शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कोई जोकर, कोई शूर्पणखा तो कोई रावण, ब्लॉगिरी में यारों कम पड़ते हैं पत्ते बावन…

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वरूण के लिए, माया – शूर्पणखा तो माया के लिए, निःसंदेह वरूण – रावण. माने, चोर चोर सगे भाई!!!

व्यंज़ल

कोई जोकर, कोई शूर्पणखा तो कोई रावण
राजनीति में यारों कम पड़ते हैं पत्ते बावन


मेरा भी मकां होता सत्ता के गलियारो में
सुना है तो वहां होता है बारहों मास सावन


मैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
कहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन


बंदा हो या कोई खुदा हो या हो कोई फ़कीर
मिला है कभी किसी को उसका मन भावन


जनता तो सो रही है चादर तान के रवि
भले ही हद से जा रही हो सियासती दावन
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11 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. चोर चोर मौसेरे भाई नहीं जी बल्कि कहिए चोर चोर भाई-बहिन :)

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  2. आज की राजनीति पर व्यंग्य करती इस कविता में उपहास, ठिठोली और क्रीड़ापरकता के साथ आक्रमकता भी है जो इसे विशेष दर्जा प्रदान करती है।

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  3. सच मे बावन पत्ते भी कम है नेताओ के लिये

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  4. मैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
    कहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन
    .... सुन्दर रचना,प्रसंशनीय!!!!

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  6. सही व्यंग्य!! यहाँ तो सभी मुखोटाधारी ही मिलेगें...


    मैं भी ख्वाब ले के आया था दुत्कारा गया
    कहते हैं कि मिसफिट हैं यहाँ जो हैं पावन

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  7. चिंता न करो रवि जी . एकदिन यही देश सभी रावनों सूर्पंखाओं को ख़त्म करेगा . यदा यदाहि धर्मस्य...........

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