बुधवार, 15 अप्रैल 2015

दुकालू और नेट न्यूट्रैलिटी

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नेट न्यूट्रैलिटी यानी अंतर्जाल या इंटरनेट निष्पक्षता से तो दुकालू भी बहुत परेशान है. वैसे भी, जब दुकालू के आस-पड़ोस की तमाम जनता जब वाट्सएप्प, फ़ेसबुक और ट्विटर पर न पहुंच गई, दुकालू ने नेट की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था. सोचता था कि हमें क्या? पर जब उसने देखा कि जनता वाट्सएप्प, फेसबुक और ट्विटर पर घुसे रहती है, वहीं हँसती, गाती और रोती है, तो एक दिन उसने भी इंटरनेट पैक ले ही लिया.

पर, ये क्या. सत्यानाश हो इन आईएसपी का. इंटरनेटी कंपनियों का. कहीं निष्पक्षता हैये ही नहीं. आपके सापेक्ष में नेट न्यूट्रैलिटी के अलग माने हों, पर दुकालू की सोच अलग है, बड़ी है. अब देखो न, जब वो गूगल पर रासायनिक पदार्थ सोना और पीतल की खोज करता है तो गूगल बायस्ड होकर उसके सामने बेबी डॉल सनी लियोनी और उसका गाना दुनिया पीतल दी परोस देता है. इसी तरह जब वो शहजादे, साहबजादे, फेंकूराम, नौटंकीबाज आदि-आदि सर्च मारता है तो पता नहीं नेट की न्यूट्रैलिटी कहीं घास चरने चली जाती है और उल्टे सीधे प्रतिमानों को खोज कर बताती है – कभी किसी का पक्ष लेती है तो कभी किसी का.

 

दुकालू जब जब भी, काम की साइट जैसे कि रेल्वे रिजर्वेशन की साइट खोलता है, कमबख्त खुलती ही नहीं. खासकर तत्काल टिकिट के समय. जबकि फ्लिपकार्ट और स्नैपडील जैसी साइटें एक स्नैप में झट और फट से खुलती हैं. जब भी कभी कोई मजेदार वीडियो देखना होता है, तो साइट बफरिंग चालू कर देती है, और जब कोई विज्ञापन का वीडियो चलता है तो साइट झकाझक चलती है. अब बताओ? और करो बात नेट न्यूट्रैलिटी की!

दुकालू के लिए नेट न्यूट्रैलिटी के मायने अहम हैं. अभी तो वो इस बात से परेशान रहता है कि ये नेट वालों को कैसे पता चल जाता है कि वो भोपाल के किसी मोहल्ले से नेट चला रहा है, और कौन-कौन सी कैसी-कैसी साइटें देख रहा है. ऐसे में नेट कैसे न्यूट्रल रह सकता है भला? नेट न्यूट्रैलिटी के लिए ये मुआ ट्रैकिंग सिस्टम बंद होना चाहिए. और, न केवल ब्राउज़रों में इतिहास की सुविधा खत्म होनी चाहिए, निजी / गुप्त विंडो की सुविधा पुख्ता होनी चाहिए – ऐसी कि आईएसपी भी ट्रैक न कर सकें, तभी तो हम सभी को सही नेट न्यूट्रैलिटी मिलेगी!

दुकालू इस बात से भी परेशान रहता है कि जब तब टोरेंट, द पायरेट बे जैसी साइटों पर सरकार प्रतिबंध लगा देती है और इंटरनेट का पूरा मजा उपभोक्ताओं को लेने नहीं देती. नेट न्यूट्रैलिटी तभी है जब तक कि ऐसी साइटें जिंदा हैं. नहीं तो इंटरनेट का मतलब ही क्या? सरकारी दफ़्तरों में बैठे मंदबुद्धि किस्म के लोग जब तब बैन लगा देते हैं, पर, ईश्वर इन्हें माफ करें, इन्हें पता नहीं होता कि ये क्या कर रहे हैं. इधर बैन लगता है, जनता उधर कई-गुना विभिन्न प्रॉक्सी तरीकों से उनका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने लगती है. कभी कभी तो लगता है कि बैन लगाया ही प्रचार प्रसार के लिए जाता है. और, अगर ऐसा है तो भी यह नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ तो हैये ही!

इधर इंटरनेटी विज्ञापनों ने तो नेट न्यूट्रैलिटी की वाट लगा दी है. इंटरनेट पर दुकालू जिस साइट पर भी जाता है, अपने आप को विज्ञापनों के बीच झांकता हुआ पाता है. पता ही नहीं चलता कि विज्ञापन के बीच सामग्री है कि सामग्री के बीच विज्ञापन. इंटरनेट पर जो चीज वो सर्च करता है, उसी का और उससे मिलती जुलती चीजों का विज्ञापन उसको परोसा जाता है. अब, कहाँ गई नेट की न्यूट्रैलिटी? और तो और, जिस सामान को सर्च कर दुकालू इंटरनेट पर छः महीने पहले खरीद चुका होता है, उसका विज्ञापन इंटरनेट पर उसका रोज पीछा करता है. अरे, भाई, टेक्नोलॉज़ी जब इतनी एडवांस हो गई है, जब इतनी ट्रैकिंग कर चुके होते हो कि बंदा क्या सर्च कर रहा है, क्या खरीदना चाहता है, तो यह भी दस्तावेज़ीकृत कर लो कि बंदे ने यह आइटम अलां दिनांक को फलां साइट से ऑनलाइन खरीद लिया है, लिहाजा, अब इसे किसी दूसरी चीज का विज्ञापन तो परोसो!

सबसे बड़ी समस्या तो नेट पैक की है. दुकालू का दिल्ली वासी मित्र जहाँ फ्रीवाईफ़ाई में नेट चलाता है तो यहाँ उसे 10 पैसे प्रति किलोबाइट के महंगे पैक से ले-देकर गुजारा करना पड़ता है. कोई अमीर आदमी बड़ा खर्च कर अनलिमिटेड, ऑप्टीकल फ़ाइबर कनेक्शन से नेट चलाकर शान बघारता है तो कोई 2 जी के 56 केबीपीएस के टूटते-जुड़ते इंटरनेट के सहारे गुजर-बसर करता है. कोई कंपनी 100 रुपए में 1 जीबी डाटा प्लान देती है तो कोई कंपनी 100 रुपए में 5 जीबी दे देती है. ऐसे में नेट न्यूट्रैलिटी की बात करना तो बेमानी है. कहाँ है नेट न्यूट्रैलिटी? कहाँ है? कहाँ है? सरकार इस बारे में क्या कर रही है? ट्राई क्या कर रहा है? नेट ऐक्सेस को मूलभूत अधिकार में शामिल किया जाना चाहिए और हर किसी के लिए निःशुल्क वाईफ़ाई प्रदान किया जाना चाहिए. तभी हासिल होगी असली नेट न्यूट्रैलिटी.

नेट न्यूट्रैलिटी जब तक पूरी तरह हासिल नहीं होगी, दुकालू का इंटरनेट पर जीना मुहाल है. ले देकर तो आया था, अब पता नहीं दुकालू कब इंटरनेट को बाय-बाय कर दे! दुकालुओं को नेट पर बनाए रखने के लिए नेट न्यूट्रैलिटी हासिल करना और उसे बनाए रखना परम आवश्यक है. नेट न्यूट्रैलिटी जिंदाबाद!

(चित्र - नेट न्यूट्रैलिटी गूगल सर्च कोलॉज)

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