आओ यारों, सीटी बजाएँ

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ये तो सरासर सिनेमा के दर्शकों, छोकरों, मनचलों का अपमान है. उनकी तुलना सीटी बजाते सांसदों से की जा रही है. सिनेमा हॉल और सड़क-चौराहे के साथ संसद की तुलना बेमानी है, अत्याचार है. सीटी बजाते सिनेमा के दर्शक, या किसी हसीन कन्या को देख कर सीटी बजाते मनचले छोकरे किसी सूरत सीटी बजाते सांसदों के समतुल्य नहीं हो सकते. सांसद तो जूतम-पैजार, सीट-फेंक, माइक उखाड़, गाली गलौज, हाथा-पाई इत्यादि इत्यादि के लिए जाने जाते हैं. जबकि सीटी बजाते सिनेमा के दर्शक या मनचले लड़के मासूम किस्म के होते हैं जो दरअसल सिनेमा के किसी हसीन दृश्य की प्रशंसा स्वरूप – मसलन माधुरी के ठुमके को देख कर सीटी बजाते हैं. संसद में सीटी नहीं सीटों का गणित बजता है, और यदि सीटी बजती भी है तो मार्शलों की. और आगे कभी सीटी बजाने की प्रक्रिया सांसदों द्वारा की जाने लगे तो वो हसीन दृश्यों के प्रतिक्रिया स्वरूप नहीं, बल्कि औचित्यहीन विरोध, घोर विरोध और एक दूसरे को नीचा दिखाने के फल स्वरूप होगी. सांसदों में अधिसंख्य हिस्ट्रीशीटर, करोड़-पति मिल जाएंगे. सीटी बजाते दर्शक-लड़के तो रोड छाप रोमियो ही होते हैं. अब आप बताएँ कहाँ हिस्ट्री शीटर और कहाँ रोड छाप रोमियो! लगता है कि रोड छाप रोमियो का मौलिक अधिकार  और उनकी मोनोपोली – सड़कों पर, और सिनेमा हॉलों में सीटी बजाने पर जल्द ही रोक लगेगी. संविधान संशोधन होगा, नया क़ानून बनेगा. सीटी बजाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ महामहिम सांसदों का होगा.

 

वैसे दूसरे एंगल से सोचा जाए तो ठीक भी है. सांसदों को सीटी बजाने की प्रैक्टिस करनी होगी. बहुतों को सीटी बजाना नहीं आता, उन्हें सीखना होगा. सीटी बजाने की प्रक्रिया स्वास्थ्य वर्धक है. फेफड़ों से तमाम शक्ति लगाकर हवा बाहर निकलती है, तभी सीटी बजती है. तो एक तरह से बाबा रामदेव का कपालभाती योग हो जाता है. इससे सांसदों का स्वास्थ्य थोड़ा ठीक रहेगा और वे देश के स्वास्थ्य की भी थोड़ी चिंता कर लेंगे. सीटी बजाते रहने से उनका स्वास्थ्य ठीक होगा तो उनके पेट का घेरा कम होगा नतीजतन वे राष्ट्र का हिस्सा थोड़ा कम खाएंगे.

तो, जब तक अभी हमें सीटी बजाने की स्वतंत्रता हासिल है, आओ यारों, इस ख़ास मौके पर सीटी बजाएँ!

 

व्यंज़ल

आओ यारों कुछ कर दिखाएँ

संसद में चलके सीटी बजाएँ


सभी तो लूट रहे हैं मुल्क को

क्यों न हम भी हाथ हिलाएँ


नए मेनिफेस्टो में जनता को

नए नए सब्जबाग़ दिखाएँ


हाथी नुमा नई पार्टी बनाके

चलो प्रदेश की अरथी उठाएँ


बिगुल बहुत बजा लिया रवि

अब तो चैन की बंसी बजाएँ

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(समाचार कतरन – खासखबर.कॉम से साभार)

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behtreen lekh
maza aa gaya jii

संसद में सीटी नहीं सीटों का गणित बजता है.. बड़ा मारक लिख दिया जी. वैसे सीटों के लिए ही सीटी याद आयी है.

वाह वाह! बहुत मजेदार

ye cartoon bahut achhe lagte hain .......

ये तो सरासर सिनेमा के दर्शकों, छोकरों, मनचलों का अपमान है.

सच है, कोई सांसद होकर आमजनों का अधिकार नहीं छीन सकता ।

आपको यार पढ़े बिना तो रह नहीं पाता पर टिप्पणी नहीं करता की आपको उसकी जरूरत ही नहीं है.हाँ मजबूर होने पर मन नहीं मानता . तो.........
अपने सूकरों से कभी ये भी कहलवा देना की ..........

चाहे ना हो भले,
दीर्घा तले
तुम संसद में .........
सीटी बजाना छोड़ दो .

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