टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

एक ग़ज़ल ग़रीबों के नाम

****
भाई आलोक को उनकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद. मुझे खुशी हुई कि आपको मेरी टूटी फूटी
(छत्तीसगढ़ी भाषा, जहाँ मेरा बचपन गुज़रा, में, उत्ता धुर्रा) ग़ज़ल पसंद आई.
****

पिछले दिनों चैनल सर्फिंग (पीसी पर नहीं) के दौरान महेश भट्ट की एक तीख़ी टिप्पणी
पर बरबस ध्यान चला गया. उन्होंने कहा थाः पिछड़ों और ग़रीबों के नाम से इस देश
में लोग काफ़ी धंधा कर रहे हैं, और उनका शोषण कर रहे हैं...

ग़रीब और पिछड़े हमेशा ही सियासत के बड़े वोट बैंक रहे हैं. जातिवाद ने भारत का
कबाड़ा कर दिया है. एलीट क्लास में जातिवाद, धर्मवाद तो समाप्त प्रायः है पर
ग़रीब और पिछड़े अपनी अशिक्षा के चलते उन्हीं जातिवाद और धर्मवाद में घुसे हैं
और सियासत उसमें ढेर सारा शुद्ध ऑक्सीज़न पहुँचा रही है ताकि यह आग उनकी छुद्र
भलाई के लिए ज़लती, और भड़कती रहे. अगर हम आने वाले कुछेक वर्षों का अंदाज़ा
लगाने की कोशिश करें तो पाते हैं कि स्थिति तो बनने के बज़ाए बिगड़नी ही है...
इन्हीं बातों को इंगित करती एक ग़ज़ल प्रस्तुत है...

****
ग़ज़ल
****
बन गए हैं ग़रीब
****
राजनीति के स्तंभ बन गए हैं ग़रीब
अब तो मुद्दे स्थाई बन गए हैं ग़रीब

सियासी खेल का कोई राज बताए
कि धनवान क्यों बन गए हैं ग़रीब

चान्दी का चम्मच ले पैदा हुए हैं जो
वो और भी ज्य़ादा बन गए हैं ग़रीब

सोने की चिड़िया का हाल है नया
क़ौम के सारे लोग बन गए हैं ग़रीब

अपनी अमीरी दुनिया सबने बना ली
औरों की सोचने में बन गए हैं ग़रीब

कुछ कर रवि, कि फोड़ अकेला भाड़
वरना तो यहाँ सब बन गए हैं ग़रीब
विषय:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
कृपया ध्यान दें - स्पैम (वायरस, ट्रोजन व रद्दी साइटों इत्यादि की कड़ियों युक्त)टिप्पणियों की समस्या के कारण टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहां पर प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

अन्य रचनाएँ

[random][simplepost]

व्यंग्य

[व्यंग्य][random][column1]

विविध

[विविध][random][column1]

हिन्दी

[हिन्दी][random][column1]
[blogger][facebook]

तकनीकी

[तकनीकी][random][column1]

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

[random][column1]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget