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व्यंग्य जुगलबंदी - व्यंग्य का विषय

व्यंग्य का विषय क्या हो?

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(चित्र - काजल कुमार http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2016/11/india-kajal-cartoon-orop-khattar-kejriwal-suicide.html का कार्टून)

बहुत पुरानी बात है. एक परिपूर्ण, आइडियल, खुशहाल देश हुआ करता था. खुशहाली के इंडैक्स में पूरे सौ में से सौ. पर, वहाँ एक कमी खलती थी. वहाँ सब कुछ था, सारी खुशी थी, परंतु वहाँ, उस देश में कोई व्यंग्यकार नहीं था, कोई व्यंग्य नहीं था. दरअसल, वहाँ व्यंग्य के लिए कोई विषय ही नहीं था.

वहाँ के शीर्ष साहित्यकारों ने एक दिन एक आम बैठक बुलाई और व्यंग्य की अनुपलब्धता पर गहन चिंतन मनन किया. देश में, साहित्य में, साहित्यकारों में व्यंग्य कहाँ से, कैसे, किस प्रकार लाए जाएं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ.

किसी ने कहा – व्यंग्य दिल से निकलता है. लगता है यहाँ दिल वाले नहीं रह गए हैं.

किसी ने कहा – व्यंग्य के लिए दुःख जरूरी है, वर्ग-संघर्ष जरूरी है, असमानता आवश्यक है. यहाँ, इस देश में तो चहुँओर खुशियाली है, कहीं कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं है, फिर व्यंग्य कहाँ से आएगा?

एक ने कहा – व्यंग्य न रहने से साहित्य सूना हो गया है. हम सबको प्रयास कर कहीं न कहीं से व्यंग्य लाना ही होगा. किराए पर ही सही. नकली ही सही. बाई हुक आर क्रुक. व्यंग्य हमें चाहिए ही!

उनमें से एक साहित्यकार, जो अपनी उलटबांसी के लिए जाना जाता था, चुपचाप लोगों की बातें सुन रहा था. लोगों ने एक स्वर में उससे पूछा – तुम चुप क्यों हो? तुम भी तो कुछ कहो?

उसने प्रतिप्रश्न किया – क्या हमारे देश में चुनाव होते हैं? क्या हमारी इस साहित्यिक समिति में कभी चुनाव हुए हैं?

सबने आश्चर्य से मुंह बिचकाते हुए, उपहास से कहा – ये कैसा अजीब प्रश्न है? यहाँ तो राम-राज्य है. यहाँ चुनाव का क्या काम? चुनाव जैसी व्यवस्था का यहाँ क्या काम?

वही तो! इसीलिए व्यंग्य नहीं है – उसने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंकी - और कहा – तो, चलिए आज हम अपनी इस साहित्यिक समिति में एक चुनाव कर लेते हैं. कुछ पदाधिकारियों का चुनाव. कल देश में भी आम चुनाव के लिए माहौल बना लेंगे, आवाज उठा लेंगे, और शायद परसों देश में  भी चुनाव  हो जाए!

कुछ लोगों ने सोचा, ये पागल हो गया है, जो व्यंग्य के लिए चुनाव करवा रहा है. परंतु, व्यंग्य के इतर, कुछेक को चुनाव का विचार बहुत पसंद आया. कुछेक ने यह विचार सिरे से ही खारिज कर दिया. देखते देखते ही वहाँ बहस होने लगी. घंटे भर में तो मामला यूँ गर्मागर्मी का हो गया कि अंततः नतीजा ये निकाला गया कि एक समिति बनाई जाए जो सप्ताह भर के भीतर साहित्यकारों में चुनाव करवाएगी कि कौन अध्यक्ष बनेगा और कौन सचिव और कौन कोषाध्यक्ष.

इस घटना के अगले दिन, वहाँ के अख़बार व्यंग्य से भरे पड़े थे. हर दूसरे साहित्यकार ने व्यंग्य लिख मारा था. विषय था – साहित्य में चुनाव!

सुनते हैं कि जल्द ही उस देश में आम-चुनाव भी होने लगे. तब से उस देश में व्यंग्य के लिए विषयों की कोई कमी कभी नहीं रही. हर लेखक, हर साहित्यकार अंततः व्यंग्यकार हो गया था. लोग कहानी, कविता, संस्मरण यहाँ तक कि अपने इनकमटैक्स रिटर्न में भी व्यंग्य मार देते थे!

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बिन चुनाव न व्यंग्य कबीरा!!! :)

बहुत सही!!!

चकाचक है ! जहां चुनाव वहां व्यंग्य !

बहुत ही उम्दा .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... Thanks for sharing this!! :) :)

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