आसपास की कहानियाँ ||  छींटें और बौछारें ||  तकनीकी ||  विविध ||  व्यंग्य ||  हिन्दी || 2000+ तकनीकी और हास्य-व्यंग्य रचनाएँ -

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 54

 

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – परितोष मालवीयरवि-रतलामी

341

कौन सा भाषण?

एक रात जब नसरुद्दीन घर पहुंचे तो उनकी पत्नी ने पूछा - "तुम्हारा भाषण कैसा रहा?"

नसरुद्दीन ने कहा - "कौन सा भाषण? जो मैंने तैयार किया था? या जो मैंने दिया? या जो मैं देना चाहता था?"

भाषण तैयार करना अलग बात है और देना अलग। इन दोनों में

बहुत अंतर है और वह भाषण तो बिल्कुल ही अलग होता है जो देना चाहते हो।

ये तीनों आपस में बहुत अलग हैं।

 

342

माँ की सलाह

तोकूगावा काल में जियुन नामक प्रसिद्ध शोगन (एक चीनी कला) शिक्षक रहा करते थे। वे अपने समय में संस्कृत के बड़े विद्वान भी थे। जब वे नौजवान थे, तब वे अपने साथी छात्रों को भाषण दिया करते थे।

जब उनकी माँ ने इस बारे में सुना तो उन्हें एक पत्र लिखा;"प्रिय बेटे, मैं यह नहीं मानती कि तुम गौतम बुद्ध के सच्चे अनुयायी हो क्योंकि तुम अन्य व्यक्तियों के लिए चलते-फिरते शब्दकोश बनना चाहते हो। ज्ञान, प्रशस्ति, गौरव और सम्मान की कोई सीमा नहीं होती। मैं चाहूँगी कि तुम भाषण देने का अपना यह व्यवसाय बंद कर दो। बहुत दूर किसी पर्वत पर स्थित छोटे से मंदिर में अपनेआप को बंद कर लो। अपना समय ध्यान में लगाओ जिससे तुम्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा।"

--

 

94

पक्का शिष्य कच्चा गुरु

यह कहानी महान तिब्बती संत मिलरेपा से संबंधित है. मिलरेपा का हृदय बेहद पवित्र, निर्मल और नम्र था, और गुरु का प्रिय था जिससे आश्रम में अन्य साथी शिष्य उससे जलते थे.

साथी शिष्यों ने मिलरेपा को मजा चखाने की ठानी. एक दिन उनमें से एक ने मिलरेपा से कहा “यदि तुम सचमुच अपने गुरु को मानते हो तो उनका नाम लेकर यहाँ पहाड़ से कूद जाओ. तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा.”

और यह क्या? मिलरेपा बिना किसी हिचकिचाहट के वहाँ से कूद गया. खाई तीन हजार फीट गहरी थी. शिष्यों ने सोचा कि नीचे तो वहाँ मिलरेपा हड्डी पसली एक हो गई होगी, और वह ईश्वर को प्यारा हो गया होगा. बेचारा विश्वासी मूर्ख!

परंतु जब वे वापस आश्रम लौटे तो पाए कि मिलरेपा प्रसन्न मुद्रा में पद्मासन लगाए ध्यान कर रहे हैं. उनका बाल भी बांका नहीं हुआ था.

एक बार आश्रम के एक कमरे में भीषण आग लग गई. कमरे में एक बच्चा और एक स्त्री फंस गए थे. किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी भीतर जाकर उन्हें बचाने की. एक शिष्य ने मिलरेपा से कहा जो वहाँ अभी पहुँचा ही था – गुरु का नाम लेकर भीतर जाओ और फंसे बच्चे और स्त्री को ले आओ. वह शिष्य मिलरेपा से बेहद जलता था और चाहता था कि मिलरेपा भी उस अग्नि में स्वाहा हो जाए. मगर यह क्या – मिलरेपा आसानी से भीतर गया और बिना किसी परेशानी के जलती आग में से बच्चे और स्त्री को बचा लाया.

कुछ दिनों पश्चात् शिष्य मंडली को दूसरे शहर जाना था. बीच में नदी पड़ती थी. सब नाव में बैठ रहे थे. एक शिष्य ने मिलरेपा से मजाक किया – तुम्हें तो नाव की जरूरत ही नहीं है. बस, गुरु का नाम लो और नदी पार कर लो.

मिलरेपा ने सहमति में सिर हिलाया और नदी में डग भरते हुए चला गया. उसके लिए नदी जैसे सड़क बन गई थी.

संयोग से उस वक्त गुरु वहीं पर थे. उन्होंने मिलरेपा को नदी को अपने कदमों से डग भर कर पार करते देखा तो विश्वास नहीं हुआ. उन्हें पूर्व की घटनाओं की जानकारी नहीं थी. उन्होंने मिलरेपा से दरयाफ्त की कि नदी को उन्होंने अपने कदमों से कैसे पार किया. मिलरेपा ने बताया कि आप गुरु का नाम लिया और बस नदी पार हो गया.

गुरु ने सोचा कि यह मूर्ख शिष्य जब मेरा नाम लेकर नदी पार कर सकता है तो मुझ स्वयं में कितनी शक्ति होगी. यह विचार कर गुरु भी नदी में उतरा. परंतु यह क्या! नदी की धारा ने उसे लील लिया.

असली शक्ति व्यक्ति में नहीं, उसके विश्वास में होती है.

--

 

95

ऑनेस्टी इज द बेस्ट क्वालिफ़िकेशन

सी.वी. रमन ने 1949 में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाया था. वैज्ञानिक सहायकों की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार का दौर चल रहा था. साक्षात्कार समाप्त होने के पश्चात् रमन बाहर आए तो एक साक्षात्कारकर्ता को उन्होंने देखा. उन्हें याद आया कि इसे तो अपर्याप्त योग्यता के कारण साक्षात्कार से पहले ही बाहर कर दिया गया था. उन्होंने जिज्ञासावश पूछा – “आप अब तक यहाँ क्या कर रहे हैं? आपको तो सुबह ही कह दिया गया था कि आपकी योग्यता अपर्याप्त है, और हम आपको नौकरी पर नहीं रख सकते.”

उस व्यक्ति ने जवाब दिया – “मान्यवर, मुझे आपने बता दिया था, और मैं समझ गया हूँ, और मैं वापस चला भी गया था. मगर आपके ऑफ़िस से मुझे गलती से अधिक यात्रा व्यय का भुगतान कर दिया गया है. दरअसल मैं उसे वापस करने आया हूँ.”

“अच्छा, ये बात है!” रमन आश्चर्यचकित होकर उसे अपने आफिस की ओर ले जाते हुए बोले – “आइए, आपको हम इस पद पर नियुक्त करते हैं. आपकी शैक्षणिक योग्यता कम है, वह हम आपको सिखा देंगे. दरअसल ज्यादा जरूरी योग्यता - ईमानदारी आप में है, और यह मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है.”

---

(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. कहानियाँ किसे पसंद नहीं हैं? कहानियाँ आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
कृपया ध्यान दें - स्पैम (वायरस, ट्रोजन व रद्दी साइटों इत्यादि की कड़ियों युक्त)टिप्पणियों की समस्या के कारण टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहां पर प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

अधिक दिखाएं

---------------

छींटे और बौछारें का आनंद अपने स्मार्टफ़ोन पर बेहतर तरीके से लें. गूगल प्ले स्टोर से छींटे और बौछारें एंड्रायड ऐप्प image इंस्टाल करें.

इंटरनेट पर हिंदी साहित्य का खजाना:

इंटरनेट की पहली यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित व लोकप्रिय ईपत्रिका में पढ़ें 10,000 से भी अधिक साहित्यिक रचनाएँ

हिन्दी कम्प्यूटिंग के लिए काम की ढेरों कड़ियाँ - यहाँ क्लिक करें!

.  Subscribe in a reader

इस ब्लॉग की नई पोस्टें अपने ईमेल में प्राप्त करने हेतु अपना ईमेल पता नीचे भरें:

FeedBurner द्वारा प्रेषित

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

***

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद करें