लिनक्स पॉकेट गाइड – लिनक्स आपकी जेब में : अध्याय 1

अध्याय 1

लिनक्स क्या है? (इतिहास, इसके फ़ायदे इत्यादि)

1.1 लिनक्स आखिर है क्या?

कम्प्यूटरों को चलाने के लिए, उसके विविध अवयवों में तारतम्य बिठाने के लिए, एक ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है. लिनक्स भी एक आधुनिक ऑपरेटिंग सिस्टम है. यह बहुत कुछ यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के समतुल्य है, और आमतौर पर लगभग इसके सारे कमांड यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के अनुरूप ही हैं.

1.2 यूनिक्स का इतिहास

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लिनक्स की लोकप्रियता को समझने के लिए हमें तीसेक साल पीछे लौटना होगा। उस वक़्त की कल्पना करनी होगी जब कंप्यूटर घर या स्टेडियम के आकार के होते थे। इन कंप्यूटरों के आकार के साथ तो घनघोर परेशानी थी ही। और भी बड़ी मुश्किल यह थी कि हर कंप्यूटर पर एक अलग ऑपरेटिंग सिस्टम होता था। सॉफ़्टवेयर अक्सर फ़रमाइशी होते थे और ज़रूरी नहीं कि एक तंत्र पर चलनेवाला सॉफ़्टवेयर किसी और पर चल जाए। यानी कि एक तंत्र पर काम करने का यह मतलब कतई नहीं था कि आप बाक़ी पर भी काम कर पाएँगे। यह प्रयोक्ताओं और प्रबंधकों दोनों के लिए सिरदर्द था।

तब कंप्यूटर काफ़ी महंगे भी थे और मूल ख़रीदारी कर लेने के बाद उसपर काम करना सीखने के लिए अच्छे-ख़ासे त्याग की ज़रुरत होती थी. सूचना प्रौद्योगिकी पर कुल लागत कमरतोड़ होती थी.

चूँकि तकनीकी विकास हुए नहीं थे इसलिए लोगों को भारी-भरकम और ख़र्चीली मशीन के साथ एक दशक और गुज़ारना पड़ा. 1969 में बेल लैब्स की प्रयोगशाला में डेवलपरों के एक दल ने सॉफ़्टवेयर की आपसी संवादहीनता के मसले पर काम करना शुरु किया। उन्होंने एक नए प्रचालन तंत्र का निर्माण किया जो:

  • सरल व सौम्य दोनों था
  • इसे असेंबली कोड में न लिखकर 'सी' प्रोग्रामिंग भाषा में लिखा गया
  • इसकी नक़ल संभव थी

बेल लैब्स के डेवेलपरों ने इस प्रोजेक्ट को 'यूनिक्स' कहकर पुकारा।

इसकी कोड-नक़ल तंत्र अहम इसलिए थी, क्योंकि तब तक तमाम व्यावसायिक प्रचालन तंत्र ख़ास तंत्र के ख़ास कोड में ही लिखे जाते थे. दूसरी ओर यूनिक्स को उस ख़ास कोड के एक छोटे से टुकड़े की ज़रुरत होती थी, जिसे आजकल सामान्यत: कर्नेल कहते हैं. यूनिक्स का आधार बनने वाले इस कर्नेल को हर कंप्यूटर तंत्र में थोड़ी फेर-बदल के साथ लगाया जा सकता था. प्रचालन तंत्र सहित सारी कार्य-प्रणालियाँ विकसित प्रोग्रामिंग भाषा यानी कि 'सी' में लिखित इस कर्नेल के इर्द-गिर्द बुनी गई थीं। यह भाषा ख़ास तौर पर यूनिक्स तंत्र के निर्माण के लिए रची गई थी. इस नई तकनीक का इस्तेमाल करके विभिन्न तरह के हार्डवेयर पर चलने वाले प्रचालन तंत्र का विकास करना ज़्यादा आसान हो गया। सॉफ़्टवेयर विक्रेताओं ने इसको फ़ौरन अपना लिया, क्योंकि अब वे बड़े आराम से दस गुना ज़्यादा बिक्री करने की स्थिति में थे। अजीबोग़रीब स्थितियाँ पैदा होने लगीं: अलग-अलग विक्रेताओं से ख़रीदे गए कंप्यूटर एक ही नेटवर्क में आपस में बातचीत करने लगे, या विभिन्न तरह की मशीनों पर काम करने वाले लोग बिना किसी अतिरिक्त शिक्षा के मशीनें अदल-बदल कर काम करने लगे।

अगले दो दशक भर यूनिक्स का विकास होता रहा. बहुत सारी चीज़ें संभव होती चली गईं और सॉफ़्टवेयर विक्रेताओं ने अपने उत्पादों में यूनिक्स के लिए नई चीज़ें जोड़ीं। यूनिक्स का एक संस्करण ‘एससीओ यूनिक्स’ एक प्रसिद्ध यूनिक्स ब्रांड बन गया.

शुरु में यूनिक्स विशालकाय माहौल में मेनफ़्रेम और मिनी-कंप्यूटर के साथ ही दीखते थे (ग़ौरतलब है कि पीसी या निजी कंप्यूटर तब "माइक्रो"-कंप्यूटर कहे जाते थे)। यूनिक्स को हाथ लगाने का मौक़ा किसी विश्वविद्यालय या किसी बड़े व्यावसायिक घराने में काम करनेवालों को ही मिल पाता था।

लेकिन छोटे कंप्यूटर भी बनने लगे थे और 80 के दशक के अंत तक कई लोगों के पास घरेलू कंप्यूटर आ गए थे। उस समय तक पीसी के लिए वैसे तो यूनिक्स के कई संस्करण मौजूद थे, लेकिन उनमें से कोई भी मुक्त नहीं था।

1.3 लिनक्स का जन्म

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लिनक्स के जन्म की कथा रोचक है. सन् 1991 में फ़िनलैंड में हेलसिंकी विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी – लिनुस टोरवाल्ड जो कि यूनिक्स के छोटे संस्करण मिनिक्स से प्रभावित थे, इसी तरह का एक छोटा, मुक्त ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना चाहते थे. उन्होंने एक समाचार समूह को अपना यह संदेश भेजा जो बाद में बेहद मशहूर हुआ –

सभी मिनिक्स प्रयोक्ताओं को मेरा नमस्कार. मैं 386/(486) एटी के लिए एक (मुक्त) ऑपरेटिंग सिस्टम (सिर्फ़ शौकिया, और ये न तो विशाल होगा और न ही ग्नू जैसा व्यवसायिक) बना रहा हूँ. इस पर मैं वैसे तो अप्रैल से काम कर रहा हूँ, पर ये अभी अभी कुछ काम लायक बन पाया है. मैं हर क़िस्म के फ़ीडबैक का स्वागत करूँगा कि आप मिनिक्स क्योंकि मेरा ऑपरेटिंग सिस्टम उसी के जैसा है (फ़ाइल तंत्र के वैसे ही भौतिक खाका जैसे (प्रायोगिक कारणों की खातिर) ) जैसे इस सिस्टम में और कौन से फ़ीचर पसंद करना चाहेंगे. मैंने इस पर बाश और जीसीसी चलाया है, और यह बढ़िया चलता दिखाई दे रहा है. तमाम सुझावों का स्वागत है, हालाँकि मैं ये वादा नहीं करता कि मैं सारी मांगें पूरी कर सकूँगा.

-लिनुस टोरवाल्ड

पुनश्च : और, यह निःशुल्क है, इसमें मल्टीथ्रेडेड फ़ाइल सिस्टम है. यह उतना छोटा भी नहीं है जिससे यह संभवत: एटी सिस्टम से कम पर नहीं चलेगा. अभी बस इतना ही.

उन्होंने समूह पर ओपन सोर्स के तहत इसका कोड भी उपलब्ध कर दिया. देखते ही देखते कम्प्यूटर प्रयोक्ताओं तथा डेवलपरों ने इस नए ऑपरेटिंग सिस्टम में रूचि लेनी शुरु कर दी और इसके नित्य नए संस्करण निकलने लगे, इसमें बग (दोष) सुधार होने लगे. शीघ्र ही लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम एक परिपूर्ण ऑपरेटिंग सिस्टम बन गया जो हर मामने में ठोस है. अनुमान किया जाता है कि इंटरनेट पर सर्वरों का अधिकांश हिस्सा लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम पर निर्भर है.

लिनक्स का प्रतीक चिह्न पेंगुइन है. एक छोटा सा प्यारा सा पेंगुइन. इस प्रतीक के चुने जाने के बारे में भी कई रोचक कहानियाँ प्रचलित हैं. एक कहानी ये है कि एक प्रवास के दौरान एक पेंगुइन ने लिनुस को चोंच मार दिया था.

वैसे, स्वयं लिनुस टोरवाल्ड ने इस प्यारे पेंगुइन प्रतीक को अपनाने के बारे में अपने तर्क दिए हैं कि विंडोज़ जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रतीक चिह्न सिर्फ़ प्रतीक चिह्न भर हैं. जबकि लिनक्स का प्रतीक चिह्न जीवंत है, और आप लिनक्स प्रतीक को विविध आयामों में – मसलन किसी कम्प्यूटर पर काम करते हुए, या किसी आंदोलन का झंडा उठाए हुए भी दिखा सकते हैं.

1.4 क्या लिनक्स कठिन है?

बिलकुल नहीं. आधुनिक लिनक्स वितरण जैसे कि उबुन्टु, न सिर्फ़ विंडोज़ जैसे ही सरल हैं, बल्कि लिनक्स के ऐसे लाइव संस्करणों को उन्नत कम्प्यूटरों पर सीधे ही सीडी/डीवीडी से बिना इंस्टॉल किए, उनकी पूरी विशेषताओं के साथ चलाया जा सकता है.

1.5 लिनक्स में क्या है?

लिनक्स में क्या कुछ नहीं है? लिनक्स में सब कुछ है. प्रोग्रामिंग से लेकर वर्ड प्रोसेसिंग और एकाउंटिंग तक सबकुछ. और इनमें से अधिकांश मुफ़्त और मुक्त. कोई अच्छा प्रोग्रामर जिस भी चीज़ की इच्छा रख सकता है, वह सभी यहाँ है - कम्पाइलर, लाइब्रेरियाँ, विकास व डिबगिंग के उपकरण। ये पैकेज हरेक मानक लिनक्स वितरण के साथ आते हैं। सी कम्पाइलर निःशुल्क मिलता है, सभी प्रलेखन व दस्तावेज़ भी हैं, और तुरत फुरत शुरुआत करने के लिए उदाहरण भी मौजूद रहते हैं। चलने-चलाने में यह यूनिक्स जैसा ही लगता है, और यूनिक्स से लिनक्स की ओर जाना बहुत ही सरल है। इसके प्रसिद्ध व प्रचलित विंडो मैनेजरों – गनोम व केडीई के ज़रिए लिनक्स का अनुभव विंडोज़ जैसा ही होता है और कुछ मामलों में इसमें अंतर्निर्मित अतिरिक्त सुविधाएँ हासिल होती हैं.

लिनक्स के शुरुआती दौर में, तंत्र का इस्तेमाल शुरू करने के लिए विशेषज्ञ होना तो लगभग लाज़िमी ही था। जिन लोगों ने लिनक्स पर महारत हासिल कर ली थी वे अपने आपको बाक़ी "users" – (सामान्य उपयोक्ताओं) से बेहतर मानते थे। नौसिखुओं को "RTFM" (बेटा पहले मैनुअल तो पढ़) कह के हड़काना आम बात थी। मैनुअल तो हर तंत्र में थे, लेकिन उन्हें ढूँढना कठिन काम था, और यदि वे मिल भी गए, तो वे इतने क्लिष्ट होते थे कि नए प्रयोक्ता सीखने के प्रति बिल्कुल हतोत्साहित हो जाते थे। मगर अब परिस्थितियाँ ऐसी नहीं रहीं. यदि आपमें सीखने का माद्दा है, नई चीज़ों, नई तकनालॉजी के प्रति आकर्षित होते हैं तो लिनक्स को अब आप सामान्य प्रयास से न सिर्फ़ जल्द ही सीख सकते हैं, बल्कि उसमें महारत हासिल कर सकते हैं.

1.6 लिनक्स का भविष्य

लिनक्स का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है. बड़े, विशाल मेन-फ्रेमों से लेकर लघु नेटटॉप और यहाँ तक कि मोबाइल उपकरणों – यानी हर संभव क्षेत्र में लिनक्स बख़ूबी चल रहा है. बहुत संभव है कि जो मोबाइल उपकरण अभी आपके हाथ में हो उसमें लिनक्स का कोई अंतर्निर्मित संस्करण हो या फिर आपने अभी अभी जो ईमेल भेजा था, उसका सर्वर लिनक्स पर होस्ट हो. इसके उज्ज्वल भविष्य के पीछे इसका मुक्त स्रोत होना है.

1.7 मुक्त स्रोत

मुक्त स्रोत के पीछे ख़याल बहुत सीधा सा है: यदि प्रोग्रामर कूट को पढ़ सकें, वितरित कर सकें व अपने हिसाब से उसमें फेर बदल कर सकें, तो वह कूट परिपक्व हो जाता है। लोग उसे कई तरीके से ढाल सकते हैं, ठीक कर सकते हैं, त्रुटियाँ निकाल सकते हैं, और यह सब पारम्परिक कम्पनियों के प्रोग्राम निर्माताओं के मुकाबले काफ़ी जल्दी किया जा सकता है। ऐसे मुक्त प्रोग्राम, पारम्परिक विधियों से बने प्रोग्रामों से ज़्यादा लचीले होंगे क्योंकि इसका परीक्षण बहुत से लोग, ढेरों क़िस्म के वातावरणों करते हैं. इतना घना परीक्षण अमुक्त स्रोत के निर्माता नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनके साधन सीमित होते हैं।

मुक्त स्रोत तंत्र की देखा-देखी, व्यावसायिक दुनिया को भी यह बात समझ आने लगी। व्यावसायिक उपक्रमों को भी शीघ्र ही समझ में आ गया कि वे मुक्त स्रोत की मदद से मुनाफ़ा भी कमा सकते हैं। पहले लिनक्स केवल अध्ययन के लिए तंत्र मात्र था जिसका लाभ केवल तकनीकी लोग ही उठा पाते थे, पर अब वह उस स्तर के उपर उठ चुका है। अब लिनक्स प्रचालन तंत्र के अलावा और भी बहुत कुछ प्रदान करता है: अब, प्रचालन तंत्र बनाने, उस तंत्र के लिए प्रोग्राम बनाने व परीक्षित करने, सब कुछ प्रयोक्ताओं तक लाने, मरम्मत करने, बदलाव व ख़ासमखा़स चीज़ें करने आदि के लिए अच्छा ख़ासा ढाँचा बन चुका है। आज के तेज़ी से बदलने वाले विश्व के लिए लिनक्स बिल्कुल तैयार है।

1.8 लिनक्स के फ़ायदे –

लिनक्स में यूनिक्स की तरह का ठोस, परिपक्व ऑपरेटिंग सिस्टम जैसा फ़ायदा तो मिलता ही है, इसके बहुत से अन्य अनगिनत फ़ायदे हैं. मसलन –

1.8.1 यह निःशुल्क है – यानी मुफ़्त और मुक्त है:

लिनक्स मुफ़्त है - जैसे कि फोकट की चाय। यदि आप कुछ भी ख़र्च नहीं करना चाहते हैं, तो आपको अंटी से एक धेला भी ख़र्च करना नहीं पड़ेगा। लिनक्स अन्तर्जाल से बिल्कुल निःशुल्क और पूर्ण रूप से उतारा जा सकता है। कोई पंजीकरण शुल्क नहीं, कोई प्रति प्रयोक्ता शुल्क नहीं, निःशुल्क परिवर्तन, और यदि आप अपनी तंत्र का बर्ताव बदलना चाहें तो इसके तमाम स्रोत भी निःशुल्क हैं।

इससे भी अधिक ज़रूरी यह है कि लिनक्स स्वतन्त्र है, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की तरह.

आम तौर पर इसके लिए ग्नू सार्वजनिक लाइसेंस का प्रयोग होता है (जीपीएल)। इस लाइसेंस के अनुसार, जो भी चाहे लिनक्स को बदल सकता है, और बदल के वितरित भी कर सकता है, केवल इस शर्त पर कि पुनर्वितरण के बाद भी उसका कूट उपलब्ध रहे। उदाहरण के लिए, आप लिनक्स बीज - यानि कर्नल - की एक छवि ले के अपना भू स्थानान्तरण या समयभ्रमण यन्त्र उसमें शामिल कर सकते हैं, और नया कूट बेच सकते हैं, बशर्ते कि आपके ग्राहकों को भी उसी कूट की प्रति प्रदान की जा रही हो।

1.8.2. यह पूरी तरह पोर्टेबल है –

यानी आप इसे लाइव सीडी या यूएसबी से भी अपने कम्प्यूटर पर बग़ैर इंस्टॉल किए भी इसके संपूर्ण विशेषताओं का उपयोग करते हुए चला सकते हैं. यह डेस्कटॉप के रूप में भी चलता है तो सर्वर के रूप में इसका कोई सानी नहीं है. इसी तरह यह हर आर्किटेक्चर पर चलता है – चाहे वह 32 बिट के 386 हार्डवेयर हों, अत्याधुनिक 64 बिट हार्डवेयर हों, या एप्पल या पावरपीसी. यहाँ तक कि मोबाइल उपकरणों तथा अन्य एम्बेडेड उपकरणों में भी यह धड़ल्ले से चलता है. दो एमबी के पामटॉप से ले कर सैकड़ों पाइंट वाले पेटाबाइट रक्षण क्लस्टर तक में वांछित अनुप्रयोग जोड़िए या हटाइए, और लिनक्स सब में काम करेगा। आपको सुपरकम्प्यूटर की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि लिनक्स द्वारा प्रदत्त छोटे छोटे टुकड़ों को जोड़ के आप बड़ी चीज़ें बना सकते हैं। यदि आप छोटी चीज़ें बनाना चाहते हैं, जैसे कि किसी एम्बेडेड प्रॉसेसर के लिए प्रचालन तंत्र बनाना, या फिर अपने पुराने 486 पर कुछ करना, तो लिनक्स वह सब भी कर देगा।

यदि कोई विक्रेता कोई नए प्रकार का कम्प्यूटर बेचना चाहता है, लेकिन उसे पता न हो कि उस यन्त्र पर कौन सी प्रचालन तंत्र चलेगी (जैसे कि आपकी कार या वॉशिंग मशीन का सीपीयू), तो वह लिनक्स कर्नल ले के अपने मशीन पर स्थापित कर सकता है, क्योंकि इसकी विधि व सम्बन्धित दस्तावेज़ मुक्त रूप से उपलब्ध हैं।

1.8.3 यह अत्यंत सुरक्षित है –

लिनक्स में प्रयुक्त सुरक्षा तंत्र यूनिक्स की सुरक्षा तंत्र पर आधारित है, जो कि सशक्त और प्रख्यात है। लेकिन लिनक्स केवल अन्तर्जाल पर मौजूद आक्रमणकारियों से बचने के लिए ही नहीं, अन्य स्थितियों में भी सुरक्षा के उच्च स्तरों के लिए जाना जाता है। विविध अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि लिनक्स तंत्र के कुछ वितरण अत्यंत सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टमों की अग्रिम पंक्ति में आते हैं. अभी तक लिनक्स तंत्र अपनी बुनियादी सुरक्षित ढांचे के फलस्वरूप किसी भी बड़े वायरस हमले से बचा हुआ है. एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि लिनक्स कंप्यूटर बिना वायरस से संक्रमित हुए, वह भी बिना एंटीवायरस इंस्टॉल किए हुए सालों साल इंटरनेट पर कनेक्टेड सुरक्षित चलते रहते हैं, जबकि एक अन्य बहु प्रचलित ऑपरेटिंग सिस्टम के कुछ संस्करण यदि बग़ैर एंटीवायरस के इंटरनेट पर चलाए जाते हैं तो आधे घंटे के भीतर ही उसमें वायरस घुस जाते हैं.

1.8.4 अबाधित निरंतर चलाया जा सकता है –

यूनिक्स की ही तरह, लिनक्स तंत्र को बार-बार बन्द कर के शुरू करने की ज़रूरत के बग़ैर प्रयोग किया जा सकता है। इसीलिए कई कार्य रात में किए जाते हैं, या फिर स्वतः ही ख़ाली समय में करने के मक़सद से संस्थापित किए जाते हैं, ताकि व्यस्त समयों में अधिक उपलब्धता हो, और कम्प्यूटरों का लगातार समान प्रयोग हो। इस प्रकार लिनक्स ऐसे वातावरणों में भी काम आ सकता है जहाँ दिन-रात तंत्र को नियन्त्रित करने के लिए लोगों के पास समय न हो। कुछ लिनक्स कंप्यूटर कई वर्षों से बिना क्रैश हुए और बिना रीबूट किए लगातार चल रहे हैं.

1.8.5 खराबी जल्द दूर हो जाती है –

लिनक्स का विकास व परीक्षण हज़ारों लोग एक साथ करते रहते हैं, अतः त्रुटियों की खोज व उनकी मरम्मत, दोनो ही काफ़ी जल्दी हो जाती हैं। अक्सर तो ऐसा होता है कि त्रुटि को खोजने और उसे ठीक करने के बीच बस घंटे दो घंटे का ही अन्तराल रहता है।

1.9 लिनक्स की कमियाँ
1.9.1 बहुतेरे निर्माता और बहुतेरे वितरण -

"जितने लोग, उतनी बातें"। इसी तर्ज पर आपको ढेरों लिनक्स मिल जाएंगे. भारतीय भाषाई बॉस लिनक्स है तो प्रसिद्ध रेडहैट भी. मंड्रिवा, सूसे, डेबियन, जेंटू इत्यादि न जाने कितने लिनक्स के प्रकार हैं. ऊपर से, लिनक्स के ईसाई-मुसलिम एडीशन भी हैं. आप भी अपना लिनक्स वितरण चुटकियों में बना सकते हैं. इस तरह से तो पहली नज़र में लिनक्स वितरणों की संख्या ख़ौफ़नाक या हास्यास्पद लग सकती है, पर यह आपके नज़रिए पर निर्भर करता है। इसका मतलब यह भी है कि हर किसी को अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहिए मिल जाएगा। उपयुक्त वितरण खोजने के लिए आपको विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है।

पूछे जाने पर आमतौर पर हरेक लिनक्स प्रयोक्ता यही कहेगा कि उसका वाला वितरण ही सबसे अच्छा है। तो फिर, आपको कौन सा चुनना चाहिए? इसके बारे में ज़्यादा चिन्ता न करें: सभी वितरणों में घूम फिर कर लगभग वही मूल अनुप्रयोग रहते हैं। कुछ विशिष्ट वितरणों में कुछ विशिष्ट अनुप्रयोग डाले जाते हैं, उदाहरण के लिए, टर्बोलिनक्स लघु व मध्यम आकार के उद्योगों के लिए अधिक उपयुक्त है, रेडहैट व सूसे निजी प्रयोक्ताओं के लिए बेहतर हैं। लेकिन ये फ़र्क बहुत थोड़े से ही होंगे। इसके लिए अच्छा होगा कि आप एक दो वितरणों को परीक्षित करें, और अपने लिए कोई पसंद करें. लेकिन दुर्भाग्य से सबके पास इतना समय नहीं है। लेकिन, इस बारे में आपको कई जगह सलाहें मिल जाएगी। इनमें से एक है लिनक्सजर्नल, जो कि अन्य चीज़ों के अलावा सिस्टम व सहायता के बारे में चर्चा करता है। यदि आप भारतीय भाषाओं में काम करना चाहते हैं तो आपके लिए विशिष्ट भारतीय भाषाई संस्करण बॉस लिनक्स ज़्यादा मुफ़ीद रहेगा. सामान्य प्रयोगों व जल्द सीखने के लिहाज से उबुन्टु लिनक्स भी एक उत्तम विकल्प होगा.

1.9.2 कॉन्फ़िगर करने में कठिनाई –

लिनक्स पर प्रोग्रामों को चलाना तो बहुत ही आसान हो चुका है. मगर अभी भी कुछ मूलभूत कॉन्फ़िगरेशन तथा उपकरणों को चलाने की सेटिंग इत्यादि करने में थोड़ी सी मशक्कत करनी होती है, और ये विंडोज़ जैसे आसान नहीं होते हैं. परंतु परिस्थितियों में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं और इसकी लोकप्रियता को मद्देनज़र रखते हुए, लिनक्स को सरल बनाने के लिए काफ़ी प्रयास किया गया है, ख़ासतौर पर नए प्रयोक्ताओं के लिए। हर दिन नई जानकारियाँ परोसी जा रही हैं, जैसे कि ये गाइड भी, ताकि सभी स्तरों के प्रयोक्ताओं के लिए गाइड उपलब्ध हो।

1.9.3 मुक्त स्रोत उत्पाद की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न –

भला फोकट में मिली चीज़ विश्वसनीय कैसे हो सकती है? लिनक्स के प्रयोक्ताओं के पास विकल्प है, कि वे लिनक्स का प्रयोग करें या नहीं, और इस तरह वे एक कदम आगे ही हैं। परीक्षणों के उपरांत अधिकतर लिनक्स प्रयोक्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि लिनक्स पारम्परिक समाधानों के बराबर तक ही नहीं, बल्कि कई मामलों में उनसे बेहतर व अधिक फ़ुर्तीला भी है। यदि लिनक्स विश्वसनीय नहीं होता तो कब का खत्म हो चुका होता, बजाय लाखों लोगों में लोकप्रिय होने के। इंटरनेट व नेटवर्क पर लिनक्स सर्वरों का बोलबाला है. लिनक्स ऐसी परियोजना बन चुकी है जो कभी खत्म नहीं होगी, लेकिन चलायमान वातावरण में इसमें चहुंओर उत्तरोत्तर विकास होता रहेगा।

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यूनिक्स तो बहुत ही कठिन था.. इस की कमान्ड को रटना और फिर ऊपर से लम्बी लम्बी कमान्ड जो कान्फिगर करने के समय सबसे अधिक परेशान करती हैं.. लेकिन शायद सबसे अधिक सुरक्षित भी है और अभी भी है..

क्या यह श्रृंखला आगे जारी रहने वाली है?

अभी गाइड पढ़ना शुरू किया पीडीएफ़ में…'जबकि एक अन्य बहु प्रचलित ऑपरेटिंग सिस्टम के कुछ संस्करण यदि बग़ैर एंटीवायरस के इंटरनेट पर चलाए जाते हैं तो आधे घंटे के भीतर ही उसमें वायरस घुस जाते हैं.'…साफ नहीं कह रहे…

वाक्य में कहीं पूर्ण विराम के लिए पाई और कहीं बिन्दु…

पीडीएफ़ में लीनक्सजर्नल का लिंक काम नहीं कर रहा।

पाठ जस्टिफ़ाइड नहीं हैं। वैसे किताब बहुत बढिया है।

छठे अध्याय में आपने लिखा है लीनक्स में खूबी है कि किसी फ़ाइल या डिरेक्ट्री को अलग-अलग प्रयोक्ताओं के लिए पहुँच के आधार बदल सकते हैं। यह तो विन्डोज में भी है। 2009 में यूनिक्स पढ़ने को मिला था। तब उबुन्टु पर कुछ काम किया था और बहुत सारे कमान्ड याद थे लेकिन अब याद नहीं रहे। दृश्य-श्रव्य के लिए और साथ ही उन बीसियों सापटवेयरों के लिए जो हम प्रयोग करते आ रहे हैं, लिनक्स या उबुन्टु में आसानी से विकल्प नहीं मिलते। विन्डोज में चलने के लिए ऐसे बहुत सारे साफ्टवेयर हैं, जो लिनक्स आदि के लिए नहीं हैं। अब उनको कैसे इस्तेमाल करेंगे?…बहुत कम के ही दोनों विकल्प मौजूद हैं। फिर भी आगे पढ़ रहा हूँ। अधिकांश बातों से परिचित था। लेकिन लीनक्स के संस्करणों पर आपका लिखा जानकारीपूर्ण लगा। हमें पता नहीं था। बस नाम सुना था कई का। वैसे इन सबमें सरकार और विश्वविद्यालय भी तो बहुत दोषी हैं जो लीनक्स पर कुछ पढ़ाते ही नहीं या फिर अत्यन्त कम पढ़ाते हैं।

ब्रासेरो में मल्टीसेशन नहीं है? नेरो में होता है।

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