यकारी परिणाम लेकर आएंगे. ऐसे परिणाम जो आप अपने ब्रश और कैनवस से किसी सूरत पैदा नहीं कर सकते. और यदि कभी आपको अपनी कला में कोई नुक्स नज़र आता भी है तो उसे चुटकियों में ठीक भी कर सकते हैं, और यदि पूरी की पूरी कलाकृति मज़ेदार नहीं लगती हो तो उसे तत्काल ही अपने कंप्यूटर की कचरा पेटी में डाल सकते हैं – बिना किसी नुकसान के – और आप तत्काल तैयार हो जाते हैं एक नई कलाकृति तैयार करने के लिए – बिना किसी खर्च के. कम्प्यूटर के मॉनीटर और माउस के अलावा आपको कुछ प्रोग्रामों की आवश्यकता भी होगी. यदि आप अपनी उंगलियों और अपनी कल्पनाशक्ति पर भरोसा करते हैं तो आप फोटोशॉप/पेंटशॉप-प्रो जैसे व्यावसायिक उत्पाद या आर्ट-रेज़ (http://www.ambientdesign.com ) जैसे मुक्त उत्पाद का इस्तेमाल - स्क्रीन पर बढ़िया कलाकृति बनाने हेतु कर सकते हैं. फोटोशॉप में सैकड़ों तरह के फ़िल्टरों का इस्तेमाल कर आप अपनी कलाकृतियों में नए रंग, नई आकृतियाँ, नई कल्पनाएँ डाल सकते हैं. और, यदि आप ड्राइंग बनाने में मेरी तरह कच्चे हैं, आम की जगह आमतौर पर अमरूद बन जाता है, तो भी कोई बात नहीं. एक सच्चे और अच्छे डिजिटल आर्टिस्ट बनने के लिए तो यह एक प्रकार का गुण है. ऐसे मामलों में आपको कुछ ऐसे प्रोग्रामों की आवश्यकता होगी जो स्क्रीन पर स्वयंमेव दृश्य, झांकी, डिज़ाइन और कलाकृतियाँ बनाते हैं. और इसके लिए आपको कहीं दूर जाने की भी जरुरत नहीं. आपके विंडोज़ मीडिया प्लेयर (http://go.microsoft.com/fwlink/?LinkId=28176 ) और विनएम्प (http://www.winamp.com/ ) के ढेरों विजुअलाइजेशन प्लगइन ही अनंत प्रकार की लुभावनी, सुंदर, अलौकिक किस्म की कलाकृतियाँ तैयार करने में सक्षम हैं. आपको ग्रेब-इट (http://www.costech.com ) या प्रिंट-की (http://www.geocities.com/~gigaman ) जैसे एक स्क्रीन कैप्चर औज़ार की भी आवश्यकता होगी जिसके जरिए आप विजुअलाइजेशन प्लगइन द्वारा प्रतिपल ड्रा किए जा रहे कलाकृतियों में से चुनकर उन्हें सहेज सकें. और आपकी सहायता के लिए कई ऐसे सारे प्रोग्राम भी हैं, जो आपके लिए दृश्य, झांकी तथा अन्य कलाकृतियाँ स्वचालित तरीके से तैयार करते हैं – आपको सिर्फ दो-चार माउस क्लिकों का इस्तेमाल रंग-दृश्य इत्यादि चुनने के लिए करना होता है, बस. और, कौन जाने कब, किसी दिन, ऐसा ही, बेतरतीबी से, स्वचालित रूप से तैयार की गई आपकी कोई डिजिटल कलाकृति किसी आर्ट क्रिटिक की निगाह में चढ़ जाए, किसी क्रिस्टी-आर्ट-टुडे गैलरी में चढ़ जाए, तो आप तो बन गए करोड़पति कलाकार! आपको भरोसा नहीं हो रहा है? कोई बात नहीं. यह जो कलाकृति आप देख रहे हैं, वह सिर्फ कुछ ही माउस क्लिकों की सहायता से पेंटशॉप प्रो (http://www.jasc.com ) की सहायता से बनाई गई है. आप भी एक बार काम करना शुरू करेंगे, तो भरोसा हो जाएगा- अपनी कलाकृतियों पर, और आप पाएँगे कि वे लोगों का ध्यान खींचने में सचमुच सफल हो रही हैं!

डिज़िटल पेन:
यूँ तो डिजिटल कलाकृतियाँ माउस की सहायता से भी बनाई जा सकती हैं, परंतु अगर आप डिजिटल आर्टिस्ट बनने के लिए सचमुच गंभीर हैं, तो आपके लिए अपने कम्प्यूटर पर एक अदद डिज़िटल पेन स्थापित करना वांछनीय होगा. दरअसल माउस को पकड़ कर उसके जरिए कुछ ड्रा करना आमतौर पर सभी के लिए थोड़ा सा अटपटा होता है और, जाहिर है कलाकृतियों में उतनी सफाई नहीं आ पाती. डिजिटल पेन का आकार ही पेंसिल नुमा होने के कारण यह समस्या दूर हो जाती है. आपको डिज़िटल पेन महज कुछ सौ रुपयों से लेकर कई हजार रुपयों तक में मिल सकते हैं. अच्छे किस्म के डिज़िटल पेन में प्रेशर सेंसिटिविटी जैसा तंत्र भी अंतर्निर्मित होता है, जो आपकी कलाकृतियों को सचमुच के रंग और कैनवस जैसा रूप दे सकता है. जैसे कि अगर आप कम दबाव डालकर कुछ रेखाएँ खीचेंगे तो वे हल्की प्रकट होंगी, बनिस्वत ज्यादा दबाव डाल कर खींची हुई रेखाओं के. पर, इसके लिए पेंट-प्रोग्रामों को भी प्रेशर सेंसिटिव पेन का इस्तेमाल करने लायक होने चाहिएँ. वैसे, सभी आधुनिक, नए संस्करणों के प्रोग्राम जैसे फोटोशॉप-सीएस2 में ये सुविधाएँ हैं.

डिज़िटल पेन वस्तुतः एक किस्म का माउस ही होता है, जो आमतौर पर अपने एक बोर्ड सहित मिलता है. इसे माउस के विकल्प के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका विशेष बोर्ड स्टेटिक इलेक्ट्रिकल सिग्नल पैदा करता है जिसे पेन नुमा डिवाइस सेंस करता है. जब आप इस पेन की नोक को उस बोर्ड पर घुमाते हैं तो माउस पाइंटर भी साथ-साथ घूमता है. डिज़िटल पेन पर ही दो या तीन बटन होते हैं जिसका इस्तेमाल सुविधानुसार दायाँ, बायाँ या मध्य क्लिक के लिए किया जा सकता है. वैसे, डिज़िटल पेन की नोक पर भी मिनिएचर स्विच निर्मित रहता है जिसे दबाकर (क्लिक करने जैसा) माउस क्लिक जैसा कार्य लिया जा सकता है. आमतौर पर डिज़िटल पेन अपने ड्राइवर तथा खास अनुप्रयोगों सहित आते हैं, जिनके जरिए कुछ अतिरिक्त कार्य भी किए जा सकते हैं, जैसे कि गो-टॉप का मैज़िक पेंट बोर्ड (डिज़िटल पेन सहित) महज 1500 सौ रुपयों में मिलता है, जिसमें एनीमेशन, दृश्य तथा अन्य कलाकृतियाँ बनाने के सॉफ़्टवेयर भी होते हैं. उदाहरण के लिए, इसके जरिए हाथी (या ऐसे ही ढेरों अन्य जानवरों) को लेकर कार्टून स्ट्रिप आसानी से तैयार किया जा सकता है, चूंकि इसमें एक छोटे से प्यारे से हाथी (या ऐसे ही ढेरों अन्य जानवरों) के सैकड़ों भाव भंगिमाओं तथा एक्शन दृश्यों युक्त क्लिप-आर्ट हैं जिनमें से चुनाव कर कार्टून स्ट्रिप की रचना की जा सकती है. आपको अलग से हाथी को ड्रा करने की जरूरत ही नहीं. बस अपनी स्टोरी लाइन पहले डिफ़ाइन कीजिए, आकृतियाँ जो इनमें जम सके वे ढूंढिए और उन्हें चुनकर कहानी के अनुरूप जमा दीजिए, बस. डिजिटल पेन को आप ट्रेसिंग औज़ार के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं – उदाहरण के रूप में जैसे कि अगर आपको सानिया मिर्जा का कोई केरीकेचर बनाना है या किसी सुंदर फूल की अनुकृति बनानी है तो उसकी छवि को डिजिटल पेन के बोर्ड के ऊपर, उसकी ट्रांसपेरेंट शीट के नीचे रख दें. फिर जैसे कि आम चित्रों को ट्रेस किया जाता है, डिजिटल पेन की सहायता से वैसा ही ट्रेस करें. पर ध्यान रहे कि कोई पेंट प्रोग्राम जरूर खोल लें. इससे आप बिना किसी परेशानी के बढ़िया केरीकेचर / चित्र बना सकते हैं. विविध किस्मों के डिज़िटल पेन कम्प्यूटर हार्डवेयर की दुकानों में आसानी से मिल जाते हैं.

विज़ुअलाइज़ेशन के जरिए मॉडर्न आर्ट:

डिज़िटल पेन की सहायता से, श्रमसाध्य तरीके से मॉडर्न आर्ट की रचना करना तो कम्प्यूटर रिसोर्सेस का कु-व्यय है! विज़ुअलाइजेशन के जरिए आश्चर्यजनक, आह्लादकारी, अविश्वसनीय सी कलाकृतियां तैयार करना तो आसान, दो तीन चरणों की क्रियाएँ हैं. आपको विंडोज मीडियाप्लेयर 9 (या अद्यतन) या विनएम्प 2.9x (या अद्यतन) अपने कम्प्यूटर पर स्थापित करना होगा. दोनों ही प्रोग्राम मुफ़्त हैं तथा इनके लिए दर्जनों विज़ुअलाइज़ेशन प्लगइन उपलब्ध हैं. इनके कुछ चयनित विज़ुअलाइज़ेशन प्लगइनों को भी आपको स्थापित करना होगा. आमतौर पर प्लगइन स्वचालित रूप से स्थापित हो सकने योग्य प्रोग्राम के रूप में जारी किए जाते हैं और मुफ़्त इस्तेमाल के लिए जारी किए जाते हैं. अगर आप अलग से विज़ुअलाइज़ेशन स्थापित नहीं करते हैं तो भी कोई बात नहीं, कुछ तो इनमें अंतर्निर्मित भी आते हैं. अब आप कुछ संगीत बजाइए और विज़ुअलाइज़ेशन को प्रारंभ करिए (विंडोज़ मीडिया प्लेयर में व्यू>विज़ुअलाइज़ेशन्स के जरिए तथा विनएम्प में प्रेफरेंसेज़>प्लगइन्स> विज़ुअलाइज़ेशन्स के जरिए). विज़ुअलाइज़ेशन को फुलस्क्रीन (या ¾ स्क्रीन पर) पर चलाने हेतु सेट करें. अब आप स्क्रीन कैप्चर औज़ार चालू करें तथा संगीत के साथ बनती बिगड़ती डिज़िटल कलाकृतियों को निहारते रहें. जब कोई आकृति अति मनमोहक लगे तो उसे स्क्रीन कैप्चर द्वारा सहेज लें. यदि आवश्यक लगे तो इसमें कुछ कांट-छांट करें और पेंट प्रोग्रामों और उनके फ़िल्टर द्वारा विशेष प्रभाव तैयार करें. बस हो गया तैयार आपका डिजिटल आर्ट! ऐसे आर्ट तो आप एक घंटे में सौ के भाव से तैयार कर सकते हैं! और, सब के सब नायाब, अलग-रूप रंग के! हर विज़ुअलाइज़ेशन प्लगइन अलग तरह के दृश्यों की रचना करता है अतः आपको अपनी डिज़िटल कलाकृति तैयार करने से पूर्व कुछ प्रयोग करने होंगे और कुछ चुनाव भी करने होंगे. विनएम्प के लिए कुछ अच्छे विज़ुअलाइज़ेशन प्लगइन हैं – विनएम्प का अंतर्निर्मित एडवांस्ड विज़ुअलाइज़ेशन स्टूडियो, स्पेस, साइकोसिस, टैक्नोरैप, जीइस, काइनोमॉर्फ़िक 3डी इत्यादि जिन्हें आप 200 से अधिक विज़ुअलाइज़ेशन प्लगइन की सूची में से चुन सकते हैं. जब आप कलाकृतियों के लिए स्क्रीन कैप्चर कर रहे हों तो अपनी उँगली प्रिंट-स्क्रीन कुंजी या स्क्रीन कैप्चर करने की विशिष्ट आबंटित कुंजी पर ही रखें. चूँकि दृश्यावली तुरत-फुरत बदलती रहती है और कभी दोहराई नहीं जाती अतः हो सकता है कि कुछ अच्छी, संभावना युक्त कृतियाँ सहेजने से रह जाएँ. स्क्रीनशॉट लेने के लिए फुल स्क्रीन मोड के बजाए विंडो मोड उपयुक्त रहता है. आप चाहें तो इसे कुछ मेक्रो के द्वारा या स्क्रीन कैप्चर औज़ार के द्वारा स्वचालित भी कर सकते हैं. बाद में अपनी कलाकृतियों के स्टाक में से चुन लीजिए बेहतरीन कलाकृतियाँ! स्क्रीन कैप्चर औज़ारों की सहायता से आप अपनी कलाकृति को सहेजने से पहले अनावश्यक हिस्सों को कांट-छांट भी कर सकते हैं, उनका पूर्वावलोकन कर सकते हैं और विविध फ़ाइल फ़ॉर्मेट जैसे बीएमपी, जेपीजी में सहेज सकते हैं. वैसे, अगर स्क्रीन कैप्चर प्रोग्राम इस्तेमाल नहीं करना चाहें तो भी कोई बात नहीं. बस, जब भी आपको लगे कि अभी किसी विज़ुअलाइज़ेशन पर बढ़िया कलाकृति बन रही है, अपने कम्प्यूटर कुंजीपट का प्रिंट-स्क्रीन बटन दबा दें. फिर विंडोज़ पेंट प्रोग्राम खोल कर नई फ़ाइल बनाएँ तथा उसमें एडिट तथा पेस्ट कमांड का इस्तेमाल कर कैप्चर की गई स्क्रीन को चिपकाएँ. अब अवांछित हिस्सों को काट कर कलाकृति को रूप दें एवं सहेज लें.

अपनी कैप्चर्ड स्क्रीन आकृतियों को अन्य ग्राफ़िक सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामों जैसे कि फोटोशॉप तथा पेंटशॉप प्रो के जरिए भी सहेज सकते हैं. इन प्रोग्रामों में आपकी कलाकृति में अतिरिक्त विशिष्ट प्रभाव डालने के कई औज़ार होते हैं, जिनका इस्तेमाल कर अपनी कलाकृति को और भी प्रभावशाली बना सकते हैं. लीजिए, अब आपकी कलाकृति तैयार हो चुकी है. इसे चाहें तो आप अपने वेब साइट पर प्रकाशित कर सकते हैं, विविध आकारों में प्रिंट आउट निकाल कर बेच सकते हैं या इनकी कला प्रदर्शनी लगा सकते हैं. पर हां, यह ध्यान रखें कि बड़े प्रिंटआउट के लिए आपको इन्हें विशेष प्रोग्रामों द्वारा नया, बड़ा आकार देना होगा अन्यथा आपके बड़े आकार के प्रिंटआउट दानेदार, अस्पष्ट, धुंधले हो सकते हैं.

कलाकृति सृजक प्रोग्रामों द्वारा कलाकृतियाँ:

आप सभी ने फ्रेक्टल प्रोग्रामों द्वारा तैयार, सुंदर, रंगबिरंगी कलाकृतियों को गाहे-बगाहे कहीं-न-कहीं देखा होगा. और शायद कुछ ने इन्हें चलाकर रंगीन कलाकृतियाँ भी तैयार किया होगा. ये फ्रेक्टल प्रोग्राम कठिन गणितीय गणनाएं करके ऊटपटांग, परंतु लयकारी युक्त सुंदर, रंगीन कलाकृतियाँ बनाते हैं. प्रोग्रामरों ने तमाम तरह के दर्जनों फ्रेक्टल प्रोग्राम बना रखे हैं, जो बेतरतीब तरीके से आपके स्क्रीन पर कलाकृतियों की रचना करते रहते हैं. एक ऐसा ही, बढ़िया प्रोग्राम है WinCIG (विंडोज़ चाओस इमेज जनरेटर), जो चलने में तेज तो है ही, फ्रेक्टल चित्रों को पूर्ण स्क्रीन मोड में भी दिखाता है. इसके अलावा, इस प्रोग्राम के जरिए आप विविध रंगों का चयन कर अपनी कलाकृति बना सकते हैं – जैसे कि श्वेत-श्याम या अग्नि रंग. यह प्रोग्राम आपको कलाकृतियों को बिटमैप फ़ॉर्मेट में सहेजने की सुविधा भी देता है जिससे आपको अलग से स्क्रीन कैप्चर औज़ार की आवश्यकता नहीं होती. इस प्रोग्राम को आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं- http://www.hoevel.de/a एक अन्य चित्र सृजक प्रोग्राम ग्लिफ़्टिक है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर इस्तेमाल कर सकते हैं- http://www.gliftic.com . ग्लिफ़्टिक के जरिए आप चित्रों को स्वचालित सृजित कर सकते हैं. इसके लिए बस, आपको प्रारंभ में कुछ इनपुट देने होंगे जैसे कि रंग योजना इत्यादि, और ग्लिफ़्टिक कलाकृतियां बनाने के लिए तैयार हो जाता है. इसमें– ड्रा मी ए पिक्चर नाम का एक विज़ॉर्ड भी होता है जिसके जरिए एक कलाकृति तैयार होती है. विज़ॉर्ड के जरिए उस कलाकृति को अनंत मर्तबा टिकल कर सकते हैं जिससे वह उस चित्र को अपने पहले से मौजूद डाटाबैंक में से कुछ चित्रों-रंगों को बाहर निकाल कर उन्हें उल्टा-पुल्टा मिला-जुला कर हर बार कुछ नया रूप-रंग देता है – जब तक कि आप उसे पसंद न कर लें. और, चित्रों में स्वचालित परिवर्तन माउस क्लिकों के जरिए ही कर सकते हैं. अतः आप यह भी कर सकते हैं कि इस प्रोग्राम के इस विज़ॉर्ड के जरिए माउस-क्लिकों की तूफ़ान ले आएँ, और कोई तूफ़ानी सी कलाकृति तैयार कर लें.

रेडीमेड कलाकृति !
आधुनिक ग्राफिक्स सॉफ़्टवेयरों के द्वारा न सिर्फ आप एक विशेषज्ञ कलाकार बन सकते हैं, बल्कि हर संभव प्रकार की रचना कर सकते हैं – जिनमें शामिल हैं- जीवंत, असली प्रतीत होने वाले एनीमेशन, प्राकृतिक दृश्यावलियाँ, ज्यामितीय आकृतियाँ इत्यादि. त्रि-आयामी चित्रों की रचनाएँ भी आसान हैं जिन्हें हम अपने कम्प्यूटर खेलों में आमतौर पर देखते हैं. त्रिआयामी चित्रों की रचना हेतु ग्राफ़िक इंजिन तैयार किए जा चुके हैं जिसके जरिए आकारों का निर्माण एवं मोशन स्वचालित होता है और हमें बस रूप रंग का चुनाव करना होता है. फ़ोटोशॉप के फ़िल्टरों या पेंटशॉप प्रो के इफ़ेक्ट्स के जरिए किसी तैयारशुदा कलाकृति में अतिरिक्त प्रभाव पैदा कर एकदम नई किस्म की कलाकृति तैयार की जा सकती है – वह भी चंद मिनटों में. आपको अख़बार का कोई चित्र पसंद आया, आप उसे स्कैन कर लें. ऐसे ही दो-चार चित्रों को मिला कर, काट जोड़ कर कोई कोलाज बना लें और उसमें फ़िल्टरों के जरिए विशेष प्रभाव डाल लें – हो गई तैयार आपकी एकदम नई, नायाब रचना. आप अपना स्वयं का कोई आर्टिस्टिक पोर्ट्रेट बनाना चाहते हैं, तो अपने चित्र को स्कैन कर लीजिए या डिजिटल कैमरे से अपना पोर्ट्रेट खींच लीजिए. फिर उसे फोटोशॉप में खोल कर उसमें आर्टिस्टिक फ़िल्टर लगा कर कुछ प्रयोग कीजिए. देखिए कि आपका पोर्ट्रेट किस प्रकार एक नायाब कलाकृति में परिवर्तित होता है. अगर पसंद न आए तो उस चरण को हटा कर कोई नया फ़िल्टर लगाएँ. कोई न कोई विशिष्ट प्रभाव आपको जमेगा और आपके पोर्ट्रेट में जान डाल देगा. यही नहीं, कुछ प्रोग्रामों के पिक्चर ट्यूब जैसे विकल्पों के जरिए आप अपना विशिष्ट किस्म का ब्रश भी बना सकते हैं जिससे आकारों-चित्रों के जरिए कलाकृतियों का निर्माण किया जा सकता है.

कम्प्यूटर के जरिए कलाकृतियों के निर्माण की संभावनाएँ अनंत हैं. तो देर किस बात की – उठा लीजिए अपने माउस / डिज़िटल पेन और ले आइए बाहर अपने भीतर के कलाकार को!

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आदेशानुसार, अब छींटे और छिंटे में कोई फ़र्क़ नहीं होगा भाई!




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भारत की केंद्रीय माध्यमिक शिक्षण संस्थान (सीबीएसई) शिक्षा का नया मापदंड अपनाने जा रही है. अब छात्रों को उनकी हिज्जे, वर्तनी, मात्राओं – स्पेलिंग गलतियों के लिए दंडित नहीं किया जाएगा. वे अब आराम से भारत को भारात या भरता या भारता या ऐसा ही कुछ और, जो मरजी बन पड़े लिख सकते हैं, उनके लिए यह जानना बस जरूरी है कि भारत (या भरता या...) नाम का कोई देश है, जिसमें सौ करोड़ से ऊपर लोग रहते हैं और वहां अब तक सही शिक्षा नीति नहीं बन पाई है उसमें लोग भगवा करण से लेकर साफ-सफाई करण इत्यादि करते रहते हैं.

सीबीएसई/एनसीईआरटी की शिक्षा नीतियां / पाठ्य सामग्रियाँ वैसे भी आलोचना की शिकार जब तब होती रही है. बीजेपी सरकार के दौरान उस पर आरोप थे कि इतिहास में उसने पूरा भगवा करण कर दिया, जिसे अब यूपीए की सरकार गंगा/मक्का-मदीना/यरुशलम जल डाल-डाल कर धो रही है – साफ कर रही है.

कुछ समय पूर्व यह खबर आई थी कि सीबीएसई में परीक्षाओं के विकल्प होंगे तथा कई स्तर की परीक्षाएँ होंगी. जैसे कोई परीक्षा ही नहीं देना चाहे तो उसे यह प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा कि उसने दसवीं या बारहवीं की पढ़ाई की (परीक्षा पास नहीं की). जो परीक्षा में बैठेंगे वे अपने लिए अलग-अलग स्तर की परीक्षा चुन सकेंगे – जैसे कोई गणित में कमजोर है तो गणित की वह स्तर तीन की परीक्षा में बैठ सकता है, जहाँ कुछ आसान से सवाल होंगे, या वह गणित का विषय ही छोड़ सकता है... इत्यादि ... इत्यादि ... यानी कुल मिलाकर परीक्षाओं का भी मजाक बनाया जा रहा है.

और अब यह नया शिगूफ़ा. कुछ थोड़े से छात्र भले ही प्रसन्न हों, कि उन्हें कम मेहनत में ज्यादा और पूरे नम्बर मिलने का रास्ता खुल रहा है, परंतु क्या हम सोच सकते हैं कि अंततः ऐसे में यह शिक्षा हमें कहाँ लेकर जाएगी? हम अपने ही नाम के स्पेलिंग और हिज्जे भूल जाएंगे एक दिन. यह आसन्न खतरा क्या किसी को दिखाई नहीं दे रहा है. शिक्षा के नाम पर बेहूदा प्रयोगों की यह इति-अति है.
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व्यंज़ल
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क्यूँ पालते हो फोकट की आशाएँ
हमने तो भुला दीं तमाम मात्राएँ

झंडा ले घूम रहा है सरे बाजार
जहां गिरवी हो गई हैं सारी हवाएँ

नसों में जहर घोलकर वो जालिम
ले के आया है जमाने भर की दवाएँ

चलाया चप्पू तमाम उम्र वो नादान
मंजिल वहीं थी पता न थी दिशाएँ

खुद फंस चुका है रवि गले तक
सोचता है कि कैसे सब को फंसाएँ

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हम भारतीय बड़े खुश!



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विश्व में खुश लोगों की कतार में भारतीयों का नंबर चौथा है. हमें यह सबसे बड़ी तसल्ली हो सकती है कि हमसे ज्यादा खुश सिर्फ तीन और देशों के लोग हैं – ऑस्ट्रेलिया, अमरीका और मिस्र के लोग. बाकी सारे के सारे हमसे ज्यादा दुःखी हैं.

जिस सर्वे में यह बात कही गई है, उसी सर्वेक्षण में यह बात भी बताई गई है कि रहने के हिसाब से सबसे अच्छी जगह, सबसे ज्यादा सुविधाओं वाली जगह कनाडा है, और भारत का नंबर कोई बयालीसवां-चवालीसवां है.

मतलब साफ है – हम भारतीय अपनी बेहूदा, सिंगल लेन की भीड़ भरी, किरोसीन से चलती टेम्पो-ऑटो की भयंकर धुएँदार, धूलदार, गड्ढेदार सड़कों में भी खुशी से आँय-बाँय-साँय मोटरकार-बाइक चलाते हुए खुश रहते हैं. बिजली कहीं मिलती है, कहीं नहीं मिलती, कभी रहती है, कभी नहीं रहती तो भी हम खुश हैं. भ्रष्टाचार में सर्वोच्च स्थान रखने वाले इस देश में कोई भी काम कराने के लिए सरकारी बाबू को ऊपरी पैसे देने पड़ते हैं तो भी हम खुश हैं- कि चलो काम तो हो जाता है. बढ़ती जनसंख्या और तमाम भीड़ के बीच बेरोजगारी, भुखमरी और गरीबी को साथ लेकर भी हम भारतीय, संतोषी जीव, बहुत खुश हैं. जात-पात और धर्म के तमाम झगड़ों – झंझटों के बीच और रसातल को जाती राजनीति के बीच भी हम खुश हैं!

इससे यह भी तय हो गया है कि आदमी झुग्गी झोंपड़ी में भी खुश रह सकता है. उसके लिए हाई-राइस बिल्डिंगें-बंगले, साफ़-सुंदर-चौड़ी सड़कें दुःख का कारण होती हैं. बेसिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर की बहुलता – चौबीस घंटे बिजली-पानी और दीगर सुविधाओं से वह घबरा जाता है और खुश नहीं रह पाता. अरे ! कनाडा वासियों, रहने के हिसाब से सुख सुविधाएँ जुटा लेने से क्या होगा? खुश तो नहीं हो न? खुश रहना हमसे सीखो!

मैं भी एक भारतीय हूँ, लिहाजा मेरे दुःखी होने का कोई कारण कैसे हो सकता है भला? इस सर्वे से आज मुझे पता चला कि मैं भी खुश हूँ! और, आप इसे पढ़ रहे कोई भारतीय हैं, तो आप भी मजे कीजिए कि आप खुश हैं!

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व्यंज़ल
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कोई सबब क्यूँ हो कि मैं खुश हूँ
उनको दुःखी देखकर ही मैं खुश हूँ

चेहरे पर स्थाई हैं पीड़ा की लकीरें
गुमां क्यूँ सबको है कि मैं खुश हूँ

बिकने लगा है बाज़ार में सबकुछ
अपने उसूलों को बेचकर मैं खुश हूँ

सबने बहुत नकारा मुझ बेदिल को
दीवानों की भीड़ में एक मैं खुश हूँ

वो आँसू प्याज मिर्च के रहे होंगे
रवि सच में तो बहुत मैं खुश हूँ

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क्या चिड़ियों में भी एस्थेटिक सेंस होता है?



क्या चिड़िया भी अपना घोंसला सजाती है?
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विविध प्रजाति की चिड़ियाएँ विविध किस्म के घोंसले बनाती हैं. कुछ तो पत्तों की सिलाई कर , कुछ कंटीली, बारीक लकड़ियों को जोड़कर तो कुछ बड़ी बारीकी से तिनकों को जोड़कर सुंदर, आर्किटेक्चरल मॉर्वल बनाती हैं. परंतु क्या चिड़ियों में भी एस्थेटिक सेंस होता है और क्या वे अपना घोंसला सजाती हैं?

ये बात तो शायद महान् स्व. सालिम अली जैसे बर्ड वाचर ही बता सकते हैं, क्योंकि मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं है. परंतु मेरे घर की दीवार के सहारे कुछ लताओं की टहनियों का सहारा लेकर पक्षी के एक जोड़े ने यह घोंसला बनाया है जिसका चित्र आप देख रहे हैं. इसके एक तरफ जो चिड़िया का सिर-नुमा आकृति दिखाई दे रही है, वह सफेद रेशे की सहायता से इस चिड़िया ने ही बनाया है – चोंच से चबाचबा कर, और उसे घोंसले पर बड़ी सफाई से लगाया है. ऐसा प्रतीत होता है कि घोंसले में चिड़िया चोंच निकाल कर बैठी है – पहरा देती हुई. यह घोंसले की सजावट का काम तो कर ही रही है, बल्कि शायद घोंसले की सुरक्षा भी कर रही है – इनट्रूडर्स को भ्रमित करती हुई - आगाह करती हुई कि घोंसला खाली नहीं है – इसका रखवाला बैठा है – चोंच निकाल कर...

सुंदरता के अलावा इसमें मजबूती भी है. अगर आप घोंसले को ध्यान से देखेंगे तो यह भी पता चलेगा कि तिनकों को सफेद, मजबूत धागे की सहायता से किस खूबसूरती से लता की बेलों पर पिरोया गया है ताकि तेज हवाओं का भी कोई असर न हो. और, घोसले की गोलाई तो इतनी परिपूर्ण है कि बस, आप उदाहरण दे सकते हैं.

पूरे आकार में (500 केबी) चित्र यहाँ देखें
इस के घोंसले के अंदर का हिस्सा चितकबरे, रंगीन अंडे समेत यहाँ देखें


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जस्ट एनॉदर व्यू...



आमतौर पर अंग्रेज़ी चिट्ठे मैं नहीं पढ़ता, परंतु देबाशीष की चिट्ठा-चर्चा पर की गई पोस्ट से कुछ कौतूहल पैदा हुआ. पोस्ट में जिस समाचार का जिक्र किया गया था, वह कोई दो महीने पुरानी जैम (जस्ट एनॉदर मैग़जीन) पत्रिका में छपा था. दरअसल जैम पत्रिका में आईआईपीएम के भारत भर के प्रायः सभी कैंपसों के बारे में गंभीरता से छानबीन कर तथ्यों को सही रूप से लोगों के समक्ष लाने का दावा किया गया था. उस समाचार को मैंने भी बड़ी रूचि से पढ़ा था क्योंकि भारत के प्रायः हर अखबार में हर महीने आईआईपीएम के पूरे पृष्ठ भर के विज्ञापन में बड़े-बड़े दावे रहते हैं कि उनका संस्थान वर्ल्ड क्लास है, और जैम के उस समाचार में उन तथ्यों के एक तरह से धज्जियाँ-और-रेशे उड़ा दिए गए थे.

बहरहाल, समाचार की सच्चाई तो जैम और आईआईपीएम ही जानें, मगर, जाहिर है आईआईपीएम प्रबंधन को वह समाचार नागवार गुजरना ही था, लिहाजा तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के एवज में कई करोड़ रुपयों का हर्जाने का क़ानूनी नोटिस जैम को पकड़ाया गया यह खबर है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क़ानूनन हर्जाने की बात तक तो सब ठीक ठाक रहा, परंतु मामले ने जल्दी ही ज्यादा तूल पकड़ना शुरू किया और जैम के मुम्बई आफ़िस में धमाल मचाया गया और इंटरनेट पर कुछ ब्लॉगरों ने जैम की प्रकाशक और प्रबंध संपादक रश्मि बंसल पर कुरूचिपूर्ण व्यक्तिगत आक्षेप लगाए. आरोप-प्रत्यारोप की यह लड़ाई शीघ्रता से तमाम नियमित ब्लॉगरों तक पहुँच गई और कुछ जैम का तो कुछ आईआईपीएम का पक्ष लेने लगे. लोग व्यक्तिगत स्तर पर नीचताई की हद तक आकर अरिंदम की पोनीटेल के बारे में टिप्पणियाँ करने लगे हैं, तो रश्मि की व्यक्तिगत सेक्सुअल प्रेफ़रेंसेज़ के बारे में लिख रहे हैं! आगे होगा क्या यह तो समय ही बताएगा, पर कुछ विचारणीय प्रश्न हैं –

जैसे कि देबाशीष ने चिट्ठा चर्चा में लिखा था- पंगा न लै – तो क्या जैम पत्रिका का आईआईपीएम से भिड़ना केलकुलेटेड मूव था? जो समाचार जैम पत्रिका ने छापा था, क्या उसके लिए आईआईपीएम के व्यूज लिए गए थे और अगर लिए गए थे तो उसे प्रकाशित क्यों नहीं किए गए थे? क्या तथ्यों को आईआईपीएम से आधिकारिक स्तर पर पुष्टि कर ली गई थी?

वैसे, जैम एक पत्रिका के रूप में सिरफ आठ रुपल्ली में मिलने वाली बहुत मज़ेदार पत्रिका है जिसे मैड और पंच शैली में निकालने की कोशिश की जाती रही है और वे कभी-कभी कामयाब भी होते दिखते हैं. अभी हाल ही में जैम ने अपना दसवां जन्म दिवस मनाया. और जैम जैसी मनोरंजक पत्रिका के लिए दीर्घायु की हमारी भी कामना है. इस विवाद का अंत जो भी हो – पर यह भी तो सबको पता है कि कभी कभी विवादों से भी चर्चा में बने रहने और सर्कुलेशन बढ़ाने में फ़ायदा तो मिलता ही है!

वैसे, निरंतर पर अरिंदम की किताब के रेशे हम भी उड़ा चुके हैं. पर, क्या आईआईपीएम को यह नहीं पता, या उन्हें हिन्दी नहीं आती, या हमने कुछ ज्यादा ही शालीनता बरती?

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कंप्यूटर बनता जा रहा है आपकी आधुनिक फैशन सामग्री



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फैशन की दुनिया में परिवर्तन बड़ी तेजी से होते हैं। वस्तुत: परिवर्तन का नाम ही फैशन है। परंतु शायद फैशन की दुनिया के लोगों को यह भान भी नहीं होगा कि अब कंप्यूटर भी उनकी दुनिया में सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर चुका है और कहीं-कहीं तो वह अपनी घुसपैठ कर भी चुका है। इससे पहले कि आपके हाथ की आधुनिकतम घड़ी को देखकर कोई आपसे पूछे कि अरे, आपने तो एक कंप्यूटर अपने हाथ में बांध रखी है, और आप सही जवाब नहीं दे पाएं या फिर आप खुद आश्चर्य चकित हो जाएं, आइए देखते हैं कि कंप्यूटर आपके फैशन परिधानों में किस तरह से और कितनी तेजी से घुसपैठ कर रहा है।

छोटी मगर गंभीर शुरूआत
आज से महज कुछ दशक पहले, जब कंप्यूटर का आविष्कार हुआ था, तो उस समय उसका आकार बड़े-बड़े कमरों जैसा होता था। आज के कंप्यूटर जो कि उस प्रारंभिक कंप्यूटरों से आकार में काफी छोटे हैं, प्रोसेसिंग पावर यानी शक्ति में उससे लाखों गुना ज्यादा तेजी से और ज्यादा अच्छी तरह से काम कर सकते हैं। चीजों को छोटे आकार में तथा आदमी की सहूलियत के अनुसार ढालने की कला अब कंप्यूटर को आदमी के और भी करीब ले आई है। हाल ही में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैलिफोर्निया में एक ऐसा पर्सनल कंप्यूटर तैयार किया गया है, जो कि एक छोटे से आम माचिस के पैकेट के आकार का है। यह विश्व का सबसे छोटा पर्सनल कंप्यूटर है, जो कि प्राय: सभी रोजमर्रा के काम जिसमें इंटरनेट संबंधित काम भी हैं, आसानी से निपटा सकने में सक्षम है। इस माचिस के आकार के कंप्यूटर में दूसरे कंप्यूटरों से जोड़े जा सकने वाले सीरियल और पैरेलल पोर्ट भी हैं। वस्तुत: जिस नोटबुक कंप्यूटर पर यह लिखा जा रहा है, वह कुछ दो किलो भारी है, तथा एक बड़े आकार के, मोटे पुस्तक जैसा है। परंतु यह माचिस के आकार का कंप्यूटर मात्र कुछेक ग्राम ही है, और इस नोटबुक कंप्यूटर से न सिर्फ ज्यादा पावरफुल है, बल्कि इसमें ज्यादा खासियतें भी है। अब जब किसी मीटिंग या किसी कान्फ्रेंस में कोई अपनी जेब से अगर माचिस निकाले, तो यह कदापि न समझें कि वह वातावरण को प्रदूषित करने हेतु सिगरेट जलाने हेतु तत्पर है। हो सकता है कि वह अपने नए मिनी फैशनेबल कंप्यूटर – पीडीए (पर्सनल डिज़िटल असिस्टेंट) पर कोई काम करने का इरादा रखता हो।

घड़ियों में, ब्रेसलेट में कंप्यूटर
विश्व की जानी मानी कंप्यूटर कंपनी आई बी एम ने अभी हाल ही में एक ऐसे कंप्यूटर का प्रदर्शन किया था जो कि न सिर्फ हाथ घड़ी की शक्ल में बनाया गया है, बल्कि इसे पहना भी जा सकता है, और पहने हुए ही इसका उपयोग ई-मेल के आदान प्रदान और इंटरनेट संबंधी अन्य कंप्यूटर संबंधी कार्यों के लिए किया जा सकता है। जानी मानी जापानी कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी केशिओ ने हाथ घड़ी की शक्ल में एम.पी.3 प्लेयर (और कई कम्पनियों ने लॉकेट और अंगूठी की शक्ल में भी ये जारी किये हैं, जिन्हें सचमुच पहना जा सकता है!) जारी किए हैं, जो कि कुछ और नहीं, बल्कि ये छोटे-छोटे कंप्यूटर हैं, जो आपको कंप्यूटर आधारित डिजिटल संगीत का आनंद प्रदान करने हेतु बनाए गए हैं। इसी प्रकार घड़ी की ही शक्ल में इस कंपनी ने डिजिटल कैमरे बनाए हैं, जो कि किसी भी कंप्यूटर से जुड़कर जीवंत वीडियो का प्रसारण इंटरनेट के जरिए विश्व में कहीं भी कर सकते हैं। ये घड़ियां ब्लूटूथ और ब्लैक बैरी जैसे वायरलेस सिध्दांत से अपने आसपास के उपकरणों से भी जुड़ने की क्षमता रखते हैं, इस प्रकार इनकी उपयोगिता आने वाले समय में तेजी से बढ़ने की संभावना है, और एक अनुमान के अनुसार, आने वाले समय में हम सभी के हाथों में जो भी घड़ी होगी, उसमें एक शक्तिशाली कंप्यूटर होगा जो आपकी जरूरत के हिसाब से आपकी कलाई को सुंदरता भी प्रदान करेगा और आपकी कंप्यूटिंग आवश्यकता की पूर्ति भी करेगा।

आपका खूबसूरत पेन भी आपका कंप्यूटर ?
अमरीका की एक नई कंपनी अनोटो ने हाल ही में एक ऐसा पेन बाजार में जारी किया है, जो कि अपने आप में एक छोटा सा डिजिटल कैमरा समेटे हुए है, तथा साथ ही एक छोटा सा प्रोसेसर यानी कंप्यूटर भी अपने आप में समेटे हुए है। इसके जरिए आप अपने हाथों से एक विशेष प्रकार के कागज पर लिखे जा रहे या बनाए जा रहे रेखा चित्रों या ग्राफ और चार्टों को वायरलेस इंफ्रारेड रिमोट के जरिए बेस कंप्यूटरों के सहारे विश्व में कहीं भी प्रेषित कर सकते हैं। एक अन्य कंपनी ने जेबी पेन की शक्ल का एम.पी.3 प्लेयर बनाया है, जो कि जैसा पहले ही बताया जा चुका है, एक प्रकार का कंप्यूटर ही है। इस पेन के सहारे न सिर्फ आप लिख सकेंगे, वरन आप हाई फाई गुणवत्ता के सीडी क्वालिटी के संगीत का आनंद भी घंटों ले सकेंगे। नोकिया, जो कि मोबाइल फ़ोन बनाने वाली विश्व की पहले नंबर की कंपनी है, उसने एक डिजिटल पेन बनाया है जिससे किसी भी सतह पर लिखा जा सकता है और आपका लिखा हुआ आपके पर्सनल कंप्यूटर पर स्थानांतरित किया जा सकता है- चूंकि यह डिजिटल पेन लिखे हुए को अपनी मेमोरी में समेटता जाता है. यानी अपने लिखे हुए कागज़-पत्र को संभालने की अब जरूरत ही नहीं! पहने जा सकने वाले कंप्यूटरों में पहले से ही एक मोटे से चश्मे के भीतर ही कंप्यूटर तैयार किया जा चुका है, जो कि रंगीन डिस्प्ले से युक्त है। आजकल वायरलेस एप्लीकेशन प्रोटोकॉल यानी डबल्यूएपी, वेप, जीपीआरएस, सीडीएमए, एज सुविधा युक्त जो सेलुलर फोन उपलब्ध हो रहे हैं वे अपने आप में ही एक छोटे से मगर संपूर्ण कंप्यूटर ही हैं। इनके द्वारा आप इंटरनेट से अपने ई मेल / इंस्टैंट मैसेजिंग सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं, तथा वेप इनेबल्ड साइटों में भ्रमण भी कर सकते हैं साथ ही साथ वेब पर मोबाइल वेब अनुप्रयोगों के जरिए अपने विभिन्न कार्य भी निपटा सकते हैं। और तो और, अब अपनी रचनाओं और ब्लॉग को मोबाइल फोनों के जरिए लिख कर सीधे ही वेब पर प्रकाशित भी कर सकते हैं.

अब आपके सुंदर, रंगीन कपड़ों में कंप्यूटर
हर बड़े, बूढ़ों, बच्चों और युवाओं की पसंद है जींस। वस्तुत: कोई एक परिधान और कपड़े का एक प्रकार, जो विश्व में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, और जिसे विश्व में सबसे ज्यादा पहना जाता है, वह जींस ही है। विश्व की सबसे ज्यादा आकारों और प्रकारों में जींस उत्पाद करने वाली कंपनियों में से एक, लेविस का नाम आपने शायद सुना हो, और हो सकता है कि आपने कभी उनके बनाए हुए जींस भी शौक से पहने हों। इस कंपनी को शायद यह भान हो गया है कि अब जींस के दिन जाने वाले हैं और कंप्यूटर युक्त परिधानों का जमाना आने वाला है लिहाजा इस कंपनी ने फिलिप्स कंपनी के साथ मिलकर एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक वस्त्र तैयार किया है, जिसमें कंप्यूटर के सर्किट बुने जा सकते हैं। इसी प्रकार एक अन्य खोज में एक ऐसा कंप्यूटर कीबोर्ड तैयार किया गया है, जो कि वस्त्रों में बुना हुआ है और जिसे वस्त्रों की तरह लपेट कर रखा जा सकता है और, जरूरत पड़ने पर, अगर गंदा हो जाए तो धोया भी जा सकता है, यहां तक कि इस पर इस्त्री भी की जा सकती है।

कपड़ों में कंप्यूटरों के बुने जा सकने की संभावनाओं ने इसकी उपयोगिता के नए-नए द्वार खोल दिए हैं। उदाहरण के लिए, आप भविष्य में एक ऐसा माइक्रोप्रोसेसर कंट्रोल्ड जैकेट पहन सकेंगे, जोकि आपके शरीर के तापमान और वातावरण के तापमान को लगातार मापते रह कर आपके शारीरिक जरूरत के अनुसार तापमान में ऐसा सामंजस्य बिठाएगा कि आपको हर समय एयरकंडीशन जैसे वातावरण का अहसास होता रहेगा। गर्भवती माताओं के लिए ऐसे वस्त्र उपलब्ध होंगे, जो कि गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के साथ-साथ गर्भिणी के स्वास्थ्य का प्रतिपल ध्यान रखने में न सिर्फ सक्षम होंगे, बल्कि गर्भस्थ शिशु के जन्मजात और जेनेटिक आनुवंशिक बीमारियों का पता लगा सकेंगे जिससे कि समय पर ही इन बीमारियों के रोकथाम के उपाय किए जा सकेंगे। पहने जा सकने योग्य कंप्यूटरों ने तो इसकी उपयोगिता के नए द्वार खोल दिए हैं। यानी अब आपको अपने कंप्यूटर पर काम करने के लिए प्राचीन पुरातन तरीके यानी किसी कुर्सी पर बैठकर अपने डेस्कटॉप पर या अपने नोट बुक को अपनी गोद में रख कर काम करने की आवष्यकता नहीं। अब अपने पैंट या स्कर्ट पर बुने की-बोर्ड के सहारे अपना सारा काम बड़े ही फैशनेबुल तरीके से कर सकते हैं। लेविस एक ऐसा जैकेट पेश करने जा रही है जो कि हाल-फिल-हाल मोबाइल फोन और एम.पी.3 प्लेयर युक्त है, और जिसमें भविष्य में शीघ्र ही और भी काफी कुछ संभावनाएं जोड़ी जा सकेंगीं।

भविष्य की असीम संभावनाएं
इतना तो तय है कि भविष्य कंप्यूटरों का ही है और यह आपके जीवन का अभिन्न अंग बनने वाला है। सवाल यह है कि इसकी घुसपैठ कहां तक जाकर खत्म होगी? कंप्यूटर पंडितों का मानना है कि भविष्य का जीवन कंप्यूटरों पर पूर्ण रूपेण निर्भर करेगा। और जहां तक जीवन की निर्भरता कंप्यूटरों पर निर्भर होनी है तो फिर फैशन परिधानों की बात ही क्या? हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक अंधे के नेत्र में लैंस की जगह सिलिकॉन चिप को प्रत्यारोपित कर उसे देख सकने की क्षमता प्रदान की है। यानी आने वाले समय में आपके कानों का हीरा जड़ित सुंदर इयररिंग अपने आप में मोबाइल फोन युक्त एक एम.पी.3 प्लेयर होगा जो कि आपको न सिर्फ आपका मनचाहा संगीत सुना सकने में समर्थ होगा बल्कि आपको आपका ई-मेल भी पढ़ कर सुना सकेगा। आपकी टाई पिन में उच्च क्षमता युक्त प्रोसेसर लगे होंगे जो कि आपकी आवाज और यहां तक कि आपकी हरकतों को पहचान कर विभिन्न कार्यों को अपने आप हो जाने हेतु निर्देश प्रदान कर सकने में सक्षम होंगे। आपकी घड़ी आपका एक पूरा व्यक्तिगत कंप्यूटर होगा जो कि आपकी आवाज को पहचान कर आपके समस्त कार्य जैसे कि पत्र लेखन, प्रोग्रामिंग, ई मेल डाउनलोड कर उसे सुनाना इत्यादि को निपटा सकने में सक्षम होगा। आपको तब कंप्यूटर पर निर्देश देने हेतु एक-एक अक्षर और मात्राओं को टाइप करने की कतई जरूरत नहीं होगी। आपका जेबी या कलाई घड़ी वाला कंप्यूटर आपकी आवाज से ही टाइप का सारा कार्य, वह भी बिना किसी गलती के, कर सकने में सक्षम होगा। आपकी उंगली में आपके प्रियतम द्वारा पहनाई गई अंगूठी टिमटिमा कर यह संदेश देगी कि आपकी प्रिया ने आपको याद किया है, और अब समय हो गया है उससे मिलने का।

कंप्यूटरों के द्वारा फैशन डिजाइनिंग का कार्य तो बरसों से हो रहा है, परंतु एक दिन कंप्यूटर खुद फैशन परिधानों में शामिल हो जाएगा, यह उम्मीद शायद किसी को नहीं रही होगी। मगर जब भी कोई नया, क्रांतिकारी फैशन आता है, वह चाहे बेल बॉटम हो या जींस या फिर कंप्यूटर उपकरण, अपने दीवानों की नई फौज तैयार करता है। जाहिर है, अब बारी आपकी है- कोशिश करिए इससे बचने की। या इसे अपनाने की!

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यूनिकोड में हिन्दी संयुक्ताक्षरों में समस्या?



अभी भी प्रायः सभी को हिन्दी में कुछ विशेष अक्षरों को टाइप करने में दिक्कतें आती हैं. इसी तरह, कुछ अक्षर/शब्द गलत तो नहीं होते, परंतु फ़ॉन्ट की ग्लिफ़ रेंडरिंग में बग या समस्या या कोई समाधान नहीं होने के कारण गलत छपते हैं. कुछ तो ब्राउज़रों की हिन्दी रेंडरिंग भी सही नहीं होती, और कुछ टैक्स्ट फ़ॉर्मेटिंग के कारण भी समस्याएँ आती हैं. जैसे कि किसी अनुप्रयोग की प्री-फ़ॉर्मेटेड शैली में अक्षरों को एक-एक स्पेस के बाद टाइप किया दर्शाया जाता हो, जैसे कि शीर्षकों में, तो हिन्दी में मात्राएँ एवं संयुक्ताक्षर सही नहीं दिखाई देते. फिर भी, ऐसी ही बहुत सी बातों को ध्यान में रखते हुए अनुप्रयोगों को निरंतर सुधारा जा रहा है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में इन समस्याओं से पूरी तरह निजात पा लिया जाएगा.

हमें प्रायः क्ष, त्र, ज्ञ, ष, श्र इत्यादि टाइप करने में दिक्कतें आती हैं. क्योंकि इनके लिए अलग से कुंजी किसी-किसी कुंजी पट में डिफ़ाइन नहीं होते. दरअसल ये अक्षर मिश्र अक्षर हैं. अगर इनके ध्वन्यात्मक विन्यासों को ध्यान में रखा जाए तो इन्हें आसानी से टाइप किया जा सकता है. जैसे – क्ष = क्ष, त्र = त्र, ज्ञ = ज्ञ, श्र = श्र
(हो सकता है कि ऊपर लिखे शब्द आपके ब्राउज़र में सही दिखाई न दें, चूँकि इसमें नॉन जॉइनर अक्षर को शामिल किया गया है.)

दरअसल, यूनिकोड में हिन्दी के इन अक्षरों को पारिभाषित करते समय ऐसी गलतियाँ रह गईं हैं. आरंभ में संयुक्ताक्षरों के लिए अलग से यूनिकोड के कोड प्राप्त नहीं किए गए. अब अगर कहीं सार्टिंग आर्डर डिफ़ाइन करेंगे तो क्या होगा? सामान्य तौर पर क्ष हिन्दी वर्णमाला-क्रम में अंत में आता है, परंतु कम्प्यूटर प्रोग्रामों के लॉजिक के लिए यहाँ यह क् और ष से मिल कर बना है, अतः यह क के बाद और ख से पहले आएगा. यह बहुत भयंकर ग़लती है. इसे दूर करने के उपाय किये जा रहे हैं.



इसी तरह, हिन्दी में कई जगह संयुक्ताक्षरों को अलग प्रकार से लिखा जाता है. जैसे कि भगवत्गीता को ऐसे दिखाई देना चाहिए - भगवत्गीता. यहाँ पर त् के बीच में अंग्रेज़ी के जीरो-विड्थ नॉन जॉइनर (U+200C) का प्रयोग किया गया है. ऐसे ही जीरो विड्थ स्पेस (U+200B) और जीरो विड्थ जॉइनर (U+200D) भी हैं, जिनका इस्तेमाल कर वांछित शब्दों-संयुक्ताक्षरों को प्राप्त किया जा सकता है. हाँ, इसके लिए आपको अलग से कुछ प्रयोग करने होंगे कि किस प्रकार से इनका इस्तेमाल किया जाए. वैसे, सबसे आसान है – कैरेक्टर मैप जैसे औज़ारों से ऐसे अक्षरों को नक़ल कर चिपकाना, या फिर ऐसे शब्दों का एक छोटा सा पाठ फ़ाइल बना लिया जाए, जहाँ से जब आवश्यकता हो, नक़ल कर ली जाए.

आने वाले दिनों में ये सब समस्याएँ बीते दिनों की बात हो जाएंगी, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है.


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हिन्दी संयुक्ताक्षरों की समस्या -2



ये हैं कुछ स्क्रीनशॉट जिन्हें ब्राउज़र पर या कहीं भी अन्यत्र अनुप्रयोगों में सही रूप में दिखने चाहिएँ – ( रमण ने भी इसके पहले के पोस्ट पर ईश्वर इत्यादि के सटीक उदाहरण दिए हैं)



और ये हैं कुछ संयुक्त अक्षर जिनके कारण समस्याएँ आती हैं -



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बीएसएनएल का ब्रॉडबैण्ड = ज़ीरोबैण्ड



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15 अगस्त को बीएसएनएल के भोपाल क्षेत्र के महाप्रबंधक ने बड़े शान से घोषणा की कि अब उनके मौजूदा लैंडलाइन टेलिफोन ग्राहकों को 250 रुपये प्रतिमाह की दर से चौबीसों घंटे ब्रॉडबैण्ड की सुविधा मिलेगी. बंधन सिर्फ 400 मे.बा. प्रतिमाह डेटा ट्रांसफर का रहेगा, और अगर इसके अलावा अधिक डेटा ट्रांसफर किया जाता है तो 2 रुपए प्रति मे.बा. की दर से अतिरिक्त भुगतान करना होगा.

जाहिर है, इस आकर्षक प्रस्ताव पर मैं झपट पड़ा. 16 अगस्त को बीएसएनएल के स्थानीय ग्राहक सुविधाकेंद्र में संपर्क करने पर पता चला कि इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है, लिहाजा आपको मुख्य कार्यालय जो कि 4 किलोमीटर दूर है, वहाँ जाना पड़ेगा. मरता क्या न करता, मैं मुख्य कार्यालय पँहुचा. दिन के ग्यारह बज रहे थे. रिसेप्शन काउंटर पर क्लर्क ने बताया कि ब्राडबैण्ड की जानकारी जनसंपर्क अधिकारी देंगे. जनसंपर्क अधिकारी की कुर्सी खाली थी. पता चला कि वे मीटिंग में हैं.

मैंने अपने एक परिचित को पकड़ा जो वहीं कार्यरत हैं. उनके जरिए जनसंपर्क अधिकारी से बात हुई जो कि मीटिंग में व्यस्त थे. उन्होंने आवेदन पत्र, जो कि खिड़की नं 3 में मिलता है वह लेकर और भरकर लाने के लिए कहा. आवेदन में टेलिफोन, जिस पर ब्रॉडबैण्ड चाहिए उसकी हालिया रसीद भी लगाने को कहा. जो आज्ञा सरकार. मैं वह आवेदन पत्र लेकर, भरकर उनके पास आया. उन्होंने उस पर अपने रजिस्टर में इन्द्राज किया, क्रमांक डाला और कहा कि ऊपर तीसरे माले पर चले जाओ वहाँ आपको पेमेंट एडवाइस मिलेगा. वह एडवाइस लेकर मैं नीचे पेमेंट काउन्टर पर आया और पूरे पैसे, जिसमें मॉडम की कीमत और एडवांस में रेंटल चार्जेस जमा करवा दिए.

रसीद देने के बाद पेमेन्ट क्लर्क बोली, भाई साहब, आप अगर बुरा न मानें तो इस रसीद की प्रति ऊपर कमर्शियल सेक्शन में दे देंगे. इधर चपरासी आज है नहीं. जो आज्ञा सरकार. मैंने वह रसीद कमर्शियल सेक्शन में दिया. वहाँ एक अफ़सर कह रहा था – यार मेरा टारगेट है इस महीने पंद्रह ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन देना है. मैं खुश हो गया. मेरा कनेक्शन तो टारगेट में ही होगा. मैंने उनसे पूछा कि मैंने भी आवेदन दिया है, आवश्यक भुगतान कर दिया है, मेरा कनेक्शन कब लगेगा. उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे कि मैंने कोई गुस्ताख़ी कर दी हो. कहा जल्दी लग जाएगा.

पंद्रह दिनों तक जब ब्रॉडबैण्ड के दर्शन नहीं हुए तो मैंने अपने उस परिचित से सम्पर्क किया. उसने किसी अफसर का नंबर दिया और बात करने को कहा. मैंने उस अफसर से सम्पर्क किया तो पता चला कि जिस एक्सचेंज में मेरा हालिया टेलिफोन कनेक्शन लगा है, वहाँ कोई उपकरण लगाना पड़ेगा तभी ब्रॉडबैण्ड दिया जा सकता है. परंतु एक रास्ता है, अगर आप अपना नंबर बदलवाने की अनुमति दें तो दूसरे एक्सचेंज से आपका इंडिकेटर बदल कर आपको ब्रॉडबैण्ड दिया जा सकता है. मैं अपना सहमति पत्र लेकर फिर वहाँ पहुँचा. आश्वासन मिला कि अब शीघ्र ही कनेक्शन मिल जाएगा.

पंद्रह दिन और बीत गए. ब्रॉडबैण्ड का पता नहीं था. सम्पर्क करने पर पता चला कि इंडीकेटर बदल कर ब्रॉडबैण्ड नहीं दिया जा सकता चूँकि केबल पेयर उपलब्ध नहीं हैं. अब कहा गया कि उपकरण लगने का इन्तजार करें. मैंने प्रश्न किया कब तक? उत्तर मिला कुछ कह नहीं सकते पंद्रह दिन भी लग सकते हैं और महीने भर भी या उससे ज्यादा भी.

मैंने अपने गुस्से को पीने की कोशिश की. ठीक है, मैं भी सरकारी तंत्र का कभी हिस्सा हुआ करता था. वहां के काम-धाम के रंग-ढंग से मैं पूरी तरह वाकिफ़ था. पर यह तो अति थी. जब आपके पास ऐसा इनफ़्रास्ट्रक्चर नहीं था, कनेक्शन देने की कोई गुंजाइश नहीं थी तो अव्वल तो आवेदन नहीं लेना था, पैसे जमा नहीं करवाने थे. मगर सरकारी बीएसएनल कर्मियों के चलताऊ एटिट्यूड के कारण किसी को कोई फिक्र ही नहीं थी.

मैंने एकाध ऊपर के अफसरों से बात करने की कोशिश की. उनके फोन या तो उठाए ही नहीं जाते थे या फिर कोई और नम्बर दे दिया जाता. हार कर उनके कस्टमर केयर सेंटर 1600 424 1600 पर बात की. वहां के आपरेटर ने तमाम जानकारियाँ लेने के बाद बताया कि हम कनेक्शन प्राप्त हो जाने के बाद के ग्रिवेंसेस हल करते हैं. अगर आपको कनेक्शन नहीं मिला है तो अपने स्थानीय ऑफ़िस से ही सम्पर्क करें.

अंततः मैंने सोचा कि क्यों न बीएसएनएल के वेब साइट पर कुछ प्रयास किए जाएँ. वहां इस पृष्ठ पर तमाम उच्चाधिकारियों के ईमेल पते हैं. जिनसे आप अपनी समस्या हेतु सम्पर्क कर सकते हैं. मैंने उनमें से सीएमडी, ग्राहक प्रकोष्ठ के प्रबंधक समेत कुल सात आठ आला अफसरों को अपनी समस्या युक्त ईमेल भेजा. पर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया. शायद मेरा ईमेल फिल्टर हो गया होगा.

संयोगवश, आज ही बीएसएनएल का आधे पृष्ठ का एक विज्ञापन ब्रॉडबैण्ड सेवा के लिए फिर आया है – उसमें लिखा है – भारत का नं 1 इंटरनेट सेवा प्रदाता. भारत का नं 1 भरोसेमंद टेलिकॉम ब्राण्ड.

और, संयोगवश मुझे तवलीन सिंग का लिखा एक लेख याद आता है जो कि आज से दस साल पहले बीएसएनएल-एमटीएनएल को लेकर लिखा गया था कि टेलिफोन कनेक्शन लेने की बात तो कोसों दूर, बरसात के दिनों में बिगड़े टेलिफोन को जल्दी ठीक करवाने के लिए केंद्रीय मंत्रियों तक से सिफ़ारिशें करवाई जाती थीं तब काम बनता था.

जहाँ आज अन्य टेलिकॉम कम्पनियाँ ग्राहकों को आधे घंटे के भीतर कनेक्शन उपलब्ध करा रही हैं, बीएसएनएल की कार्यशैली प्रश्नचिह्न पैदा करती है. आज भी इसके सेलफ़ोनों के लिए (सिमकार्ड) नंबर लगते हैं. रतलाम में ही हजार से ज्यादा आवेदन साल भर से लंबित हैं ऐसी सूचना है.

मुझ गरीब को 250 रुपए के ब्रॉडबैण्ड के शीघ्र कनेक्शन के लिए किसी मंत्री की सिफ़ारिश कहाँ मिलेगी? अब तो मैं अपने व्यर्थ में जमा किए पैसे शीघ्र वापस मिल जाएँ इसी की कामना करता हूँ. क्योंकि मुझे पता है कि पैसा जमा करने से कहीं ज्यादा टेढ़ी-खीर उसे वापस पाना है. आप भी दुआ दें कि मेरा यह काम शीघ्र हो जाए. धन्यवाद.

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ऑपेरा ब्राउज़र हिन्दी में!



यूं तो पिछले कुछ समय से मैं ऑपेरा ही इस्तेमाल कर रहा था, और जब पता चला कि ऑपेरा मुफ़्त हो गया है तो बड़ी खुशी हुई. तुरंत इसका मुफ़्त संस्करण डाउनलोड किया. पर, तब पता नहीं था कि इसका तो हिन्दी संस्करण भी है! तो, ऑपेरा का पूरा हिन्दी संस्करण यहाँ से डाउनलोड करें (सिर्फ विंडोज हेतु) या यहां से इसका हिन्दी पैक (सारे संस्करणों हेतु) अगर आपने ऑपेरा 8.5 पहले ही संस्थापित कर रखा है!


आश्चर्य की बात कि यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंट एडीशन से मुझे मिली!

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ऑफ़ द रेकॉर्ड चैट?



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आप सारा दिन इंटरनेट पर तमाम लोगों से चैट करते रहते हैं तो कोई बात ऑफ़ द रेकॉर्ड भी कहना चाहते होंगे जो गोपनीय हो, और जो औरों को कभी न दिखे-समझ में आवे. तो लीजिए आपके लिए, ‘गेम’ इंस्टैंट मैसेंजर औज़ार के लिए ऐसा ही प्लगइन उपलब्ध है, जिसके जरिए आप ऑफ़ द रेकॉर्ड चैट कर सकते हैं. चैट रूम में राजनीति घुसाने के लिए इससे बढ़िया औज़ार और क्या हो सकता है भला?

अधिक जानकारी तथा डाउनलोड कड़ियों के लिए इस कड़ी पर क्लिक करें:




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ये चिरकाल से भूखे बच्चे...



मां मुझे बहुत भूख लगी है, खाना दे दो...

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बच्चा जब तक नहीं रोता, उसकी माँ उसे दूध नहीं पिलाती. यह बात शायद चिड़ियों में भी लागू होती है. उसी चिड़िया के तीन छोटे-छोटे प्यारे बच्चे अंडों से निकल आए हैं जो उसी घोंसले में सारा दिन चीं चीं करते गुजारते हैं. जैसे ही उन्हें लगता है कि उनकी अम्मा या उनका पिता घोंसले पर उनके लिए भोजन – जो आम तौर पर कीट पतंगे होते हैं, लेकर आया है, तो वे अपने चोंच पूरी ताक़त से जितना ज्यादा फ़ाड़ सकते हैं उतना फाड़ कर ऊपर की तरफ खोल कर और जोर जोर से चींचीं करते हैं. उनके माता-पिता यह कोशिश करते हैं कि सबको बारी बारी से बराबर खाना मिले. वे हर एक की चोंच में दाना डालने की कोशिश करते हैं. वैसे, इन बच्चों में से कभी कोई बुली भी निकल जाता है जो आमतौर पर ज्यादा चीख पुकार मचाकर ज्यादा खाना खा लेता है और ज्यादा बलशाली हो जाता है. परंतु आमतौर पर ऐसा कम ही होता है.

इस चिड़िया के कीट पतंगों के शिकार का ढंग भी निराला और आश्चर्य चकित करने वाला होता है. यह बिजली के तार पर या झाड़ों की शाखाओं पर बैठ जाती है और अपना सिर हिला-हिला कर चारों ओर देखती रहती है. जैसे ही उसे कोई कीट-पतंगा उड़ता हुआ दिखता है, वह तुरंत छलांग लगाती है और तेजी से उड़ते हुए उस कीट को हवा में ही अपनी चोंच से दबोच लेती है. उसके शिकार की सफलता की दर आमतौर पर 90-95 प्रतिशत होती है- यानी शायद ही कभी कभार कोई कीट-पतंगा उसकी चोंच से बच पाता हो.

वह ऐसे तीन चार कीट अपनी चोंच में भरने की कोशिश करती है. जब वह इन्हें एकत्र कर लेती है तो फिर तत्काल उड़ पड़ती है अपने घोंसले की ओर, जहाँ उसके बच्चे हैं, जो लगता है कि चिरकाल से भूखे हैं, भूख के कारण कलप रहे हैं – उनके मुँह में दाना डालने के लिए. फिर बारी बारी से हर एक को वह एक-एक कीट खिलाती है. इन बच्चों को वह सारा दिन खिलाती है. दरअसल इन बच्चों का विकास अत्यंत तेज़ी से होता है. प्राय: पंद्रह से बीस दिनों में तो ये एक इंच के मांस के टुकड़े के रूप से बढ़कर चार-पाँच इंच के पूर्ण चिड़िया के रूप में, उड़ सकने योग्य, पंखों सहित, बड़े हो जाते हैं, लिहाजा इन्हें भयंकर रूप से, सारा दिन भोजन चाहिए होता है- वह भी पौस्टिक- प्रोटीन, वसा युक्त जो कि इन्हें कीट-पतंगों से ही हासिल हो सकता है. और इसी लिए ये सारा दिन खाते रहते हैं और इसके बावजूद भी भूख के कारण किलबिलाते रहते हैं- इनकी भूख कभी मिटती नहीं दिखती. बस रात को वे सो जाते हैं – क्योंकि अंधेरे में इन्हें ज्यादा कुछ दिखाई नहीं देता. और एक बार जब ये सो जाते हैं तो आमतौर पर जब तक कि कोई बड़ी हलचल न हो, उठते नहीं हैं.

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व्यंग्य : मौसम का मिज़ाज



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मौसम का मिज़ाज भी अब लगता है कि नेताओं के मिज़ाज की तरह टोटली अनप्रेडिक्टेबल हो गया है. पहले रीटा, फिर केटरीना और अब एल्मा ने तो अमरीकी क्षेत्रों में तांडव-सा मचा दिया है. एक तूफ़ान से निपटे नहीं कि दूसरा हाज़िर. वह तो ग़नीमत है कि आदमजात ने सुपर कम्प्यूटर नामक औज़ार ईज़ाद कर लिया है जिसकी वजह से तूफ़ान कब, कहाँ से पैदा होगा, कहाँ-कहाँ से गुज़रेगा और कहाँ जाकर खत्म होगा इसका पता वो पहले से लगा लेता है और अपने को तबाहियों से बचाने की नाकाम कोशिशें करता है. तूफ़ान पैदा होने के कारणों पर लगाम लगाने, उसके पैदा होने से रोकने के उपाय भी लगता है आदमी आज नहीं तो कल ढूंढ ही लेगा.

पर, आजकल के नेताओं के तो ये हाल हैं कि न तो कोई पोंगा पंडित और न ही कोई पॉलिटिकल एक्सपर्ट आज कल के माहौल में यह बता सकने की कूवत रखता है कि किस नेता का मिज़ाज किस दिन कैसा रहेगा. बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, अब तो यह उम्मीद भी जाहिर नहीं की जा सकती कि किस दिन किस नेता का कैसा मिज़ाज हो सकता है. और तो और, जो तोता-छाप पंडित चौराहों बाजारों में तोते से कार्ड निकाल कर आपकी सटीक भविष्यवाणी का दावा करते हैं – भले ही वे खुद सड़कों चौराहों में बैठने को अभिशप्त हों – वे भी नेताओं के बारे में कोई भविष्यवाणी करते नहीं दीखते.

वैसे, तमाम तरह की गणनाओं के उपरांत भी आप किसी स्थान विशेष के मौसम के बारे में कुछ नहीं कह सकते. किसी दिन अलसुबह चटखती हुई धूप खिलती है तो यह आभास होता है कि आज मौसम खुला रहेगा. परंतु दोपहर आते-आते या अकसर शाम ढलते-ढलते हो यह जाता है कि या तो भारी भरकम बरसात हो जाती है या फिर कभी ओले भी पड़ जाते हैं. इसके ठीक विपरीत अगर आसमान में घनघोर घटाएँ घुमड़ती दिखाई देती हैं तो फिर यही हो जाता है कि समस्त पूर्वानुमानों की हवा निकालती हुई पूरवी हवाएँ पश्चिम की ओर हवा हो जाती हैं. यही कारण है कि किसी बरसात में मुम्बई में जल प्लवन हो जाता है – जहाँ लोग सड़कों पर ही चौबीस-अड़तालीस घंटों तक फंस जाते हैं तो कहीं मालवा में सूखा पड़ जाता है. बादल वही हैं, मानसून भी वही है, परंतु मुम्बई और बड़ौदा में तो भारी बारिश लाता है – जावरा और उज्जैन में सूखा. मानसून जब अक्तूबर में भारत से पूरी तरह विदा ले चुका होता है तो पूर्वोत्तर भारत और चेन्नई में बादल फटने लगते हैं...

यही हाल नेताओं के मिज़ाज का भी है. देर रात जब एक नेता निद्रा देवी की गोद में जाता है तब तक की उसकी निष्ठा, दूसरे दिन सुबह उठने पर मौसम के बदले हुए मिज़ाज की तरह बदली हुई होती है, और नतीजतन, किसी अन्य के प्रति निष्ठावान होकर वह सुबह की अँगड़ाई लेता है. जब तक दोपहर की गरमी का परवान चढ़ता है, उसकी निष्ठा किसी दूसरे की तरफ बहने लगती है तो शाम होते-होते निष्ठा की यह बहार या तो उलटी लौट पड़ती है या फिर किसी और पोटेंशियल दिशा की ओर बहने लग जाती है. सुबह उसके मुखारविंद से जो प्रवचन निकले होते हैं, उसे शाम को या तो वह गटक लेता है या फिर आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट की संज्ञा देकर उससे पीछा छुड़ाने की भरसक कोशिश करता है.

कुछ साल पहले अल नीनो और ला नीना के प्रभाव के कारण जहाँ बरसों सूखा रहा वहाँ भी प्रलयंकारी बाढ़ आ गई थी और जहाँ सभावना नहीं के बराबर थी वहाँ भयानक सूखा पड़ गया. रेगिस्तानों में बारिश होने लगी थी, पहाड़ों में सूखा पड़ने लगा था. सत्ता और धन के प्रभाव के कारण अपने इधर नेताओं के साथ भी यही स्थिति है. कोई भी छुटभैया नेता अब पार्टी प्रमुख को खुलेआम टीवी कैमरों के सामने आँखे तरेर देता है. दूसरे दिन पार्टी से बाहर हो जाता है. तीसरे दिन फिर अंदर हो जाता है. नहीं तो अपनी नई पार्टी खड़ी कर या दूसरी पार्टी में शामिल हो सत्ता में शामिल हो जाता है. वहाँ से उसे अपनी पुरानी पार्टी के प्रमुख के काले धंधे और काला पैसा साफ दिखाई देते हैं, जो वह जब पार्टी के अंदर था, कभी दिखा नहीं था. जो जिंदगी भर दूसरे को चिल्लाया और गरियाया, अब उसकी प्रशंसा के पुल बाँध रहा है, उसे सर आँखों पर बिठा रहा है और जिसके साथ उसने अब तक का राजनीतिक जीवन जिया, उसकी छत्र छाया में उसने अपना यह राजनीतिक कद प्राप्त किया, उसे वह एक झटके में छोड़ दे रहा है. अब यह बात जुदा है कि यही, इसी तरह की बात उसके लिए दूसरे लोग कहते फिरते हैं. पर, पॉलिटिक्स में तो भई, सब चलता है.

और, इससे पहले कि इस लेख का मिज़ाज इतना बदल जाए कि आप इन वाक्यों को पढ़ते बोर हो जाएँ और अपने बाल नोचने लगें, मामला यहीं खत्म करते हैं और चाहे जैसा मौसम हो, उसके मजे लेते हैं – नेताओं के बयानों का भी और मौसमी बयारों का भी.
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लाखों रुपयों की कुछ टेढ़ी मेढ़ी रेखाएँ...



खरीदिए कुछ टेढ़ी मेढ़ी रेखाएँ लाख रुपए में...


(साभार – टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
तैयब मेहता और हुसैन के बाद, लीजिए, अब आर के लक्ष्मण का कार्टून भी बेच रहा है कुछ टेढ़ी मेढ़ी, अनाप-शनाप रेखाओं को लाखों रुपयों में !

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फ़्लॉक - क्या इसमें कुछ संभावनाएँ दिखाई देती हैं ?





फ़्लॉक के बारे
में जब
सूचना मिली
तो कौतूहल हुआ कि क्यों न आजमा कर देखा जाए.
इसका ब्लॉग पोस्ट करने का औज़ार गज़ब का
है. आप सीधे ही इसमें
एमएस वर्ड जैसे अनुप्रयोगों से फ़ॉर्मेटेड
पाठ
वेब कड़ियों सहित
नक़ल कर सकते हैं और अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर सकते हैं. अब देखते हैं कि यह ब्लॉग
पर, जैसा एमएस वर्ड पर लिखा है वैसा ही छापता है कि नहीं.



  • फ़्लॉक हमें
    याद दिलाता है कि अगर आप कल्पनाशील हैं, तो कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के विस्तार की
    कोई सीमा नहीं
    है !


पर, जरा ध्यान रहे, अभी इसका डेवलपर संस्करण ही जारी हुआ है, जिसमें बहुत से बग हैं और यह कई बार क्रैश हो जाता है. मेरा पिछला पोस्ट इंटरनेट पर कहीं खो गया. देखते हैं यह पहुँचता है कि नहीं?



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हाई टैक चोरी…



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अमूमन चोरी की वारदातों की खबर भी भला कोई खबर होती है, जब तक कि वारदात के दौरान किसी के जान-माल का खासा नुकसान नहीं हुआ हो. वैसे भी भारतीय पुलिस छोटी मोटी चोरी को तो वारदात मानने से ही इंकार करती है, और आमतौर पर ऐसी चोरियों का एफआईआर तक दर्ज करने में विश्वास नहीं रखती- तहक़ीक़ात की बातें तो छोड़ ही दें. मुझे भी याद नहीं कि मैंने पिछले कितने महीनों-वर्षों से चोरी संबंधी कोई खबर पढ़ी-सुनी हो. चोरी शब्द आते ही उस खबर से अपनी आँखें और कानों को हटा लेता था यह सोचकर कि यह भी कोई खबर है भला!

पर, चोरी की यह वारदात तो सचमुच मज़ेदार है. कितना हाई टैक चोर है यह. सचमुच कमाल का टैकी चोर होगा वह जिसने 17 सीपीयू चोरी कर लिए. वह भी दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के कार्यशील कम्प्यूटर नेटवर्क के कम्प्यूटरों से. खबर में यह भी बताया गया है कि पहले 9 अक्तूबर को छः सीपीयू चोरी किए गए. फिर बाद में उसी अस्पताल से 20 अक्तूबर को आराम से ग्यारह सीपीयू फिर से चुरा लिए गए. लगता है कि पहली चोरी पर चोर को किसी तरह पकड़े जाने का अंदेशा-सा नहीं हुआ होगा, या फिर सीपीयू की चोरी को, बकौल भा. पुलिस, चोरी नहीं माना गया होगा, तो उस चोर की हिम्मत शायद बढ़ी होगी और उसने आराम से दूसरी, बड़ी चोरी को अंजाम दिया.

यूँ तो मेरे घर में चोरों के लायक कोई माल-मत्ता है नहीं. पर इस खबर ने मुझे चौंका-सा दिया है. जाहिर है, मेरे पर्सनल कम्प्यूटर, जिससे मैं यह लिख रहा हूँ, उसमें भी एक अदद सीपीयू है. अब पता नहीं कब, किसी दिन, किसी हाई टैक चोर की नजर उस पर पड़ जाए और उस सीपीयू को ले उड़े.... मुझे सावधानी बरतनी ही चाहिए. रोज रात्रि को सोते समय उसका सीपीयू खोलकर उसे अपने तकिए के नीचे रखकर सोना कैसा रहेगा ? शायद यह उपाय कारगर हो. आप भी अपने सीपीयू की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध हो जाइए, अन्यथा हार्ड-डिस्क क्रेश जैसे अंतिम सत्य की तरह सीपीयू चोरी जैसी अंतिम सत्य से आपका सामना हो सकता है.

सीपीयू की चोरों से सुरक्षा के अन्य उपायों पर आपके सुझावों का बेसब्री से इंतजार रहेगा...

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