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इट हैप्पन्स ओनली इन इंडिया...

बिकाज़ आर व़ी डूम्ड फ़ॉर इट?
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मैंने अपनी किसी पिछली पोस्टिंग में लिखा था कि भारत में पाठशालाओं को अप्रायोगिक तरीके से भोजनशालाओं में तब्द़ील कर दिया गया है. तमिलनाडु के तंजावुर जिले के कुंभकोणम में एक पाठशाला में दोपहर का भोजन पकाते वक्त़ फ़ैली आग ने ८१ बच्चों को ज़िंदा जला कर मार डाला. मेरे ही रतलाम जिले के किसी गांव में स्कूली बच्चों द्वारा दोपहर के भोजन का बहिष्कार इस लिए किया गया कि वह किसी दलित महिला द्वारा तैयार किया गया था. कुछ समय बाद शायद हमें यह ख़बर मिले कि दोपहर का भोजन खाकर फ़ूड पॉयज़निंग से कुछ विद्यार्थियों की मौत हो गई, या कहीं कोई साम्प्रदायिक विवाद पैदा हो गया.
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इंडियन एक्सप्रेस ने अपने १३ ज़ुलाई के संपादकीय में लिखा है कि टूरिज़्म मंत्री रेणुका चौधरी ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है कि १५५ मिमी हैवी आर्टिलरी गन का कोई एक विशिष्ट मॉडल अच्छा है, और उसे खरीदना चाहिए. वे अपनी सिफ़ारिश में यह भी जोड़ती हैं कि उन्हें इसका ज्ञान है, चूंकि वे एक पूर्व सेवा अफ़सर की बेटी हैं! अच्छा है, हमें अपने ज्ञान का उपयोग तो करना ही चाहिए! अब तो रक्षा मंत्रालय को चाहिए कि उन्हें अगर बोफ़ोर्स जैसे विवादों से बचना है, तो पूर्व-वर्तमान सेवा अफ़सरों के बेटों-बेटियों से सिफ़ारिशें प्राप्त कर तमाम रक्षा सौदों को अंजाम दें.
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रितु सरीन ने इंडियन एक्सप्रेस के १५ ज़ुलाई के अंक में यह चौंकाने वाली ख़बर दी है कि किस तरह पप्पू यादव अपने उच्च-रक्तचाप, पीठ दर्द और पैर में चोट इत्यादि बीमारियों के इलाज़ के लिए जेल से दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती हुए और पूरे दो साल तक सिर्फ रात में अस्पताल में रहते थे, और दिन भर बाहर रह कर राजनीति करते थे. यहाँ तक कि चुनावों के दौरान वे मधेपुरा में प्रचार अभियानों में भी लगे रहे. दिन में उनका कोई डमी अस्पताल के बिस्तर पर रहता था!

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ग़ोधरा फ़िर उबाल पर है. बीज़ेपी अपने को बेदाग़ कहती है, पर किसी नई जाँच पर बवाल मचाती है. वह दाग़ी मंत्रियों पर संसद में हंगामा खड़ा करती है तो ज़ूदेव को राज्य सभा सदस्य से नवाज़ती है. सत्ता में रहकर एफ़डीए की पैरोकार, महज़ विरोध के नाम पर रीफॉर्म्स का विरोध कर रही है!

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ग़ज़ल

जहाँ लोग लगे हैं पूरियाँ त़लने में
क्या हर्ज़ है अपनी रोटी सेंकने में

मची है मुहल्ले में जम के मारकाट
हद है, और भीड़ लगी है देखने में

बातें ग़ज़ब हैं आगे चलने की पर
ज़ोर है सारा असली चेहरा छुपने में

भारत भाग्य क्या जाने विधाता जब
जनता को पड़ गई आदत सहने में

तू भी कर ही ले अपनी चिंता रवि
क्या रखा है इन पचड़ों में पड़ने में

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टिप्पणियाँ

  1. रविशंकर जी, आपकी चुटीली शैली सशक्त रूप से राजनीतिक व अन्य मुद्दों की विसंगतियां दर्शाती है। धन्यवाद।

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  2. ओहो। आप शुरू से पाई की जगह बिन्दु लिख रहे हैं पूर्ण विराम की जगह। इससे परेशानी होती है। क्योंकि वाक्य खत्म होता नहीं, ऐसा लगता है।

    उत्तर देंहटाएं

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