टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

शब्द-उपनिषद् - डा. सुरेन्द्र वर्मा

शब्द उपनिषद

‘ उपनिषद” का शब्दार्थ ‘समर्पणभाव से निकट बैठना’ है.उप का अर्थ है निकट;;नि; से तात्पर्य है’समर्पण’भाव और सद माने बैठना है.ऋषियों के पास बैठकर जिज्ञासुओं को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही उप्निषदों में संकलित है.

एक मज़ेदार बात यह है कि जूतों के लिये एक प्राचीन शब्द ;उपानत’ था उपानत का अर्थ है, जिसे निकट लाया जाए. आख़िर जूते हमारे पैरों के सबसे नज़दीक नज़दीक रहने वाली वस्तु है. “उपनिषद” और उपानत,दोनो में इस प्रकार जो भावात्मक सम्बंध है, देख्ते ही बनता है‌,भले ही दोनों के अर्थ में कोई सिर पैर न हो. या,यों कहें ,सिर और पैर का अंतर हो.

यदि हम समर्पण भाव से शब्दों के निकट जाएं तो शब्द अपने तमाम रहस्य रहस्य हमारे समक्ष खोल देते हैं. कुछ ऐसे ही शब्दों का जायज़ा लीजिए....

आप इस ज्ञानवर्धक आलेख को आगे आप यहाँ रचनाकार.ऑर्ग पर पढ़ सकते हैं - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_17.html

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