मंगलवार, 15 नवंबर 2011

आसपास बिखरी हुई शानदार कहानियाँ - Stories from here and there - 5

आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ

संकलन – सुनील हांडा

अनुवाद – रवि-रतलामी

9

छुट्टन के तीन किलो

छुट्टन पटसन तौल-2 कर ढेरी बना रहा था. उधर से एक बौद्ध गुजरा. उसने छुट्टन से पूछा “तुम जिंदगी भर पटसन तौलते रहोगे  – तुम्हें मालूम है, बुद्ध कौन था?”

छुट्टन ने बताया – “नहीं, पर यह खूब पता है कि पटसन का यह गुच्छा तीन किलो का है.”

 

10

बारिश में सूखे

एक बार एक शिकारी ने मुल्ला नसरूद्दीन को शिकार पर साथ चलने के लिए न्योता दिया. शिकारी ने मुल्ला को एक मरियल सा घोड़ा दे दिया और खुद बढ़िया, तेज घोड़े पर चला. जल्दी ही शिकारी आँख से ओझल हो गया और मरियल घोड़े पर सवार मुल्ला ज्यादा दूर नहीं जा पाया. इतने में बारिश होने लगी. मुल्ला ने अपने सारे कपड़े उतारे, उनकी पोटली बनाई और एक मोटे पेड़ की छांव में बैठ गया. बारिश बन्द होने पर उसने अपने कपड़े पहने और वापस लौट चला.

शिकारी को बारिश ऐसी जगह मिली जहाँ दूर दूर तक कोई पेड़ नहीं था, घास के मैदान थे अतः वो बारिश में बुरी तरह भीगा वापस आया. उसने मुल्ला से पूछा कि वो सूखा सूखा कैसे है.

मुल्ला ने कहा – “ऐसा आपके घोड़े के कारण हुआ.”

दूसरे दिन शिकारी ने धीमा घोड़ा खुद अपने पास रखा और तेज घोड़ा मुल्ला को दे दिया. उस दिन बारिश देर से हुई जब शिकारी का घोड़ा घास के मैदान तक पहुँच गया था और मुल्ला अपने घोड़े पर वापस उस पेड़ के पास आ चुका था. मुल्ला ने बारिश से बचने के लिए फिर वही उपाय अपनाया और शिकारी धीमे चाल वाले घोड़े के कारण कल से भी ज्यादा बुरी तरह भीगा वापस आया.

मुल्ला को देखते ही शिकारी चिल्लाया – “ये सब तुम्हारी चाल थी. तुमने मुझे इस घटिया घोड़े की सवारी करवाई.”

“मेरी तो नहीं, मगर ये आपके घोड़े की चाल जरूर थी.” मुल्ला ने जवाब दिया.

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(सुनील हांडा की किताब स्टोरीज़ फ्रॉम हियर एंड देयर से साभार अनुवादित. नित्य प्रकाशित इन कहानियों को लिंक व क्रेडिट समेत आप ई-मेल से भेज सकते हैं, समूहों, मित्रों, फ़ेसबुक इत्यादि पर पोस्ट-रीपोस्ट कर सकते हैं, या अन्यत्र कहीं भी प्रकाशित कर सकते हैं.अगले अंकों में क्रमशः जारी...)

5 blogger-facebook:

  1. अपना काम मन से करें तो चंगा है, दुनिया में जो हो रहा है उसकी भले ही जानकारी न हो तो चलेगा।

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  2. सच है, जो है, आनन्द उठा लो..

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  3. पहली कथा पर एक कथा हमें भी कहने का मन होता है लेकिन अभी कहेंगे नहीं…

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  4. अपने काम के विषय में पता होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बुद्ध के बारे में जानना ..
    मुल्ला की तो बात ही निराली है

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