सत्यकथा - हेलमेट

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"सर, पिछले वर्ष हमने नागपुर, मुम्बई, चेन्नई यानी लगभग सारे वेस्टर्न सदर्न बिग सिटीज कवर कर लिए थे, और अब सेंट्रल सिटीज की बारी है."

"गुड. गो अहेड"

"सर, हम एमपी के इंदौर, भोपाल, जबलपुर से शुरू करेंगे और फिर यूपी की तरफ आगे बढ़ेंगे."

"ग्रेट प्लान."

"सर, हमने इन सिटीज के डीएम, एसपी को पहले ही लाइन में ले लिया है - तो पूरी सरकारी मशीनरी हमारे साथ है. दो-एक मेनस्ट्रीम अखबार के बिग हेड्स को भी सेट कर लिया है, ये हमारे कैंपेन में अपने अखबारों में साथ देंगे."

"दैड्ट गुड. एनीथिंग एक्स्ट्रा नीड्स टू बी मैनेज्ड?"

"यस सर, कुछ लोकल पॉलिटिशियन को भी मैनेज करना पड़ सकता है, नहीं तो कैंपेन की हवा निकल जाएगी."

"ओके, दैट विल बी डन."

 

और इस तरह इन शहरों में बारी बारी से हफ़्ते दस दिन के लिए हेलमेट पहनो-पहनाओ अभियान हेलमेट कंपनियों के बैकग्राउण्ड प्रायोजन में चलता रहा. और जनता की हलाकान जिंदगी दस-बारह दिनों में वापस पटरी पर आती रही...

 

(डिस्क्लेमर और वैधानिक चेतावनी - सुरक्षा के लिहाज से दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट अवश्य पहनें.)

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अच्छा हुआ जो समय रहते सचेत कर दिया !

हर बार खरीदे हेलमेट न जाने कहाँ चले जाते हैं

कितने जजेज पहनते हैं हेलमेट?

यह 'व्‍यंजल' का गद्य रूप है। बहुत ही तीखा। बहुत ही सटीक।

sab thik hai

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