टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

मेरा लोकपाल कैसा हो? बिलकुल मेरे जैसा हो!

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चलिए, प्रस्ताव पास हो गया, आश्वासन मिल गया. लोकपाल की वास्तविकता अब महज चंद दिनों दूर की बात है. दिल्ली बेहद करीब है. समझिए कि हम सीमा में दाखिल हो ही चुके हैं.

 

लोकपाल बन रहा है. मगर सवाल ये है कि लोकपाल कैसा हो? बहुत ही सीधा-सा, सरल-सा उत्तर है – बिलकुल मेरे जैसा हो.

कांग्रेसी बंधु चाहेंगे कि वो पूरा, पक्का कांग्रेसी हो. भाजपाई-संघी चाहेंगे कि वो पूरा पक्का संघी हो. लेफ़्टिस्ट चाहेंगे कि वो पक्का माओवादी हो. बाम्हन चाहेगा कि वो पिछले सात पुश्त से कान्यकुब्ज हो. कायस्थ चाहेगा कि वो असल ‘लाला’ हो, और राजपूत चाहेगा कि उसके ख़ून में शुद्ध क्षत्रिय खून बहता हो. माइनरिटी चाहेंगे कि लोकपाल माइनरिटी में से ही होना चाहिए. पिछड़ों को बहुजन लोकपाल चाहिए होगा. .....

अफ़सरों का लोकपाल खांटी अफ़सर नुमा होगा. नेताओं का पुख्ता नेता टाइप. व्यापारी और उद्योग घराने तो चाहेंगे ही कि लोकपाल कोई पार्टटाइम उद्योग-पति हो. इक्वेलिटी वाले चाहेंगे कि दसों के दसों लोकपाल कम्पटीशन से आएँ. अब, कम्प्टीशन के लिए कितना जुगाड़ चलेगा ये दीगर बात है. इधर कोटा सिस्टम वाले पचास प्रतिशत से कम में नहीं मानेंगे. स्त्रीवादी चाहेंगे कि हर कैटेगरी में हर लेवल पर वर्टिकली फ़िफ़्टी परसेंट महिला लोकपाल होनी चाहिए, तभी न्याय मिलेगा. .....

 

तो, पार्टनर, आप किस कैटेगरी में हैं – मेरा मतलब आपके हिसाब से लोकपाल कैसा होना चाहिए? जरा बताएंगे? कुछ खुलासा करेंगे?

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रवि जी, लोकपाल बिल कैसा भी हो।
लेकिन उद्देश्य भ्रष्टाचार को खत्म करने का ही हो ।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो तो ही सही है।
चाहे जैसा भी हो।
कड़ी सजा हो भ्रष्टाचारियो को तो ही अच्छा है।
चाहे जैसा भी हो लोकपाल बिल।

इसी सब ने तो बर्बाद कर रखा है इस देश को..

लोकपाल बिल कही ...सबके मन के मुताबिक होने के चक्कर में अधर में ही ना लटक जाएँ
--

anu

इसे भी खिचड़ी की तरह बनाया जाये ताकि पचाने में आसानी हो।

चाहे जैसा हो होगा तो गया गुजरा ही न। अब लोकपाल एक यानि प्रधानमंत्री के समकक्ष एक और महान आका विराजेंगे। लोकपाल एक और सौ उम्मीदवार। खूब तमाशा होगा।

हमारी राय पूछकर आपने हमारी इज्‍जत तो बढाई लेकिन करने के लिए कुछ भी तो बाकी नहीं रखा। आपकी हॉं में हॉं मिलाने के सिवाय कोई रास्‍ता आपने छोडा ही कहॉं।

क्या हम लोगों कि मध्यम वर्गी आदत कम नहीं हो सकती है ?
आज लोक पाल पर इतनी टिपण्णी क्यों? क्या देश में किसी ऐसे प्रावधान कि आवश्यकता नहीं है जो इस देश व्यापी रोग पर कुछ काबू कर सके?
और आज ही लोक सभा मैं ५ बिल पेश होवे, कितनों को पता है, या कोई उसके बारे में बात कर भी नहीं रहा है...किसी एक नें हिम्मत तो की, ईन भ्रष्ट व्यवान्था के खिलाफ जाने कि ...क्या चुन जाने के बात, जनता के प्रति जबाबदेही समाप्त हो जाती है? अगर नहीं तो कम से कम सरकार जिसकी भी हो, जनता के प्रति सम्बेदंशील तो रहे...
जन लोक पाल बिल कैसा भी हो,अब तो इस बात कि गारंटी हो गयी की, बनने के बाद निकम्मों कि जबाबदेही कुछ हद तक निश्चित होगी..

वैसे भी हमने किया ही क्या है ? अपने ,. अपने घरों के सुरक्छा के भीतर बैठ कर पूरे देश कि बखिया बधेड़ने के सिवाय..अपने, अपने कांई का प्रबंध कर के, अच्छे घर, कपडे और पैसा जमा करके , जब आराम करने के लिए घर में बैठते हैं तो याद आता है, कि देश कितना भ्रष्ट हो गया , या सरकार कितनी बेकार हो गयी..फिर सबेरे, अपने अपने काम के लिए तैयार.
जी लोग भी कुछ अच्छा करने के लिए आगे बढे, उनपर छीटा, कशी में ही तो मजा है...या शायद हम अपने काम छोड़ कर देश के सुधार में सक्रीय नहीं हो पा रहे हैं, उसका घुटन ? आखिर क्या है, जो बिना कुछ किये , दुसरे पर छीटा कशी के लिए प्रेरित करता है?

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