April 2009

अमित ने अपने फालतू बड़बड़ में 99 चीजों की हिटलिस्ट दी. हिटलिस्ट बढ़िया लगी और लगा कि इसका उत्तर तो दिया जाना चाहिए. नियमानुसार मैं भी बोल्ड या इटैलिक्स में अपना उत्तर भर सकता था, मगर उससे बात नहीं बनती. कभी कभी चीजों को विस्तार से भी बताना पड़ता है. अमित ने किसी को टैग नहीं किया था – यानी टैगिंग स्वयंसेवी आधार पर था. मैं हिन्दी समेत विश्व के तमाम भाषाओं के हर आम और ख़ास (ब्रेक द लैंगुएज बैरियर, डोंट यू?) ब्लॉगर को टैग करता हूं.

मेरी सूची कुछ यूं है -

  1. अपना ब्लॉग आरंभ किया – हाँ, किया है तो? अब जब हर टॉम डिक और हैरी का ब्लॉग है तो?
  2. तारों की छांव में नींद ली – हाँ, रोज लेते हैं. छत ऊपर से टूट गया है. खपरैल उखड़ गया है.
  3. संगीत बैन्ड में कोई वाद्य यंत्र बजाया – मंदी में भइए, यहाँ तो अपना ही बैण्ड बज रहा है.
  4. अमेरिका के हवाई द्वीपों की सैर करी – जावा सुमात्रा की कर लें? फिर सोचेंगे.
  5. उल्का वर्षा देखी – रोज ही देख रहे हैं. अपने बॉस के रैन्ट की ऊल्का (उ पर दम लगाया है...) वर्षा. बीवी के नैगिंग की ऊल्का वर्षा. बच्चों के फरमाइशों की ऊल्का वर्षा...
  6. औकात से अधिक दान दिया – औकात की बात करते हैं? हमारी औकात, अपनी औकात से अधिक कमाने में है... दान बांटने में नहीं.
  7. डिज़नीलैन्ड की सैर करी – मदरलैन्ड की सैर पहले कर लें...
  8. पर्वत पर चढ़ाई करी – पर्वत पर तो रोज चढ़ते उतरते हैं. ससुरा शहर का ट्रैफिक किसी पर्वत की चढ़ाई से कम है क्या?
  9. प्रेयिंग मैन्टिस (praying mantis) कीड़े को हाथ में पकड़ा – पकड़ा? भई, खाया पीया भी. म्यूनिसिपल्टी के नल के पानी में, कॉर्नर की चाट की दुकान पर और दही भल्ले के खोमचे में...
  10. सोलो गाना गाया – रोज गाता हूं. बाथरूम में! सुनना चाहेंगे?
  11. बंजी जंप करी – हाँ जी, सब्जियों की, तेल की, दाल की कीमतें सुन कर मेरा मन, दिल, पॉकेट सब बंजी जम्प करता है. बस, ये माटी का शरीर ही बचा है.
  12. पैरिस गए – यहाँ भोपाल में मानव संग्रहालय ही नहीं गए – आप पेरिस की बातें करते हैं.
  13. समुद्र में बिजली का तूफ़ान देखा – वो भी देख लेंगे, पहले अपने घर में अबाधित, बिना कटौती की बिजली तो पहले देख लें. फिर बिजली का तूफान भी देख लेंगे.
  14. कोई कला शुरुआत से अपने आप सीखी – हाँ जी, ब्लॉगिंग की, टिप्पणियाँ देने की, विवादित पोस्ट डालने की, कैची शीर्षक लिखने की... कहें तो और गिनाएँ?
  15. किसी बच्चे को गोद (adopt) लिया – अभी तो मैं ही बच्चा हूं. कोई है?
  16. फूड प्वॉयज़निंग झेली – रोज झेल रहे हैं. स्लो पाइजनिंग. मिर्च-हल्दी में कोलटार रंग, धनिया पावडर में लीद, दूध में सफेदा... लिस्ट अनंत है.
  17. कुतुब मीनार को देखा – अभी तो मुहल्ले की मोबाइल टावरों की मीनारें देख और गिन रहे हैं. कुतुब मीनार का भी नंबर कभी न कभी तो आवेगा...
  18. अपने लिए सब्ज़ी उगाई – हाँ, सोच तो रहे हैं. बाजार से तो खरीद नहीं सकते, अब उगाना ही पड़ेगा. खाना है तो!
  19. फ्रांस में मोनालिसा देखी – फ्रांस में तो नहीं, परंतु यहीं चौराहे पर फुटपाथ में बिकते पोस्टरों पर मोनालिसा खूब देखी.
  20. रात के सफ़र में ट्रेन में नींद ली – हाँ, हाँ, लालू के नए ट्रेन के साइड बर्थ में मिडिल बर्थ पर जहाँ रिजर्वेशन नहीं मिल पाने के कारण दो लोग और आजू बाजू बैठ कर साझा कर रहे थे. घोर क्रानिक अनिद्राग्रस्त व्यक्ति भी 1 मिनट में खर्राटे मारने लगे ऐसी, पक्का व्यवस्था है आजकल.
  21. तकिए द्वारा लड़ाई की – अभी कर लेते हैं! लो!
  22. सड़क पर किसी अंजान व्यक्ति से लिफ़्ट ली – लगता है बाबा भारती जैसा भरोसा अब किसी में नहीं रह गया है. कोई लिफ़्ट ही नहीं दे ता. ये पोस्ट भी बीच सड़क पर लिफ़्ट के लिए अंगूठा उठाए लिख रहा हूं...
  23. स्वस्थ होते हुए भी ऑफिस से बीमारी के लिए छुट्टी ली – ये तो स्थाई और एकमात्र कारगर तरीका है जिसे हमने शुरू से अपनाया हुआ है.
  24. बर्फ़ का किला बनाया – बर्फ के गोले बनाए और बहुत खाए. खाने लायक साइज का किला बनाने की कोशिश करते हैं.
  25. मेमने को गोद में उठाया – उठाया तो था, पर बाद में पता चला कि वो स्वाइन फ़्लू के संभावित कारक की नस्ल का पशु है! बायलाजी में हमेशा कमजोर रहा, क्या करें.
  26. बिना किसी वस्त्र के नग्न ही पानी में उतरे (तरण ताल, नदी, तालाब, समुद्र अथवा बाथ टब इत्यादि में) – भारत में? कभी नई. रामसेना, शिवसेना है ना!
  27. मैराथन रेस में दौड़ लगाई – रोज. भाग दौड़ युक्त आधुनिक जीवन का ये रेस मैराथन से कोई कम है भला?
  28. वेनिस में गोन्डोला (एक तरह की नाव) में सवारी करी – अभी तो एक साथ दो नावों की सवारी कर रहे हैं – काम और ब्लॉगिंग. ये तीसरी नाव कहां से आ गई?
  29. पूर्ण ग्रहण देखा – जीवन में ग्रहण ही ग्रहण है. नल में पानी का आंशिक ग्रहण है, बल्ब में बिजली का पूर्ण ग्रहण है, राशन में कीमत का डबल पूर्ण ग्रहण है. अब और कौन सा पूर्ण ग्रहण बचा है देखने को?
  30. सूर्योदय अथवा सूर्यास्त देखा – सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक सब देखा. परिस्थितियाँ वही रहीं, न बदलनी थीं, न बदलीं.
  31. होम रन मारा (बेसबॉल में) – सिर्फ बेसबॉल में? होम में बैठकर तो हम तमाम रन मारते हैं – टीवी पर क्रिकेट से लेकर...
  32. समुद्र पर्यटन (cruise) पर गए – सोमाली पाइरेट के जमाने में समुद्र पर्यटन? इतने एडवेंचरिस्ट नहीं बनना!
  33. नियाग्रा फॉल्स स्वयं देखा – हाँ हाँ, स्वयं देखा. फोटो में, टीवी पर.
  34. पूर्वजों की जन्मभूमि देखने गए – यदि आपका इशारा डार्विन के विकासवाद के अनुसार परिभाषित पूर्वजों की ओर है, तो नहीं! क्योंकि उसे तो आधुनिकीकरण के नाम पर उजाड़ दिया गया है.
  35. किसी कबीले के रहन सहन को नज़दीक से देखा – तालिबानी-रामसेना युग में हमारा अपना रहन सहन किसी कबीले से कम है क्या?
  36. अपने आप एक नई भाषा स्वयं सीखी – हाँ, ब्लॉगिंग की भाषा.
  37. इतना धन अर्जित किया कि पूर्णतया संतुष्ट हुए – धन से कोई संतुष्ट हुआ है भला? मित्तल-अंबानी को पहले संतुष्ट हो लेने दें, फिर अपुन बात करेंगे.
  38. पिसा की झुकती मीनार (Leaning Tower) देखी – हाँ जी, ये भी देखी. अभी कल ही टीवी पर.
  39. रॉक क्लाइम्बिंग करी – मेरे मुहल्ले की सड़कों पर रॉक ही रॉक हैं. डामर तो कब का गल-बह चुका. दिन में दसियों बार क्लाइम्ब करता हूं.
  40. माइकलेन्जलो द्वारा कृत पुरातन इज़राइल के राजा डेविड की मूरत देखी – हाँ, ये देखना रह गया है. पर कुछ इच्छा अपूर्ण ही रहने दें?
  41. कैरीओकी (karaoke) गाया – अभी भी गा रहे हैं. 1000 वाट का संगीत पड़ोस से आ रहा है...
  42. वायोमिंग के येलोस्टोन नेशनल पार्क में मौजूद ओल्ड फेथफुल गीज़र को भभक कर उठते देखा – गीज़र को तो नहीं, पर आज सुबह अख़बार पढ़ते समय हिंसा-बलात्कार इत्यादि की ख़बरों को पढ़ कर अपने दिमाग को भभकते जरूर देखा था.
  43. किसी अंजान को रेस्तरां में खाना खिलाया – कोई पहले इस अंजान को खाना खिला दे तब!
  44. अफ़्रीका गए – फिर वही बात? पहले भोपाल के मानव संग्रहालय हो आएं तब न!
  45. चांदनी रात में समुद्र तट पर सैर करी – चाँदनी रात में (क्योंकि स्ट्रीट लाइट बंद थी) सड़क तट पर सैर करी. समुद्र ज्यादा दूर नहीं होगा उम्मीद है.
  46. एम्बुलेन्स में ले जाया गया – अभी तक तो नौबत नहीं आई है, पर लगता है कि 99 नंबर तक आते आते ये नौबत भी शर्तिया आनी ही है!
  47. अपनी तस्वीर बनवाई (फोटो नहीं) – हाँ, हाँ, इशारा समझ रहे हैं. अब कोई थोड़े ही न बता देगा कि आपकी तस्वीर हमने अपने मन में बना ली है!
  48. गहरे समुद्र में मछली पकड़ने गए – पीटा वाले पीट पीट कर मारेंगे इसी डर से न तो मुर्गी पकड़ने की सोचा है न मछली.
  49. वैटिकन में सिस्टीन चेपल देखा – अलबत्ता भारत में बीच सड़कों पर बने दसियों मंदिरों में आरती और सड़कों पर नमाज जरूर देखा.
  50. पैरिस में ऐफिल टॉवर के शीर्ष से नज़ारा किया – ऐफिल टॉवर के शीर्ष से भी पीप शो का नजारा दिखाई देता है? नई बात पता चली.
  51. स्कूबा डाईविंग अथवा स्नॉर्कलिंग करी – एक तरह से! भारतीय सड़कों पर मोटरसायकल चलाना इससे बेहतर अनुभव तो नहीं होता होगा?
  52. बरसात में चुंबन लिया/दिया – नो एडल्ट क्वेश्चन्स प्लीज़! – वैसे भी रामसेना के लोग पीछे खड़े हैं.
  53. मिट्टी में खेले – लो. कर लो बात. धूल-मिट्टी में तो हर भारतीय खेलता है. सुबह घर से निकलो, शाम को वापस आओ – आप भले ही खेलो न खेलो, धूल मिट्टी तो आपसे खेलेगा ही खेलेगा.
  54. ड्राईव-इन सिनेमा देखा – हाँ, देखा. हर तरह का सिनेमा देखा. नुक्क़ड़ के फुटपाथिया शॉप तक ड्राइव किया, पायरेटेड डीवीडी लाया, डीवीडी ड्राइव में इन किया और सिनेमा देखा.
  55. किसी फिल्म में नज़र आए – हाँ, एक्सरे फ़िल्म में.
  56. चीन की बड़ी दीवार देखी – अपने घर की बड़ी प्लास्टर निकलती दीवार देख रहे हैं अभी तो.
  57. अपना व्यवसाय आरंभ किया – हाँ, किया. चिट्ठाकारिता का व्यवसाय. पर, ये न तो फल रहा है न फूल रहा है. पता नहीं कहां जा रहा है...
  58. मार्शल आर्ट की क्लास में भाग लिया – हाँ, टिप्पणी-प्रतिटिप्णी और पोस्ट-प्रतिपोस्ट की मार्शल क्लास में. अब तो खुदै क्लास चलाने की सोच रहे हैं. अभिनव सोच वाले स्टूडेंटों का स्वागत है.
  59. रूस गए – सोच तो रहे हैं, पहले बेलारूस होकर आते हैं.
  60. लंगर/भंडारे में लोगों को खाना परोसा – जाते तो हैं इसी विचार में, पर पंगत में बैठ जाते हैं, और फिर उठा नहीं जाता...
  61. ब्वॉय स्कॉऊट पॉपकार्न अथवा गर्ल स्कॉऊट कुकीज़ बेची – हिन्दी में व्यवसायिक चिट्ठाकारी की संभावना तलाशने वाले मुझ जैसे ब्लॉगरों को अब तो आगे पॉपकार्न बेचने का ही काम करना पड़ेगा लगता है.
  62. समुद्र में व्हेल देखने गए – गए तो थे, पर समुद्र किनारे गंदगी देखकर वापस हो लिए.
  63. खामखा बिना वजह किसी ने फूल दिए – हाँ, 1 अप्रैल को बहुतों ने.
  64. रक्त दान किया – आपका इशारा रामसेना वालों की तरह रक्त दान का है, तो नहीं!
  65. स्काई डाईविंग करी – हाँ, रोज ही करते हैं. भारतीय, गड्ढों युक्त सड़कों पर ड्राइविंग करना और स्काई डाइविंग करना दोनों एक ही बात है.
  66. नाज़ी कॉन्सनट्रेशन कैम्प देखा – क्या अब भी वहां कॉन्सनट्रेशन कैम्प चल रहा है? यदि हाँ, तो ऐसा कोई इरादा नहीं है हमारा.
  67. खुद का दिया बैंक चैक बाऊंस हुआ – हाँ, हुआ. कहें तो आपको भी चेक ईशू कर दें इस बात को सत्यापित करने के लिए?
  68. हैलीकॉप्टर में सवारी करी – बड़े बड़ों के हैलीकॉफ़्टरों के ईंघन टैंक में पत्थर और रेत मिलने के बाद भी यदि कोई ऐसा सोचे, तो उसे मेरा सलाम!
  69. बचपन के किसी मनपसंद खिलौने को बचा के रखा – किससे बचा के? वैसे, इधर के कम्पीटीशन युक्त जमाने में किसी का बचपन ही बच जाए यही ग़नीमत है!
  70. राज घाट पर गांधी समाधि देखी – हाँ, और गांधी पर हो रही राजनीति भी!
  71. कैवियार (मछली के अंडों का अचार) खाया – पीटा के भय से नहीं.
  72. रजाई का कवर सिला – कथरी ओढ़ने वालों से रज़ाई की बातें – ये तो अत्याचार है! ह्यूमनराइट्स में जाना पड़ेगा.
  73. चांदनी चौक गए – चाँदनी चौक टू चाइना भी (देखने) गए.
  74. घने जंगल में सैर की – जी हाँ. अपनी तो कंक्रीट के घने जंगलों में रोज सैर होती है.
  75. नौकरी से निकाले गए – नहीं. तलाक की नौबत ही नहीं आई है अब तक.
  76. लंदन के बकिंघम महल में पहरेदारों की बदली देखी – क्या कहा? लंदन के? नहीं. वैसे, यहाँ सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस की वसूली की बदली जरूर देखता आ रहा हूं मैं.
  77. हड्डी टूटी – बिना रीढ़ वालों की हड्डी नहीं टूटा करती जो आप ये बात पूछ रहे हैं.
  78. तेज़ रफ़्तार मोटरसाइकल की सवारी करी – रफ़्तार तो ठीक है, पर तेज़ की क्या परिभाषा है? भारतीय गड्ढेदार सड़कों पर क्या ये अधिकतम 5-10 या 15 किमी प्रघं है?
  79. अमेरिका में ग्रैन्ड कैनयन देखी – जब देखो अमरीका इंग्लैंड की बात करते हैं. नागपुर कानपुर की भी तो कुछ पूछें.
  80. अपनी किताब छपवाई – हाँ हाँ, प्रिंट ऑन डिमांड इसीलिए तो है. एक किताब की एक प्रति. अपने लिए. अपने ड्राइंग रूम के आले में सबसे सामने रखने के लिए.
  81. वैटिकन गए – फिर वही बात. पचमढ़ी की पूछें तो बताएंगे.
  82. नई नवेली गाड़ी खरीदी – गाड़ी तो नई नवेली ही होती है, पर वो दूसरे दिन ही जाने क्यों पुरानी हो जाती है.
  83. जेरूसलम की सैर करी - धार्मिक प्रश्नोत्तरी बंद है.
  84. अखबार में फोटो छपी – नो थैंक्स. न तो हमें पप्पू यादव और शहाबुद्दीन बनना है, न कसाब और न पीएम इन वेटिंग और न ही कमजोर पीएम.
  85. नव वर्ष की पूर्व संध्या की मध्यरात्रि किसी अंजान का चुंबन लिया – इच्छा तो वर्षों पुरानी है, पर फिर रामसेना वालों (बीवी समेत) का भी तो भय है.
  86. राष्ट्रपति भवन की सैर करी – नहीं. सोच रहे हैं किसी दिन तकदीर ने जोर मारा तो क्या पता किसी पार्टी के उम्मीदवार ही न बन जाएँ किसी दिन...
  87. किसी जानवर का शिकार कर खाया – नहीं. वैसे भी आजकल जानवर नहीं मिलते. आदमियों ने जानवर का चोला पहन लिया है, और इसी कारण आदमी ही आदमी के खून का प्यासा हो चला है.
  88. चिकन पॉक्स झेला – झेला है कई बार. बेस्वाद और मिर्च मसालों से भरपूर नमकीन भी. क्या इसका स्वाद चिकन चिली जैसा होता है? अपने इधर शायद इसे चिकन रोस्ट कहते हैं...
  89. किसी की जान बचाई – हाँ, कल एक मच्छर काट रहा था. उसे मारने ही वाला था कि पीटा वालों की याद आई तो मैंने उसे मारा नहीं और बस, उड़ा दिया.
  90. जज अथवा जूरी बन निर्णय सुनाया (किसी प्रतियोगिता में या न्यायालय में) – हाँ, – बाद में डिस्को रूदन करना पड़ा था – ये भी याद है.
  91. किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मुलाकात करी – आज सुबह ही आईना देखा था. वैसे मेरे अत्यंत सड़ियल कॉम्पैक लॅपटॉप की बेहद चमकीली स्क्रीन पर अभी भी दिख रहा है वो प्रसिद्ध व्यक्ति.
  92. बुक क्लब की सदस्यता ली – गुटेनबर्ग और दपायरेटबे और टोरेन्ट के जमाने में? हैरी पॉटर का आने वाला नया संस्करण टोरेन्ट पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध है. लिंक भेजूं?
  93. किसी अज़ीज़ को खोया – अजीज को तो नहीं, पर अजीज पोस्ट को खोया. लिखते लिखते बिजली चली गई, लॅपटॉप की बैटरी उड़ गई, ड्रॉफ़्ट में से पोस्ट उड़ गया. जाने कैसे...
  94. शिशु को जन्म दिया – अभी ये तकनॉलाजी इवॉल्यूशन ट्रैक पर है. पर, मैं इसका अनुभव जरूर लेना चाहूंगा.
  95. जॉन वेन की फिल्म द अलामोदेखी – नहीं, पर मौका मिलते ही देखेंगे. वैसे, पूछा जाना चाहिए था - तस्वीर 8x10 देखी? कोई माई का लाल नहीं कहता कि देखी, और ये भी नहीं कि हाँ, मौका मिलते ही देखेंगे.
  96. अमेरिका के ग्रेट सॉल्ट लेक में तैराकी करी – अभी तो भोपाल के बड़े तलाब में तैराकी की सोच रहे हैं. वैसे अवर्षा और गर्मी के कारण यहाँ भी पानी तेजी से सूख रहा है और बाकी फिर रॉक और सॉल्ट ही बचेगा.
  97. किसी कानूनी मुकदमे में शरीक हुए/रहे – इतने सारे 99 प्रश्न में उलझने के चक्कर में सोच रहा हूं कि इस विचार को जन्म देने वाले पर एक मुकदमा ठोंक ही दूं.
  98. सेल फोन के मालिक हैं/रहे – हैं? ये भी कोई प्रश्न है जी. एक दो नहीं, ड्यूअल सिम वाले तीन-तीन सेलफोन हैं अपने पास जो छै नेटवर्क सपोर्ट करते हैं. सेलफोन के बगैर आजकल का जीना भी कोई जीना है लल्लू?
  99. मधुमक्खी ने डंक मारा – हाँ, पर मेरी जेब पर. हाल ही में बाजार से किलो भर मधुरस लाया तो पता चला कि वो नक़ली है! हद है, अब मरी मधुमक्खियों ने डंक मारने का नया तरीका ईजाद कर लिया है. वो नकली मधुरस भी बनाने लगी हैं!

smart gets numbers

स्मार्ट लिखने से कुछ नहीं होगा. दिखने से होगा. अपने हाव-भाव-आचरण-व्यवहार में री-बॉकिया और अदिदासिया व्यवहार दिखाएँ और झमाझम टिप्पणियों की बरसात पाएँ.

व्यंज़ल

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वक्त वाकई बहुत स्मार्ट निकला ।
वो गंवई तो बड़ा स्मार्ट निकला ।।

सोचा था यूं ही गच्चा दे जाऊंगा ।
पर हालात साला स्मार्ट निकला ।।

वहम था कौन समझेगा नारों को ।
हर वोटर अच्छा स्मार्ट निकला ।।

उत्तर वैसे यूं तो छटांक भर था ।
प्रश्न मगर ग़जब स्मार्ट निकला ।।

बीते समय को याद करे है रवि ।
दर्द सहने में कैसे स्मार्ट निकला ।।

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(समाचार कतरन – साभार, दैनिक भास्कर)

मैं आपका फॉर्मर पीयेम बोल रहा हूं,
आज नेता लोगों की पॉल खोल रहा हूं.
दिल्ली इंडिया की राजधानी है,
मगर यहाँ बिजली है ना पानी है.

सब अपना भला करते हैं,
इंडिया के ग़रीब मरते रहें.
हमारे बच्चे अमेरिका में पढ़ते हैं,
इनकम टॅक्स वालों से हम क्या डरते हैं?

पाँच साल बाद वोटर के पास गये, '
इंडिया शाइनिंग' की मिठास लिए.
फिल्मी सितारों ने भी डाइलॉग मारे,
पता नहीं हम फिर क्यूँ हारे?

एग्ज़िट पोल वालों का कमाल देखा,
रिसर्च के नाम में कुछ भी फेंका.
आंध्रा में आ गयी आँधी,
टीवी चॅनेल्स की हो गयी चाँदी.

पॉलिटिक्स में वो सितारे जिन्हें काम नहीं,
बंबई में अब एमपी गोविंदा, राम नहीं.
बंबई वो नगरी जहाँ फिल्में बनती हैं,
और एक्टर धर्मेंन्द्र की दोनों पत्नी हैं.
पत्नी वो जो पॉलिटीशियन को ज़रूरी है,
एक फॅमिली में दो सीट की हज़ूरी है.
मेरा कभी सक्सेस्फुल रोमॅन्स होता,
तो आज मेरे बेटे को चान्स होता.

राहुल बेटे, एक अच्छी अड्वाइज़ है,
अब जल्दी से ढूंढ कर एक वाइफ ले.
चाहे कश्मीर से या कन्याकुमारी से,
मगर कर किसी इंडियन नारी से. 

इंडिया के वोटर अजीब है,
यह भी कोई तहज़ीब है?
अब लोक सभा सास बहू सीरियल से बढ़िया होगा,
जब लालू और सिद्धू का अँग्रेज़ी में झगड़ा होगा.

कम से कम ममताजी चुप होएंगी,
कहीं कोने में बैठ कर रोएंगी.
मुरली मनोहर जोशी की हार हो गयी,
ड्रीम वालों की पार्टी चार हो गयी.

एम बोले तो अपने मुन्नाभाई का बाप,
जेल गया लड़का तो कौन सा पाप?
पॉलिटिक्स में सब चलता है,
खाली आम आदमी जलता है.

आम मेरा फॅवरेट फल है,
पावर आज नहीं तो कल है.
लड़ेंगे झगड़ेंगे ये लोग,
गद्दी का यही तो है रोग.

मैं च्यवनप्राश लेता रहूँगा,
हेल्थ रही तो नेता रहूँगा.
आपके प्यार के लिए धन्यवाद,
सी यू - एक ब्रेक के बाद.

जय हिंद.
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- रश्मि बंसल

(जैम मैगज़ीन अंक अप्रैल-15-29, 2009 से साभार. हिन्दी में स्वचालित लिपि परिवर्तन क्विलपैड से. जैम मैगज़ीन का एक रिव्यू यहाँ पढ़ें)

pappu going to become PM

सुबह सुबह मेरी दाढ़ी बनाते समय मेरे मुहल्ले के नाई ने जब मुझसे कहा कि वो पीएम बनने के बारे में गंभीरता से विचार कर रहा है तो अचानक मैं चौंक पड़ा और इस वजह से उसका उस्तुरा मेरे चेहरे पर एक कट मार गया.

खून की बहती बूंदों को फिटकरी रगड़ कर बंद करने की नाकाम कोशिश करते उसने कहा – अरे साहब, मैंने अपने पीएम बनने के सपने की जरा सी बात कह दी तो इतना बड़ा हादसा हो गया. अगर मैं सचमुच पीएम बन जाऊं तो?

मैंने उसे विश्वास दिलाया कि वो कतई कमजोर और बंधुआ मार्का नहीं रहेगा. उसके पास कम से कम उसका उस्तुरा तो रहेगा. मौके बे मौके लहराने के लिए ताकि कोई उसे कमजोर न कह सके और यदि उसे कमजोर कह भी दिया तो उसपर उस्तुरा चला कर दिखा देगा कि वो कमजोर कतई नहीं है. और, हाथ में उस्तुरा लेकर वो बंधुआ तो किसी सूरत में नहीं हो सकता – क्योंकि अपने उस्तुरे से वो हर बंधन काटने के लिए हर हमेशा तैयार रहेगा.

वह खुश हो गया और मेरे जख्म पर और भी जोर से फिटकरी रगड़ने लगा जो उस वक्त जाने क्यों नमक की माफिक प्रतीत हो रहा था.

रक्त स्राव रोकने के लिए अपने जख़्म को रूमाल से दबाए हुए वापस घर की ओर आ रहा था तो याद आया कि मुहल्ले के धोबी से प्रेस के लिए दिया हुआ पैंट-शर्ट उठाना है. पैंट प्रेस हो चुका था और मेरे शर्ट के कालर की सिलवटों को वो बेहद गर्म प्रेस से हटाने की कोशिश पानी के छींटे मार कर कर रहा था. शर्ट के प्रेस हो जाने के इंतजार में मैं खड़ा हो गया. मैं बातचीत के मूड में कतई नहीं था, मगर धोबी को मेरे चेहरे पर चिपके रूमाल से उत्सुकता हो रही थी. उसने पूछा कि माजरा क्या है. मैंने उसे टाला – कहा, कुछ नहीं.

प्रेस करते करते धोबी अचानक एक सांस में बोला – साहब मैं पीएम बनने की सोच रहा हूं. क्योंकि अखबारों में रपट आ रही है कि इस बार किसी पार्टी को बहुमत तो मिलेगा नहीं. जोड़-तोड़ खरीद फरोख़्त तो जम के होगी. अपने पास भी थोड़ा बहुत पुश्तैनी जमा पूंजी है. कुछ प्रयास करने में क्या जाता है?

मैंने उसे बताया कि वो वाकई बहुत उम्दा सोच रहा है और यदि उसने अपने पांसे सही चले तो उसे पीएम बनने से कोई नहीं रोक सकता. जब गूंगी गुड़िया और हम्बल फार्मर सीधे पीएम बन सकते हैं तो हार्डवर्कर धोबी क्यों नहीं? बातचीत में धोबी के हाथ मेरे शर्ट के कॉलर के ऊपर ही थम गए थे और उसमें धुआँ निकलने लगा था. धत् तेरे की. अब तो ब्लैक कॉलर के साथ अपने व्हॉइट कॉलर जॉब के लिए जाना होगा.

जरूरत से ज्यादा कड़क प्रेस कपड़ा हाथ में लेकर घर आ रहा था तो मेरे मन में भी कुछ अंकुर फूटे. दरवाजा खुलते ही पत्नी को मैंने ऐलानिया बताया – यार, डार्लिंग मैं सोच रहा हूं कि यदि मौका लगा तो मैं पीएम बन जाऊंगा.

वो उबल पड़ी. मरदुए कहीं के. जिंदगी में पहली बार मैंने ख्वाब देखा था पीएम बनने के. कितने ही दिनों से पीएम बनने के ख्वाब मैं देख रही थी. आज कल में अपने पत्ते खोलने वाली थी. और तुम सब किया कराया मटिया मेट करना चाहते हो. तुम्हारा षडयंत्र है एक स्त्री को घर में बाँध कर रखने का. मैं तुम्हारा यह प्रयास बिलकुल सफल नहीं होने दूंगी. भारत को वैसे भी अब एक स्त्री पीएम की बेहद जरूरत है.

गृह युद्ध को भरसक टालते हुए मैं भीतर घुसा. बेटा तयशुदा स्टाइल में अपने कम्प्यूटर पर गेम की मारा मारी में व्यस्त था. उसे कुछ आहट हुई तो कनखियों से देखा – गेम को पॉज किया और गेम के एक पात्र की तरह मुंह बनाकर बोला –

डैड, डू यू थिंक आई हैव एनी रिमोटेस्ट पॉसिबिलिटी टू बिकम पीएम? मैं क्या कहता. मेरे पीएम बनने की आशाओं पर दो-दो मर्तबा तुषारापात तो घर में ही हो गया था. मैंने मरी सी आवाज में कहा – येस्स. ओनली यू हैव द अट मोस्ट प्रॉबेबिलिटी!

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(प्रस्तुत है हम देसियों के बीच एक बेहद अग्रेषित मूल अंग्रेज़ी ईमेल फारवर्ड [तथा चिट्ठों पर बेहद कॉपी-पेस्ट] का हिन्दी अनुवाद. मूल (अज्ञात?) लेखक को धन्यवाद सहित)

पुरानी कहानी:


तमाम गर्मियां चींटी जुटी रही और उसने अपने रहने के लिए बढ़िया सा बिल बनाया और उसमें ढेर सारी खाने की चीजें एकत्र कर रख ली ताकि ठंड में काम आवे.

चिड्डा ये देखकर हंसा और बोला चींटी तू मूर्ख है. देखो मैं दिनभर कैसे मजे में खाता पीता नाचता कूदता और मस्ती करता रहता हूं.

ठंड का मौसम आया. चींटी अपने बिल में सुरक्षित थी. उसके पास खाने पीने की चीजों की कोई कमी नहीं थी. चिड्डे के पास न घर था न भोजन व्यवस्था. ठंड में ठिठुरकर उसने अपनी जान दे दी.


भारतीय संस्करण:


तमाम गर्मियां चींटी जुटी रही और उसने अपने रहने के लिए बढ़िया सा बिल बनाया और उसमें ढेर सारी खाने की चीजें एकत्र कर रख ली ताकि ठंड में काम आवे.

चिड्डा ये देखकर हंसा और बोला चींटी तू मूर्ख है. देखो मैं दिनभर कैसे मजे में खाता पीता नाचता कूदता और मस्ती करता रहता हूं.

सर्दी का मौसम आया तो ठंड में ठिठुरते चिड्डे ने प्रेस-कॉफ्रेंस बुलाया और मांग रखी कि जब दूसरे ठंड में भूखे-प्यासे ठिठुरकर मरने की कगार पर हैं तो ऐसे में चींटी क्यों आराम से अपने बिल में खा-पी कर मुटिया रही है.

एनडेटीवी, बेबीसी, सीएसएन सहित तमाम चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज छपी जिसमें एक तरफ ठिठुरते, भूख में कलपते चिड्डे को दिखाया गया तो दूसरी तरफ खूब सारे संग्रहित भोजन के बीच आराम फर्माती चींटी को.

इस भयंकर विरोधाभास को देखकर  अवसरवादी भारतीय राजनीतिज्ञों की दुनिया दंग रह गई. चिड्डे को ऐसा कैसे मरने के लिए छोड़ा जा सकता है भला?

अवनति राय ने चींटी के बिल के सामने इस अत्याचार के विरूद्ध प्रभावी धरना-प्रदर्शन किया.

मेगा पाटवकर ने दूसरे चिड्डों के साथ अनशन किया कि चिड्डों को आरामदायक अपेक्षाकृत गर्म जगह पर विस्थापित किया जाए.

पायावती ने इसे अल्पसंख्यकों पर अन्याय बताया.

तमाम रपटों के आधार पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारतीय सरकार की खिंचाई की कि वह चिड्डे के मौलिक अधिकारों की रक्षा में असमर्थ रही है.
इंटरनेट पर चिड्डे के समर्थन में ऑनलाइन पिटीशनों की बाढ़ आ गई. चिट्ठाजगत में समर्थन और विरोध में घमासान मच गया.
विपक्षी दलों ने संसद में धरना-प्रदर्शन-वाकआउट तो किया ही, संसद में तोड़फोड़ मचाया और एक दूसरे पर कुर्सियों के हत्थे और माइक फेंके. वामपंथी दलों ने चींटी के विरोध में एक माह का बंगाल और केरल बंद करवाया तथा इस भयंकर असमानता के कारणों की न्यायिक जांच की मां की.

राज्यों की वामपंथी सरकारों ने एक क़ानून पास करवाया जिसमें चींटियों को गर्मियों के दौरान ज्यादा काम करने पर पाबंदी लगाई गई ताकि चींटी व चिड्डों के बीच आर्थिक स्तर समान बना रहे व समाज में असमानता पैदा न हो.
आलू प्रसाद ने भारतीय रेलों में चिड्डों के लिए एक अलग कोच रिजर्व करने की घोषणा की तथा चिड्डा रथ नाम का एक नया रेल चलाया जिसमे चिड्डे मुफ़्त में जहां मर्जी पड़े यात्रा कर सकें.

भारतीय न्यायिक कमेटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक कानून पोटागा 'प्रिवेंशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट ग्रासहॉपर्स एक्ट' [PODAGA], बनाया और उसे पिछले पाँच साल पहले से लागू किया.
वर्जुन सिंह ने चिड्डों के लिए विशेष आरक्षण की घोषणा की.

चींटी को पोडागा कानून के अंतर्गत गिरफ़्तार कर लिया गया और उसकी संपत्ति जब्त कर उसे जेल भेज दिया गया. जब्त की गई सम्पत्ति को जरूरतमंद चिड्डों में बांट दिया गया जिसके एक्सक्लूजिव लाइव प्रसारण के अधिकार एनडेटीवी ने खरीद लिए थे. डांडिया टीवी ने इस आयोजन को बोगस, नकली करार दिया और चींटियों की तुलना तालिबान से की.


अवनति राय ने इसे न्याय की जीत माना.


आलू प्रसाद ने इसे असली सामाजिक न्याय माना.

 

वामपंथियों ने इसे साम्यवाद की क्रांतिकारी जीत माना.

 

संयुक्त राष्ट्र संघ में चिड्डे को वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया.


बहुत साल बाद....


जेल से छूटने के बाद चींटी अमरीका भाग गई और वहां सिलिकान वेली में उसने मल्टी बिलियन डालर की कंपनी खोल ली.

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चिड्डा अभी भी उसी हाल में है.

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blogger for hire

और, वो भी शानदार, व्हाइट-कॉलर व्यवसाय. प्रतीत होता है कि चिट्ठाकारों के दिन बहुर चुके हैं. तो क्या बहुत जल्दी ही भारत में भी रेलमपेल मचेगी? वो भी हिंदी चिट्ठाकारी में?

वाल स्ट्रीट जर्नल में मार्क पेन ने लिखा है कि अमरीका में आज की तारीख में उतने ही प्रोफेशनल ब्लॉगर (ब्लॉगर जिन्होंने ब्लॉगिंग को अपनी रोजी-रोटी का प्राथमिक साधन बनाया है) हैं जितने कि वहां वकील हैं. वे आगे लिखते हैं कि कम्प्यूटर प्रोग्रामरों और अग्निशामकों से कहीं ज्यादा संख्या में अब अमरीकी अपने ब्लॉगीय विचारों को छापकर आजीविका कमा रहे हैं.

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वे आंकड़े देते हुए बताते हैं कि 1% अमरीकी के पास ब्लॉगीय आय किसी न किसी रूप में पहुँच रही है. 2 करोड़ अमरीकी चिट्ठाकारों में से कोई 4 लाख 52 हजार ब्लॉगरों के प्राथमिक आय के संसाधन ब्लॉग लेखन ही है. यदि किसी चिट्ठे के महीने के 1 लाख से अधिक विशिष्ट पाठक होते हैं तो उसका चिट्ठा 75 हजार अमरीकी डॉलर सालाना आय अर्जित कर सकता है. बहुत से चिट्ठाकार किसी उत्पाद या सेवा के बारे में लिख-लिखकर 75 से 250 डॉलर तक आय प्राप्त करते हैं. वरिष्ठ व्यवसायिक चिट्ठाकारों जो कम्पनियों के लिए नियमित लिखते हैं, 45 हजार से 2 लाख अमरीकी डालर सालाना वेतन दिया जाता है. तमाम बड़े व्यवसायिक जाल स्थल पर हर विषय – तकनीकी से लेकर राजनीतिक टिप्पणियों पर व्यवसायिक चिट्ठाकारों से मानदेय आधार पर लिखवाया जा रहा है.

मार्क पेन ये भी बताते हैं कि चिट्ठाकारों में जॉब सेटिस्फेक्शन – याने अपने व्यवसाय में संतुष्टि आमतौर पर तुलनात्मक रूप से अधिक पाया गया है और वे अपने काम में खुश रहते हैं.

अब जरा ये बताइए कि भारतीय ब्लॉगरों को अमरीकी चिट्ठाकारी संबंधी इस धमाकेदार खबर से कुछ आशा, कुछ उम्मीद लगाना चाहिए कि नहीं?

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हिन्दी चिट्ठों के नए-नए पाठकों और प्रयोक्ताओं द्वारा एक प्रश्न अकसर पूछा जाता है कि हिन्दी के कुंजीपट (हार्डवेयर हिन्दी कीबोर्ड) कहां से हासिल किए जाएं. वे पूछते हैं कि हिन्दी कुंजीपट कहीं बिकता भी है और यदि हाँ तो हिन्दी कीबोर्ड कहां से खरीदें. हिन्दी कीबोर्ड कौन सा अच्छा होता है और कौन सा खरीदना चाहिए. चूंकि कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने के दर्जनों आसान किस्म के तरीके हैं, और ढेरों विकल्प हैं – (माउस क्लिक के जरिए लिख सकने की भी सुविधा सहित) अत: हिन्दी कीबोर्ड बाजार में आसानी से नहीं बिकते. यदा कदा किसी कम्प्यूटर शॉप से हिन्दी के स्टीकर मिल जाते हैं, मगर वो भी सर्वाधिक प्रचलित कृतिदेव फ़ॉन्ट का.
फिर भी, मानक इनस्क्रिप्ट का हिन्दी कीबोर्ड (जिसके कीबोर्ड में हिन्दी पहले से छपा होता है – आम QWERTY कीबोर्डों की तरह) टीवीएस (तथा कुछ इक्का दुक्का अन्य कंपनी के भी) ने कुछ समय से बाजार में उतारा है, जिसे आप इनस्क्रिप्ट सीखने और उसके जरिए टच-टाइप करने के काम में आसानी से ले सकते हैं. वैसे यह आम कुंजीपट ही है, बस इसके कीबोर्ड में हिन्दी इनस्क्रिप्ट लेआउट छपा हुआ होता है. यानी इसमें आप तमाम दीगर तरीकों याने की फोनेटिक, शुषा, कृतिदेव लेआउट से भी यूनिकोड हिन्दी लिख सकते हैं.
इस हिन्दी कीबोर्ड के दो रूप आते हैं – टीवीएस चैम्प मेम्ब्रेन कीबोर्ड जिसकी कीमत है 300 रुपए, तथा दूसरा टीवीएस गोल्ड फेदर-टच मेकेनिकल – 1350 रुपए.
इन कीमतों में आप इस कीबोर्ड को दिल्ली के नेहरू प्लेस में निम्न दुकान से खरीद सकते हैं –

Kuldeep Bansal (9810176026)
Micro Peripherals,
301, 3rd floor, Bajaj House,
Nehru Place,
New Delhi 110019.
यदि आप दिल्ली से बाहर के हैं तो इन कुंजीपट को आप इंडियाप्लाजा से ऑनलाइन खरीद सकते हैं. यहाँ आपको कुछ ज्यादा कीमत देना पड़ सकता है. अन्य शहरों के विक्रेताओं के बारे में पूछताछ के लिए टीवीएस के टोल फ्री नंबर 18002005123 से या ईमेल sales-support@tvs-e.in पर पूछताछ की जा सकती है.
यदि आप ज्यादा काम करते हैं, तो थोड़ी अतिरिक्त कीमत देकर टीवीएस गोल्ड खरीदें, ये कीबोर्ड आपकी उंगलियों को आराम देगा. मैं बहुत समय से इसी कीबोर्ड का प्रयोग कर रहा हूं, और इसमें लंबे समय तक काम करने में भी उंगलियों में कार्पेल टनल सिंड्रोम और आरएसआई (रिपीटिटिव स्ट्रेस इंज्यूरी) की समस्या बहुत कम आती है.
ये जानकारियाँ सुरेश शुक्ला के ब्लॉग अनेकता में एकता की अंग्रेजी में ब्लॉग प्रविष्टि – हिन्दी टाइपिंग कम्प्लीट सॉल्यूशन से साभार ली गई हैं. अधिक परिपूर्ण जानकारी तथा हिन्दी कीबोर्ड के चित्र के लिए मूल प्रविष्टि (अंग्रेज़ी में) देखें.

chief minister's blog

ब्लॉगों की ताक़त लगता है अब सबको दिखाई दे रही है. बिजनेस वीक में भारत के 50 प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में एक ब्लॉगर के शामिल होने की खबर आई ही थी कि मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के ब्लॉग जगत में पदार्पण की सूचना भी आ गई. अच्छी बात ये है कि वे हिन्दी में ब्लॉग लिख रहे हैं. अपने शुरूआती उद्बोधन में, जाहिर है स्वर्णिम मध्य प्रदेश की कल्पना करते हुए लिखते हैं -

 

“अत्यंत क्षोभ के साथ मैं मानता हूँ कि ‘भ्रष्टाचार’ पूरी व्यवस्था के लिए नासूर बन चुका है और इसे एक झटके में समाप्त करना किसी के लिए संभव नहीं  है परन्तु मैं विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि चरणबद्ध तरीके से इसको जड़ से  समाप्त करने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ |  शासन में आईटी का प्रयोग इसी लिए प्रारंभ किया गया है |  परन्तु इस संघर्ष मैं समाज के हर वर्ग को मेरा साथ देना होगा, क्योंकि मेरी कल्पना जरूर “स्वर्णिम मध्यप्रदेश” की है  परन्तु सामूहिक प्रयासों से ही इसे मूर्त रूप दिया जा सकता है|”

देखते हैं शिवराज सिंह चौहान का यह ब्लॉग लेखन कितने दिनों तक जारी रहता है और कितना नियमित रह पाता है. क्या यह भी एक चुनावी प्रोपेगंडा तो नहीं? जो भी हो, आइए उनका हिन्दी ब्लॉग जगत् में आत्मीय स्वागत करें.

चाह नहीं मैं नेता मंत्री के

ऊपर फेंका जाऊँ,

 

चाह नहीं प्रेस कान्फ्रेंस में

किसी पत्रकार को ललचाऊँ,

 

चाह नहीं, किसी समस्या के लिए

हे हरि, किसी के काम आऊँ

 

चाह नहीं, मजनूं के सिर पर,

किसी लैला से वारा जाऊँ!

 

मुझे पहन कर वनमाली!

उस पथ चल देना तुम,

संसद पथ पर देस लूटने

जिस पथ जावें वीर अनेक।

 

(श्रद्धेय माखनलाल चतुर्वेदी की आत्मा से क्षमायाचना सहित,)

(चित्र – साभार : सीएवीएस संचार)

वैसे, एक लट्ठ की मार्मिक अभिलाषा भी आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

unmukt

इंटरनेट पर विचरण करते-करते हिन्दी की एक उम्दा साइट पर निगाह पड़ी. साइट का पता है – http://unmukt.com.

इस साइट की सारी सामग्री उन्मुक्त जी के चिट्ठों की है. तो, प्रकटत: यही लगा कि उन्मुक्त जी ने डोमेन नाम खरीद लिया है और अपना वेबसाइट भी बनाकर लांच कर दिया है. परंतु नाम का शीर्षक उन्मुक्त की जगह उनमुक्त दिखा रहा था. इससे लगा कि मामला कहीं गड़बड़ है, और कोई क्यों अपना नाम गलत लिखेगा?

तो, मैंने आनन-फानन में उन्मुक्त जी को बधाई देने के विचार को त्यागा और, उनसे पूछा कि भई माजरा क्या है?

उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कोई डोमेन-वोमेन नहीं खरीदा है और न ही ऐसी कोई योजना है. अलबत्ता प्रतीत होता है कि इस साइट को उनके चिट्ठे के किसी प्रशंसक ने बनाया है और वे उसमें उनकी सारी सामग्री को प्रकाशित कर रहे हैं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वैसे भी उनकी रचनाएँ कॉपीलेफ़्टेड रहती हैं, और उनका उपयोग किसी भी रूप में किया जा सकता है – नाम व कड़ी दे दें तो उत्तम. और, तमाम दीगर चिट्ठाकारों के विपरीत, उन्मुक्त जी ने कहा कि उन्हें खुशी हुई और गर्व महसूस हुआ कि किसी प्रशंसक ने उनके चिट्ठों पर लिखी सामग्री इस तरह साइट बना कर प्रकाशित करने लायक समझा गया. शायद हमें उन्मुक्त जी से यह सीख नहीं लेनी चाहिए जो हम छोटी-मोटी चिट्ठाचोरी के नाम पर हम चिल्ल-पों मचाने लगते हैं और अपने चिट्ठों में सामग्री चोरी रोकने हेतु “बिनाकाम” का ताला डाल रखते हैं?

उन्मुक्त.कॉम देखने में साफ सुथरी और अच्छे इरादों की साइट प्रतीत हो रही है, क्योंकि चोरी के माल छापने वाले एडसेंसिया चिट्ठों जैसा रूप रंग इसका नहीं है, और न ही इसमें किसी तरह का विज्ञापन आदि है.

तो, भला जो प्रशंसक अपने जेब से नांवा खर्च कर उन्मुक्त जी के नाम का डोमेन पंजीकृत करवा कर, साइट बना कर उनकी रचनाएँ उन्हीं के नाम से पुनः प्रकाशित करेगा, वह भी प्रकटतः बिना किसी लाभ के, तो उसकी प्रशंसा ही की जानी चाहिए? इससे यह भी सिद्ध होता है कि उन्मुक्त जी की रचनाएँ काबिले तारीफ और काम की होती हैं इसीलिए इनकी रचनाओं को एकत्र करने का प्रयास भी किया गया है.

डोमेनटूल्स से उन प्रशंसक महोदय का अता-पता हासिल करने की कोशिश की गई तो सिर्फ ईमेल और फोन नंबर हासिल हुआ. ईमेल से उन्हें इंगित किया गया कि भइए, आपने अपने पसंदीदा चिट्ठाकार को जो सम्मान दिया है, उसके तो आभारी हैं, परंतु नाम की वर्तनी जरा ठीक कर देते तो उत्तम होता. और उन प्रशंसक महोदय ने तत्परता दिखाते हुए वह वर्तनी घंटे भर में ठीक भी कर दी.

पर, प्रशंसक महोदय, लगे हाथ जरा ये भी बताते जाएं कि इंटरनेट एक स्थल पर प्रकाशित सामग्री को दोबारा जस-का-तस अन्यत्र छाप कर अंतत: इसमें डुप्लीकेट सामग्री डालकर उसमें जंक की वृद्धि तो नहीं कर रहे? कल को यदि उन्मुक्त जी के दो दर्जन प्रशंसक पैदा हो गए और सभी ने उनके चिट्ठों की सामग्री को इसी तरह के छः दर्जन प्रकल्पों पर डालने लगें तब?

जो भी हो, प्रशंसक महोदय, क्या आप सबके सामने आएंगे? काश हमें भी उन्मुक्त जी के प्रशंसक जैसा कोई मिलता? अभी तक तो हमारे चिट्ठों की चोरी एडसेंसिया फायदे के बिना पर होती रही है...

chotu google

यूनिकोड के आने से पहले भी हिन्दी प्रेमी इंटरनेट पर सक्रिय थे और तमाम जुगतों के जरिए अपनी रचनाएँ व कृतियाँ इंटरनेट पर प्रकाशित करते थे. बहुत सी साइटों मसलन प्रभासाक्षी.कॉम में कृतिदेव में तथा अभिव्यक्ति-हिन्दी.ऑर्ग में शुषा फ़ॉन्ट में लाखों पन्नों की हिन्दी सामग्री है.

अब आप इन्हें प्रभावी तरीके से इंटरनेट पर खोज बीन कर सकते हैं व प्रयोग कर सकते हैं.

यहाँ तक कि पीडीएफ़ फ़ाइलों की हिन्दी सामग्री को भी.

यह सुविधा आपके लिए प्रस्तुत किया है – छोटू गूगल ने. वैसे तो रफ़्तार, गुरूजी इत्यादि विशिष्ट खोज सेवाओं के जरिए पुराने हिन्दी फ़ॉन्टों की सामग्री को ढूंढने की सुविधा पहले से उपलब्ध है, मगर मामला घालमेल सा हो जाता है. यदि आपको किसी विशेष फ़ॉन्ट की सामग्री ही ढूंढनी हो तो यह नया विकल्प बहुत काम का है.

मैंने सरसरी तौर पर अभिव्यक्ति ढूंढा तो मेरे सामने एक बहुत ही शानदार हिन्दी पीडीएफ पत्रिका वाणी (http://hindipressclub.110mb.com/vaani/06/Vaani-06-high.pdf ) नमूदार हो गई. – पत्रिका शुषा फ़ॉन्ट में तैयार की गई है और उसका पीडीएफ़ इंटरनेट पर उपलब्ध है.

छोटू गूगल में खोज शब्द भरने के लिए दो खिड़कियाँ हैं. आप चाहें तो सीधे यूनिकोड में ऊपर की खिड़की पर खोजा जाने वाला हिन्दी शब्द भर सकते हैं, या फिर नीचे की खिड़की में संबंधित फ़ॉन्ट में (कृतिदेव या शुषा फ़ॉन्ट में).

मैंने कुछ और खोजबीन की तो कृतिदेव और शुषा में तो हिन्दी साहित्य का खजाना यत्र तत्र बिखरा हुआ मिल गया. तो चलिए कुछ खोजबीन आप भी करें, और यदि काम का कुछ निकलता है तो छोटू गूगल को दे दें धन्यवाद.

ह निबंध श्री आलोक पुराणिक के एक छात्र के परचे से ली गई है. निबंध का विषय था – अगर मैं गृहमंत्री होता...

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अगर मैं गृहमंत्री होता तो बहुत बड़े बड़े काम करता. यूं ही नहीं बैठा रहता. जैसे कि यदि कोई विमान अपहर्ता विमान अपहरण कर उसे कांधार ले जाता और 5 आतंकवादियों की मांग करता तो मैं बापू की शांतिप्रियता का उदाहरण देकर 5 के बदले 50 आतंकवादियों को खुद ले जाकर उन्हें सौंपता.

यदि मैं गृह मंत्री होता तो मुम्बई में आतंकवादी हमलों के समय कैमरे में इंटरव्यू देते समय हर घंटे कोई 2-3 ड्रेस बदलता. दिन भर में इस तरह 20-25 ड्रेस बदलता. स्मार्ट गृहमंत्री होने के नाते स्मार्ट दिखाई देना गृहमंत्री का धर्म है. और, करात-माया-लालू के जमाने में गृहमंत्री को वैसे भी इन दिनों लाइव कैमरे वाले, टीवी वाले रोज रोज पूछते कहां हैं भला?

यदि मैं गृहमंत्री होता तो देश की तमाम ईमानदार जनता को हाथी के पांवों तले कुचलवा देता. इन ईमानदार जनता के कारण ही देश का बेड़ा गर्क हो रहा है. भारत का एक ही धर्म घोषित करता – बेईमानी. तब जातपांत धरम के दंगे फसाद फुर्र से दूर हो जाते. भारत की जनता बेईमानी करने लगे तो यहाँ की गरीबी और भुखमरी को दूर होने में एक सेकण्ड की देर नहीं लगती. तब सारे भारतीयों का स्विस बैंक में खाता होता.

अगर मैं गृहमंत्री होता तो एक जूते खाने के बाद दूसरे की मांग करता चूंकि भई, एक जूते का भला क्या काम? एक जूता न फेंकने वाले के किसी काम का, न पाने वाले का.

अगर मैं गृह मंत्री होता...

(पर्चे का समय खतम हो गया था, अत: छात्र से जबरदस्ती उसकी कॉपी ले ली गई)

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जब से यह खबर मिली थी कि हिन्दी में ब्लॉगिंग की किताब बाजार में आ गई है, उत्सुकता बनी हुई थी कि कब ये हाथ में आए. कल ही ये किताब मिली और लीजिए, आपके लिए आज हाजिर है इसकी बेबाक समीक्षा.

तीन सौ से ऊपर पृष्ठों की, पॉकेटबुक साइज की इस किताब के लेखक हैं इरशादनामा के श्री इरशाद अली. प्रकाशन रवि पॉकेट बुक, मेरठ का है, और कीमत है एक सौ पचास रुपए. पुस्तक का काग़ज बढ़िया क्वालिटी का है और छपाई उत्तम है. किताब के फ़ॉन्ट पढ़ने में आसान हैं, और पृष्ठों का लेआउट भी बढ़िया है.

किताब निम्न चौदह खंडों में विभाजित है –

1. ब्लॉगिंग क्या है?

2. ब्लॉगिंग का इतिहास

3. ब्लॉग, ब्लॉगिंग, ब्लॉगर

4. ब्लॉग एग्रीगेटरों की दुनिया

5. कैसे जुड़ें ब्लॉगिंग से आप

6. आपका हिन्दी ब्लॉग

7. ब्लॉगिंग का बढ़ता क्षेत्र और लोकप्रियता

8. कैसे बनाएँ प्रभावी ब्लॉग

9. मशहूर ब्लॉग, ब्लॉगर और उनके किस्से

10. मजेदार ब्लॉगिंग

11. ब्लॉगिंग और कुछ सावधानियाँ

12. एडवांस ब्लॉगिंग टिप्स

13. कैसे हो ब्लॉगिंग से कमाई

14. सितारों के ब्लॉग.

अध्यायों को देखा जाए, तो ब्लॉगिंग की एक सम्पूर्ण किताब में जिन बातों को समावेश किया जाना आवश्यक है, वे तो प्रकटतः दिखाई दे रहे हैं. अब आइए, देखते हैं अध्यायों के सामग्री को. शुरूआत करते हैं प्रथम अध्याय से. ब्लॉगिंग क्या है? को पारिभाषित करते हुए (देखें पृ. 17) बताया गया है –

“ब्लॉग अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम

जन्म लेते ही मनुष्य रो कर विश्व को अपनी यह अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का प्रयास करता है कि अब, आज से, जगत में उसका भी कोई अस्तित्व है. अभिव्यक्ति का यह प्रयास उसके महाप्रयाण तक जारी रहता है....”

अरे! यह क्या? यह तो अभिव्यक्ति पर छपे मेरे लेख की कट-पेस्ट प्रतिलिपि है. इसी के कुछ हिस्से फिर से दोबारा पृष्ठ 52 तथा 146 पर छापे गए हैं. प्रथम अध्याय से शुरू कट-पेस्ट का सिलसिला किताब के अंतिम पृष्ठों तक जारी है. पुस्तक जीतेन्द्र चौधरी के लेख अतीत के झरोखे से तथा आप किस किस्म के ब्लॉगर हैं जी, .. इत्यादि इत्यादि, अभिव्यक्ति का मेरे आलेख चलो चिट्ठा लिखें से लेकर और भी तमाम कट-पेस्ट मसालों से अटा पड़ा है. ईपंडित के हिन्दी में व्यवसायिक चिट्ठाकारी आलेख है तो ईस्वामी का हिन्दी चिट्ठाकारी के ट्राल्ल भी. फुरसतिया का आत्मीय सवाल जवाब भी है तो दातुन कर ब्लॉग लिखने के फायदे भी. और तो और, ब्लॉगरों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प जिसे मैंने मजाहिया अंदाज में लिखा था, उसे ब्लॉगिंग टिप्स के रूप में जस का तस उतार दिया गया है.

कट-पेस्ट के ये महज उदाहरण हैं, और लगभग पूरी किताब प्रतीत होता है कि ऐसे ही तैयार की गई है. और भी ढेर सारे हिन्दी चिट्ठाकारों के हिन्दी ब्लॉग संबंधी आलेखों को सीधे सीधे कट-पेस्ट किया गया है.

किताब में ब्लॉग बनाने की विधि के नाम पर सिर्फ ब्लॉगर ब्लॉगस्पाट को पकड़ा गया है और उतना ही प्रसिद्ध, बल्कि निजी डोमेनों के लिए बहुप्रचलित विकल्प वर्डप्रेस को छोड़ दिया गया है. ब्लॉग संबंधी अन्य तकनीकी ज्ञान प्रदान करने में किताब शून्य है. ब्लॉग संबंधी विजेट, सीएसएस स्टाइल, एडऑन, पॉडकास्ट-वीडियोकास्ट-माइक्रोब्लॉगिंग-ट्विटर इत्यादि विषय लगभग अछूते से हैं.

प्रतीत होता है कि किताब को पॉकेट-बुक पाठकों के लिहाज से, उन्हें सिर्फ ब्लॉगिंग संबंधी सरसरी जानकारी मुहैया कराने  के एकमात्र उद्देश्य को लेकर तैयार किया गया है. पढ़ते समय कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा साफ नजर आता है, और इस किताब से ब्लॉग जगत में चार-छः महीने गुजार चुके चिट्ठाकारों के लिए काम की कोई चीज शायद ही नजर आए, चूंकि सारा माल इंटरनेट पर वैसे भी पहले से मौजूद है, और वो भी शुद्ध हिन्दी में. हाँ, हिन्दी ब्लॉग संसार से सर्वथा अनभिज्ञ व्यक्ति के लिए जरूर ये कुछ जानकारियाँ जुटा सकता है, मगर वो भी सबकुछ इतना बेतरतीब और बिखरा-बिखरा सा है कि वो कहेगा –

 

बहुत सुनते थे ब्लॉगिंग ब्लॉगिंग

हुँह, तो यही है ब्लॉगिंग श्लागिंग

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कल इसी ब्लॉग में भारतीय समयानुसार शाम पांच से नौ बजे के बीच एक अश्लील विज्ञापन प्रकाशित होता रहा. विज्ञापन एडसेंस की तरफ से स्वचालित आ रहा था और उसमें रोमन हिन्दी में पुरुष जननांगों के लिए आमतौर पर अश्लील भाषा में इस्तेमाल किए जाने वाले की-वर्ड्स (जिसे संभवत गूगल सर्च में ज्यादा खोजा जाता है) का प्रयोग किया गया था.

 

इस विज्ञापन को तत्काल ही गूगल एडसेंस के कम्पीटीटिव एडसेंस फ़िल्टर का प्रयोग करते हुए उस वेबसाइट के यूआरएल को ब्लॉक कर दिया गया. मगर, इस ब्लॉक को अमल में आते आते कुछ समय लगता है और तब तक तो आपका नुकसान, जाहिर है हो चुका होता है. और, किसी यूआरएल को ब्लॉक करना इलाज नहीं है, क्योंकि ये शैतान फिर कोई नए यूआरएल से ऐसा खिलवाड़ करेंगे.

 

वैसे, गूगल की नीति इस संबंध में बहुत कड़क है और वे इस तरह के अश्लील सामग्री अपने विज्ञापनों में कतई नहीं परोसते. मगर शैतान लोग गूगल के स्वचालित बॉट (क्योंकि अरबों पृष्ठों और लाखों विज्ञापनों को रीयल टाइम में दस्ती तौर पर जांचा परखा नहीं जा सकता) को बेवकूफ बनाते रहते हैं. यदि इस चिट्ठे पर ऐसी समस्या दुबारा आई, तो इन विज्ञापनों को सिरे से ही हटाने पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाएगा.

 

यदि आपके साथ भी ऐसी समस्या पूर्व में आई हो तो उसे अवश्य साझा करें. और यदि ऐसे विज्ञापन कहीं भी आपकी नजर में आएं तो तत्काल ही उस चिट्ठे के चिट्ठाकार को सूचित करें. कई मर्तबा ये अनडिटेक्टेड रह जाते हैं, और विज्ञापन चलते रहते हैं. और पाठकों की संवेदनाओं को चोट पहुंच सकती है, तथा चिट्ठाकार को अश्लीलता परोसने के आरोप में अनावश्यक कानूनी पचड़ों में फंसना पड़ सकता है.

 

इस चिट्ठे के पाठकों को उस विज्ञापन के जरिए हुई असुविधा के लिए खेद है.

 

तथाकथित विज्ञापन का अन्य विवरण व स्क्रीनशॉट मैंने अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे पर दस्तावेज के रूप में लगाया है जिसे आप निम्न यूआरएल पर जाकर देख सकते हैं. पर ध्यान रखें, भाषा अश्लील है.

http://raviratlami1.blogspot.com/2009/04/beware-google-adsense-ads-may-embarrass.html

यदि आपके पास विचारों की कमी नहीं है तो इंटरनेट की दुनिया में आप कभी भी धूम-धड़ाका कर सकते हैं. और वो भी बढ़िया धूम धड़ाका.
meridhun
मेरीधुन नाम के एक नए विचार ने जन्म लिया है और एक नजर में यह धूम धड़ाका ही है. मेरीधुन अपने तरह की एक नई सेवा है जिसे इंटरनेट पर जारी किया गया है. इसके बारे में आपको और बताएँ, इससे पहले आप ये गाना सुनें. और, ईमानदारी से, पूरा गाना सुनें, फिर आगे पढ़ें. (नोट - फ्लैश प्लेयर प्लगइन आवश्यक, नहीं तो यहाँ से डाउनलोड कर सुनें)

…. घर आजा वे…

सुन लिया गाना? कैसा लगा?
मूल गाना है – चन्ना वे घर आजा वे. इसे मनमाफिक परिवर्तित कर रविरतलामी घर आजा वे में बदल कर रीमिक्स रूप में रेकॉर्ड किया गया है.
meridhun channave remix
जी हाँ, मेरीधुन सेवा प्रचलित प्रसिद्ध गीतों को आपके मनपसंद, मगर थोड़े से सीमित तरीके से फेरबदल कर रेकॉर्ड कर आपको प्रस्तुत करती है. इसके लिए आपसे न्यूनतम रु 99/- से लेकर और अधिक राशि गानों के हिसाब से ली जाती है. आप गीतों को जन्मदिन, सालगिरह इत्यादि के मौकों के हिसाब से उपहार देने योग्य तैयार करवा सकते हैं. नववर्ष, होली-दीपावली इत्यादि के मौकों के लिए भी आप अपने मनमाफिक गीत तैयार कर सकते हैं. गीतों को आपके आदेश करने के उपरांत 72 घंटों में डिलीवर कर दिया जाता है, जिसे आप एमपी3 के रूप में डाउनलोड कर सकते हैं. आप चाहें तो इसकी सीडी के लिए भी आर्डर कर सकते हैं.
नए पंजीकृत प्रयोक्ताओं को रु 99/- का एक गीत मनमाफिक बनाने की सुविधा मुफ़्त में दी जा रही है. मैंने इन गीतों को मुफ़्त में ही बनवाया है.
बढ़िया, धूम धड़ाका है ना यह सेवा? तो फिर, एक गीत और सुनें (फ्लैश प्लेयर प्लगइन आवश्यक नहीं तो यहाँ से एमपी3 डाउनलोड कर सुनें). यह, आपको पता है कि मैंने किसके लिए रेकॉर्ड करवाया और किसे भेंट दिया? स्वर जरूर स्त्री के हैं, मगर भाव मेरे अपने हैं! आप भी अपने खड़ूस बॉस के नाम का एक गीत पप्पू कांट डांस साला वाला रेकॉर्ड कर उसे उपहार में दे सकते हैं.

… प्यार में हम संवरने लगे…?

new style for making love

मेरे प्यार को, मेरे मुहब्बत के इजहार के इस तरीके को जरा समझने की कोशिश तो करो जानेमन!

व्यंज़ल

जालिम जमाने ने सबकुछ बदल दिए
हां मुहब्बत के मायने तक बदल दिए

हमारा प्रेम परवान चढ़ता किस तरह
उन्होंने तो जब चाहे रास्ते बदल दिए

वक्त का तो क्या बताएँ आपको साहब
वक्त ने तो अच्छे महिवाल बदल दिए

उनके जरा से अहसास के लिए हमने
अपने दिनरात सुबह शाम बदल दिए

अपने मुहब्बत की खातिर रवि हमने
क्या कहें खुद को कैसे तमाम बदल दिए
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(समाचार कतरन साभार – टाइम्स ऑफ इंडिया)

तो, भीम बेटका (बैठकम या बैठका?) में आपका स्वागत है. भीम बेटका भोपाल (मप्र) से कोई 50 किमी दूर है. यह एक पर्वतीय स्थल है, जहाँ बहुत सी प्राकृतिक गुफाएँ हैं. इन्हीं गुफाओं में आदिमानवों का प्राकृतिक शैलाश्रय रहा था और अपने फुरसत के क्षणों में आदिमानवों ने गुफा की दीवारों पर विविध रूपाकारों में सैकड़ों दर्शनीय चित्र अंकित किए थे. यहां की कोई 500 से अधिक गुफाओं में सैकड़ों प्रागैतिहासिक चित्र है. यहाँ के कुछ चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं, और एक प्याला नुमा आकृति के बारे में कहा जाता है कि वो कोई एक लाख वर्ष पुराना है. अलबत्ता समय, काल और वातावरण की वजह से लगातार होते क्षरण से हमें उस प्याले नुमा चित्र के दर्शन तो नहीं हुए, मगर बहुत से चित्र पुरातन काल की जीवनी की बयानी करते मिले. पाषाणआश्रय के इन चित्रों को देखकर बरबस ही अपने पुरखों की याद आती है कि उनका प्राचीन, वन्य जीवन कैसा रहा होगा. अधिसंख्य चित्र 9 हजार वर्ष पुराने हैं.

भीम बेटका को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर भी घोषित किया जा चुका है. कुछ चित्र आप भी देखें –

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दुःख की बात है कि इन शैलाश्रयों और इनमें उकेरे चित्रों के पुख्ता संरक्षण के उपाय नदारद दिखे. चित्रों के ऊपर वेदरप्रूफ कोटिंग किया जाना आवश्यक है, अन्यथा कुछ वर्षों में इन चित्रों के पूरी तरह से नष्ट हो जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. कहीं कहीं पत्थरों की गुफाओं के दीवारों की परतें भी उखड़ कर गिर रही हैं.

भीम बेटका के बारे में गोविंद कुमार गुंजन ने अपने ब्लॉग में बहुत ही सुंदर प्रविष्टि लिखी है. जागरण में भी छोटा सा समाचार पढ़ें. विकिपीडिया पर भी बहुत बढ़िया जानकारी परक आलेख है.

 

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चलते चलते –

भीम बेटका में इनसे भी सामना हुआ:

 

जिंदगी की जद्दोजहद – पीपल का पेड़, दैत्याकार पाषाण शिला से बुरी तहर लिपटा हुआ - पत्थर में से तेल निकालना शायद यही है -

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और, दीवार पर लिखी ये इबारत -

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भाषा भले ही शुद्ध न हो, इरादे तो शुद्ध और नेक हैं!

Nero burning hindi

वैसे तो हिन्दी नामधारी फ़ाइलों व फ़ोल्डरों को सीडी/डीवीडी रोम डिस्क पर कई तरीके से बर्न किया जा सकता है,
और यदि आप लिनक्स में हैं (शायद सेब में भी कोई समस्या नहीं?) तो फिर तो कोई समस्या ही नहीं है. विंडोज में विस्ता व 7 में अंतर्निर्मित सीडीराइटरों के जरिए हिन्दी नामधारी फ़ाइलों व फ़ोल्डरों को सीडी में सीधे रेकार्ड किया जा सकता है. परंतु ये उतने उन्नत नहीं होते और इनमें बहुत सी कमियाँ होती हैं - जैसे कि मल्टी सेसन डिस्क तैयार करने के लिए बढ़िया सेवा जिससे कि रेकार्ड की हुई सीडी हर कम्प्यूटर पर बढ़िया चल सके, यह नीरो जैसे विशुद्ध सीडी बर्निंग प्रोग्रामों में ही उपलब्ध होता है.

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नीरो बर्निंग रोम के नए संस्करण (ट्रायल संस्करण 9.2.6 यहाँ से डाउनलोड करें) में हिन्दी नामधारी फ़ाइलों व फ़ोल्डरों को बिना किसी समस्या के बढ़िया तरीके से सीडी/डीवीडी पर रेकार्ड कर सकते हैं. यही नहीं, आप अपने सीडी/डीवीडी का नाम भी हिन्दी में रख सकते हैं. मैंने छत्तीसगढ़ी भाषा के केडीई अनुप्रयोगों को हिन्दी नाम देकर तथा इस डीवीडी को भी हिन्दी नाम देकर रेकार्ड किया है और इस हिन्दी नामधारी डीवीडी को किसी दूसरे कम्प्यूटर पर चलाने में कोई समस्या नहीं आई.

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