सोमवार, 28 अगस्त 2017

व्यंग्य जुगलबंदी 49 - बाबागिरी के मरफ़ी के नियम

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(चित्र - साभार - काजल कुमार )

मरफ़ी का नियम हर जगह लागू होता है. बाबागिरी में भी. कुछ नियम ये हैं –

· दुनिया में कुछ नहीं बदलता. बाबागिरी भी नहीं.

· सबसे बड़ा अंधविश्वास है कि, बाबागिरी जैसी कोई चीज नहीं होती.

· किसी भी दिए गए बाबा के सामने दूसरा दिया गया बाबा बड़ा (डेरा या आश्रम वाला) होता है.

· हर बाबा, बाबागिरी को दोहराता है.


· सदैव संभल कर रहें, दिए गए किसी भी आने वाले समय में, और अधिक संख्या में बाबा पैदा होने वाले होते हैं.

· मुस्कुराएँ. कल और अधिक बाबा पैदा होने वाले हैं.

· किसी भी दिए गए बाबे का डेरा (आश्रम) जितना बड़ा होगा, वो बाबा उतना ही अधिक पतित होगा.

· जितना दिखाई देता है, बाबा उससे ज्यादा पतित होता है.


· बाबे के जितने ज्यादा फालोअर (अंधभक्त) होंगे, बाबा उतना ही अधिक पतित होगा.

· बाबा अपने भक्तों की संख्या के अनुपात में पतित होता है.

· दिया गया कोई भी बाबा, अनुमान से अधिक पतित होता है.

· बाबा जितना शांत और निस्पृह बाहर से दिखता है, उतना ही भयभीत, लोभी और अशांत भीतर से होता है.


· बाबा जब अपने प्रवचनों में त्याग की बात करता है तो वो अपने बारे में नहीं कहता होता है.

· बाबा प्रवचन में जो बात कहता है उसका पालन वो स्वयं किसी सूरत नहीं करता.

· लोगों को पता होता है कि बाबाओं के पास जाना गलत है फिर भी वे जाते हैं.

· यदि आप किसी बाबा के प्रवचन सुनकर सोते हैं तो रात्रि में दुःस्वप्न आते ही हैं.


· लोगों को चिरायु और दीर्घायु का आशीर्वाद देने वाले बाबा स्वयं बीमार और अल्पायु होते हैं.

· सभी बाबे एक जैसे होते हैं – बुरे या और, अधिक बुरे

· यदि बाबा द्रव्यमान है तो भक्त गुरुत्वबल है.

· बाबाओं की सुलभता व उपलब्धता उनकी आवश्यकता के व्युत्क्रमानुपाती में होती है.


· जो ऊपर जाता है वह नीचे आता ही है - बाबाओं में भी.

· यदि कहीं बाबा नहीं भी होता है, तो लोग अपने लिए शून्य में से भी एक बाबा बना लेते हैं.

· किसी भी दिए गए बाबे के विरुद्ध एफ़आईआर, कोर्ट-केस, सजा आदि होने के बाद भी, असली भक्तों को बाबा का असली रंगरूप नजर नहीं आता.

· विश्व के महानतम बाबाओं के उत्थान-पतन में मानवीय भूलों का हाथ रहा है – दूसरे मानवों के.


· नए बाबा नई समस्याएँ पैदा करते हैं.

· गलतियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है, परंतु ढेरों, सुधारी नहीं जा सकने वाली गलतियों के लिए एक गुरु बाबा की आवश्यकता होती है.

· दुनिया में सब संभव है. बाबागिरी भी.

· बाबा के आशीर्वाद से आपको तमाम तरक्की, सुख सम्पत्ति मिलेगी, परंतु, फिर, पहले, इसके लिए, अपनी अंटी से बाबा के आश्रम में दान करना होगा.


...यूँ और भी नियम हैं. कुछ आपको भी याद आ रहे हों तो कृपया बताएँ !

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

व्यंग्य जुगलबंदी - 48 : तकनीक और हवापानी

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प्राचीन काल में आदमी स्वास्थ्य लाभ करने के नाम पर हवापानी बदलता था. तपेदिक जैसी बीमारियाँ हवापानी बदलने से खुद-ब-खुद ठीक हो जाती थीं. आजकल, तकनीक की चहुँओर उन्नति के बावजूद मल्टी-ड्रग-रेजिस्टेंस आदि-इत्यादि के चलते हवापानी बदलने का सौभाग्य प्राप्त हो इसके पहले ही आदमी का त्रिलोक बदल जाता है. यानी आदमी के साथ साथ आदमी को बीमार करने वाले जीवाणु भी आदमी से अधिक तेज गति से उन्नति कर रहे हैं. डैंगू, चिकन-गुनिया, स्वाइन-फ़्लू, एड्स आदि ये बताते हैं कि आदमी कितनी भी तेजी से उन्नति कर ले, जीव-जंतु और जीवाणु उससे एक कदम आगे ही रहेंगे.

चलिए, बात तकनीकी हवापानी की हो रही थी. आज का आदमी आजकल हर मिनट हवापानी बदलने में सक्षम हो गया है. डेस्कटॉप हो या लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन-टैबलेट हो या फ़ीचर फ़ोन. हर आदमी के पास इनमें से कोई न कोई उपकरण है, जिसमें वह व्यस्त रहता है. और इनमें मौजूद रहते हैं हवापानी बदलने के तमाम ऐप्प और प्रोग्राम. आदमी आधा घंटा फ़ेसबुक चलाया, तबीयत थोड़ी ऊबी, तो व्हाट्सएप्प पर चला गया. वहाँ संघी-वामी-आपिए-कांगी-वरिष्ठ-गरिष्ठ-साहित्यकार-व्यंग्यकार आदि-इत्यादि के बीच हो रहे चतुर्थ विश्वयुद्ध के हथियारों का अजीबोगरीब प्रयोग देख तबीयत नासाज सी हुई तो इंस्टाग्राम पर चला गया. वहाँ ब्रिटनी स्पीयर्सों, पेरिस हिल्टनों, जस्टिन बीबरों और प्रियंका चोपड़ाओं के फ़ोटो-सेल्फ़ियों को देख कर कुछ देर मन बहला. मगर जल्द ही फिर उकता गया तो फिर हवापानी बदलने की बात हो आई. दन्न से दूसरा पन्ना खोला और ब्लॉगरों की दुनिया में चले आए. वहाँ मन नहीं रमा तो लल्लनटाप और द-ऑनियन जैसी साइटों की और भाग लिए. हवापानी बदलने का यह सिलसिला अनवरत जारी रहता है.

थोड़ा अति उत्साही किस्म के लोग नई-नई तकनीक और गॅजेट में नियमित-इन्वेस्ट कर अपना हवापानी बदलने की असफल कोशिश करते रहते हैं. अपने व अपने घर के स्मार्टफ़ोनों, ब्लूटूथ स्पीकरों, मोटर-साइकिलों, कारों, स्मार्ट-वॉच, स्मार्ट-टीवी आदि-इत्यादि के महज छः माह पुराने मॉडलों को फेंक कर एकदम नया वाला मार्केट में ताज़ा जारी किया मॉडल लाकर अपना हवापानी बदलने की असफल कोशिश करते हैं. कार्निंग गोरिल्ला ग्लास का वर्जन 3 हो या 4, वे यह भूल जाते हैं कि यदि स्मार्टफ़ोन चार फ़ीट की ऊंचाई से गिरेगा, तो उसका टचस्क्रीन तो टूटेगा ही! आईपी 67 या 68 सर्टिफ़िकेशन वाला वाटर-डस्ट प्रूफ़ उपकरण होगा तो भी, यकीन मानिए, भारतीय भूमि में जहाँ हर आमो-खास का कदम कदम पर पसीना निकलने लगता है और धूल-गर्द से साबिका पड़ता है, ये उपकरण खुद के पसीने से भीग जाएंगे और खुद का धूल-गर्द बनाने लगेंगे और इस तरह खराब होने लगेंगे और आपको फिर से एक बार गॅजेटीय हवापानी बदलना पड़ सकता है – इस बार अवांछित रूप से.

नई तकनीकें और उनके कैची विज्ञापन आपको अपने उपकरणों के हवापानी बदलने को हर वक्त उत्साहित करते रहते हैं. आपने नया, इन-सेल एक्टिव 4के टीवी इधर खरीदा नहीं, इसका हवापानी बदलने को लालायित करता, 8के वाला मॉडल पीछे पीछे चला आता है. कुछ नहीं तो कंपनियाँ और ऑनलाइन स्टोर जब चाहे तब, त्यौहारों से परिपूर्ण भारत के ऑलटाइम त्यौहारी सीजन में अच्छे खासे छूट देकर हवापानी बदलने का लोभ देते रहते हैं जिनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी होता है. जरा याद करें, पिछली छूट में आपने न चाहते हुए भी, अनावश्यक होते हुए भी 32 जीबी का कार्ड लिया था या नहीं, जो कि आपके कबाड़ संग्रह में बिना उपयोग के पड़ा हुआ है. और, आप अपने पीसी/लैपटॉप के हार्डडिस्क की बात करना चाहेंगे? उसके हवापानी बदलने के चक्कर में आपने उसके भीतर कितना कूड़ा कबाड़ा एकत्र कर लिया है?

अंत में, एक प्रश्न - आपने अपनी ज्वैलरी का हवापानी बदला या नहीं? ऊपर दिए विज्ञापन का चित्र ध्यान से देखें. एवरीथिंग स्मार्ट के जमाने में स्मार्ट ज्वैलरी खरीदी या नहीं? नहीं? चलिए, जल्द ही अपनी ज्वैलरी संग्रह का हवापानी बदल डालिए.

रविवार, 13 अगस्त 2017

व्यंग्य जुगलबंदी 47 : साराह से छेड़छाड़

साराह से प्राप्त संदेशों को दुनिया सगर्व अपने फ़ेसबुक, वाट्सएप्प, ब्लॉग आदि आदि पर डाल रही है. प्रकटतः बड़ी ईमानदारी से. परंतु हमारे पास एआई (कृत्रिम बुद्धि) युक्त एक ऐसी हैकिंग मशीन आ गई है जिससे उनके साराह संदेशों में की गई छेड़छाड़ का पता लग जाता है. हमारी मशीन ने ये पता लगा लिया है कि अब तक सार्वजनिक प्रकाशित साराह संदेशों में से अधिकांश में छेड़छाड़ की गई है और नक़ली संदेश छापे गए हैं. हमारी हैकिंग मशीन ने साराह में सेध लगा ली है और असली संदेशों को प्राप्त कर लिया है.

प्रस्तुत है बिना छेड़छाड़, साराह से प्राप्त कुछ असली संदेश, जिसे, जाहिर है, लोगों ने सार्वजनिक जाहिर नहीं किया.


(दिया गया कोई भी)

एक वरिष्ठ कवि -

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एक और -

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एक वरिष्ठ व्यंग्यकार -

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एक वरिष्ठ कहानीकार -

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एक वरिष्ठ समीक्षक -

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एक और -

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एक वरिष्ठ उपन्यासकार -

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एक वरिष्ठ संपादक -

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एक और -

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(क्रमशः अगले अंकों में - साराह से छेड़छाड़ जारी है...)

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

साराह किया क्या?

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आइए, साराह (या, सारा या सराहा?) करें

यह तो स्वयंसिद्ध है कि दुनिया बड़ी पॉलिश्ड है. मुंह में राम बगल में छुरी टाइप. नहीं?

अभी की ही बात ले लो. सुबह आपकी दाल में नमक जरा ज्यादा हो गई थी. परंतु आपने कहा – वाह! दाल तो बहुत बढ़िया बनी है. भले ही यह बात कहते कहते आपका मुँह कसैला हो रहा होगा.

छोड़िए, चलिए, दूसरी बात करते हैं. हैरी साडू को कभी हैरी साडू बोला है? अरे भाई, अपने बॉस को कभी उसकी औकात दिखाई है?

या, कभी अपने मित्र को सीधे, उसके मुँह पर कभी बोला है कि यार थोड़ा सा डियो लगा लिया करो, या फिर – मोजे तो गाहे-बगाहे धो लिया करो!

नहीं न?

आपने जब भी वास्तविक, सही, ठोस, वाजिब बात कहने की सोची, आपके संस्कार, आपका संकोच और न जाने क्या क्या सामने आ गया. और आपने फ़ावड़े को फ़ावड़ा कहने की हिम्मत नहीं दिखाई. इसी तर्ज पर, लोग सत्य बात को पचाने, स्वीकारने की भी हिम्मत नहीं दिखा पाते.

अब आप पूरी हिम्मत कर सकते हैं. सच को सच कह सकते हैं, किसी के मुँह पर कह सकते हैं. एक बड़ी राहत की बात यह है कि आप अपनी पहचान, अपनी आइडेंटिटी जाहिर किए बगैर, बताए बगैर कह सकते हैं. साथ ही, सब को सही बात कहने के लिए आमंत्रित भी कर सकते हैं. पता तो चले कि आपमें क्या क्या खामियाँ हैं.

उदाहरण के लिए, क्या मेरे एक्टिव फैब्रिक कंडीशनर से ताज़ा धुले मोजे में भी बदबू आती है जो आपको असहनीय लगती है? तो कृपया अपनी जान-पहचान जारी किए बगैर मुझे मेरे साराह खाते पर जरूर बताएँ.

साराह. हाँ, एक नई सुविधा जो इंटरनेट/डेस्कटॉप पीसी और आपके स्मार्टफ़ोनों पर ऐप्प के माध्यम से हासिल हुई है और दुनिया दीवानी हुई जा रही है. आखिर दुनिया को भी हक है उसकी खुद की असलियत जानने का. चिकनी-चुपड़ी बातों से किनारा करने का.

साराह – भी वाट्सएप्प की तरह एक बेहद सरल किस्म का, नौ-नॉनसेंस मैसेंजिंग ऐप्प है, जो मूलतः संदेश प्राप्त करने के लिए बनाया गया है. इसमें संदेश पाने वाले के पास संदेश भेजने वाले का किसी तरह का सूत्र या अता पता नहीं होता, जब तक कि स्वयं भेजने वाला संदेश में न लिखे. यानी भेजने वाला पूरी तरह गुप्त रहता है. जो मर्जी संदेश भेजो, यदि आप नहीं चाहेंगे तो आपका पता कोई नहीं लगा सकेगा. इसका इंटरफ़ेस बहुत ही संक्षिप्त व सरल है, और इसमें खाता बनाना बेहद आसान. जल्द ही लोग – गूगल किया क्या? की तर्ज पर, साराह किया क्या कहने लगेंगे.  डेस्कटॉप पर खाता बनाने के लिए sarahah.com पर जाएँ अथवा स्मार्टफ़ोन पर प्लेस्टोर पर sarahah ऐप्प सर्च करें. यूँ स्मार्टफ़ोन पर डेस्कटॉप संस्करण भी बढ़िया काम करता है.

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मैंने अपना साराह खाता यहाँ बनाया है - जिस पर आप मुझे अपने बेबाक संदेश भेज सकते हैं -  https://raviratlami.sarahah.com/

वहां पर यूँ तो आपको लिखा मिलेगा कि कोई सृजनात्मक संदेश भेजें, परंतु आपके हर तरह के संदेशों का स्वागत है. दिल-खोल दीजिए. मैं भी जानना चाहूंगा कि मेरे बारे में लोगों की बेबाक, किस-किस्म की कैसी-कैसी राय हो सकती है, जिनसे मैं अब तक वंचित रहा था. :)

आप भी अपना एक साराह खाता बनाएँ, और मुझे उसका पता बताएँ. मुझे भी आपके बारे में बहुत सी बातें ऐसी कहनी हैं जो आज तक कह नहीं सका. अब अनामी बनकर तो मैं सफेद को सफेद कह सकूंगा.

आने वाले दिनों में, केवल और केवल दो किस्म की जनता होगी - एक जिसका साराह खाता होगा और दूसरा जिसका नहीं होगा. जिसका नहीं होगा, उसे लोग कहेंगे - देखो - वो जा रहा है, उसमें हिम्मत ही नहीं है सच सुनने की - उसका साराह खाता ही नहीं है!

आप किस किस्म के जीव हैं जी?

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

आर्काइव.ऑर्ग पर हालिया प्रतिबंध और स्ट्रीसेंड प्रभाव

चहुँओर हल्ला मचने के बाद, जैसी कि संभावना थी, ताज़ा खबर ये है कि  आर्काइव.ऑर्ग पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है.

इस घटना से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है.

यहाँ, भारत में, जिसके पास पैसा है, पहुँच है, वो हाई-सुप्रीम-कोर्ट में पहुँच कर उल्टे-सीधे जिरह सामने रख कर माननीय न्यायाधीशों से मूर्खता भरे कोर्ट-आदेश निकलवा सकता है जिसमें शामिल है - आर्काइव.ऑर्ग के संपूर्ण डोमेन पर प्रतिबंध - बिना कोई आर्काइव.ऑर्ग की बात पहले से सुने, या उनके बारे में जाँच-पड़ताल किए या कोई साक्ष्य हासिल किए!

इस संबंध में आर्काइव.ऑर्ग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की तो मीडिया-नामा ने कोर्ट-ऑर्डर की प्रतिलिपियाँ सार्वजनिक रूप से, सबके डाउनलोड के लिए टांग दीं. (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ )

उस कोर्ट-ऑर्डर में आर्काइव.ऑर्ग समेत उन 2600 साइटों के वेब पते हैं जिन पर प्रतिबंध लगाया गया था.

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(मद्रास उच्चन्यायालय के वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश की प्रति का स्क्रीनशॉट)

आप देख सकते हैं कि मासूम वेब उपयोगकर्ता के पास अब एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, बल्कि छब्बीस सौ से अधिक ऐसी वेबसाइटों के पते हैं जहाँ से वो पायरेटेड फ़िल्में और गाने और गेम्स, प्रोग्राम आदि डाउनलोड कर सकता है!

ये है उलटे बांस बरेली को. कहाँ तो प्रतिबंध लगाने की बात हो रही थी, यहाँ तो प्रतिबंधित वेबसाइटों की मार्केटिंग हो रही है, प्रचार प्रसार हो रहा है! ये सभी साइटें वीपीएन, प्रॉक्सी आदि के माध्यम से बखूबी काम कर रही हैं.

प्रतिबंध तभी प्रभावी काम करेगा, जहाँ इंटरनेट हो ही नहीं. डिजिटल इंडिया के जमाने में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा लो अब!

आर्काइव.ऑर्ग पर सरकारी प्रतिबंध - शुतुरमुर्गी मूर्खता बंद करो! बंद करो!! How to visit blocked site through vpn

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भारतीय सरकारी बाबुओं ने एकबार फिर से अपनी शुतुरमुर्गी जड़ता और मूर्खता को सार्वजनिक प्रतिपादित किया है.

आर्काइव.ऑर्ग जैसी एक शानदार वेबसाइट और संकल्पना को बंद कर उसने अपने आप को न केवल उपहास का पात्र बनाया है, बल्कि अपनी संकीर्ण सोच और मंद बुद्धि का एक और परिचय दिया है.

इसका चहुँओर प्रतिकार, हो हल्ला होना चाहिए ताकि इस तरह के अर्थहीन प्रतिबंधों पर लगाम लगे. इस मूर्खता भरे प्रतिबंध तो तत्काल हटाया जाना चाहिए.

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शुक्र है कि विभिन्न तकनीकों के सहारे हमारे-आपके लिए इस शानदार और खूबसूरत साइट (रचनाकार.ऑर्ग जैसी साहित्यिक साइटों की बहुत सी साहित्यिक सामग्री आर्काइव.ऑर्ग पर होस्टेड हैं) को अबाधित रूप से उपयोग करने के ढेरों, आसान तरीके उपलब्ध हैं. प्रॉक्सी, वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क, जिसमें किसी तरह की बंदिश आदि काम नहीं करती) आदि का प्रयोग कर आप आराम से इस प्रतिबंध का प्रतिकार कर सकते हैं - हालाकि यह समाधान नहीं होगा, फिर भी.

यदि आपको प्रॉक्सी, वीपीएन आदि की तकनीकी जानकारी  अधिक नहीं है, तो इसके लिए हम आपके लिए एक बहुत ही सरल सा समाधान लाए हैं. यह हर प्लेटफ़ॉर्म पर काम करेगा.


ओपेरा ब्राउज़र का नवीनतम संस्करण डाउनलोड करें. इस ब्राउज़र में वीपीएन अंतर्निर्मित है.

ओपेरा ब्राउजर को इंस्टाल करने के बाद इसकी सेटिंग में जाएँ. वहाँ प्राइवेसी और सेक्यूरिटी टैब में जाएं और वीपीएन शीर्षक के नीचे दिए गए इनेबल वीपीएन चेकबॉक्स पर सही का निशान लगाएँ. बस. हो गया.


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अब ओपेरा ब्राउजर में एड्रेस बार पर वीपीएन का चिह्न दिखेगा. उस पर क्लिक कर वीपीएन को चालू या बंद कर सकते हैं. वीपीएन चालू करें और आर्काइव.ऑर्ग या अन्य कोई भी बंद साइट का यूआरएल डालें.


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प्रतिबंधित आर्काइव.ऑर्ग का आनंद लें ! --- >

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वीपीएन से हो सकता है कि कुछ लोकेशन आधारित साइटें ठीक से काम न करें, मगर, तात्कालिक हल तो प्राप्त हो ही जाता है.

ओपेरा ब्राउज़र को आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -

http://www.opera.com/hi/download

लिंक को खोलने के लिए अपने ब्राउज़र में कॉपी पेस्ट करें. या गूगल / प्लेस्टोर में ओपेरा डाउनलोड सर्च करें. ओपेरा, मोबाइल के लिए ब्राउज़र तथा ऐप्प - दोनों रूप में उपलब्ध है.

How to visit blocked site archive.org through vpn प्रतिबंधित साइट आर्काइव.ऑर्ग को वीपीएन / ओपेरा ब्राउज़र से कैसे उपयोग करें


अपडेट - चहुँओर हो हल्ला मचने के बाद अब इस साइट पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया है. अलबत्ता आर्काइव.ऑर्ग के इस आलेख और मीडियानामा की इस पड़ताल (लिंक - https://www.medianama.com/2017/08/223-internet-archive-blocked-court-orders-obtained-bollywood-studios/ ) से सिद्ध होता है कि भारतीय कोर्ट और भारतीय बाबुओं ने मिलकर किस तरह से भारत का नाक इंटरनेट जगत में कटवाया है और ये सिद्ध किया है कि हम भारतीय निरे मूर्ख हैं !

उम्मीद करें, कि ऐसी मूर्खता भविष्य में देखने को न मिलें!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

व्यंग्य जुगलबंदी : असली अफ़वाह

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इधर उसने चोटीकटवा की खबर पढ़ी, और उधर उसकी बांछें, शरीर में जहाँ कहीं भी हों, खिल गईं.

उसके दिमाग में बत्ती जो जल गई थी.

आदमी को कुछ चीजें, नामालूम रूप से, बिना किसी कारण, बेवजह, यूँ ही, बेहद पसंद होती हैं तो कुछ चीजें बेहद नापसंद.

मामला कुछ-कुछ मीठा, खट्टा या नमकीन नुमा होता है.

कोई मिठाई का दीवाना होता है तो कोई नमकीन का. किसी को घी की खुशबू बर्दाश्त नहीं होती तो किसी को पेट्रोल की, और इन खुशबुओं के दीवानों की भी कोई कमी, दुनिया में नहीं है.

इसे खुदा का कहर ही समझो, वो जिस जमात में जन्मी, जिस जमात में पली-बढ़ी उस जमात में उसने जन्म से ही, चहुँओर, अपने आसपास दाढ़ीजारों को देखा. अलबत्ता कुछ गिनती के तरक्कीपसंद भी आसपास होते थे जिनके न दाढ़ी होती थीं न मूछें. उसे, नामालूम रूप से, बेवजह, जन्मजात, दाढ़ीजारों की दाढ़ियों से सख्त नफ़रत थी जिनमें उनके प्रिय अब्बा भी शामिल थे. और, जब उसकी शादी एक ऐसे शख़्स से हुई जो सफाचट किस्म का था, तो उसने अपने भाग्य को सराहा था, ईश्वर का धन्यवाद किया था.

पर, इधर कुछ महीनों से उसका पति पता नहीं क्यों अपनी दाढ़ी बढ़ाए जा रहा था. और, वो उन्हीं महीनों से उसे कह रही थी दाढ़ी कटा ले दाढ़ी कटा ले. ऊपर से यह दाढ़ी उसके भरे चौड़े चेहरे पर बिलकुल नहीं जमती. उसकी दाढ़ी देखते ही उसे कुछ हो जाता था. तन-बदन में आग लग जाती थी. आसपास की सामान्य सी चीजें भी उसे उस्तुरा, ब्लेड, चाकू, कैंची आदि आदि नजर आने लग जाती थीं और वो उन्हें उठा लेती थी उसकी दाढ़ी काटने. पर, जाहिरा तौर पर यह प्रयास असफल ही होता क्योंकि चश्मे के केस, पेन, पेंसिल, कंप्यूटर के माउस आदि से दाढ़ियाँ नहीं कटतीं, और वो अपनी इस पागल-पन भरी हरकत पर खुद ही हंस पड़ती. हाँ, शायद वो दढ़ियलों की दाढ़ियों को लेकर जन्मजात पागल थी.

इधर, चोटीकटवा की घटनाएँ चहुँओर फैलती जा रही थीं. चोटी-कटवा तमाम औरतों की चोटियाँ काटे जा रहा था. उसके अपने  मुहल्ले में पिछली रात ये घटना हो गई थी. अब तो उसे भी कुछ-न-कुछ करना ही होगा, उसने सोचा. शाम होते होते उसने पुख्ता प्लानिंग कर ली.

अगली सुबह जब उसका प्यारा पति उठा तो उसने अपने बिस्तर के आसपास बालों के गुच्छों को बिखरा पाया. उसकी बीवी बेसुध सो रही थी. पहले तो उसे लगा कि उसकी बीवी की चोटी कट गई है. उसने ध्यान से देखा. उसकी बीवी की चोटी तो वैसी ही भरी पूरी लंबी है. फिर ये बाल कहाँ से आए?  बेसाख्ता उसके हाथ अपनी दाढ़ी पर चले गए. उसे अपनी दाढ़ी थोड़ी अजीब लगी. उसने टटोला तो पाया कि उसकी दाढ़ी के बाल गायब थे, जो जाहिरा तौर पर नीचे बिस्तर पर फैले हुए थे. उसने सोचा, कहीं उसकी बीवी ने तो नहीं... पर, जल्द ही उसने यह ख़याल अपने दिल से निकाल दिया, और जोर से चीखा.

चहुँओर हल्ला मच गया. घर में, मुहल्ले में, शहर में और फिर समाचार के जरिए देश में. चोटी-कटवा के बाद दाढ़ी-कटवा ने आमद दे दी थी. दाढ़ी-कटवा की घटनाएँ जल्द ही पूरे देश में फैल गईं. उधर, बहुत से दाढ़ी-जारों ने दाढ़ी-कटवों के डर के मारे, खुद ही अपनी दाढ़ियाँ साफ कर लीं.

उधर, वो हर बार अपनी हँसी दबाने में कामयाब रही - जब भी दाढ़ी-कटवों का जिक्र होता, या उनकी खबर चलती.

आपको क्या लगता है? इसी तर्ज पर, घूंघट-कटवा, जनेऊ-कटवा, बुरखा-कटवा आदि आदि की घटनाएँ नहीं होनी चाहिएँ?

क्या पता, किसी दिन ये भी शुरू हो जाएँ. इंतजार करें, शुभ दिन का!

बुधवार, 2 अगस्त 2017

व्यंग्य जुगलबंदी 44+45 = डबल जुगलबंदी = जुगलबंदी की जुगलबंदी = जुगलबंदी^2 = गठबंधन की बाढ़

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पवित्र भारत भूमि में, जुलाई के महीने में सदियों से बाढ़ आती रही है और आगे अनंत-काल तक आती रहेगी. तमाम सरकारें आईं और गईं, तमाम साम्राज्य आए और नेस्तनाबूद हो गए या भारत छोड़ गए, मगर हर वर्ष जुलाई में बाढ़ की स्थिति वही रही, और, जब से हवाईजहाज का आविष्कार हुआ है, अफ़सरों नेताओं का बाढ़ की स्थिति का हवाई सर्वेक्षण और जायजा लेने का चक्र भी बदस्तूर जारी है और जारी रहेगा. जहाँ एक ओर पर्यावरण को बचाने की, प्रकृति को बचाने की दुनियाभर में जमकर सफल-असफल कोशिशें हो रही हैं, भारत भूमि के अधिनायकों और भाग्य-विधाताओं ने कम से कम इस मामले में बढ़िया काम दिखाया है – उन्होंने प्रतिवर्ष-हरवर्ष की बाढ़ और उसकी संभावना को अक्षुण्ण बनाए रखा है, उसका विनाश नहीं किया है, उसे समाप्त नहीं किया है. इस तरह से हम भारतीयों ने प्रकृति को बचाने में बड़ी सफलता पाई है. संपूर्ण ब्रह्मांड इसके लिए हमारा सदैव शुक्रगुजार रहेगा.

जबकि, नदियों में जुलाई के महीने में आने वाली बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, जो भारत भूमि की साम्प्रदायिक सद्भाव, सर्वे भवन्तु सुखिनः को आदर्श मानने वाली जनता प्रतिवर्ष, और यदि टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो बड़े उत्साह से झेलती-स्वीकारती है, और अगले वर्षों के लिए फिर-फिर कमर कस लेती है; एक दूसरी आपदा इस वर्ष और आई है वो है राजनीतिक गठबंधनों की बाढ़. और, इसे भी भारतीय जनता, टीवी चैनलों के हिसाब से कहा जाए तो, बड़े उत्साह से स्वीकार रही है.

जब बाढ़ आती है तो नदी के किनारे के छोटे मोटे पेड़ पौधे अपने जड़-जमीन से उखड़ जाते हैं और धारा में बहने लगते हैं. इतने में कहीं कोई बड़ा सा वृक्ष का तना या लट्ठ बहता हुआ आता है तो ये सब छोटे मोटे पेड़ पौधे और जीव जंतु अपनी जान बचाने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए उस बड़े लट्ठ के चहुँओर चिपक जाते हैं, उसके ऊपर बसेरा बना लेते हैं. राजनीतिक गठबंधनों के भी यही हाल हैं. किसी बड़े दल में यदि चुनावी वैतरणी पार करने की संभावनाएँ दिखती हैं तो छोटे मोटे दल, निर्दलीय, क्षेत्रीय दल उस बड़े दल में गठबंधन के नाम पर चिपक जाते हैं. लाइफ आफ पाई की तरह फिर एक दूसरे के जान के दुश्मन विरोधी पार्टियाँ – आदमी और शेर किस्म की पार्टियाँ – जो पहले एक दूसरे को देख कर गुर्राते थे, मारने – काटने को दौड़ते थे, वे भी प्रेम-पूर्वक साथ रह लेते हैं, मिल-बांट-कर खाने लगते हैं. गठबंधन के असर से एक दूसरे के लिए, पूर्व के साम्प्रदायिक दल राष्ट्रवादी बन जाते हैं, तो सामाजिकता का नारा बुलंद करने वाले दल भ्रष्टाचारी बन जाते हैं, आम आदमी आज विशिष्ट हो जाता है और कल का विशिष्ट, आज निरीह जनता बन जाता है.

इधर साहित्यिक गठबंधनों – यानी लेखकों-पाठकों-अनुसरणकर्ताओं की भी बाढ़ आई हुई है. सोशल मीडिया ने इस गठबंधनी बाढ़ को बड़ी हवा दी है. 1-1 लेखक के लाखों फॉलोअर हैं. लेखक को वर्तनी का व नहीं आता, कि और की कहाँ लगाना है वो यह नहीं जानता, नहीं और नही में फर्क (या, फ़र्क़?) नहीं कर सकता वो चार लाइन लिख देता है – बहुधा समकालीन राजनीति, या राजनीतिक व्यक्ति या धर्म के बारे में – और उसे मिलते हैं लाखों हिट्स, हजारों लाइक्स, सैकड़ों कमेंट. और, बेचारा सारगर्भित, शुद्ध, सुसंस्कृत, शोध-पूर्ण लेख लिखने वाला लेखक 1-1 पाठक को तरसता रहता है. कट-पेस्टिया और चुटकुलों-पंचतंत्रीय-कहानियों को नए रूप में ढालकर लिखने वाले लेखकों के तो और भी मजे हैं. कवियों का तो कहना ही क्या! आजकल व्यंग्यकारों के भी गठबंधन हैं – कुछ पंच मार उड़ा रहे हैं, कुछ सार तत्व, सरोकार और मार्मिकता ढूंढ रहे हैं तो कुछ को व्यवस्था को गरियाना व्यंग्य लगता है तो कुछ को नहीं! एक दूसरे की नजर में ये गठबंधन कुछ को एवरेज टाइप लगते हैं तो कुछ को श्रेष्ठ और कुछ को महा-श्रेष्ठ. जाहिर सी बात है, बहुतों को निकृष्ट भी लगते होंगे, पर, फिर, पंगा कौन मोल ले?

वैसे तो मेरे दिमाग में विचारों की बाढ़ आई हुई है इस मसले पर, परंतु दिमाग-और-उंगलियों का गठबंधन कीबोर्ड पर उन्हें टाइप नहीं करने दे रहा - एक टी ब्रेक मांग रहा है. इसलिए यहीं बंद करते हैं. और, इस बात का भी तो खतरा है कि अगर इस किस्से को एकता कपूर के सीरियल की तरह लंबा खैंच दूं तो मेरा आपका लेखक-पाठक गठबंधन टूट कर किसी और ब्लॉग के पन्ने की बाढ़ की ओर क्लिक/टैप तो न हो जाएगा!

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