टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

जॉनी तुम यूँ निकला न करो बन ठन के, न जाने किस गली तुम्हें लूट लिया जाए.

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एक शेर पेश है -
रात में सड़क पे निकलना मना है मेरे देश में यारों ,
न जाने किस अंधे मोड़ पे मौत से भिड़ंत हो जाए.

यह शेर मेरा नहीं है, और न ही किसी मंजे हुए शायर का. यह शेर तो हमारे प्रदेश के मुख्य-मंत्री महोदय का है. वे अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को यह सुझाव दे रहे हैं. और, हो सकता है ऐसी सलाह कल को वे तमाम जनता को दें. अभी तो वे मंत्रियों को कह रहे हैं कि भई, रात-बेरात बाहर सड़क पर न निकलो. तुम्हारे जान-माल का खतरा है. मंत्री वैसे भी जनता जनार्दन से ऊंचे दर्जे के होते हैं, तो उनकी चिंता खास रखनी ही होगी. तो, यदि मंत्रियों को रात-बेरात बाहर जाना हो तो? सड़क मार्ग नहीं, वायुमार्ग का प्रयोग करें. मंत्री बन गए हैं, पर इतना भी नहीं जानते! और जब जनता जनार्दन हो हल्ला मचाने लगेगी तो? चुनावों के समय वोटों का भय दिखाएगी तब? तब उन्हें जनता को भी ऐसी हिदायतें देने में देर नहीं लगेगी. जनता को तैयार रहना चाहिए, ऐसी किसी भी मुश्किल का सामना करने के लिए.
मगर, फिर, रात में ही क्यों? दिन में सड़क में निकलना क्या सुरक्षित है? जनता के लिए तो रात और दिन बराबर हैं. रात में अंधेरी, गड्ढेदार सड़कें आपकी जान की आफत हैं तो दिन में भीड़भाड़, ट्रैफ़िक जाम और बीच सड़क पर ट्रैफ़िक वसूली. जनता तो ख़ैर भुगतने के लिए ही है, मगर मंत्रियों के लिए ज्यादा अच्छा नहीं होता कि तिथि और समय निश्चित कर दिया जाए कि इस नियत तिथि को ही बाहर निकलें, अन्यथा नहीं. फिर उस तिथि और समय पर बढ़िया चाक चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था के साथ सड़कों के गड्ढे इत्यादि पाट कर चकाचक कर दिया जाए ताकि कोई समस्या न रहे, कोई खतरा न रहे – जैसे कि वीवीआईपी के लिए होता है?

एक और शेर -
जॉनी तुम यूँ निकला न करो बन ठन के,
न जाने किस गली तुम्हें लूट लिया जाए.

ये शेर भी मेरा नहीं है, और न ही किसी उस्ताद शायर का. ये जबरदस्त शेर ऑस्ट्रेलिया के मंत्री महोदय का है. अभी कुछ दिन पहले ऑस्ट्रेलिया के मंत्री महोदय ने वहाँ के प्रवासी भारतीय जनता को सलाह दी थी कि वे भिखारियों की तरह के कपड़े पहन कर बाहर निकलें, अमीरों की तरह नहीं, ताकि उन पर जातीय और नस्ली प्रहार न हों. उन्हें ये भी हिदायतें दी गई थीं कि आभूषण पहन कर न निकलें, अपने महंगे आई-फोन को दिखाते हुए बात न करें और न ही गाने सुनें. सारी हिदायतें मानवीय गुणों, मानवीय स्वभाव के विरूद्ध! और, अभी तो भारतीय प्रवासियों के लिए ये सलाहें दी गई हैं, कल को ये जातीय और नस्ली हिंसा अन्य जातियों और अन्य नस्लों पर भी होने लगें तब? और, अब जब सरकार ने सलाह दे दी है, तो भिखारी की तरह नजर आते किसी शख्स की ख़ैर नहीं. वो उत्पाती ऑस्ट्रेलियाइयों की निगाह में सबसे पहले आएगा.
मैं अभी ऑस्ट्रेलिया में तो नहीं हूँ, अतः मैं भिखारियों जैसे कपड़े पहनने के लिए अभिशप्त नहीं हूं. मैं अभी मंत्री भी नहीं हूं, और ईश्वर की दया से रात्रि में घूम सकता हूं, क्योंकि ये सलाह अभी मुझ जनता को नहीं मिली है.
शुक्र है!
---
(समाचार कतरन – साभार, दैनिक भास्कर)

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अच्छा है इन दिनों तकनलाजी छोड़कर शेरों पर कम कर रहे हैं !

हम भी शुक्र मना लेते है. :)

...इन महानुभावों के चक्कर में आम जनता का निकलना मुश्किल न हो जाये!!!

बढ़िया व्यंग्य है ।

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