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(कार्टून - साभार काजल कुमार )

 

गरमी अभी ठीक से आई नहीं है, और लोगों को गरमी चढ़ रही है. एक नेता इतनी गरमी खा बैठे कि सीधे हवाई जहाज से गिरे और ट्रेन में अटके. एक रोस्टिया कॉमेडियन सफलता की गरमी से इतने स्व-रोस्ट हुए कि उनके इनकम टैक्स में करोड़ों की कमी होने का अंदेशा है.

गरमी केवल लोग नहीं खाते. अपने आसपास की तमाम चीजों, उपकरणों पर गरमी चढ़ जाती है. पिछले साल सेमसुंग गैलेक्सी नोट 7 को अपने नए-पन की इतनी गर्मी चढ़ी कि वो जहाँ तहाँ ही फटने ही लगी. पंखे में लगे कैपेसिटर का इलेक्ट्रोलाइट गरमी खाकर सूख जाता है तो पंखा मरियल चाल चलने लग जाता है. आपके कंप्यूटिंग उपकरणों में लगे इलेक्ट्रानिक कलपुर्जे गरमी खा जाते हैं तो वे उपकरण को बेकार कर देते हैं और फिर उन्हें रिपेयर या रीप्लेस करना पड़ता है. वाहन का इंजन गरमी खाकर ब्लॉक हो जाता है तो टायर गरमी खाकर बर्स्ट हो जाता है.

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साहित्यकारों, खासकर व्यंग्यकारों में गरमी खाने की अच्छी खासी परंपरा रही है. वैसे भी, बिना गरमी खाए कोई सरोकारी, चर्चित, लोकप्रिय, पसंदीदा आदि-आदि किस्म का व्यंग्यकार नहीं बना जा सकता. बिना गरमी खाए, कहीं से, किसी कोने से, किसी भी तरतीब से व्यंग्य निकल ही नहीं सकता. कुंजीपट से (हें, आजकल कोई कलम-दवात से लिखता भी है क्या?) सही, मारक व्यंग्य टाइप करने के लिए गरमी खाना जरूरी है. गरमी कहाँ से, किधर से, किस विषय पर खाएँ यह एक बड़ी समस्या है. वैसे आजकल लोग टुंडे के कबाब खाने-नहीं-खाने के नाम पर गरमी खा रहे हैं, और अच्छी खासी खा रहे हैं, और उनमें साहित्यकारों की भी अच्छी खासी संख्या है.  हर एक साहित्यकार हर दूसरे साहित्यकार पर इसलिए गरमी खाता है कि सामने वाला लिखता तो कूड़ा है, पर हर कहीं छपता है, प्रशंसित होता है. लेखन में पठनीयता, सरोकार, मौलिकता तो घेले भर की नहीं, मगर मजमा जमाए फिरता है. और, जो बचे खुचे साहित्यकार सार्वजनिक गरमी नहीं दिखाते हैं वे ठीक इसी किस्म की अंदरूनी गरमी से त्रस्त रहते हैं.

गरमी खाकर रिश्ते परिपक्व होते हैं तो टूटते-फूटते भी हैं. तीन तलाक का मामला चहुँओर गरमी खा खिला रहा है, इतना कि स्थापित राजकुमारों की कुर्सियाँ तक हिल गईं और नए योगी सत्तानशीं हो गए. रोमियो जूलियट के रिश्तों में भारतीय संस्कृति के तथाकथित रक्षक भाले त्रिशूल लेकर और पुलिसिये डंडे लेकर गर्मी पैदा करने की कोशिशों में आदि काल से लगे हैं तो भारतीय जनमानस के जातीय और सामाजिक रिश्तों में जातीय गणित के समीकरण बिठाने वाले नेता. मंदिर मस्जिद का मसला लेकर तो लोग जब तब गरमी खाने लगते हैं.

जिस तरह से कार्बन-पुनर्चक्रण होता है, ठीक उसी तरह से गरमी खाने का पुनर्चक्रण होता है. उदाहरण के लिए, पसंदीदा ठेकेदार को टेंडर नहीं मिलने से गरमी खाकर नेता अफ़सर को ठांसता है, तो अफ़सर कुछ गरमी अपने मातहत पर निकाल देता है. मातहत घर जाकर वह गरमी अपनी पत्नी पर निकालता है तो पत्नी या तो अधिक नमक की पतली बेस्वाद दाल बना कर गरमी निकालती है या फिर बच्चे को होमवर्क करने के बाद भी टीवी नहीं देखने देती और बच्चा हुक्मउदूली कर गरमी निकालता है. यह गरमी भुगतकर मातहत दूसरे दिन कार्यालय में आकस्मिक अवकाश का आवेदन भेज देता है, अफ़सर, नेता के गोटी बिठाए टेंडर पर कोई नेगेटिव टीप ठोंक मारता है और इससे आहत नेता फिर किसी दूसरे अफ़सर या विरोधी पार्टी के नेता पर गर्मी उतारता है अथवा अपने ट्रांसफर पोस्टिंग के रेट बढ़ा देता है. यह चक्र अक्षुण्ण होता है, और सेल्फ प्रोपेल्ड होता है, और इसे किसी बाहरी ऊर्जा की जरूरत नहीं होती है.

मामला कुछ ज्यादा ही गरमाने लगा है? इससे पहले कि आप यह पढ़ते पढ़ते गरमी खा जाएँ और आइंदा इन पंक्तियों के लेखक को हमेशा के लिए पढ़ने से मना कर दें, किस्सा यहीं तमाम करते हैं. मगर, फिर, इतनी गरमी आपको किन्हीं और दूसरे लेखकों में से किसी से कभी मिली भी है भला?

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आज मैं आपको एक ऐसा व्यंग्य सुनाने जा रहा हूँ जिसे आप एक सांस में पढ़कर वाह! वाह!! कह उठेंगे. आज नहीं तो कल, पर ये तय है कि रवि रतलामी के व्यंग्य सभी पढ़ने लगेंगे. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब जिंदगी का पाठ इन व्यंग्यों के माध्यम से पढ़ाया जाने लगेगा.

ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आज जब हर ओर तकनीक, बिजनेस, धन, कामयाबी की ही बातें चल रही हैं तो रवि रतलामी के व्यंग्य जीवन के सत्य की बातें करती हैं. खैर, रवि रतलामी आज आपको चुनाव के बाद का हाल सुनाएगा. वो चुनाव, जो आगे, आपके जीवन के विकास क्रम में कभी-न-कभी तो आएगा!

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जम्बू द्वीप में सृष्टि के प्रारंभ से ही चुनावी व्यवस्था लागू थी. वैसे, एक धड़े के वैज्ञानिकों का कहना है कि, बिगबैंग की थ्योरी तो बकवास है,  चुनाव से ही, और चुनाव के लिए ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ. वैसे भी, कुछ लोग चुनाव में ही जीते मरते हैं – उनके लिए संपूर्ण सृष्टि, सपूर्ण ब्रह्मांड चुनाव और केवल चुनाव होता है – उनकी सृष्टि का आरंभ और अंत चुनाव से ही होता है. वे खाते-पीते-उठते-बैठते चुनावी चक्र में उलझे रहते हैं और अपना सारा कार्य चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही करते हैं.

बहुत आगे की बात है, यथा समय जम्बू द्वीप में आम-चुनाव हुए. चुनाव में सत्तासीन पार्टी की हार हुई और विपक्ष की जमीन-खिसकती (अरे, वही, लैंडस्लाइड विक्ट्री) जीत हुई.

जैसा कि होता आया है, चुनाव के बाद हार-जीत का विश्लेषण किया गया.

हार-जीत के कुछ मुख्य कारक ये रहे –

1 – बायोमैट्रिक तरीके से, 1048 बिट एनक्रिप्टेड सेक्योर्ड साइट के जरिए जो मतदान करवाए गए उसमें हैकिंग की गई, और तमाम वोट परसेंटेज जीतने वाली पार्टी को चले गए. (इसीलिए, वापस, पुराने, ईवीएम तरीके से, बूथ आधारित मतदान कराने की पुरजोर मांग हारने वाली पार्टी की ओर से की गई)

2- चुनावी पंडितों ने बताया कि इस बार अगड़ों ने पिछड़ों को जमकर वोट दिया, पिछड़ों ने अगड़ों को, नारियों ने पुरुषों को, अल्प-संख्यकों ने बहु-संख्यकों को, और इसके उलट, भरपूर वोट दिया और इस तरह से बहुत ही तीव्र अ-ध्रुवीकरण हुआ जिसके फलस्वरूप यह जमीन-खिसकती हार/जीत हासिल हुई.

3 – चुनाव के दौरान वोटरों को जमकर लुभाया गया. चुनावी घोषणा-पत्र में पर्सनल ड्रोन से लेकर पर्सनल रोबॉटिक असिस्टेंट तक देने के वायदे किए गए और बांटे गए, जिससे लालच में अंधी होकर जनता ने वोट दिए.

4 – चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल, अधिकांशतः जीते वही हैं जो टिकट नहीं मिलने या अन्य वजहों से ऐन चुनाव से ठीक पहले पाला बदल लिए थे. इस लिहाज से, जिस पार्टी की जीत है, सत्यता में वह जीत नहीं है, और जिस पार्टी की हार है, वस्तुतः वह हार नहीं है. ठीक ठीक कहें, तो यह तो यथा-स्थिति-वाद है!

और, यह यथास्थिति-वाद अगले पाँच साल बदस्तूर जारी रही और फिर एक और चुनाव जनता के सामने आ गया और उस चुनाव में भी ऊपर वाली कहानी एक बार फिर से दोहराई गई. और, उस चुनाव के बाद भी, अमूमन विश्लेषण वही का वही रहा. लगे हाथ आपको बता दें कि पांच साल पहले की कहानी भी कुछ इसी तरह की ही थी.

यह कहानी है ही ऐसी.  चुनाव के बाद की कहानी. एक सी.

Ravi Ratlami

#जुगलबंदी

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(अस्वीकरण – अरे, भाई, डिस्क्लेमर! – यह काल्पनिक पोस्ट है और इस पोस्ट की स्टाईल का किसी अन्य जीवित-मृत व्यक्ति के स्टाइल से कोई संबंध नहीं है और यदि ऐसा लगता है तो इसे केवल संयोग मात्र समझा जाए)

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