टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

व्यंग्य जुगलबंदी : असली अफ़वाह

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इधर उसने चोटीकटवा की खबर पढ़ी, और उधर उसकी बांछें, शरीर में जहाँ कहीं भी हों, खिल गईं.

उसके दिमाग में बत्ती जो जल गई थी.

आदमी को कुछ चीजें, नामालूम रूप से, बिना किसी कारण, बेवजह, यूँ ही, बेहद पसंद होती हैं तो कुछ चीजें बेहद नापसंद.

मामला कुछ-कुछ मीठा, खट्टा या नमकीन नुमा होता है.

कोई मिठाई का दीवाना होता है तो कोई नमकीन का. किसी को घी की खुशबू बर्दाश्त नहीं होती तो किसी को पेट्रोल की, और इन खुशबुओं के दीवानों की भी कोई कमी, दुनिया में नहीं है.

इसे खुदा का कहर ही समझो, वो जिस जमात में जन्मी, जिस जमात में पली-बढ़ी उस जमात में उसने जन्म से ही, चहुँओर, अपने आसपास दाढ़ीजारों को देखा. अलबत्ता कुछ गिनती के तरक्कीपसंद भी आसपास होते थे जिनके न दाढ़ी होती थीं न मूछें. उसे, नामालूम रूप से, बेवजह, जन्मजात, दाढ़ीजारों की दाढ़ियों से सख्त नफ़रत थी जिनमें उनके प्रिय अब्बा भी शामिल थे. और, जब उसकी शादी एक ऐसे शख़्स से हुई जो सफाचट किस्म का था, तो उसने अपने भाग्य को सराहा था, ईश्वर का धन्यवाद किया था.

पर, इधर कुछ महीनों से उसका पति पता नहीं क्यों अपनी दाढ़ी बढ़ाए जा रहा था. और, वो उन्हीं महीनों से उसे कह रही थी दाढ़ी कटा ले दाढ़ी कटा ले. ऊपर से यह दाढ़ी उसके भरे चौड़े चेहरे पर बिलकुल नहीं जमती. उसकी दाढ़ी देखते ही उसे कुछ हो जाता था. तन-बदन में आग लग जाती थी. आसपास की सामान्य सी चीजें भी उसे उस्तुरा, ब्लेड, चाकू, कैंची आदि आदि नजर आने लग जाती थीं और वो उन्हें उठा लेती थी उसकी दाढ़ी काटने. पर, जाहिरा तौर पर यह प्रयास असफल ही होता क्योंकि चश्मे के केस, पेन, पेंसिल, कंप्यूटर के माउस आदि से दाढ़ियाँ नहीं कटतीं, और वो अपनी इस पागल-पन भरी हरकत पर खुद ही हंस पड़ती. हाँ, शायद वो दढ़ियलों की दाढ़ियों को लेकर जन्मजात पागल थी.

इधर, चोटीकटवा की घटनाएँ चहुँओर फैलती जा रही थीं. चोटी-कटवा तमाम औरतों की चोटियाँ काटे जा रहा था. उसके अपने  मुहल्ले में पिछली रात ये घटना हो गई थी. अब तो उसे भी कुछ-न-कुछ करना ही होगा, उसने सोचा. शाम होते होते उसने पुख्ता प्लानिंग कर ली.

अगली सुबह जब उसका प्यारा पति उठा तो उसने अपने बिस्तर के आसपास बालों के गुच्छों को बिखरा पाया. उसकी बीवी बेसुध सो रही थी. पहले तो उसे लगा कि उसकी बीवी की चोटी कट गई है. उसने ध्यान से देखा. उसकी बीवी की चोटी तो वैसी ही भरी पूरी लंबी है. फिर ये बाल कहाँ से आए?  बेसाख्ता उसके हाथ अपनी दाढ़ी पर चले गए. उसे अपनी दाढ़ी थोड़ी अजीब लगी. उसने टटोला तो पाया कि उसकी दाढ़ी के बाल गायब थे, जो जाहिरा तौर पर नीचे बिस्तर पर फैले हुए थे. उसने सोचा, कहीं उसकी बीवी ने तो नहीं... पर, जल्द ही उसने यह ख़याल अपने दिल से निकाल दिया, और जोर से चीखा.

चहुँओर हल्ला मच गया. घर में, मुहल्ले में, शहर में और फिर समाचार के जरिए देश में. चोटी-कटवा के बाद दाढ़ी-कटवा ने आमद दे दी थी. दाढ़ी-कटवा की घटनाएँ जल्द ही पूरे देश में फैल गईं. उधर, बहुत से दाढ़ी-जारों ने दाढ़ी-कटवों के डर के मारे, खुद ही अपनी दाढ़ियाँ साफ कर लीं.

उधर, वो हर बार अपनी हँसी दबाने में कामयाब रही - जब भी दाढ़ी-कटवों का जिक्र होता, या उनकी खबर चलती.

आपको क्या लगता है? इसी तर्ज पर, घूंघट-कटवा, जनेऊ-कटवा, बुरखा-कटवा आदि आदि की घटनाएँ नहीं होनी चाहिएँ?

क्या पता, किसी दिन ये भी शुरू हो जाएँ. इंतजार करें, शुभ दिन का!

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आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्मदिवस : भीष्म साहनी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

ये नौबत भी एक दिन आ ही जाएगी.

चोटी या दाढ़ी कटवा हर किस्से की सच्चाई यही है। सुंदर प्रस्तुति।

घूंघट-कटवा, जनेऊ-कटवा, बुरखा-कटवा आदि आदि की घटनाएँ नहीं होनी चाहिएँ? - जरूर होनी चाहिये !

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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