टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

बातें तो तेरी फूल सी थीं मगर, सुनकर मैं पत्थर का हो गया ...

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इससे बड़ी हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है! जो ऑलरेडी, पहले से ही पत्थर का हो उसे पत्थर बनने का डर सताए!! एक पत्थर को पत्थर हो जाने का भय सताए! लोग तो नाहक ही डर रहे थे.

 

भारत में आम आदमी यूँ भी पत्थर का होता है. भले ही वो पत्थर का बना पैदा न होता हो, मगर अपनी पैदाइश के दूसरे ही क्षण वो पत्थर का हो जाता है. पहले तो भ्रूण में ही सोनोग्राफ़ी जैसे तमाम उपायों से यह भली प्रकार जाँचा परखा जाता है कि कोयले (कोयला तो एक तरह से पत्थर है) की आने वाली है या हीरे (हीरा भी एक तरह से पत्थर ही है,) का आनेवाला है. और जब वह इन टोने-टोटकों से बच बचाकर किसी तरह से पैदा हो जाता है तो जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के पवित्र कार्य से उसके पत्थर रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

 

कोई प्रतिवाद कर सकता है कि वो पत्थर का नहीं है. ठीक है, आपके प्रतिवाद को हम स्वीकारते हैं. मगर जब आप अपने शहर के भीड़ भरे, गड्ढे युक्त सड़क पर बिना प्रतिवाद किए, निस्पृहता से रोज-ब-रोज निकलते हैं तब आपका क्या स्वरूप होता है? पत्थर का ही न? और फिर जब आप किसी सरकारी काम से जाते हैं और आप भी औरों की तरह चाय पानी करवाए बगैर अपना काम नहीं करवा पाते हैं तो आप क्या हुए? पत्थर ही न? और, ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं.

 

पिछले साल भर समाचारों में भ्रष्टाचार प्रमुखता से छाया रहा. लाखों करोड़ों के घपलों के समाचार रोज छपते रहे. मगर जनता? पत्थर की माफिक बिना किसी क्रिया-प्रतिक्रिया के देखती सुनती रही. बीच में लोकपाल का हल्ला मचा. जैसे कि कोयला-पत्थर में कहीं थोड़ी आग लगी हो, या किसी ने बड़े चट्टान को पहाड़ से लुढ़काया हो. मगर कुछ दिनों में वो सब पत्थर की तरह फिर से जड़वत हो गया. नतीजा – ढाक के तीन पात! संसद में वह बिल पिछले 40 वर्षों से पत्थर की माफिक पड़ा है, और लगता है कि आगे यूँ ही पड़ा रहेगा. भारतीय जनता, उसकी भावनाएँ पत्थर की है, पत्थर की रहेगी – यह हमारे राजनेताओं ने एक बार फिर से प्रूव करके दिखा दिया है.

 

व्यंज़ल

बातें तो तेरी फूल सी थीं मगर

सुनकर मैं पत्थर का हो गया

 

मेरे मुल्क का हर आदमी क्यों

सन 47 से पत्थर का हो गया

 

मुझ इनसान को देखकर मेरा

देवता भी पत्थर का हो गया

 

सियासतों के दाँव खेलते हुए

मैं भी जैसे पत्थर का हो गया

 

लिया तो था हाथ में पत्थर रवि

मगर मैं खुद पत्थर का हो गया

--

(कार्टून – इरफान का कार्टून – इतनी सी बात से साभार)

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एक टिप्पणी भेजें

सब ही पाथर हो गये हैं।

कहते हैं, सुन्‍दरता किसी वस्‍तु/व्‍यक्ति में नहीं, देखनेवाले की ऑंख में होती है। यही बात आपकी पोस्‍ट ने साबित कर दी। बात एक और देखनेवाले दो - इरफान और आप। दोनों की अपनी-अपनी नजर और दोनों ही तीखी, धारदार। आनन्‍द आ गया।

मुझे इज्‍जत बख्‍शने के लिए अन्‍तर्मन से कोटिश: आभार।

बस पढ़ना खत्म किया और मैं भी पत्थर का हो गया.

धन्यवाद. आपकी लेखनी चमत्कृत करती है, और उसमें तो अपने आप में बड़ी इज्जतें होती हैं :)

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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