बुधवार, 9 मार्च 2005

आयातित रुपिया...

व्यंग्य

इम्पोर्टेड रुपया?

इधर मैंने वह खबर पढ़ी, उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ. नतीजतन मेरी रातों की नींदें डिस्टर्ब हो गईं और अनिद्रा, अर्द्धनिद्रा में मुझे हॉरिबल, हॉटिंग सपने दिखाई पड़ने लगे. सपनों का यह सिलसिला जारी है. इससे पहले कि इन भयंकर सपनों को भुगतकर मैं और भी ज्यादा डिस्टर्ब हो जाऊँ, आपको भी थोड़ा डिस्टर्ब करूं अपने सपने सुनाकर.

रॉबर्ट के हाथ में भी वही अख़बार था. वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही अख़बार पढ़ रहा था. खबर पढ़ कर उसकी भी आंखें फटी रह गईं. वह भी घबरा गया. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में नए नोट नहीं छपवा सकने के कारण विदेशों से नए नोट छपवाकर मंगवाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा. उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. अभी तक हमारे पास सब कुछ इम्पोर्टेड था. रुपए को छोड़कर. अब वह कमी भी पूरी हो जाएगी. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. अब तो रुपया भी इम्पोर्टेड आ गया और इस देश में कभी इम्पोर्टेड चीज़ों का शौक कभी खत्म हुआ है? अब तो लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है.”

रुपए के इम्पोर्टेड होने न होने का मेरा कन्फ्यूजन नींद के अगले स्पैल में तुरंत दूर हो गया. बाजार में विदेशों से छपकर आए नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. इम्पोर्टेड नए नोटों का बंडल ऑन में बिकने लगा. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन इम्पोर्टेड रुपयों की होने लगी. एक का नोट दस में, दस का पच्चीस में और सौ का हजार में बिकने लगा. जाहिर है इस कारण इन इम्पोर्टेड, बढ़िया, कुरकुरे नोटों की क्रय शक्ति, देश में छपे गंदे, कटे फटे, फूहड़ नोटों की तुलना में बढ़ गई. लोगों का अपने पास इम्पोर्टेड नए नोट रखना स्टेटस सिंबल बन गया. हाई क्लास बार, क्लब, रिसॉर्ट इत्यादि में प्रवेश के लिए नए नियम बन गए. अब इन स्थानों में उन्हीं लोगों को प्रवेश मिलता था जो इम्पोर्टेड रुपया लेकर आ सकते थे. देश में एक नया विभाजन हो गया. मेजॉरिटी और माइनारिटी की. मेजॉरिटी पूअर क्लास जिनके पास पुराने नोट थे और माइनारिटी, रिच क्लास जो अपने नए इम्पोर्टेड नोटों पर इतराते थे.

बात इम्पोर्टेड रुपयों की थी, सो लोगों का जमीर भी जाग गया था. ये नए, विदेश से छपकर आए नोट नई तकनॉलाजी के थे जो नॉन टियरेबल, डस्ट-रस्ट-स्टेन प्रूफ होने तथा गारंटीड एवरफ्रेश होने के बावजूद, कैपेबल ऑफ वेरी रफ हैंडलिंग होने के बावजूद लोगों के दुलारे बने रहे. लोग इन नए रुपयों को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखने लगे. कोई आदमी उसे मोड़कर अंटी में नहीं रखता था. कोई औरत उसे अपनी चोली में ठूंसती नहीं थी. कोई उस पर कुछ लिखता नहीं था. इस मामले में सभी सेल्फ डिसिप्लिन्ड हो गए थे. बैंकों में नियम बन गए थे कि इन इम्पोर्टेड रुपयों को पंच नहीं किया जाएगा, केयरलेस हैंडलिंग नहीं की जाएगी. थूक-पानी लगाकर सर्र-सर्र गिना नहीं जाएगा ताकि इनका ओरिजिनल कुरकुरापन-नयापन बना रहे – इत्यादि, इत्यादि. कुछ बैंकों ने इन इम्पोर्टेड रुपयों की गड्डियों के लिए पाउच, पैकेट निर्धारित कर दिए तो कुछ बैंकों ने विशेषज्ञों को एंगेज कर लिया इन नोटों की गड्डियों के लिए एवरफ्रेश पैकिंग ईजाद करने के लिए.

चूंकि नोट छापने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए गए थे और जैसा कि होता ही है, ऑर्डर अमरीका, जापान और जर्मनी की कुछ एमएनसीज़ ने मैनेज कर लिए थे. इम्पोर्टेड नोट इन्हीं देशों की कम्पनियों से आते थे. जापान में छपी नोटों की डिमांड जरा ज्यादा ही थी. यूं तो सभी नोटों का डिज़ाइन एवं ड्राइंग एकसार ही था, परंतु फिर भी प्रिंटेड इन जापान देखकर लोग ज्यादा रोमांचित होते थे, और उन नोटों में लोगों को कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ नजर आने लगती थीं. ऐसे नोटों को प्राप्त करने और उसे खर्चने का आनन्द अलग ही आता था. रिश्वत, भेंट इत्यादि के लिए तो जाहिर है इन्हीं नए नोटों का ही प्रयोग होने लगा था.

पर, सपने तो सिर्फ सपने ही होते हैं. सपने कोई हकीकत थोड़े ही हो जाते हैं. क्या हुआ जो सपने के क्लाइमेक्स में मैंने देखा कि देश में छपे हुए रुपए का चलन अंतत: बन्द हो गया है. कोई उसे रद्दी के मोल भी नहीं लेता. देश के कर्णधारों, प्लानरों ने उसे अघोषित रुप से इल्लीगल करार जो दे दिया है.

(दैनिक भास्कर में दि. 1 मार्च 1997 को पूर्व प्रकाशित)

2 blogger-facebook:

  1. वाह रवि भाई,
    मजा आ गया, आपके सपने का तो जवाब नही.
    क्या व्यंग बाण चलाये है आपने, मजा आ गया.

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  2. अब जाकर पढ़ा है, सात साल बाद... यह तो कालजयी रचना हो गई... ;)

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