April 2013

इन अनुवादकों को तकनीकी हिंदी समूह के सक्रिय सदस्य, अनुनाद सिंह ने तैयार किया है. ये अनुवादक अभी प्रूफ़ ऑफ़ कॉसेप्ट की तरह ही हैं, मगर इन्हें थोड़े से श्रम कर और इनमें संशोधन कर बढ़िया अनुवादक बनाया जा सकता है. डोमेन स्पेसिफिक यानी विशिष्ट श्रेणी - जैसे कि कार्यालयीन प्रयोग के दस्तावेज़ों को स्वचालित मशीनी अनुवाद के लिए तो इन्हें 100% शुद्धता हेतु ट्रेन किया जा सकता है. इसके लिए बस आपको इसकी एचटीएमएल फ़ाइल को किसी यूनिकोड टैक्स्ट एडीटर में खोलना होगा और गुजराती-हिंदी के शब्द युग्म शामिल करने होंगे.

नीचे एक पाठ के गुजराती अनुवाद का स्क्रीनशॉट दिया गया है -

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गुजराती से हिन्दी अनुवादक यहाँ से डाउनलोड करें -

https://sites.google.com/site/raviratlami/Home/Gujarati%20%20to%20Hindi%20Translator_11.html?attredirects=0&d=1

 

इसी तरह अनुनाद सिंह ने ही हिंदी से छत्तीसगढ़ी अनुवादक भी बनाया है. यह भी ठीक ऊपर दिए गए गुजराती से हिन्दी अनुवाद की तरह ही है, मगर चूंकि यहाँ लिपि दोनों में देवनागरी ही है, अतः वह खंड हटा दिया गया है. बाकी सभी कुछ वैसा ही है. इसका एक स्क्रीनशॉट निम्न है -

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हिन्दी से छत्तीसगढ़ी अनुवादक यहाँ से डाउनलोड करें -

 

https://sites.google.com/site/raviratlami/Home/Hindi%20to%20Chattisagadhi%20Translator_01.html?attredirects=0&d=1

 

इसी तरह से अन्य भारतीय भाषाओं, मसलन मराठी-हिन्दी अनुवादक भी बनाया जा सकता है.  यदि आप द्विभाषी हैं तो यह कार्य आप भी आसानी से कर सकते हैं.

 

डाउनलोड लिंक काम न करे तो कृपया बताएं.

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लगता है कि अब इस देश के बाशिंदों को ग़रीब बने रहने में ही भलाई है. जिधर देखो उधर ग़रीबों के लिए योजनाएँ. फलां योजना ग़रीबों के लिए ढिकां योजना ग़रीबों के लिए. सरकारी तो सरकारी, गैर सरकारी और एनजीओ सभी ग़रीबों के पीछे अपनी योजनाएं लेकर पिले पड़े रहते हैं. आप कोई योजना अमीरों के लिए, यदि कोई हो तो बता दो. अब ये बात जुदा है कि ग़रीबों की योजनाओं से भला अंततः अमीरों का ही होता है. मगर, फिर योजना भी तो कोई चीज होती है या नहीं.

कोई भी योजना उठाकर देख लो. सरकार ग़रीबों को ग़रीब ही बने रहने देना चाहती है. ऊपर से ग़रीबों के लिए चुनावी साल तो बहुत ही बेकार साल होता है. वो ग़रीबों को और ज्यादा ग़रीब बनाने की फिराक में रहती है. अब चाहे शादी के समय मुफ़्त में सोना यानी मंगल-सूत्र बांटने की योजना हो या लैपटॉप की. अंदर के तो कयास ये भी हैं कि बाजार में सोने के लुढ़कने के पीछे ग़रीबों को मंगलसूत्र बांटा जाना भी है!

अभी हाल ही की खबर लें. मप्र में चुनावी वर्ष में एक योजना लाई गई है कि ग़रीबों को 1 रुपए किलो गेहूं और 2 रुपए किलो चावल दिया जाएगा. अरे भई, ये टोकन एमाउंट, 1-2 रुपए भी क्यों ले रहे हो? हम ग़रीबों का इतना खयाल नहीं रखोगे तो और कौन रखेगा. मुफ़्त में नहीं दे सकते थे तो भाव चवन्नी किलो या पाँच पैसे किलो कर देते. वैसे भी ये प्रचलन से बाहर हो गए थे, यदि भाव चवन्नी अठन्नी कर देते तो शायद ये फिर प्रचलन में आ जाते और इनकी औकात कुछ खरीदने की तो हो जाती! ग़रीबों के साथ साथ देश के लिए कुछ किया है ये हो जाता. पैसे की कीमत डॉलर के मुकाबले, बढ़े या न बढ़े, कुछ खरीदने की तो हो ही जाती!

अच्छा है. अब हम ग़रीब एक दिन काम करेंगे, और उसकी कमाई से महीने भर खाते रहेंगे. फिर एक दिन काम करेंगे और महीने भर खाते रहेंगे. इस तरह साल में बारह दिन काम कर अपना जीवन आराम से जी लेंगे. आखिर एक ग़रीब को जिंदा रहने के लिए और क्या चाहिए? अनाज और नमक. बस!

कुछ समय पहले विशिष्ट पहचान पत्र यानी आधार कार्ड बनाने की कवायद की गई थी. इसके बारे में कहा गया था कि इसमें इतनी ताकत होगी कि यह अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई को पाट देगा. हम ग़रीबों के तो हाथ पाँव फूल गए थे उस समय. यदि हम ग़रीबों और अमीरों में कोई अंतर नहीं रहेगा, तो हमारी पूछ परख कौन करेगा? हमारे लिए योजनाएँ कैसे आएंगी? हमारे लिए योजनाएँ कौन बनाएगा? और, सबसे बड़ी बात, सरकार चुनावी साल में आखिर करेगी क्या और कौन सी योजना लाकर वो चुनाव जीतने के अपने मंसूबे पूरा करेगी? पर, शुक्र है, आधार कार्ड की मंशा पूरी होती दिखाई नहीं दे रही, उसका खुद का आधार खिसकता जा रहा है और हम ग़रीबों को अभी थोड़ी राहत है.

हाँ, याद आया. अगले साल तो केंद्र के चुनाव भी हैं ना! सुना है कि केंद्र सरकार भी हम ग़रीबों के लिए एक नई योजना ला रही है शिक्षा का अधिकार (हाँ, ये भी तो हम ग़रीबों के लिए ही योजना थी, जिसके कारण हमरा बबुआ भी अब कॉन्वेंट में पढ़ता है अब ये बात अलग है कि उसे कक्षा में अलग बैठाया जाता है) की तरह भोजन का अधिकार. जब यह आ जाएगा तब तो और भी बल्ले बल्ले. काम करो या न करो. खाना तो बैठे-बिठाए ही मिलेगा - सरकारी अमला और सरकारी बाबू अलग से इस बात के लिए हमारे आगे पीछे घूमेंगे कि हमने खाना खाया या नहीं. खाने का अधिकार हमें ठीक तरह से मिला या नहीं. यहाँ ये बात दीगर है कि मनरेगा योजना की तरह आखिर में पैसे की भूख किनकी जगती है और किनकी मिटती है. कभी कभी तो मुझ ग़रीब को ये भी अंदेशा होता है कि हम ग़रीबों के लिए योजना बनाते समय अफ़सर और नेता अपने पैसों की भूख के लिए तो नहीं योजना बना रहे होते हैं!

इधर मैं भी ग़रीब ब्लॉगरों के लिए एक योजना पर काम कर रहा हूँ जिसमें ग़रीबों के कंप्यूटरों/स्मार्टफ़ोनों पर बिना डेटाप्लान के, बिना क्लिक किए, बैठे-बैठे मुफ़्त में ही ब्लॉग पोस्टें लिखने-पढ़ने और टिप्पणियाँ मारने को मिलेगा. पुश ईमेल की तर पुश ब्लॉग. तो बस, थोड़ा इंतजार करिए.

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व्यंज़ल

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तेरी किस्मत में हवा है धूल है ग़रीब

फिर तू फल अंडे क्यों खाता है ग़रीब

 

रेमंड का सूट और नाइकी के जूते पहन

तू तो और भी ज्यादा लगता है ग़रीब

 

अब बस हैं अफ़सर नेता और ठेकेदार

ये देश किसी सूरत तेरा नहीं है ग़रीब

 

सियासी खेल में तुझे पता नहीं चलेगा

कौन है अमीर और कौन तो है ग़रीब

 

निजी जेट में तू भले चलता हो रवि

मगर मुहब्बत में तू बेहद है ग़रीब

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मैं अपने नए स्मार्टमोबाइल में श्रेष्ठ मूल्यांकित (टॉप रेटेड ऐप्प) ऐप्प पर एक नजर डाल रहा था कि इसमें कौन से, काम के ऐप्प डाले जाने चाहिएं.

तो मैंने जैसे ही खोजबीन प्रारंभ किया, मुझे ऊपर दिखाए गए चित्र के अनुसार ऐप्प दिखे. टॉप रेटेड. यानी श्रेष्ठ मूल्यांकित श्रेणी में.

हनुमान चालीसा, बाइबिल ऑन द गो, इस्लामिक हब.

अर्थ यह कि हमारे स्मार्टफ़ोन हमसे भी ज्यादा धार्मिक हो रहे हैं. उनमें धार्मिक ऐप्प इंस्टाल होना पहली शर्त है! टॉप रेटेड ऐप्प तो यही कहानी कह रहे हैं, और आप झूठ नहीं बोल सकते.

 

तो, कृपया बताएँ कि आपके मोबाइल फ़ोन का धर्म क्या है?

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