टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

देश तो साला जैसे सुबह का अख़बार हो गया

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व्यंज़ल


देश तो साला जैसे सुबह का अख़बार हो गया
वो तो एक नॉवेल था कैसे अख़बार हो गया

तमाम जनता ने लगा लिए हैं मुँह पे भोंपू
मेरा शहर यारों कुछ ऐसे अख़बार हो गया

दुश्वारियाँ मुझपे कुछ ऐसी गुजरीं कि मैं
एक कॉलम सेंटीमीटर का अख़बार हो गया

लोगों ने कर डाली हैं विवेचनाएँ इतनी कि
धर्म तो बीते कल का रद्दी अख़बार हो गया

बहुत गुमाँ था अपने आप पे यारों रवि को
जाने क्या हुआ कि वो बस अख़बार हो गया

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(समाचार कतरना – साभार – अदालत ब्लॉग)

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बहुत बढ़िया साहब

बहुत ही मारक लगा..........
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

waah lajawaab rachna...

बहुत ही सही निर्णय । अखबार पढ़ने से अच्छा है कि कुछ न पढ़ें ।

सच कहा आपने और सुप्रीम कोर्ट ने

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