टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

फ़ेसबुक को माइनस में लाने की कोशिश में आया गूगल+

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गूगल प्लस के आमंत्रण लोगों को मिलने लगे हैं. कहा जा रहा है कि इसे फ़ेसबुक को मात देने की नीयत से अच्छी खासी मेहनत व रिसोर्स से तैयार किया जा रहा है. गूगल यूं भी इंटरनेट पर सर्च - ईमेल से लेकर ऑफ़िस सूट तक की  हर किस्म की सेवा प्रदान कर उसका बादशाह बना बैठा है, और उसकी बादशाहत को खतरा फ़ेसबुक से मिल रहा है जहाँ जनता एक बार घुसी तो वहीं पड़ी रहती है. गूगल इस समीकरण को बदलने के लिए गूगल+ नामक नया सोशल साइट लेकर आया है. वैसे तो गूगल के प्लेटफ़ॉर्म में सोशल साइट ओरकुट पहले से है, परंतु फ़ेसबुक के बेहद आसान प्रयोग ने ओरकुट की हवा निकाल दी और अब न सिर्फ हर व्यक्ति, बल्कि उसका कुत्ता, और उसका मोबाइल भी फ़ेसबुक पर है.

सवाल ये है कि क्या गूगल+ की ये कोशिश कामयाब होगी?

कुछ आरंभिक सेवाएँ आपके इंटरनेट जीवन और फोटो-वीडियो फ़ाइल साझा को और आसान बनाने की गरज से रीडिजाइन की गई प्रतीत तो होती हैं. मगर इसका असली टेस्ट तो तब होगा जब यह आम प्रयोग के लिए खुलेगा तब लोग इसे कितना हाथों हाथ लेंगे. और, लोगों को फ़ेसबुक से बाहर निकालना भी तो बड़ी टेढ़ी खीर है.

गूगल+ कोई 44 भाषाओं में उपलब्ध है. मैंने इसे हिंदी में देखा तो पाया कि अनुवाद बेहद ही कच्चा और सड़ियल किस्म का है. सीधा शब्द-दर-शब्द और वाक्य दर वाक्य अनुवाद है. इतना घटिया अनुवाद तो मैंने किसी साइट पर नहीं देखा, यहाँ तक कि गूगल के मशीनी अनुवाद में भी नहीं! एक बानगी देखें -

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मजेदार के बिलकुल विपरीत कार्य? ये हिंदी कहाँ की है मेरे भाई? और, आप हिंदी में आखिर कहना क्या चाहते हैं?

वैसे, गूगल+ एक और मजेदार, काम की सेवा लगती है जिसमें विशिष्ट किस्म की नए फ्लैवर की सेवाएँ मसलन - सर्कल, स्ट्रीम, स्पार्क, हैंगआउट, चैट इत्यादि हैं जिनमें कुछ दम नजर आता है.

गूगल+ का आमंत्रण आपको भी चाहिए? अभी ही यहाँ https://services.google.com/fb/forms/googleplusenuk/  पंजीकरण करें

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कुत्ता और मोबाइल भी फेसबुक पर है... वाह वाह क्‍या सटीक बात कही... सही है। गुगल वाले पहले बज़ लेकर आए थे लेकिन नहीं बजा। शायद तब ट्विटर पर निशाना था। अब फेसबुक पर निशाना साधा है... अगर यह भी बज़ की तरह जीमेल से बंधा हुआ है तो नहीं लगता कि कोई फेसबुक छोड़ कर इसे पसंद करेगा।

हम तो सभी सोशल साइटों से दूर रहते आए हैं और रहेंगे। गूगल लाए चाहे याहू लाए।

हम तो फेसबुक से छिपे छिपे घूम रहे हैं, अब गूगल भी।

हम तो सभी सोशल साइटों से दूर रहते हैं|

जो हो सो हो, ऐसे अनुवाद मज़ेदार होते हैं।

एक झुनझुना और!

इसको भी देखते है ... आपका आभार !

अब कहाँ कहाँ जाएँ !

क्या बात है... गूगल प्लस के बारे में सुना जरुर था पर यह गहन जानकारी काफी अच्छी लगी आपका धन्यवाद

गूगल ने अपने बुढ़ाते ऑर्कुट को वक्त रहते सम्भाल लिया होता तो उसकी हवा नहीं निकलती। बज्ज बजा नहीं वेव लहरों में खो गया। अब इसको देखते हैं इन्तजार करके।

गूगल का आरकुट और बज तो पहले ही फ्लाप हो चुके हैं। बेहतर होगा कि गूगल वही काम करे जिसमें यह माहिर है यानी भूसे के ढेर में सुई खोजना। वरना अपने यहां कहावत तो है ही - जिसका काम उसी को छाजे, और करे तो डण्‍डा बाजे।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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