टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

५७ सालों की केंचुआ चाल

57 साल और केंचुए की चाल
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इंडिया टुडे ने अपने स्वतंत्रता दिवस विशेष में भारत की दयनीय स्थिति, उनके कारण और निवारण के बारे में विस्तार से लिखा है. अरूण पुरी अपने संपादकीय में भारत की भयानक सत्यता बताते हैं कि अभी भी भारत के आधे घरों में बिजली नहीं है. तीन में से दो घरों में नल का पानी नहीं है. १० में से ६ घरों में शौचालय सुविधाएँ नहीं हैं. एक लाख जनसंख्या के विरूद्ध सिर्फ ४८ डॉक्टर की सेवा उपलब्ध है. हममें से हर तीसरा भारतीय अशिक्षित है. और सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, हस्पताल इत्यादि ज़रूरत से ज्यादा कम हैं, और अगर हैं भी तो खस्ताहाल. बड़े शहरों तथा मेट्रो में रहने वालों की भी यही समस्या है, चूंकि स्लम्स में ही अधिसंख्य जनता रहती है, ऊपर से अनियंत्रित भीड़ और सुविधाओं का अभाव परिस्थितियों को और भी विकराल बना देती है.

भारत ५७ सालों में कहाँ पहुँचा है? केंचुए की चाल जिसमें कोई दिशा नहीं, कोई तेज़ी नहीं और कोई लक्ष्य नहीं. कारण? बहुतायत में. पर प्रमुख है- अमेठी, अयोध्या और मधेपुरा जैसे स्थानों को लेकर बनाई गई राजनीतिक योजनाएँ, जिनमें भारत की खुशहाली के लिए कोई स्थान नहीं.

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ग़ज़ल
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क्या बताएँ कि ये दिल हमेशा रोता क्यूँ है
बता तो जरा तेरा बहस तल्ख़ होता क्यूँ है

कभी दीवानों को जान पाएंगे जमाने वाले
वो मन का कीचड़ सरे आम धोता क्यूँ है

लगता है भूल गए हैं लोग सपने भी देखना
नहीं तो फिर किस लिए जमाना सोता क्यूँ है

लोग पूछेंगे कि ये कौन नया मसखरा आया
जानकर भी भाई-चारे का बीज बोता क्यूँ है

तू भी क्यों नहीं निकलता भीड़ के रस्ते रवि
बेकार बेआधार बिनाकाम चैन खोता क्यूँ है

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