शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

व्यंग्य जुगलबंदी–31 : लाल बत्ती में परकाया प्रवेश

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(चित्र – साभार – डॉ. अरविंद मिश्र का फ़ेसबुक पृष्ठ)

परकाया प्रवेश विधा का उपयोग कर मैं एक वरिष्ठ आईएएस अफ़सर के शरीर में घुस गया था. बड़े दिनों से तमन्ना थी कि लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद लूं. परंतु ये क्या! इधर मैंने परकाया प्रवेश किया और उधर नोटबंदी की तरह लाल-बत्ती बंदी हो गई.

मैंने सोचा, चलो, एक वरिष्ठ आईएएस के शरीर में प्रवेश किया है जो अब तक लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद उठाता फिरता था, उसके नए, गैर-लाल-बत्ती वाले अनुभव को एक दिन जी कर देख लिया जाए –

“आज सुबह जब मैं उठा तो मुंह सूजा और आँखें फूली हुई थीं. मैंने मन में ही सोचा क्या शक्ल हो गई है एक वरिष्ठ अफसर की. पूरी रात करवटें बदलते गुजरी जो थीं. पूरी रात सपने में लाल-बत्ती वाली गाड़ियां अजीब अजीब शक्लों में, रूपाकारों में आती रहीं और डराती रही थीं तो नींद बार बार टूट जो जाती थी. जैसे लाल-बत्ती ने मुंह का पूरा नूर नोच लिया है लगता था. वैसे भी आज आफिस जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. जैसे तैसे आलस्य को त्यागकर तैयार होकर बाहर निकला, तो बिना लाल-बत्ती के अपनी सरकारी गाड़ी को देख कर दिल धक्क से हो गया और बुझ गया. लगा, जैसे गाड़ी विधवा हो गई है, उसके सिर का सिंगार, सुहाग चिह्न जबरदस्ती उतार लिया गया हो. गाड़ी पूरी तरह बेनूर हो गई थी. इधर ड्राइवर का हाल भी बुरा था. ड्राइवर का भी सबकुछ बुझा हुआ सा लग रहा था. मुझे लगा कि वो जल्दी ही इस बोरिंग, बिना लाल-बत्ती वाली गाड़ी की उतनी ही बोरिंग गाड़ी से पीछा छुड़ाने वाला है. आखिर, सड़कों पर मुझसे ज्यादा सैल्यूट और सम्मान मेरा ड्राइवर पाता था जो उसे केवल और केवल लाल-बत्ती वाली गाड़ी की वजह से हासिल था. जब मैं गाड़ी में बैठा, तो लगा कि ड्राइवर बस रो ही देगा. मैं स्वयं उसे तसल्ली देने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि भीतर से रो तो मैं भी रहा था.

गाड़ी का इंजन आज अजीब आवाज कर रहा था. बिलकुल मरियल. आज तो गाड़ी की चाल में भी दम नहीं दिख रहा था. यकीनन उसे भी अपनी लाल-बत्ती गंवाने का दुःख हो रहा था. आगे बढ़े तो सरकारी कॉलोनी के मुहाने पर बने चेकपोस्ट के चौकीदार ने कोई तवज्जो नहीं दी, और उसका ध्यान खींचने के लिए ड्राइवर को हॉर्न बजाना पड़ गया. इससे पहले ऐसा हादसा कभी नहीं हुआ था. गाड़ी के ऊपर डुलबुग जलती लाल-बत्ती को देखते ही चौकीदार दौड़कर बैरियर हटाता था. आज जब चौकीदार बैरियर हटा रहा था तो उसमें वह फुर्ती तो ख़ैर दिखी ही नहीं, उल्टे उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान अलग तैर रही थी जो बड़ी दूर से महसूस की जा सकती थी. लगा कि वो जानबूझ कर देर से और बड़े आराम से बैरियर हटा रहा है ताकि उसके चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान को ठीक से पढ़ा समझा जा सके.

आगे बढ़े तो जैसी आशंका थी, वही हुआ. चौराहे पर ट्रैफ़िक सिपाही ने उलटे तरफ का ट्रैफ़िक क्लीयर करने के चक्कर में अपनी गाड़ी रोक दी. सैल्यूट मारना तो दूर की बात थी. लाल-बत्ती रहती तो ट्रैफ़िक की ऐसी-तैसी बोल वो पहले तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी को एक शानदार सैल्यूट ठोंकता, इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि गाड़ी के भीतर कोई बैठा भी है या नहीं, या बैठा है तो कोई अफ़सर है नेता है या कोई अपराधी जो नक़ली लाल-बत्ती लगाए घूम रहा है, और फिर वो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए पहले रास्ता क्लीयर करता. पूरे रास्ते यही हाल रहा और दस मिनट में नित्य ऑफ़िस पहुंचने वाले रास्ते में आज पूरे पैंतालीस मिनट लग गए. लगा कि भारत में जनता और गाड़ियों की भरमार हो गई है और इस पर नियंत्रण के लिए हम जैसे अफसरों को ही कुछ करना होगा. इन नेताओं के भरोसे बैठे रहे तो बस लाल-बत्ती लाल-बत्ती खेलते रह जाएंगे.

आफिस में विशिष्ट वीआईपी पार्किंग के हाल बुरे थे. कोई रौनक नहीं थी, कोई एटीट्यूड नहीं था, कोई गर्व नहीं था, कोई रौब नहीं था. कहीं लाल-पीली-नीली बत्ती का नामोनिशान नहीं था तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक सारी गाड़ियाँ मारूती 800 की तरह बेजान, एक-सी नजर आ रही थीं. प्रधान सचिव की पर्सनल मर्सिडीज़ बैंज, जिस पर वे शान से लाल-बत्ती लगाया करते थे, रोती हुई-सी प्रीमियम पार्किंग में खड़ी थी. और कुछ इस तरह खड़ी थी जैसे वह पार्किंग उसे धकिया रहा हो – कलमुंही परे हट, यह स्थल तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए आरक्षित है. तू बिना बत्ती के यहाँ कैसे खड़ी है?

ऑफ़िस के अपने चैम्बर में घुसा तो अर्दली को हमेशा की तरह दरवाजे पर स्वागत में नहीं पाया. वो दरअसल खिड़की से नीचे झांक रहा था. जहाँ से प्रीमियम पार्किंग का दिलकश नजारा दिखाई देता था. आज उसकी निगाह में अलग चमक थी, जो स्पष्ट प्रतीत हो रही थी, और मुख पर थी संतुष्टि और प्रसन्नता के साथ व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट. उसे मेरी स्थिति का आभास नहीं था. मैंने टेबल पर निगाह मारी. धूल की परत जमी हुई थी. प्रकटतः उसने आज टेबल साफ नहीं किया था.

मैंने अपनी गर्दन मोड़ी और दीवार की और मुख किया. मेरी निगाह कैलेंडर को खोज रही थी. मैं अपने रिटायरमेंट के बचे-खुचे दिन गिनने लगा.”

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3 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पृथ्वी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. ओहो, तो पूरे फसाद की जड़ आप हो..कौन जरुरत थी परकाया में प्रविष्ट होने की...

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