व्यंग्य जुगलबंदी - बुढ़ापे या बीमारी से नहीं, मैं मरा अपनी शराफ़त से!

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ग़लती से मैं शराफ़त से पैदा हो गया, साथ में शराफ़त लेकर, शराफ़त से लबरेज़. अब देखिए ना, जिस दिन से मैंने होश सँभाला, अपने आप को निहायत ही शराफ़त से ओतप्रोत पाया. हर काम, जाने-अनजाने व चाहे-अनचाहे शराफ़त से करता आया. जैसे कि, स्कूल में जनगणमन गाते समय टाँग में भयंकर खुजली मचने पर भी, बिना किसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के, मैंने अपने आप को सदैव शराफ़त से खड़ा रखा – वह भी सावधान की मुद्रा में. शायद ये मेरी शराफ़त थी कि मैं वहीं का वहीं रह गया, जबकि मेरा एक सहपाठी जो टांगों में खुजली नहीं मचने पर भी जबरन खुजाता रहता था और इस तरह उसने कभी सावधान की मुद्रा का पालन नहीं किया, आगे चलकर बहुत बड़ा नेता बना और देश के लिए कानून बनाने का काम करने लगा.

कॉलेज में आए तो हमने अपनी शराफ़त में और पर लगा लिए. शराफ़त से कक्षा के और कॉलेज के सक्रिय समूह से जुड़े और अनगिनत कक्षा-बहिष्कारों में शामिल रहे. शिक्षकों के पढ़ाने का निहायत शराफ़त से तिरस्कार-बहिष्कार किया. जुलूस धरना प्रदर्शन आदि में शराफ़त से नारे लगाए और यदि कहीं उत्तेजना और भीड़-तंत्र में बावले होकर झूमा-झटकी व कुर्सी मेजों की उठापटक भी कभी की तो, यकीन मानिए, पूर्णतः शराफ़त से.

इधर नौकरी में आए, तो अपनी शराफ़त में और कलफ़ लगा लिए और इस्तरी आदि भी कर ली. बॉस ने “ये” कहा तो हमने भी यस बॉस “ये” कहा. बॉस ने “वो” कहा तो हमने भी यस बॉस “वो” कहा. बॉस ने “नो” कहा तो हमने भी यस बॉस, “नो” कहा. शराफ़त का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला? नौकरी में सारे समय शराफ़त से मलाईदार विभाग के बजाय लूप लाइन में जमे रहे और, जब देखा कि राजनीति के चलते वहाँ भी शराफ़त निभाना मुश्किल है तो शराफ़त से वीआरएस ले ली. राजनीति की बात से याद आया - नोटा से पहले, बहुत पहले हम नोटा का उपयोग शराफ़त से करते आ रहे हैं. हम अपने वोट शराफ़त से हर उम्मीदवार को देते रहे हैं - कमल हो या पंजा सब में ठप्पा. किसी तरह का कोई विभाजन नहीं, कोई जांत-पांत, ऊंच-नीच, धर्म-बेधर्म की बात नहीं!

इस बीच शादी भी हो गई. किसी व्यक्ति के शराफ़त का अंदाज़ा उसके वैवाहिक स्थिति से जाना जा सकता है. यदि वो शादीशुदा है तो बाई-डिफ़ॉल्ट वो शराफ़त का पुलिंदा होगा. क्योंकि अपने इधर तो जन्मकुंडली से लेकर कर्मकुंडली तक का मिलान और तसदीक कर, शराफ़त का सर्टिफिकेट हासिल कर शादियां होती हैं, भले ही अगला सुपरबग का मरीज हो, उसकी चिंता नहीं. अब तक तो केवल मुझे ही पता था, मेरी शादी ने पूरी दुनिया के सामने यह स्थापित कर दिया कि ये शख्स शराफ़त से परिपूर्ण है. शराफ़त का एक अदद लाइसेंस इसके हाथ में है जो ये दुनिया को सगर्व दिखा सकता है.

आजकल लोगों को एक और जीवन जीना पड़ता है. सोशल मीडिया का जीवन. खुदा कसम, सोशल मीडिया में तो मैं और ही निहायत शराफ़त भरा जीवन जी रहा हूँ. पूरा सोशल मीडिया खंगाल लें. हर कहीं मेरी टीका-टिप्पणियों लेखों आदि में भली प्रकार देख-झांक लें. मैंने सदैव शराफ़त दिखाई है. वर्तनी और व्याकरण की उपेक्षा से भरपूर, की और कि के धड़ल्ले से आपसी प्रयोग और है और हैं के बीच बिना-भेदभाव वाले लेखन की भी मैंने उतने ही शराफ़त से, दिल खोल कर तारीफ़ की है, जितनी की धीर-गंभीर और छंद-मात्रा को गिन कर लिखे गए लेखन की. दक्षिण और वाम दिशाओं में भी निहायत शरीफ़ाना अंदाज़ से घूमा फिरा हूँ और वहाँ भी हर कहीं शरीफ़ाना तारीफ़ें की हैं. टालरेंस में भी शरीफ़ी दिखाई है तो इनटालरेंस में भी!

मेरी शराफ़त के किस्से इतने हैं कि पूरा महाभारत जैसा ग्रंथ तैयार हो जाए. और तो और, जब ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में कुछ मासूम लोगों ने मुझे मरियल और गूगल का एजेंट कहा, तब भी मैंने शराफ़त से उनका धन्यवाद किया.

अब तो लगता है, एक दिन, मेरी शराफ़त ही मेरी जान लेगी!

अब जरा आप भी अपनी शराफ़त, यदि कुछ हो, तो दिखाएँ, - टीका टिप्पणी करें, इसे साझा करें, वायरल करें. :)






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ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई ' शहीद ' हुआ हो ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

आज एक आम आदमी के पास शराफत के तमगे के अलावा और बचा ही क्या है...रोचक प्रस्तुति

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