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व्यंग्य जुगलबंदी - 43 – चीनी यात्री ह्वेनत्सांग की 2017 की भारत यात्रा

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चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने पुनर्जन्म लिया और एक बार फिर वो भारत की यात्रा पर निकल लिया. पेश है उसकी सन् 2017 की भारत यात्रा का अति-संक्षिप्त विवरण –

जैसे ही मैं इंदिरा गांधी एयरपोर्ट टर्मिनल पर उतरा, सामने दैत्याकार बोर्ड पर चीनी मोबाइल ब्रांड वीवो का विज्ञापन लगा था और लिखा था – वीवो वेलकम्स यू इन इंडिया! मुझे तब से ही लग गया था कि इस बार की भारत यात्रा भी अच्छी खासी मजेदार, दिलचस्प रहने वाली है.

मैं एक्ज़िट गेट की तरफ आगे बढ़ा. एक बेहद विशालकाय, ह्यूआवेई के 4-K टीवी स्क्रीन पर कोई भारतीय पसंदीदा शो चल रहा था. देखने वालों की भीड़ लगी थी. सोचा मैं भी देखूं. जैसे ही देखने के लिए मैंने अपना मुंह घुसाया, एक ब्रेक आया और विज्ञापन आया – ओप्पो प्रेजेंट्स द अनलाफ़्टर शो!

अचानक मुझे याद आया कि चलो इंडिया पहुँच गए हैं यह बात घर वालों को बता दी जाए. मैंने एयरपोर्ट की मुफ़्त वाई-फ़ाई सेवा का लाभ उठाने के लिए साइट खोली. वहाँ प्रकट हुआ – वेलकम टू एयरपोर्ट फ्री हाई स्पीड वाई-फ़ाई सर्विसेज. स्पांसर्ड बाई अलीबाबा एंड मैनेज्ड बाई जेडटीई.

मैंने एयरपोर्ट का लंबा गलियारा पैदल नापने के बजाय उपलब्ध इलैक्ट्रिक व्हीकल से पार करना चाहा. साफ सुथरा और आरामदायक इलैक्ट्रिक वाहन था वो. उत्सुकतावश, वाहन के नाम-पट्ट पर स्वयमेव निगाह चली गई. नाम पत्र पर शेनडांग ज़ूफ़ेंग व्हीकल कं लिमिटेड चाइन का नाम नजर आया. ओह!

मेरे सामने एक सुंदरी अपने टैब पर यू-ट्यूब पर साई का नया डांस वीडियो देख रही थी. उसके टैब का रंग बड़ा अच्छा था. कुछ-कुछ नीली आभा लिए. मैंने यूँ ही पूछ लिया – कौन सा टैब है यह?

शियामी नोट 6 – उसने गर्व से उत्तर दिया.

सामने एक गिफ़्ट और सोवेनियर शॉप दिखा तो मैं वहाँ चला गया. की-रिंग व की-चेन से लेकर रिमोट कंट्रोल्ड ड्रोन व हेलिकॉप्टर खिलौने सब कुछ थे वहाँ. मैंने एक दो पैकेट उठाए और कीमतें और निर्माता आदि का नाम देखा. कीमतें तो विविध थीं, जेब-जेब के मुताबिक, परंतु निर्माता-देश एक ही छपा नजर आया – मेड इन चाइना. शायद इनके पैकेटों में प्रिंटिंग मिस्टेक आ गया होगा जिसकी वजह से हर पैकेट पर मेड इन चाइना छपा था. खिलौने भी, चॉकलेट भी, प्रतीक चिह्न भी – सबकुछ मेड इन चाइना. वो भी भारत में?

मैं बाहर निकला तो ट्रैफ़िक जाम में फंस गया. रक्षाबंधन का समय था तो सड़कों बाजारों में वैसे भी बहुत भीड़ पहले से थी, ऊपर से एक बड़ा भारी जुलूस भी निकल रहा था. जिसमें लोगों ने पोस्टर बैनर टांग रखे थे – स्वदेशी अपनाओ, चीनी रक्षाबंधन का बहिष्कार करो!

मेरी पिछली यात्रा में दिल्ली के ठगों की खूब धूम थी. पता नहीं इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद उन बिरादरी का क्या हाल हुआ होगा. एक से यूँ ही बातों बातों में पूछा, तो उसने संसद भवन का पता बताया और टीप दी कि अब वहाँ केवल दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के ठग मिलते हैं.

मैंने अपनी भारत यात्रा वहीं समाप्त कर दी – आगे की यात्रा में मेरी दिलचस्पी खत्म हो गई. हाँ, एकमात्र दिलचस्प बात यह मिली कि भारत विचित्रताओं का देश अभी भी बना हुआ है - नाम यूँ हिन्दुस्तान है, सामान सब चीनी भरा है, और भाषा अंग्रेज़ी है!









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बहुत सटीक व्यंग लिखा है आपने, चीनी से कब तक बचेंगे भारतीय? भले ही स्वदेशी या बहिष्कार का नारा लगाले पर हर फ़ील्ड में चीनी हावी हैं.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

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