फ़ेसबुक का इंद्रासन हिलाने आया गूगल+?

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फ़ेसबुक का इंद्रासन हिलाने आया गूगल+?

इंटरनेट खोज, ईमेल, एप्स के बाद गूगल का नया बड़ा शगूफ़ा

लेखकः रविशंकर श्रीवास्तव | July 1st, 2011

Google Plus- Stream

इंटरनेट पर गूगल की एक नई नवेली सोशल नेटवर्किंग सेवा गूगल+ (उच्चारणः गूगल प्लस) चंद चुनिंदा आमंत्रितों के लिए प्रारंभ हो गई है। यह http://plus.google.com या http://www.google.com/+ पर उपलब्ध है।

Google Plusमाना जा रहा है कि गूगल+ को फ़ेसबुक को मात देने की नीयत से अच्छी खासी मेहनत कर प्रस्तुत किया जा रहा है। गूगल यूं भी इंटरनेट पर खोज और ईमेल से लेकर ऑफ़िस अनुप्रयोगों तक की तमाम तरह की सेवाएं और वेब अनुप्रयोग प्रदान कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व बना बैठा है। माईक्रोसॉफ्ट बिंग के प्रवेश के बाद विगत कुछ दिनों में गूगल की बादशाहत को सबसे बड़ा खतरा फ़ेसबुक से ही रहा है, जिसका प्रयोक्ता ने एक दफा रुख किया तो फिर वहीं की हो कर रह गई, ऐसा मुकाम जो आर्कुट को मयस्सर नहीं हो सका। कई क्षेत्रों में तो इंटरनेट प्रयोग के मामले में फ़ेसबुक ने गूगल को पछाड़ कर पहले स्थान पर कब्जा भी कर लिया है। अफवाह तो ये भी है कि गूगल को उसके घर में घुसकर मात देने के लिए फ़ेसबुक ने ईमेल के पश्चात अब अपना सर्च इंजन लाने की भी योजना बना ली है। संभवतः इस समीकरण को बदलने के लिए ही गूगल ने प्लस नामक यह नया सोशल शगूफ़ा छोड़ा है। अब सवाल यही है कि क्या गूगल+ की ये कोशिश कामयाब होगी?

 

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इंतज़ार है।

गूगल के इस नए प्रयोग को कामयाबी नहीं मिलने की सम्भावना है.

आप के दिए लिंक पर क्लिक करने पर सब कुछ अरबिक में लिखा आ रहा है..कैसे अंग्रजी में बदलें कहीं कोई बटन नहीं दिख रहा न ही कोई विकल्प.अब इस सर्वर से नॉन-अरबिक लोगों को बैरंग लौटना पड़ेगा .

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (02.07.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

अल्पना जी,
ब्राउज़र मेन्यू में व्यू में जाएँ, तथा वहाँ एनकोडिंग यूनिकोड यूटीएफ-8 कर देखें.
यदि समस्या नहीं सुलझती हो तो कृपया अपने कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम, ब्राउजर संस्करण की जानकारी दें और हो सके तो स्क्रीनशॉट हमें भेजें, तो आपकी समस्या का त्वरित निदान कर सकेंगे.

आगे आगे देखिये होता है क्या।

सुनते आए हैं बहुत पहलु में दिल के धड़कने का :)

इस संघर्ष में बात इतनी सीधी भी नहीं है जितनी की लग रही है, दरसअल हो यह रहा है की फ़ेसबुक के ज्यादा इस्तेमाल से गूगल की खुराक यानि की हमारी निजी जानकारियों की मात्रा गूगल को उतनी नहीं मिल पा रही हैl और यह तो सर्वविदित है की इस तरह की सभी कम्पनियाँ फिर चाहे गूगल,याहू,मसन,फ़ेसबुक या ट्विटर हो हमारी निजी जानकारियां ही बेच कर ही अपना धंधा कर रही है, तो यहाँ भी अस्तित्व से ज्यादा दूसरी ही हौड है l

वैसे इस समय इंतजार तो नए ब्लॉगर का था .....:((

अभी तक एक भी बुरा रिव्यू पढने को नहीं मिला वैसे. इतना तो है कि बज की तरह फेल नहीं होगा.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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