May 2010

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ओपनसोर्स की अपनी महिमा है. सॉफ़्टवेयर अनुप्रयोगों को आप अपने हिसाब से बदल सकते हैं, परिष्कृत कर सकते हैं, परिमार्जित कर सकते हैं.

इसी फलसफे के आधार पर तैयार किया गया है बच्चों के लिए खास – लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम – क्विमो लिनक्स4किड्स तथा ऑफ़िस सूट – ओपनऑफ़िस4किड्स. वैसे तो वन लैपटॉप पर चाइल्ड योजना में सुगर नाम का लिनक्स आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम खास पढ़ने वाले बच्चों के लिए बनाया गया है, मगर नर्सरी के बच्चों के लिए यह भी थोड़ा उन्नत है, और काम का नहीं ही है. ऐसे में क्विमो लिनक्स4किड्स एक बेहतर विकल्प है.

आइए, पहले देखते हैं बच्चों के लिए खास – क्विमो लिनक्स4किड्स ऑपरेटिंग सिस्टम में बच्चों के लिए आखिर क्या है-

क्विमो लिनक्स4किड्स ऑपरेटिंग सिस्टम

डेस्कटॉप वातावरण एक्सएफ़सीई को खास बच्चों के लिए परिमार्जित कर क्विमो सत्र बनाया गया है जो कि उबुन्टु लिनक्स संस्करण पर आधारित है. इसका  लाइव/इंस्टालेसन सीडी भी है तथा इसका क्विमो सत्र उबुन्टु के नए ताजा संस्करण में संस्थापित भी किया जा सकता है.

क्विमो लिनक्स4किड्स में बच्चों के लिए तमाम मुफ़्त उपलब्ध शैक्षणिक व कंप्यूटर गेम्स हैं. इसे नर्सरी से लेकर प्रायमरी तक के बच्चों के हिसाब से लक्ष्य कर बनाया गया है. गिनती, शब्द ज्ञान, जोड़ घटाना, गुणा-भाग, इत्यादि को बच्चे खेल-खेल में जल्द ही सीख लेते हैं. इस तरह के ढेरों अनुप्रयोग इसमें हैं. जीकॉम्प्रिस नाम का शैक्षणिक व खेलों का एक संपूर्ण सूट हिन्दी में भी उपलब्ध है. जब क्विमो लिनक्स4किड्स के बच्चों के अनुप्रयोगों को चालू कर दिया जाता है तो कंप्यूटर स्क्रीन वीजीए मोड में पूरे स्क्रीन पर छा जाता है जिससे कंप्यूटर पूरा सुरक्षित हो जाता है और बच्चे मनमर्जी, कंप्यूटर में बिना किसी नुकसान के बारे में सोचे जहाँ तहाँ क्लिक कर सकते हैं, कीबोर्ड चल सकते हैं.

desktop (Mobile)

क्विमो लिनक्स4किड्स की थीम (फोंट, कर्सर, आइकॉन इत्यादि) वाइब्रेंट चमकीले रंगों में एनीमेशन चरित्रों को लेकर बनाए गए हैं जिसे बच्चे बेहद पसंद करेंगे. यदि आपके घर में कोई बच्चा है तो इसे अवश्य आजमाएँ. डाउनलोड लिंक व अन्य जानकारी के लिए क्विमो लिनक्स 4 किड्स की साइट पर जाएँ.

 

ओपनऑफ़िसऑर्ग4किड्स

जब बच्चों के लिए खास कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम आ चुका है तो फिर ऑफ़िस सूट भी तो खास बच्चों के लिए होना चाहिए ना?

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जी हाँ, ओपन ऑफ़िस का एक संस्करण – ओपनऑफ़िस 4 किड्स जारी किया जा चुका है, जिसमें बच्चों (7-12 वर्ष को लक्षित) के लिहाज से इसमें बहुत से परिवर्तन किए गए हैं. मेन्यू को सरल, रंगीन और आकर्षक बनाया गया है, बच्चों के लिहाज से थीम व टैम्प्लेट शामिल हैं तथा और भी बहुत सी चीजें बच्चों के लिहाज से हैं. यह ओपनऑफ़िस.ऑर्ग का लाइट संस्करण है, जिसमें स्टार्ट स्क्रीन भी नया है, साफ सुथरा है, इस्तेमाल में आसान है, और तेज भी है. ओपनऑफ़िसऑर्ग4 किड्स को यहाँ से डाउनलोड करें

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इसी का तो इंतजार था. अब तक तो ईमेल भेज भेज कर पका डाला था इन लोगों ने. यहाँ तक कि इन लोगों ने हिन्दी में भी ईनाम खुलने के संदेश मुझे भेजे थे. पर जब इन फर्जी ईमेलों पर ध्यान नहीं दिया तो जाने कैसे इन्हें मेरा मोबाइल नंबर मिल गया. और भेज दिया माइक्रोसॉफ़्ट इंटेल मोबाइल ड्रा में चार लाख पचास हजार पाउंड ईनाम जीतने का एसएमएस.

ऐसे फर्जी एसएमएस संदेशों से सावधान रहें. हालांकि इस आभासी दुनिया में सुरक्षा एक रिलेटिव शब्द है जहाँ सुरक्षा और भेदिए तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर चलते हैं, फिर भी कुछ टिप्स आपको सुरक्षित बने रहने में सहयोग करेंगे -

  • अपने प्रोफ़ाइल या हस्ताक्षर में मोबाइल नंबर कभी भी नहीं लिखें.
  • विभिन्न फोरमों में अपने नाम के साथ साथ मोबाइल नंबर कतई नहीं लिखें.
  • किसी साइट पर मोबाइल नंबर मांगा जाता है तो पुष्टि करें कि क्या यह अति आवश्यक है? यदि आवश्यक नहीं हो, वैकल्पिक हो तो मोबाइल नंबर कतई न भरें.  यदि सिर्फ फोन नंबर से काम चलता हो तो सदैव ही लैंडलाइन नंबर भरें.
  • चित्र में दर्शित इसी प्रकार के ईनाम व लॉटरी, टैक्स रीफंड, पासवर्ड रीसेट इत्यादि के एसएमएस संदेशों को पूरी तरह से अनदेखा करें और डिलीट करें. अपने मोबाइल सेवा प्रदाता को इसकी रपट दें कि ऐसे फर्जी संदेश आ रहे हैं.
  • बिना नंबर से अजनबियों के अंतर्राष्ट्रीय कॉल आने तथा ईनाम खुलने इत्यादि कॉल से भी सावधान रहें. ऐसे कॉल की रपट मोबाइल सेवा प्रदाता या स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज कराएँ.

हालांकि मेरे मोबाइल पर ऊपर आया संदेश पूरी तरह से फर्जी प्रतीत होता है और मुझे फांसने की चाल दिखती है. मगर कहीं ये सचमुच का ईनाम निकला हो तो? सोचता हूं इनसे इनके दिए गए ईमेल पर संपर्क कर ही लूं…!#^& ?

(यह पोस्ट – बॉब ईटन, अनुनाद तथा नारायण प्रसाद को समर्पित है.)
कम्प्यूटरों में हिन्दी भाषा में काम करने वालों के लिए फ़ॉन्ट कन्वर्टर बेहद आवश्यक हैं. तमाम कई कारण हैं. पिछले दस से अधिक वर्षों से मैं दर्जनों फ़ॉन्ट कन्वर्टर प्रयोग कर रहा हूँ, जिनमें कई मुफ़्त हैं, और कई तो अच्छे खासे पैसे देकर खरीदे गए हैं. मगर हर एक में कुछ न कुछ समस्या है.
फ़ॉन्ट कन्वर्टर में सबसे पहला गुण क्या होना चाहिए? – उसमें 100 प्रतिशत शुद्धता से फ़ॉन्ट को कन्वर्ट करने की क्षमता होनी चाहिए. इस काम को अभी कुछ सॉफ़्टवेयर बढ़िया अंजाम दे रहे हैं जिनमें डांगी सॉफ़्ट का प्रखर फ़ॉन्ट कन्वर्टर प्रमुख है – जिसमें कोई दो सौ से अधिक फ़ॉन्टों से परिवर्तन की सुविधा है. यह लाइसेंसी सॉफ़्टवेयर है. इसकी सबसे बड़ी खामी ये है कि यह बेहद धीमा है और अगर आप चाहें कि पूरी किताब को कन्वर्ट करें तो यह इसमें असंभव सा काम है. साथ ही यह एक तरफा ही परिवर्तन करता है – पुराने फ़ॉन्टों से यूनिकोड में.
शत प्रतिशत शुद्धता से फ़ॉन्ट कन्वर्ट करने वाला एक और प्रोग्राम है – सिल कन्वर्टर. सिल कन्वर्टर में और भी ख़ूबियाँ हैं कि आप वर्ड, एक्सेल डाक्यूमेंट को बल्क कन्वर्टर के जरिए पूरा का पूरा कन्वर्ट कर सकते हैं और वह भी दस्तावेज़ की फ़ॉर्मेटिंग को बिगाड़े बगैर. साथ ही इसमें दोतरफा कन्वर्शन की भी सुविधा है.
इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें हिन्दी फ़ॉन्ट कन्वर्टर हेतु मात्र कुछेक फ़ॉन्ट ही सम्मिलित हैं.
सिल कन्वर्टर में हालाकि अपना खुद का कन्वर्टर बनाने की आसान सी सुविधा भी है (मैप फ़ाइल बनाकर) मगर आम कंप्यूटर प्रयोक्ता के लिए यह भी संभव नहीं है. इस कमी को दूर करने का एक बढ़िया काम बॉब ईटन ने गूगल तकनीकी समूह के फ़ॉन्ट कन्वर्टरों को सिल कन्वर्टर से जोड़कर किया है.

इसका क्या अर्थ है?


इसका सीधा सा अर्थ है कि अब आप सिल कन्वर्टर की ख़ूबियों का प्रयोग करते हुए, गूगल तकनीकी हिन्दी समूह पर उपलब्ध तमाम फ़ॉन्ट कन्वर्टरों का प्रयोग ज्यादा आसानी से और ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकते हैं. पूरी की पूरी किताब का फ़ॉन्ट बिना उसकी फ़ॉर्मेटिंग बदले कर सकते हैं. अभी तक आपको अपने ब्राउजर में ही कट-पेस्ट के जरिए तकनीकी समूह के फ़ॉन्ट कन्वर्टरों का प्रयोग करना होता था और आउटपुट सादा पाठ होता था. सिल कन्वर्टर + गूगल तकनीकी हिन्दी समूह फ़ॉन्ट कन्वर्टर से आप सीधे एमएस वर्ड में किसी भी पाठ को सलेक्ट कर एक क्लिक में भी कन्वर्ट कर सकते हैं.

इसके लिए क्या करना होगा?

(1) विशेष रूप से बनाए गए नए सिल कन्वर्टर को बॉब ईटन के व्यक्तिगत स्काई ड्राइव से यहाँ से  (अब यह यहाँ उपलब्ध नहीं है. अतः, ) सिल कन्वर्टर की मूल साइट - http://scripts.sil.org/cms/scripts/page.php?item_id=EncCnvtrs#download से डाउनलोड करें. सिल कन्वर्टर के प्रयोग के बारे में कुछ और जानकारी यहाँ है.
(2) सिल कन्वर्टर में गूगल तकनीकी हिन्दी समूह पर उपलब्ध वांछित कन्वर्टर को जोड़ें. यह बेहद आसान है. इसके लिए विस्तृत गाइड यहाँ है. और, जब आप गूगल तकनीकी समूह का कन्वर्टर जोड़ते हैं तब भी यह गाइड प्रोग्राम में फ्लैश होता है.
(3) अपने पाठ को सीधे एमएस वर्ड में सिल कन्वर्टर प्लगइन/एडइन से कन्वर्ट करें या फिर सिल बल्क डाक्यूमेंट कन्वर्टर से कन्वर्ट करें.
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मैंने गूगल तकनीकी समूह पर उपलब्ध कन्वर्टर “कृतिदेव 010 से यूनिकोड से कृतिदेव 010”  तथा “4सी गांधी…” कन्वर्टर जोड़ा और आजमाया जो शानदार रहा. कृतिदेव 010 कन्वर्टर आउटपुट का स्क्रीनशॉट यह है -
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हैप्पी कन्वर्टिंग… :)

बहुत से स्थानों पर ब्लॉगर ब्लॉग नहीं खुलने की शिकायतें आई हैं. पहले भी होती रही हैं. आमतौर पर ऐसा इंटरनेट सेवा प्रदाता के सर्वरों में समस्या होने के कारण होता है. बी.एस.पाबला जी ने समस्या का एक समाधान यहाँ सुझाया है, मगर यदि आपके पास दूसरे इंटरनेट सेवा प्रदाता का विकल्प नहीं है तो यह समाधान काम का नहीं है. ऐसे में आपके सामने कुछ और विकल्प हैं – जैसे कि वेब प्रॉक्सी सर्वरों का प्रयोग – जैसे कि हाइडमाइआस.कॉम या फिर ओपनडीएनएस का प्रयोग.

वेब प्रॉक्सी सर्वर का प्रयोग आसान है. वेब प्रॉक्सी साइट जैसे कि हाइडमाइआस.कॉम  पर जाकर वहाँ पर जो साइट/ब्लॉग नहीं खुल रहे हैं उनका यूआरएल भरने से वे आमतौर (यदि सर्वर इत्यादि की समस्या हो या आपके प्रतिष्ठान में प्रतिबंधित हों) पर खुल जाते हैं. परंतु हर बार आपको पता प्रॉक्सी सर्वर पर भरना झंझट का काम है और कई दफा स्वयं प्रॉक्सी सर्वरों में ही समस्या होती है.

दूसरा निरापद तरीका है – ओपन डीएनएस का प्रयोग. ओपन डीएनएस के दूसरे दीगर फ़ायदे भी हैं जिनमें शामिल है – फ़िशिंग व नक़ली, वायरस साइटों से स्वचालित बचाव तथा एडल्ट साइट फ़िल्टरिंग इत्यादि.

ओपन डीएनएस विंडोज़ एक्सपी पर कैसे प्रयोग करें? चरण दर चरण विवरण:

1. स्टार्ट मेन्यू से कंट्रोल पैनल चुनें.

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2. कंट्रोल पैनल विकल्प में नेटवर्क कनेक्शन्स पर क्लिक करें.

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3. नेटवर्क कनेक्शन विंडो में नेटवर्क कनेक्शन चुनें और क्लिक करें. (यदि एक से अधिक हो तो अपना डिफ़ॉल्ट या वर्तमान कनेक्शन को चुनें, अन्यथा उपलब्ध एकमात्र कनेक्शन को चुनें.)

 

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4. प्रापर्टीज बटन पर क्लिक करें.

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5. इंटरनेट प्रोटोकॉल (TCP/IP) चुनें और प्रापर्टीज पर क्लिक करें.

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6. रेडियो बटन Use the following DNS server addresses” पर क्लिक करें.

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परंतु पहले अपना पुराना डीएनएस सर्वर पता नोट कर रखें यदि पहले से दिया हो. यदि कोई समस्या आएगी तो आपको वापस पुराना पता यहीं लगाना होगा. यदि ऑब्टेन डीएनएस सर्वर ऑटोमेटिकली पर पहले से चयनित है तो कोई समस्या नहीं है..

ओपन डीएनएस का डीएनएस सर्वर पता है:

  • 208.67.222.222

ओपन डीएनएस का आल्टरनेट डीएनएस सर्वर पता है:

  • 208.67.220.220

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पता भरने के बाद ओके पर क्लिक करें. अपना नेटवर्क फिर से चालू करें (कंप्यूटर रीबूट कर सकते हैं). आपका कंप्यूटर ओपन डीएनएस सर्वर से चलने लगेगा. ये सब सेटिंग करने के बाद आपका ओपन डीएनएस सही चल रहा है या नहीं इसको जाँचने के लिए यहाँ क्लिक करें.

ध्यान दें कि ओपनडीएनएस भी आपकी समस्त समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता. वायरलेस सर्फिंग इत्यादि में हो सकता है कि ओपनडीएनएस काम ही न करे. विंडोज़ विस्ता/7 के लिए चरण दर चरण विवरण देखने के लिए यहाँ क्लिक करें. लिनक्स तंत्र में ओपनडीएनएस बखूबी काम करता है. बस आपको नेटवर्क सेटिंग में डीएनएस सर्वर/ वैकल्पिक डीएनएस सर्वर का पता ओपनडीएनएस का भरना होगा – जो कि कई तरीके से किया जा सकता है.

ओपनडीएनएस को अन्य ऑपरेटिंग सिस्टमों (चित्रमय गाइड यहाँ देखें) व अन्य उपकरणों – यथा विंडोज मोबाइल इत्यादि में भी प्रयोग में लिया जा सकता है. पूरी सूची, विस्तृत गाइड समेत यहाँ देखें

 

#अद्यतन

ओपनडीएनएस का एक बेहतर विकल्प है – गूगल पब्लिक डीएनएस. गूगल पब्लिक डीएनएस के प्रयोग करने की विधि यहाँ दर्ज है, और ठीक वैसा ही है जैसे ऊपर ओपनडीएनएस के लिए दिया गया है. बस, निम्न आपको डीएनएस सर्वर गूगल का डालना होगा.

प्रेफ़र्ड डीएनएस सर्वर

8.8.8.8

आल्टरनेट डीएनएस सर्वर

8.8.4.4

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हाईस्कूल की यादें हम सब के मन में बनी हुई रहती हैं. ऐसे में यदि कभी अरसे बाद रीयूनियन जैसा आयोजन हो तो पुरानी यादें एकदम से ताज़ा हो जाती हैं. सर्वेश्वर दास न.पा. स्कूल के 1977 मैथ्स बैच का रीयूनियन कार्यक्रम 9 मई 2010 को 33 वर्षों के पश्चात् रखा गया था. इस वन्स-इन-अ-लाइफ़-टाइम आयोजन में दुर्भाग्यवश मैं शामिल नहीं हो पाया, मगर यह आयोजन धुंआधार तरीके से सफल रहा. इस आयोजन को सफल बनाने में मित्र अजय पाण्डे, योगेश बागड़ी और तमाम दूसरे मित्र जी जान से जुटे रहे. इस अवसर पर यादों को संजोने के लिहाज से एक स्मारिका भी निकाली गई. स्मारिका की पीडीएफ़ ई-बुक आप आर्काइव.ऑर्ग से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.

इस स्मारिका को आप यहीं पर नीचे आनलाइन स्क्रिब्ड ई-पेपर पर भी पढ़ सकते हैं.

------ 1977 Batch Reunion 2010 Sarveshwar Das Nagar Palika School Rajnandgaon-Final

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माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस 2010 नई विशेषताओं के साथ बाजार में आ चुका है. क्लाउड कम्प्यूटिंग की सुविधा युक्त ऑफ़िस 2010 के नए संस्करण में बहुत सी नई ख़ूबियों को शामिल किया गया है.

ऑफ़िस 2010 तकनीकी पूर्वावलोकन संस्करण की एक संक्षिप्त समीक्षा आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

भारत में भी ऑफ़िस 2010 जारी किया जा रहा है. इस मौक़े पर माइक्रोसॉफ़्ट की तरफ से ऑफ़िस 2010 के बारे में और अधिक जानने-समझने तथा सीखने के लिए 25 और 26 मई 2010 को माइक्रोसॉफ़्ट कम्यूनिटी वर्चुअल लांच इवेंट आयोजित कर रही है. आप चाहें तो अपने पास के शहर के आयोजन स्थल पर या इंटरनेट के वेबकास्ट पर इस आयोजन का लाभ निशुल्क ले सकते हैं. इसके लिए आपको मेराऑफ़िस.कॉम http://www.meraoffice.com पर पंजीकृत होना होगा.

इसी प्रकार, जून 2010 के महीने में भारत के कई शहरों में ऑफ़िस 2010 लांच इवेंट आयोजित किया जाएगा. इस अवसर पर प्रतिभागी, ऑफ़िस 2010 के बारे में न सिर्फ बहुत सी नई खूबियों के बारे में जान सकेंगे, बल्कि उन पर काम करने का अनुभव भी प्राप्त कर सकेंगे. अधिक विवरण यहाँ http://office.merawindows.com दर्ज है.

अब आते हैं असली बात पर.

इस ब्लॉग के 2 चयनित पाठकों को कम्यूनिटी ब्लॉग बज़ फ़ॉर ऑफ़िस 2010 आयोजन के तहत माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस 2007 के होम-स्टूडेंट लाइसेंस सॉफ़्टवेयर प्रदान किए जाएंगे जो कि मुफ़्त में ऑफ़िस 2010 में अपग्रेडेबल होंगे. चयनित पाठकों के भारत के पते पर सॉफ़्टवेयर सीधे माइक्रोसॉफ़्ट द्वारा भेजे जाएंगे चूंकि इसे माइक्रोसॉफ़्ट भारत की तरफ से प्रायोजित किया जा रहा है.

इसके लिए आपको क्या करना होगा?

बहुत आसान है. इस पोस्ट पर टिप्पणी में लिखें कि आप हिन्दी लिखने के लिए किस औजार का इस्तेमाल करते हैं? हिन्दी लिखने में आपको क्या समस्या आती है? इत्यादि. वैसे आप अपनी मर्जी की Nice नुमा टिप्पणी भी डाल सकते हैं, मगर यदि हिन्दी लेखन के औजार व इसकी दुश्वारियों संबंधी कुछ लिखें तो हम सभी के लिए उत्तम होगा. इस पोस्ट पर आई टिप्पणियों के तमाम टिप्पणीकर्ताओं के नामों की चिट डाली जाएगी, जिसमें से जादू जी  के द्वारा  चिट निकाल कर 2 भाग्यशाली पाठकों को चुना जाएगा. इस आयोजन में शामिल होने के लिए इस ब्लॉग पोस्ट में टिप्पणी दर्ज करने की अंतिम तिथि 8 जून 2010 है. परिणाम 15 जून 2010 से पहले प्रकाशित किए जाएंगे.

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, चयनित टिप्पणीकर्ता(ओं) को भारत का शिपिंग एड्रेस देना होगा. इस आयोजन के संबंध में किसी तरह का वाद-विवाद/पत्राचार मान्य नहीं होगा, और आयोजक की तमाम शर्तें प्रतिभागियों को अंतिम रूप से मान्य व बंधनकारी होंगी.

इस संबंध में अद्यदन जानकारी हेतु इस ब्लॉग पोस्ट को देखते रहें.

एक ओर जहाँ काईट्स और रा-वन के प्रदर्शन के इंतजार में बाजार के पंडित फ़िल्म में लगे करोड़ों रुपए और उसके एवज में होने वाली कमाई और फ़िल्मों सफलता-असफलता की भविष्यवाणियाँ करने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर, क्या आपको पता है कि कुछ उच्चस्तरीय, तकनीकी दक्ष फ़िल्में बनती तो अच्छी खासी लागत, मेहनत और प्रतिबद्धता से हैं, मगर उन्हें मुफ़्त/फोकट में देखे व वितरित किए जाने के लिए रिलीज किया जाता है?

जी हाँ, ऐसा ही एक प्रोजेक्ट है द ओपन मूवी प्रोजेक्ट. मुफ़्त  एनीमेशन सॉफ़्टवेयर ब्लेंडर की सहायता से इन फ़िल्मों को बनाया गया है.

इस प्रोजेक्ट के जरिए अब तक दो उच्चस्तरीय एनीमेटेड फ़िल्में रिलीज की जा चुकी हैं -

1) एलीफेंट्स ड्रीम

2) बिग बक बन्नी

और ब्लेंडर गेम इंजिन के सहारे बनाया गया वीडियो -

3) यो फ्रेंकी!

भी देखने लायक है.

बिग बक बन्नी के बारे में चवन्नी चैप में एक छोटी सी समीक्षा छपी थी -

“…

तीन घंटों की हिन्दी फ़िल्में क्या आपको बोर नहीं करतीं? आम अंग्रेज़ी फ़िल्में भी डेढ़-दो घंटे से कम नहीं होतीं.
आमतौर पर किसी भी फ़िल्म में एक छोटी सी कथा होती है - बुराई पर अच्छाई की जीत. इसे कहने के लिए, इसी बात को बताने के लिए दर्शकों पर लगातार डेढ़ से तीन घंटे अत्याचार करना कितना सही है? कोई फ़िल्म कितना ही अच्छा बन जाए, गीत संगीत, दृश्य और भावप्रण अभिनय से सज जाए, परंतु फ़िल्म की लंबाई दर्शकों को पहलू बदलने को, बीच-बीच में जम्हाई लेने को मजबूर कर ही देती है.
ऐसे में, एक घिसी पिटी कहानी पर बनाई गई एक छोटी सी त्रिआयामी एनीमेशन फिल्म –
बिग बक बन्नी देखना कई मामलों में सुकून दायक है.
वैसे यह फिल्म कई मामलों में बेजोड़ भी है. इसे
ब्लेंडर नाम के एक मुफ़्त स्रोत अनुप्रयोग की सहायता से तैयार किया गया है. इस फिल्म को क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत जारी किया गया है जिसे हर कोई मुफ़्त में देख सकता है व लोगों में वितरित कर सकता है. यानी आपको इसे देखने के लिए इसे खरीदने की आवश्यकता नहीं.

…..”

पूरी समीक्षा यहाँ पढ़ें

 

इसी परियोजना के तहत एक नई फ़िल्म – सिंटेल  का निर्माण किया जा रहा है, जिसका ट्रेलर आप नीचे दिए यू-ट्यूब वीडियो पर देख सकते हैं

सिंटेल का ट्रेलर

 

 

एलीफेंट्स ड्रीम देखें

 

बिग बक बन्नी देखें

 

यो फ्रेंकी! देखें

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व्यंज़ल


देश तो साला जैसे सुबह का अख़बार हो गया
वो तो एक नॉवेल था कैसे अख़बार हो गया

तमाम जनता ने लगा लिए हैं मुँह पे भोंपू
मेरा शहर यारों कुछ ऐसे अख़बार हो गया

दुश्वारियाँ मुझपे कुछ ऐसी गुजरीं कि मैं
एक कॉलम सेंटीमीटर का अख़बार हो गया

लोगों ने कर डाली हैं विवेचनाएँ इतनी कि
धर्म तो बीते कल का रद्दी अख़बार हो गया

बहुत गुमाँ था अपने आप पे यारों रवि को
जाने क्या हुआ कि वो बस अख़बार हो गया

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(समाचार कतरना – साभार – अदालत ब्लॉग)

अनामों और बेनामों को अकसर इस बात की धमकी दी जाती है कि उनका आईपी पता नोट कर लिया गया है और उन्हें पहचान लिया गया है. यह बात सत्य है कि सही आईपी पते से फोरेंसिक जाँच पड़ताल के जरिए किसी व्यक्ति के सटीक भौगोलिक स्थान और यहाँ तक कि उसके विशिष्ट कंप्यूटर की पहचान की जा सकती है. मगर, चतुरों के लिए अपने आईपी पते को छुपाने के बहुत से तरीके हैं – अनुप्रयोग प्रॉक्सी से लेकर वेब आधारित प्रॉक्सी का प्रयोग तथा टॉर प्रोजेक्ट और हॉट स्पॉट शील्ड जैसे अनुप्रयोगों का बारीकी से प्रयोग.

 

कुछ वेब आधारित प्रॉक्सी सर्वर – जैसे कि एनोनिमस.ऑर्ग या हाइडमाइआस.कॉम यह दावा तो करते हैं कि वे आपके आईपी पते को छुपा देते हैं, मगर वास्तव में स्थिति भिन्न होती है. एक प्रयोग मैंने बी.एस.पाबला के ब्लॉग जिंदगी के मेले पर किया. उनके ब्लॉग में बाजू पट्टी में पाठक का आईपी पता दर्ज करने का विजेट लगा हुआ है. सामान्य ब्राउज़िंग में मेरा आईपी पता वहाँ पर कुछ यूँ दर्ज हुआ-

 

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आई पी पता – भारत का. हूइज़ क्वैरी से आप इस पते से स्थान का पता आसानी से लगा सकते हैं. चलिए, अप प्रॉक्सी का प्रयोग किया जाए. वेब प्रॉक्सी आजमाते हैं -

जब मैंने वेब प्रॉक्सी हाइडमाइआस.कॉंम का प्रयोग किया तो ब्लॉग पर आई पी पता दर्ज करने वाले विजेट ने मेरा आई पी पता बताया -

 

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वाह! बढ़िया. मेरा आईपी पता अमरीका का आ रहा है. कमाल है. काम बन गया लगता है.

परंतु जरा पूछते हैं कि इस मामले में पाबला जी क्या कहते हैं.

मैंने उनसे दरियाफ़्त की कि उनके मशीन पर मैंने एक जाँच परख टिप्पणी डाली है उसका आईपी पता उनके पास क्या दर्ज हुआ है? उन्होंने बताया कि भारत का दर्ज हुआ है.

खुल गई न अपनी पोल पट्टी!

इसी तरह से यदि आप अपने ब्राउजर का प्रॉक्सी (अन्य वेब सेवा या प्रॉक्सी अनुप्रयोगों के जरिए) बदलते हैं तब भी समस्या बनी रह सकती है और आपको उन्नत औजारों के जरिए ढूंढ निकाला जा सकता है.

तो क्या परिपूर्ण, पक्के अनामी बने रहने के लिए क्या कोई इलाज है भी?

यदि आप अपने आईपी पते को वाकई, पूरी तरह छुपाना चाहते हैं, तो इसके लिए सर्वोत्तम औजारों में से एक, मुफ़्त – टॉर प्रोजेक्ट को अपनाएँ. इसमें अनाम बने रहने की पूरी गुंजाइश रहती है चूंकि आपकी नेट गतिविधयों को सैकड़ों टॉर क्लाएंटों के जरिए बारंबार, बेतरतीब तरीके से भेजा जाता है और हर टॉर क्लाएंट अपने पीछे के ट्रेल मिटाते चले जाते हैं – यह ठीक ऐसा ही होता है जैसे कि आप यदि रेतीले सड़क पर जा रहे हों तो सीधे जाने के बजाए आड़े टेढ़े लंबे रास्ते से जाएँ  और पीछे अपने पग चिह्नों को मिटाते जाएँ. अनाम बन कर, अपनी पहचान छुपाकर ब्लॉगिंग करते रहने के लिए टॉर प्रोजेक्ट की अनुशंसा ग्लोबल वाइसेज (एक बढ़िया हाऊ टू यूजर गाइड है यह) भी करती है. इसलिए, यदि आप वाकई गंभीर हैं, तो पक्के अनामी बनने के लिए टॉर प्रोजेक्ट अपनाएँ. एक बार सेट  कर लेने के बाद इसका प्रयोग आसान है और इसका फायरफाक्स प्लगइन भी आता है.

टॉर कैसे काम करता है?

नीचे दिए चित्रों को देखें. एलिस बॉब को कोई ईमेल भेजना चाह रही है – पूरी तरह अनाम बनकर. बॉब – ब्लॉगर भी हो सकता है ईमेल के जरिए ब्लॉग प्रकाशित करने का माध्यम.

एलिस का कंप्यूटर वर्तमान में चल रहे उपलब्ध टॉर क्लाएंटों की सूची डिरेक्ट्री सर्वर से प्राप्त करता है.

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एलिस के  कंप्यूटर से भेजा गया डाटा टॉर क्लाएंट चल रहे कंप्यूटरों के एक बेतरतीब पथ को चुनता है और अपनी यात्रा पूरी करता है. और  यात्रा के दौरान इसका डाटा आखिरी पथ से पहले पूरी तरह एनक्रिप्टेड रहता है.

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एलिस द्वारा अगली दफा जब नेट पर कोई अन्य क्रिया कलाप किया जाता है तो फिर से एक नया बेतरतीब पथ चुना  जाता है. इससे आपके ब्राउजिंग पैटर्न, बिहैवियर इत्यादि का अंदाजा भी लगाना मुश्किल होता है.

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हालांकि टॉर का प्रयोग बेहद सुरक्षित है, फिर भी, ध्यान दें कि यह शत प्रतिशत अनामी की गारंटी नहीं देता. बेहद तेज उपकरणों और रीयल टाइम स्कैन के जरिए आपके बेतरतीब पथ को भी पकड़ा जा सकता है.

(चित्र – साभार टॉर प्रोजेक्ट. इस आलेख को तैयार करने में श्री बी एस पाबला को उनके अमूल्य तकनीकी सहयोग हेतु उन्हें हार्दिक धन्यवाद)

गूगल अनुवाद में उर्दू जुड़ गया है. और उर्दू – हिन्दी तो क्या कमाल का जुड़ा है. हालांकि अभी उर्दू बीटा है, मगर अभी से इसकी उपयोगिता झलक रही है. नीचे स्क्रीनशॉट पर नजर मारें -

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यह उर्दू में लिखे गए पेज का गूगल उर्दू-हिन्दी स्वचालित अनुवाद से लिया गया है! है न कमाल? कुछ समय से उर्दू से हिन्दी स्वचालित लिप्यंतरण और अनुवाद की कोशिशें जारी थीं, मगर उर्दू को संदर्भ के अनुसार लिखने व पढ़ने की दिक्कतों के कारण भले ही उर्दू बोलने में हिन्दी जैसा ही हो, लिप्यंतरण में भारी समस्याएँ थीं. अब गूगल ने अपने भारी भरकम डाटाबेस के जरिए इस समस्या को हल कर लिया है ऐसा लगता है. और, ये रही बीबीसी उर्दू के पाकिस्तान पृष्ठ का हिन्दी अनुवाद -

मूल उर्दू पेज -

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गूगल अनुवादित हिन्दी पेज-

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है न मजेदार? तो, चलिए, क्यों न अब उर्दू की दुनिया में टहल आएं…? और, अरे, ये तो उर्दू ट्विटर हिन्दी में क्या मस्त दिख रहा है-

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और, ये रही उर्दू ब्लॉगिस्तान में चमक करे उर्दू ब्लॉगरों की सूची – हिन्दी में!

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इस दफा आईपीएल ने वाकई बहुतों को निचोड़ा. धोनी तो खुले आम स्वीकारते हैं कि आईपीएल में खेल खेल कर भारतीय खिलाड़ी पूरे निचुड़ गए हैं इसीलिए विश्वकप में उनकी हार हो गई. आइए, देखें कि आईपीएल ने और किनको कितना निचोड़ा –

· सबसे पहले तो दर्शक निचुड़ा. बुद्धू बक्से के सामने फिक्स किए मैचों को वो पूरे दो महीनों तक बेवकूफ़ों की तरह घंटों निहारता रहा, तमाम कयास लगाता रहा, हर बॉल पर अपना दिल फ़ालतू में धड़काता रहा, सट्टे के दांव लगाता रहा और हारता रहा...

· मीडिया निचुड़ा – हर तरफ आईपीएल. चाहो तो और न चाहो तो. चर्चा करो, समाचार दो तो लोगों ने कहा – आईपीएल के अलावा और कुछ नहीं सूझता क्या? और समाचार न दो तो निचोड़ने लगे – इतने बड़े महत्वपूर्ण आयोजन को कवर नहीं करते – बेवकूफ हो क्या?

· पूर्व आईपीएल आयुक्त मोदी निचुड़ा – इस पर भी कोई प्रकाश डालने की जरूरत है क्या?

· थरूर और सुनंदा निचुड़े – इस पर भी प्रकाश डालना फजीहत नहीं होगी?

· आईपीएल ने भारत के न सिर्फ तमाम दीगर खेलों – राष्ट्रीय खेल हॉकी समेत – को निचोड़ डाला, बल्कि वन डे और टेस्ट मैचों को भी निचोड़ डाला!

.... और, इससे पहले कि आगे की सूची पढ़ते पढ़ते आपका दिमाग़ निचुड़ जाए, इसे यहीं बन्द करते हैं, और पढ़ते हैं एक व्यंज़ल

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किसने किसको निचोड़ा

सभी ने हमको निचोड़ा


वक्त की बात करते हो

वक्त ने सबको निचोड़ा


नीबुओं ने मिलकर यहाँ

मिर्च अदरक को निचोड़ा


प्यास बुझाने की खातिर

अपने पसीने को निचोड़ा


ये कैसे बता पाओगे रवि

किसने किसको निचोड़ा


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(समाचार कतरन – साभार दैनिक भास्कर)

गूगल ट्रांसलेट ने बिना किसी हो-हल्ला के 14 अप्रैल 2010 को बताया कि गूगल ट्रांसलेट में अब हिन्दी टैक्स्ट टू स्पीच भी उपलब्ध है -

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इसका क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि अब आप विश्व की 50 से अधिक (समर्थित) भाषाओं की सामग्री का ऑनलाइन आनंद गूगल ट्रांसलेट के जरिए सुनकर ले सकते हैं. हालांकि अभी अनुवाद कई मामलों में अपूर्ण, बेकार या उल्टा-सीधा होता है, मगर यदि छोटे-छोटे सरल से वाक्य लिए जाएँ, तो प्रायः अनुवाद से कथ्य को बखूबी समझा जा सकता है. और यही एक बड़ी उपलब्धि है. एक उदाहरण आपके सामने है -

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अभी यह सुविधा (हिंदी टैक्स्ट टू स्पीच) बक्से में टाइप करने पर (त्वरित अनुवाद सुविधा सक्षम करने पर) तथा छोटे-छोटे वाक्यों को कॉपी-पेस्ट करने पर मिल रही है. यदि आप पाठ बक्से में कॉपी-पेस्ट से लंबा चौड़ा पाठ भरेंगे तो यह सुविधा स्वचालित अक्षम हो जाती है. मशीनी आवाज बहुत कुछ मानवीय है और कर्णप्रिय है.

भविष्य में मशीनी अनुवादों के और भी त्रुटि रहित होने पर यह कमाल की सुविधा (यदि स्पीच टू टैक्स्ट और जोड़ दिया जाए तो और भी कमाल!) तमाम उपकरणों पर मौजूद रहेगी – तो आप तकनॉलाज़ी की संभावनाएँ देख सकते हैं – आपका चीनी भाषी दोस्त आपसे चीनी में बतियाता है और आप उसे मशीन के जरिए हिन्दी में सुनते हैं, आप हिन्दी में उत्तर देते हैं और वो उसे चीनी में सुनता है – दक्ष मशीनी इंटरप्रेटर के रूप में!

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वैसे भी, कहावत है ही – जर, जमीन और जोरू. जोरू याने नारी. सारे झगड़े की जड़ ये ही हैं. ये अगर दूर रहें, आदमी की जिंदगी से बहुत दूर रहें तो किसी तरह की समस्या ही न हो. महिलाएँ पुरूषों से दूर रहें तो फिर निरूपमा जैसे कांडों को सिरे से नकारा नहीं जा सकता?

क्यों न अब आदमीयत की सारी शक्ति इस बात पर लगा देनी चाहिए कि महिलाओं को पुरुषों से कैसे दूर कर दिया जाए. अब भले ही महिलाएँ माँ, बहन, बेटियाँ हों, बहुएँ, सास हों, मामी – चाची हों. इन्हें पुरुषों से दूर करना ही होगा. दफ़्तर हो या घर. मस्जिद हो या मंदिर क्या फर्क पड़ता है? वैसे भी, किसी धर्म स्थल और पब में आखिर क्या कोई अंतर होता है? वहाँ भी दर और दीवार होते हैं यहाँ भी. पब तो फिर भी ज्यादा सुसज्जित और लाइवली होता है – और शायद इसी वजह से कुछ समय पूर्व महिलाओं को पब से दूर रहने की सलाहें दी गईं थीं…

 

व्यंज़ल

कोई पास है कोई दूर है

वो पास रहकर भी दूर है


निरूपमा जैसी बेटियों की

दिल्ली अभी बहुत दूर है


आसमान तो मुट्ठी में है

मगर धरती क्यों दूर है


दूरी कदम भर की है पर

मंजिल क्यों बहुत दूर है


सबके के दिलों में है रवि

खुद से दूर, बहुत दूर है


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rough guide to blogging

चाहे आप नए नवेले हों या पुराने जमे हुए ब्लॉगर – यह किताब आपके लिए आवश्यक है – यह किताब – ‘द रफ गाइड टू ब्लॉगिंग’ का टैग लाइन है. और लगता है कि यह बात आंशिक रूप से सही भी है, क्योंकि छः सालों से ब्लॉगिंग में जमे होने और प्रोब्लॉगर और ब्लॉगर बस्टर जैसे ब्लॉगिंग टि्प्स प्रदान करने वाले ब्लॉगों के नियमित सब्सक्राइबर होने के बावजूद मैं मानता हूँ कि किताब से दो चार नई जानकारियाँ  मुझे भी मिलीं. कई मामलों में यह सदैव के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी उपयोगी है.

रफ गाइड सीरीज की यह पुस्तक जोनाथन यंग ने लिखी है. पुस्तक में बिना गूढ़ हुए, आसान सादे वाक्यों में रंगीन चित्रों समेत ब्लॉगिंग के फंडे बताए गए हैं. ब्लॉगिंग के हर क्षेत्र को समेटा गया है. ब्लॉग के इतिहास से लेकर आधुनिक माइक्रोब्लॉगिंग तक की चीजों को शामिल किया गया है.

किताब में ऑडियो वीडियो पॉडकास्ट से लेकर ब्लॉग डिजाइन और एड-ऑन की बातें तो हैं ही, लेखन के टिप्स और ट्रैफ़िक बढ़ाने के श्योरशॉट तरीके भी दिए गए हैं. ब्लॉग को मॉनीटाइज करने  - यानी ब्लॉग से कमाई करने तथा ब्लॉग को पूर्णकालिक आजीविका के रूप में अपनाने के लिए कुछ बेहतरीन टिप्स भी इसमें शामिल हैं.

ब्लॉगिंग एंड पॉलिटिक्स, ब्लॉगिंग एंड जर्नलिज्म, एजुकेशनल ब्लॉगिंग तथा ब्लॉगिंग बिजनेस नाम के कुछ दिलचस्प अध्याय भी हैं जो आपकी ब्लॉगिंग में नए आयाम जोड़ सकते हैं.

उदाहरण के लिए, पृष्ठ 117 में फैंटेसी ब्लॉगिंग के बारे में बताया गया है कि लोग-बाग किस तरह से किसी सेलेब्रिटी के नाम से छद्म ब्लॉगिंग करते हैं. अनाम ब्लॉगर सेलेब्रिटी का चोला ओढ़ कर मजेदार तरीके से ब्लॉग लिखते हैं, और इनके पढ़ने वाले भी बहुत होते हैं – उदाहरण के लिए एपल के सीईओ स्टीव जॉब्स का एक नकली ब्लॉग बेहद प्रसिद्ध रहा था. किसी ने तो ब्रिटनी स्पीयर्स के अजन्मे भ्रूण का ब्लॉग बना दिया और उसके अनुभवों को लिखने लगा (लगी?)!

किताब का आकार विशिष्ट है – डीवीडी डिस्क के कवर से थोड़ा बड़ा और थोड़ा मोटा. काग़ज बढ़िया क्वालिटी का है व छपाई रंगीन पृष्ठों पर उत्तम, चित्रों से भरपूर है जिससे पढ़ने-समझने में सुविधा होती है.

किताब  के आखिर में ब्लॉगरोल शीर्षक से कोई 30 पृष्ठों में चुनिंदा ब्लॉगों की विषयवार सूची दी गई है जो बेहद काम की है. ब्लॉगरोल की नीचे दी गई सूची के अनुसार,  ब्लॉगों के कुछ विषय आपको अचंभित भी करेंगे -

 

आर्ट ब्लॉग्स

ब्लॉग्स अबाउट ब्लॉग्स

ब्लॉग अवार्ड्स

बिजनेस ब्लॉग्स

कार ब्लॉग्स

सेलेब्रिटी ब्लॉग्स

डिजाइन ब्लॉग्स

फुड ब्लॉग्स

गे एंड लेस्बियन ब्लॉग्स

गॉसिप ब्लॉग्स

इनसाइडर ब्लॉग्स

निटिंग ब्लॉग्स

लॉ ब्लॉग्स

लिंक ब्लॉग्स

लिट्रेरी ब्लॉग्स

मेट्रो ब्लॉग्स

मिसलेनियस इंट्रेस्ट

ऑडिटीज

पर्सनल

पेट्स

फ़ोटोग्राफ़्स

पॉलिटिकल ब्लॉग्स

पंडित ब्लॉग्स

सेक्स ब्लॉग्स

स्पोर्ट्स ब्लॉग्स

टेक ब्लॉग्स

पर्सनल टेक ब्लॉग्स

ऑडियो/वीडियो ब्लॉग्स

वीडियो गेम्स ब्लॉग्स

वर्क / जॉब ब्लॉग्स

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ऊपर दी गई सूची में हिंदी ब्लॉग कहाँ ठहरता है? चंद विशिष्ट विषय – जैसे कि गे एंड लेस्बियन, पेट्स, डिजाइन इत्यादि को छोड़ दें तो प्राय: हर विषय पर एक-दो ब्लॉग तो मिल ही जाएंगे. वैसे, हिंदी में पर्सनल, लिट्रेरी ब्लॉग तो भरपूर हैं.

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द रफ गाइड टू ब्लॉगिंग

लेखक – जोनाथन यंग

प्रकाशक – रफ गाइड्स लि.

पृष्ठ - 200

मूल्य – $12.99 USD

आईएसबीएन नं. – 10: 1-84353-682-X

शायद आपकी नजरों में पहले भी आया हो, मगर मेरी नजर में पहली मर्तबा गूगल के मराठी विज्ञापन आए -

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वैसे इक्का दुक्का गुजराती विज्ञापन भी नजर आ चुके हैं. वैसे, गूगल के देवनागरी (हिन्दी ) में विज्ञापन का इतिहास बहुत पुराना है – नेट पर साल-दो-साल में तो कायापलट हो जाता है – इस लिहाज से. मुलाहिजा फरमाएँ आलोक के ब्लॉग का ये स्क्रीनशॉट -

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अभी फिर से गूगल के हिन्दी टैक्स्ट विज्ञापन यत्र तत्र नजर आने लगे हैं, मगर सुधार? लगता है मामला वहीं लटका है जहाँ से शुरू हुआ था – यह रहा आज वर्गपहेली पर प्रकट हुआ गूगल का हिन्दी विज्ञापन -

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लगता है कि गूगल को अपनी हिन्दी सुधारने में देर लगेगी. बहुत देर!

 

अंत में-

गूगल का एक और विज्ञापन -

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इससे लगता नहीं कि भारतीय बेहद धार्मिक होते हैं?

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भारत देश में एक ग़रीब आदमी रहता था. वह बड़ी बेसब्री से पहचान पत्र के लिए बाट जोह रहा था क्योंकि सब तरफ चर्चा चल रही थी कि कोई पहचान पत्र मिलने वाला है जिससे उसकी गरीबी देश में बाघों की तरह ग़ायब हो जाएगी.

अंतत: वो दिन आ ही गया जब एक दिन उसे पता चला कि पहचान पत्र बनाने के लिए सरकारी ऑफ़िस में आवेदन मिल रहा है और जिसे भर कर जमा करना होगा तभी पहचान पत्र मिलेगा. चूंकि उसे अपनी गरीबी दूर करने हेतु, अमीरों के समकक्ष खड़ा रहने हेतु किसी भी कीमत पर पहचान पत्र बनवाना था, अतः वो अपनी दिहाड़ी छोड़कर आवेदन लेने वाली लाइन में लग गया.

लाइन बहुत लंबी थी. उसका ओर छोर नहीं दिखाई दे रहा था. उसका नंबर आते आते शाम हो गई और दफ़्तर बंद होने का टाइम आ गया. इधर आजू-बाजू से बहुत से लोग ब्लैक में फ़ॉर्म बांट रहे थे. परंतु उसके पास ब्लैक में खरीदने लायक पैसा नहीं था, सो वह लाइन में ही लगा रहा. जैसे ही उसका नंबर आया, उस वक्त ठीक चार बजकर उनसठ मिनट और अट्ठावन सेकंड हो रहे थे. यह समय तो सरकारी दफ़्तर के बंद होने का होता है. बाबू ने उसके नाक के सामने यह कहकर फ़ॉर्म देने की खिड़की बंद कर दी कि ‘दफ़्तर बंद होने का समय क्या तुम्हें नहीं मालूम? फिर भी बुड़बक की तरह लाइन में खड़े हो?’.

वह दूसरे दिन जल्दी ही लाइन में लगने के लिए आ गया ताकि आज तो आवेदन पत्र मिल ही जाए. दिन भर धूप में वो लाइन में भूख प्यास भूलकर खड़ा रहा ताकि लाइन में उसकी जगह बनी रहे. ले देकर शाम होते होते उसे फार्म मिल ही गया. बारह पन्नों के फ़ार्म में पता नहीं क्या क्या पूछा गया था, उसे समझ नहीं आया. उसे पूरा भर कर जमा करवाने के पश्चात् जांच परख पूरी होने के पश्चात ही पहचान पत्र मिलेगा ऐसी बातें हो रही थी. उसने एक से पूछा – भइए, ये फ़ॉर्म को कैसे भरना है? मैं तो ग़रीब आदमी हूं, अंगूठा छाप, मैं कैसे भरूंगा? उसने बाजू में सड़क के परले किनारे नए नए बने कई गुमटियों की ओर इशारा किया – वहाँ चले जाओ. वो तुम्हारे जैसे लोगों के फ़ॉर्म भरवाने के लिए ही खुले हैं.

वो बड़ा खुशी खुशी वहाँ पहुंचा – अपना फ़ॉर्म भरवाने के लिए. बड़ी भीड़ लग रही थी – भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित जो है. और इसी वजह से नामालूम जैसे धंधे भी निकल आते हैं और पनपने लगते हैं. पर उस गरीब आदमी की खुशी थोड़ी ही देर में काफूर हो गई, जब उसे पता चला कि फ़ॉर्म भरवाने के अच्छे खासे पैसे लगेंगे.

वो ग़रीब आदमी दो दिन से वैसे ही दिहाड़ी पर नहीं गया था. उसके पास अच्छे क्या रद्दी पैसे भी नहीं थे. उसने सोचा कि चलो फ़ॉर्म तो मिल ही गया है, एक दो दिन मजूरी कर फ़ॉर्म भरवाने का पैसा जुटा लेंगे.

हफ़्ते भर की अतिरिक्त मजदूरी कर उस ग़रीब आदमी ने फ़ॉर्म भरवाने लायक पैसे जुटा लिए और अंतत: फ़ॉर्म भरवा ही लिया. अब बारी आई फ़ॉर्म को जमा करवाने की. उसके लिए एक अलग काउंटर था. वहाँ भी बड़ी भीड़ हो रही थी. लोग अपना फ़ॉर्म पहले जमा करवाने के चक्कर में पिले पड़ रहे थे. आजू बाजू में कई ब्लैकिये इशारों में फ़ॉर्म जमा करवाने की बातें कर रहे थे जो कई को समझ में तत्काल आ रहे थे तो उस ग़रीब आदमी जैसे लोग भी थे जो समझते हुए भी उन इशारों को अनदेखा कर रहे थे. वहाँ भी दिन भर की जद्दोजहद के बाद, और फ़ॉर्म में तीन गलतियाँ बताने और उसे सुधरवाने के बाद अंततः उस ग़रीब आदमी ने अपना फ़ॉर्म जमा कर ही दिया. उस रात वो बड़े आराम की और बड़ी गहरी निद्रा में सोया और सपने में उसने देखा कि वो लालू यादव, ललित मोदी और केतन देसाई के साथ गलबहियाँ डाले, गले में पहचान पत्र युक्त सोने की माला पहने, अपने प्राइवेट जेट में उड़ रहा है.

फ़ॉर्म जमा किए हुए दो हफ्ते गुजर गए. पहचान पत्र का कोई अता पता नहीं था. उसने ऑफ़िस में तलाश की तो बताया गया कि पहले ठोंक बजाकर जाँच परख होगी फिर पहचान पत्र मिलेगा. कोई ऐसे थोड़े ही न मिलेगा. आवेदकों के बारे में विभागीय कर्मचारियों, पुलिस – आईबी इत्यादि से पुख्ता जानकारी मिलने के बाद ही उन्हें पहचान पत्र मिलेगा. कोई डेढ़ महीने बाद पुलिस का कोई कांस्टेबल सुबह सुबह उसके घर आ धमका. उसने सोचा कि उससे या उसके घर वालों से क्या जुर्म हो गया है जो ये पुलिसिया घर पर आ धमका है.

‘क्यों रे, पहचान पत्र के लिए तूने फ़ॉर्म भरेला है?’ पुलिसिया ने रौब झाड़ा - मानों उसने फ़ॉर्म भर कर कोई अपराध कर दिया हो.

‘हाँ, हुजूर...’ ग़रीब के मुँह से ले देकर बोल छूटे – वह अपने आप को बिना कारण ही अपराधी मानने लग गया था.

‘मैं वेरीफ़िकेशन के लिए आया हूँ...’ पुलिसिये ने और गोल मोल बातें कीं, जो ग़रीब आदमी के समझ में नहीं आईं. आखिर पुलिसिये के सीधे-सीधे सही भाषा में उतर आने पर उसे पता चला कि ‘सरकारी वेरीफ़िकेशन’ के लिए उसे कई दिन की दिहाड़ी भेंट में चढ़ानी होगी. उसे तो पहचान पत्र चाहिए ही था – हर कीमत में – चलो, कुछ दिन और भूखे पेट मजूरी सही.

वेरीफ़िकेशन के बाद कई दिन गुजर गए. वो दफ़्तर के चक्कर लगाता रहा. कोई उसे सही जानकारी नहीं देता था. कोई कहता था कि बन रहे हैं. कोई कहता था कि बन कर आपके घर में सीधे रजिस्ट्री से पहुँच जाएगा. कोई कहता था कि भइए, कुछ भेंट पूजा चढ़ाओ, तभी पहचान पत्र मिलेगा. ऐसे ही नहीं मिल जाएगा. सब बना हुआ रखा है. जब तक भेंट पूजा नहीं चढ़ेगी कुछ नहीं होगा.

एक दिन उसके पते पर पहचान पत्र कार्यालय से एक पत्र आया जिसमें लिखा था कि अपनी पहचान बताकर कार्यालय से पहचान पत्र ले लें. वो खुशी खुशी कार्यालय पहुँचा. मगर उससे पूछा गया कि उसकी पहचान क्या है कि वो वही आदमी है जिसके लिए वो पहचान पत्र लेने आया है?

दफ़्तर में किसी ने जब उसे हवा नहीं दी तो एक बिचौलिये को उस पर दया आ गई. उसने उससे कहा कि वो आधी पहचान में उसका काम करा देगा – उसे पहचान पत्र दिलवा देगा. आधी पहचान? उस ग़रीब आदमी ने प्रश्न वाचक नेत्रों से बिचौलिये को देखा. भई, यहाँ की भेंट पूजा का एक रेट है. अब चूंकि तुम गरीब हो, और यहाँ के चक्कर लगा के थक गए हो – मैं तुम्हें रोज देखता आ रहा हूँ यहाँ, तो तुम्हारी मैं पहचान करवा देता हूं – आधे रेट पर और तुम्हें पहचान पत्र मिल जाएगा.

उस ग़रीब आदमी ने सोचा कि चलो अब सब मामला सुलट तो गया ही है, पहचान पत्र मिलने में भूखे पेट चार दिन की दिहाड़ी और सही.

अंततः वो दिन आ ही गया. बिचौलिये की कृपा से मामला आधे में ही निपट गया था. वो बड़ा खुश था. उसके हाथ में पहचान पत्र था. वो भी अमीर बन गया था. वो पहचान पत्र को अपने हाथों में कसकर पकड़ा हुआ था – अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा लग रहा था उसका नया यूनीक आई डी पहचान पत्र. उसका होलोग्राम कड़कती धूप में नौरंगे हीरे की तरह चमक रहा था. उसकी आँखें पहचान पत्र की चमक से चुंधिया रही थी.

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दूसरे दिन समाचार पत्रों में एक गुमनाम सी खबर छपी थी – कल दोपहर सरे चौराहे पर एक व्यक्ति गश खाकर गिर पडा और अस्पताल ले जाते समय उसकी मृत्यु हो गई. पोस्टमार्टम की रपट में भूख से मृत्यु बताया गया है, मगर सरकारी नुमाइंदों ने इस बात का खंडन किया है और इसकी जाँच कमेटी बिठाई है. उस व्यक्ति की अब तक पहचान नहीं हो सकी है. अलबत्ता मृतक के हाथ में एक नया पहचान पत्र बरामद हुआ है जिसमें सूरत किसी और की लगी हुई पाई गई है और पता किसी और का दर्ज है.

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