मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

क्या विंडोज मर रहा है?

निकट भविष्य में तो नहीं, मगर शुरुआत हो चुकी है - नीचे स्क्रीनशॉट देखें :

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यह है इंटरनेट पर हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय ईपत्रिकाओं में शुमार -  रचनाकार.ऑर्ग के आंकड़ों का स्नैपशॉट.

एंड्रायड पर 72 प्रतिशत पाठक हैं, और विंडोज पर केवल बीस प्रतिशत. जब एंड्रायड नहीं था तब 99 प्रतिशत पाठक विंडोज से ही आते थे.


नई, नवोन्मेषी तकनीकें पुरानी स्थिर तकनीकों को लील लेती हैं, प्रचलन से निकाल बाहर कर देती हैं.


क्लासिक उदाहरण.


आज की स्थिति में यदि मैं विंडोज़ से चिपका हूँ तो केवल और केवल एक वजह है - विंडोज आधारित हिंदी का ओसीआर, और हिंदी के कुछ फ़ॉन्ट परिवर्तक (वर्चुअल मशीन से यह भी संभव है, पर बात वही हुई). अन्यथा अपना सारा काम अब एंड्रायड पर ही होने लगा है, और क्या बढ़िया होने लगा है!

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

अत्याधुनिक, तकनीकी मेहमान-नवाज़ी

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आजकल के अत्याधुनिक जमाने में, मैं अपने घर के कम्फ़र्ट को छोड़कर कभी कहीं भी, किसी से भी मेहमान-नवाज़ी करवाने नहीं जाता. किसी से भी, रिपीट किसी से भी अपनी मेहमान-नवाज़ी नहीं करवाता. कानपुर से फुरसतिया से लेकर कैनेड्डा से उड़नतश्तरी तक ने मनुहारों में कहीं कोई कमी न रखी है, मगर मैं नहीं पसीजा तो नहीं ही पसीजा. दरअसल, मेहमान-नवाज़ी का सुख हासिल करने में अब तक के बुरे अनुभवों ने मजबूरन मुझे ऐसा बना दिया है – निष्ठुर अंतर्मुखी.

आप पूछेंगे ऐसा क्या हो गया था? अरे, यह भी कोई बताने की बात है. कारण जग जाहिर हैं, और आपने भी यदा कदा भुगता होगा. रीफ्रेश होने के लिए, कुछेक, अच्छी भली वज़हें ये हैं –

1 – वाईफ़ाई की क्वांटिटी और क्वालिटी – कहीं आप मेहमान बनकर जाते हैं तो आजकल आप पहले पहल किस चीज की आशा करते हैं? पहले मेहमान आता था तो एक डल्ली गुड़ और एक लोटा पानी से स्वागत होता था. दूर देश की यात्रा से थक हारकर आता था तो हाथ-गोड़ धोकर गुड़ खाकर पानी पीता था तो मेहमान की आत्मा तृप्त होती थी और थकान दूर हो जाती थी. अब, भले ही जियो ने खेल में कुछ बदलाव लाने की भरपूर कोशिश की हो, मगर अभी भी वाई-फ़ाई का कहीं कोई मुकाबला नहीं. आज का मेहमान आते ही वाई-फ़ाई पासवर्ड की आशा तत्काल रखता है. साथ ही वो ये भी आशा रखता है कि ब्रॉडबैण्ड मिनिमम 8 एमबीपीएस का, अनलिमिटेड हो, नहीं तो क्या खाक मेहमान-नवाज़ी. कुछ उन्नत किस्म के मेज़बान भी पीछे नहीं रहते, आते ही 13 डिजिट का डबल्यूएपी पासवर्ड टिकाते हैं, और बातों बातों में गर्वीले अंदाज में बताते हैं कि हाल ही में एक्टिव मैट्रिक्स में अनलिमिटेड अपग्रेड करवाया है, फ़ाइबर लगवाया है! मेहमान यदि मेजबान की तरह तकनीकी उन्नत हुआ तो मन में बोलता है – वॉव! फ़ाइबर!, नहीं तो वो सामने वाले का मुंह ताकता है और मन में सोचता है यह फाइबर वाला नया भोज्य पदार्थ है क्या? शायद आज के रात्रि भोज में यह नया आइटम खाने को मिलेगा. और, हमारे जैसा अर्ली एडॉप्टर किस्म का मेजबान तो, भारत में भले ही 5 जी की बातें अभी हो रही हैं, सेवा शुरू होने में साल दो साल लगेंगे ही लगेंगे, मगर वो, अपने मेहमानों के लिए, खास  विदेश से 5जी राउटर पहले ही मंगवा कर रख लेता है. जस्ट इन केस.

2 – आपके घर में आरो है क्या – पानी का तो ऐसा है कि हर कोस में उसका स्वाद बदल जाता है. ऊपर से आजकल म्यूनिसिपल पाइपलाइन से मिलने वाले पानी में पानी की मात्रा कितनी है और सीवर के लीकेज की कितनी ये अंदाजा लगाना बड़ी टेढ़ी खीर है. अंडरग्राउंड वाटर (हाँ, वही नलकूप का पानी,) की तो बात ही मत करें, कितने टॉक्सिक मिनरल होंगे कोई नहीं बता सकता. ऐसे में आरो (वही, मशीन वाला पानी,) ही मुंह लग गया है तो उसकी आदत अब छूटती नहीं. और दूसरा कोई भी पानी अब सुहाता नहीं. पेट खराब होने का डर अलग से. ऊपर से, बोतलबंद आरो पानी की आदत रेलवे के सदा सूखे नलों ने ऐसी लगाई, कि अब तो मृत्युपर्यंत ही यह आदत जाएगी. यूँ, क्लोरीनेटेड पानी से आधी जिंदगी तो आराम से निकल गई थी, और पानी का असली स्वाद क्लोरीन वाला ही होता है ऐसा मन में बैठ गया था, मगर बोतलबंद पानी बेचने वालों के मार्केटिंगि गिमिकों ने पानी का असली स्वाद भुला दिया. अब तो 100% प्योर H2O का कड़वा स्वाद ही मन को भाता है. तो, जब तक विश्वस्त सूत्रों से पता नहीं चल जाता कि सामने वाले के घर में आरो का पानी ही चलता है – भले ही वो बिना धुले, फफूंद लगे कैन में सप्लाई होता हो, अपन मेहमान-नवाज़ी करवाने नहीं ही जाते.

3 - एसी और एयरप्यूरीफ़ायर – यूँ मेरे शहर का मौसम और आबो हवा और वातावरण कोई जन्नत जैसा नहीं है, मैं भी आधुनिक युग के जहन्नुम में रहता हूँ जहाँ धूल-धुँआ-गर्द आदि इत्यादि चहुँओर से घेरे रहते हैं, मगर मेहमान-नवाज़ी भी कोई चीज होती है. अब आप कहीं अपनी मेहमान-नवाज़ी करवाने जाएँ, और वहाँ भी वही धूल भरी हवा खाएँ, तो इसमें क्या तुक? फिर तो हमारा अपना शहर अच्छा भला. इसलिए, जब तक किसी के पास से ये पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते कि अगले ने अपने मेहमान के कमरे में क्लाइमेट कंट्रोल एसी और एयरप्यूरिफ़ायर नहीं लगवा रखा है, उसके आमंत्रण-निमंत्रण प्रस्तावों पर नजर ही नहीं मारते. भले ही अगला मनुहार करते करते स्वर्ग सिधार जाए. प्रदूषित वातावरण के चलते, हमें अपने आकस्मिक स्वर्ग सिधारने की चिंता करनी चाहिए कि दूसरों की?

4 – आपके घर का, आपके घर के मेहमान के कमरे का स्टैंडर्ड कैसा है? कहने का अर्थ यह कि घर में, एसी लगवा लेने से या 4के स्मार्ट टीवी लगवा लेने से स्टैंडर्ड नहीं बढ़ जाता. अच्छे अच्छे लोग, एसी तो लगवा लेते हैं मगर कमरे को हीट इंसुलेशन नहीं करवाते. इसी तरह, और भी अच्छे-अच्छे लोग 4के स्मार्ट टीवी तो लगवा लेते हैं, मगर उनका सेट-टॉप-बॉक्स बाबा आदम के जमाने का एसडी क्वालिटी का ही लगा हुआ होता है. माने, सारा तबेला गया पानी में! इधर अपन ठहरे डब्ल्यू-डबल्यू-ई को फुल-एचडी में, और डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम के साथ देखने के लती, तो आप समझ सकते हैं, आपकी मेहमान-नवाज़ी हमारे जैसों के किसी काम की नहीं. अब तो जमाना अपने-अपने घरों को आईएसओ 9000 सर्टिफ़िकेशन करवाने का आ गया है. तो, भई, सीधी सी बात है, बात तब करना जब आपका घर कम से कम आधा दर्जन सर्टिफ़िकेशन से लैस हो – जिसमें डीटीएस सर्टिफ़िकेशन अनिवार्य रूप से शामिल हो.

है किसी में, हम जैसों को अपना मेहमान बनाने की क़ूवत?

रविवार, 3 दिसंबर 2017

व्यंग्य : एआई का मारा मैं बेचारा!

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(कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त गूगल होम स्पीकर – स्पीकर के सामने कुछ कहें, यह आपकी बात समझने की कोशिश करेगा और तदनुसार कार्य करेगा.)


अब आप एआई का मतलब किसी इंस्पेक्टर से मत जोड़ लीजिएगा. वैसे भी अपने देश में पग पग पर इंस्पैक्टर मिलते हैं, और उनमें से किसी न किसी एक किस्म के इंस्पैक्टर का मारा, डग डग में. बहरहाल, मैं बात कर रहा हूँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता की. सरल शब्दों में कहें तो आर्टीफ़िशल इंटेलिजेंस की. एक बात और, शीर्षक जल्द ही ‘एआई की मारी दुनिया बेचारी!’ में जल्द बदलेगा. अतः थोड़ा ध्यान से.

तो, किसी बुरे दिन को मैंने डेढ़ होशियारी दिखाई और अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली. मैं एआई युक्त एक अदद होम असिस्टेंट ले आया. जब चहुँओर कोर्टाना, बिक्सबी, सिरी, अलेक्सा, गूगल होम असिस्टेंट आदि-आदि की बातें हो रही हों तो आदमी कितने दिनों तक दूरी बनाए रख सकता है भला. और इस तरह मेरे बहुत बहुत बुरे दिनों की शुरूआत हो गई.

होम असिस्टेंट को मैंने अपने घर के नेटवर्क से जोड़कर आरंभिक सेटअप पूरा किया. एक-दो आसान से चरणों में यह पूरा हो गया. फिर यह बड़े ही नर्म किस्म के आवाज में पूछा – मैं आपका नया सहायक हूँ. मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?

कल भले ही इतवार था, परंतु मैंने इसे जांचने परखने के लिहाज से कह दिया – ठीक है, मेरे सहायक, कल सुबह छः बजे मुझे जगा देना.

कोई तीन बजे रात को अलार्म की कर्कश आवाज से मेरी नींद खुली. मेरा होम असिस्टेंट अपनी प्यारी मगर मॉडुलेटेड मशीनी आवाज में कह रहा था – आपको इस लिए उठाया गया है कि आपके शरीर में जल की मात्रा सामान्य से कम हो गई है, अतः तुरंत एक गिलास पानी पिएँ.

वाह! यह है बुद्धिमत्ता. मैं बड़ा प्रसन्न हुआ, कि यह सहायक तो बड़े काम का है, सोते में भी मेरा खयाल रखता है. इसने मेरे हाथ में बंधे फिटनेस बैंड से स्वचालित तरीके से संचार प्रारंभ कर लिया था, और मेरे स्लीप पैटर्न का रीयल टाइम में मॉनीटरिंग कर रहा था, और जब इसे एबनॉर्मल सिग्नल मिला कि मेरे शरीर में फ्लूइड की मात्रा कम हो रही है तो इसने मुझे जगा दिया कि भइए, एक गिलास ठंडा पानी पीने में ही भलाई है. भले ही रात के तीन बजे हों. मगर मुझे यह पता नहीं था कि मेरी प्रसन्नता क्षणिक है, और मैं बड़ी कृत्रिम किस्म की मुसीबतों में फंसने वाला हूँ!

घंटे भर बाद फिर अलार्म बजा. बढ़िया सपने देख रहा था मैं. स्विटजरलैंड के कोमो झील में नौकायन कर रहा था सपने में, और मेरे नव सहायक का अलार्म बजा. मजा किरकिरा हो गया. क्या यह असिस्टेंट सपने में नहीं झांक सकता? अर्थ यह कि यह तब उठाए, जब बुरे, डरावने सपने आ रहे हों? अलार्म के बीच असिस्टेंट कह रहा था – आप जिस करवट लेटे हैं उसे बदलें क्योंकि आप जरूरत से ज्यादा और बड़ी खर्राटे भर रहे हैं.

चलो, यह भी ठीक है. आदमी खर्राटे हमेशा नींद में ही निकालता है और अनजाने में लोगों की हँसी का पात्र बनता है. मेरा यह नया सहायक मेरे खर्राटे कंट्रोल करने में बड़ा सहायक होगा. मैंने उसे शाबासी देना चाही, मगर उसका पीठ कहीं दिखा नहीं. पर जब इस सहायक ने महज बीस मिनट बाद ही मुझे फिर से जगाया यह बोलकर कि नींद में आपकी गर्दन तकिये से नीचे गिर गई है और आपकी गर्दन की नसों को नुकसान पहुँच सकता है, तो मेरा पारा गर्म हो गया. एक बार मन हुआ कि इसे उठाकर कहीं दूर फेंक दूं. और, इसने बाकायदा छः बजे फिर से अलार्म बजा दिया – सुप्रभात. उठिए, आपके कार्य का समय प्रारंभ हो गया है – मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ. मैं बिस्तर से ही चिल्लाया – मेरे बाप! जरा शांति बनाए रख, मुझे सो लेने दे.

मेरा सहायक वापस बोला – क्षमा कीजिएगा, मैं आपकी बात समझ नहीं पाया. मुझे फिर से निर्देश दें. स्पष्ट शब्दों में बोलने का प्रयास करें ताकि मैं आपकी बात समझ सकूं.

ये ल्लो! ये अब मुझे समझाने लगा कि मैं किस तरह और कैसे बात करूं! हद है!

सुबह नौ बजे दरवाजे की घंटी बजी. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि कौन हो सकता है. आज किसी का एप्वाइंटमेंट भी नहीं था और न ही कोई मेहमान अपेक्षित था. दरवाजा खोला तो सामने अमेजन ऑनलाइन स्टोर का मिनी डिलीवरी ट्रक खड़ा दिखा. डिलीवरी मैन किराने के सामानों से भरा बास्केट लेकर खड़ा था.

मैंने आश्चर्य से उससे कहा – भाई शायद आप गलत पते पर आ गए हैं. मैंने कोई सामान नहीं मंगवाया है.

सर, ऑर्डर तो आप ही का है – यह देखिए – और उसने मेरे हाथों में बिल की कॉपी थमा दी. रात बारह बजे ऑनलाइन ऑर्डर हुआ था. मेरे घर से, मेरे खाते से.

समझने में मुझे कुछ समय लगा. तो, यह मेरे नए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता युक्त सहायक का किया धरा है! उसने मेरे एआई युक्त फ्रिज – जिसकी क्षमताओं के बारे में मुझे भी इतना नहीं पता था, से संचार संपर्क स्थापित किया, जानकारी ली, मेरी पिछली आवश्यकताओं और कंजप्शन पैटर्न को खंगाला, और फ्रिज में उपलब्ध अनुपलब्ध सामानों तथा पिछले आर्डर और कंजप्शन के आधार पर आवश्यक सामानों की सूची बनाया और मेरे खाते से स्वयमेव आर्डर कर दिया ताकि सुबह-सुबह मेरी आवश्यकताओं का सारा सामान मुझे मिल जाए!

बाकी सामानों का तो फिर भी ठीक था, मगर दूध, मक्खन और दही जैसी जल्द खराब हो सकने वाली चीजों का मैं क्या करूंगा? वह भी इतनी मात्रा में? बीबी अभी परसों ही दो हफ्ते के लिए मायके गई थी, और मैं तो मित्र मंडली के साथ पार्टी के मंसूबे बनाया हुआ था. होम असिस्टेंट, सत्यानाश हो तेरा!

जल्द ही मैं अपने इस एआई युक्त सहायक से भर पाया. मैंने इसे अपने होम नेटवर्क से पासवर्ड बदल कर निकाल बाहर किया, उसका पावर सप्लाई बंद किया और एक डब्बे में लपेट कर रख दिया, और ओएलएक्स पर डाल दिया ताकि जो भाव मिले, बेच दूं. मगर, ये क्या? हफ़्ते गुजर गए कोई लेवाल नहीं मिला. शायद सबके सब एआई सहायक के मारे हुए हैं. अब तो यह डर भी लगा रहता है कि कहीं यह सहायक रिनीवेबल, सेल्फ सस्टेंड एनर्जी न जनरेट करने लगे और फिर से जीवित होकर डब्बे से बाहर न आ जाए सहायता करने को!

http://rachanakar.org