टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

15 लाख रुपए की गाँधी की लँगोटी




हमारी नामी कंपनी 'सो फ्लां' ने एक लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में पेश किया है. लिमिटेड एडीशन की सिर्फ 3000 लँगोटियाँ तैयार की गई हैं. इन लँगोटियों की ढेरों ख़ासियतें हैं जो इन्हें व इनके खरीदारों और प्रयोगकर्ताओं को विशिष्ट बनाती हैं. पहली खासियत तो ये है  कि इन्हें अति विशिष्ट किस्म के खद्दर से बनाया गया है. वही खद्दर, जो देश के नेताओं को आजादी के पहले और आजादी के बाद बहुत ही मुफीद बैठता आ रहा है अब तक. खद्दर के लिए कच्चा माल खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया के वर्जिन जंगलों से आयातित किया गया है. इसकी रुई प्राकृतिक रूप से उगे पौधों से तैयार की गई है और पूर्णतः जैविक पैदावार है, न कि रासायनिक और कृत्रिम रूप से उगी. इसे खास तौर पर डिजाइन किए गए हीरा मोती माणिक्य मढ़े करघे की सहायता से हाथ से बुना गया है. लँगोटी का डिजाइन प्रसिद्ध फ्रेंच फ़ैशन डिजाइनर 'विव सेंट फोरें' द्वारा रीडिजाइन कर बनाया गया है.
इसके बॉर्डर में विशेष किस्म के प्लेटिनम अलॉय का प्रयोग किया गया है जिससे लँगोटी सुन्दर, आकर्षक तो दिखती ही है, इस्तेमाल में नर्म और मुलायम भी होती है. इसकी ड्यूरेबिलिटी के लिए विशेष ट्रीटमेंट दिया गया है जिससे कि इसका प्रयोग एक बार में लगातार पाँच साल तक एक ही कुर्सी पर बैठकर किया जा सकता है.
गाँधी लँगोटी की एक और महत्वपूर्ण खासियत ये है कि आप नेता हों या अफसर, गाँधी लँगोटी डालकर बेशक भ्रष्टाचार के नए-नए, विशाल कारनामे कर सकते हैं. आपके ऊपर कोई आँच नहीं आएगी. आपने जो गाँधी लँगोटी का कैमोफ्लॉज पहना हुआ होगा. गाँधी लँगोटी आपको हर किस्म के चुनाव में (पूरे भारत में इसकी गारंटी है) जितवाने में सहायक होगा. आप लँगोटी की आड़ में आप चाहे कितने मतदाता खुले आम खरीद सकते हैं – कोई चुनाव आयोग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा – क्योंकि उसे तो आपकी गाँधी लँगोटी ही दिखाई देगी. गाँधी लँगोटी की ये भी खासियत है कि ये अपने मालिक के लिए अच्छे और मलाईदार पद वाली कुर्सियों की व्यवस्था खुद करेगा.

चूंकि गाँधी लँगोटी को लिमिटेड एडीशन के रूप में सीमित संख्या में जारी किया गया है, अतः इसके मालिक और प्रयोगकर्ता समाज में विशेष इज्जत और मान सम्मान के हकदार होंगे. वे समाज के एलीट क्लास और श्रेष्ठी वर्ग के लोग होंगे जो गाँधी लँगोटी को अफोर्ड कर सकेंगे. जाहिरा तौर पर ऐसे में चंद बड़े नेताओं, उद्योगपतियों और बड़े अफसरों के हाथ में ही गाँधी लँगोटी पहुँच पाएगी. और ऐसे में गाँधी लँगोटी धारकों को हर कहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में माना जाएगा और उनका स्वागत सत्कार किया जाता रहेगा.

इन लँगोटियों की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इन्हें सर्वसिद्धि यंत्र के रूप में प्रयोग में लिया जा सकता है. आपका काम कहीं रुक रहा हो, अड़ रहा हो, कहीं फंस रहा हो, बस एक अदद गाँधी लँगोटी की दरकार है आपको. एक अदद गाँधी लँगोटी सामने वाले अफसर/नेता/मंत्री को गिफ़्ट कर दें. गाँधी लँगोटी का असर चौबीस घंटे के भीतर होगा और आपका रुका हुआ काम बन जाएगा. वैसे भी गाँधी लँगोटी को खास इन्हीं कामों को ध्यान  में रख कर डिजाइन किया गया है.

इन लँगोटियों की वैसे तो और भी ढेरों खासियतें हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता और इन्हीं खासियतों के चलते लिमिटेड एडीशन गाँधी लँगोटी बाजार में जारी होते ही सोल्ड आउट हो गई और सुना है कि अब उसकी ब्लैक मार्केटिंग हो रही है. एक शीर्ष के वित्तीय सलाहकार के मुताबिक इन्वेस्टमेंट के लिहाज से भी गाँधी लँगोटी पर निवेश करना एक समझदारी भरा निर्णय होगा. इसीलिए गाँधी लँगोटी चाहे जितनी खरीद सकें खरीद लें.

गाँधी लँगोटी के बाजार से उत्साहित हमारी कंपनी जल्द ही गाँधी लाठी, गाँधी घड़ी, गाँधी खड़ाऊँ, गाँधी धोती के लिमिटेड एडीशन जारी करने जा रही है. इनमें भी एक से बढ़कर एक खासियतें होंगी. अग्रिम बुकिंग चालू है. इससे पहले कि आप पीछे रह जाएँ, गाँधी को लपक लें. गाँधी की लँगोटी ही सही!
---

व्यंज़ल

यहाँ कहीं दिखती नहीं लँगोटियाँ
क्या हमने पहनी भी हैं लँगोटियाँ


यथा राजा तथा प्रजा के तर्ज पर
लोगों ने कब से तज दी लँगोटियाँ


मेरे शहर की सूरत यूँ बदल गई
यहाँ सरे आम धुलती है लँगोटियाँ


वक्त ने सब उलट कर रख दिया
पैंट के ऊपर पहनते हैं लँगोटियाँ


अपने  को छुपाने में लगा है रवि
पहन कर लँगोटियों पे लँगोटियाँ
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(स्क्रीनशॉट – साभार नई-दुनिया ईपेपर)

एक टिप्पणी भेजें

पूरे गाँधी को बेचो...टूकड़े टूकड़े क्यों?

@ संजय जी,
मार्केटिंग स्ट्रेटेजी - टुकड़े टुकड़े में ज्यादा फ़ायदा दीख रहा है!!!

अगर किसी एक टुकड़े से भी कोई गांधी निकल आया तो इनका क्या होगा??
हिन्दी टेक ब्लॉग
http://computerlife2.blogspot.com/

यही तो बचा है अब ! कलम वाली खबर मैंने भी देखि. मार्केटिंग का ज़माना है जी. गाँधी बियर कब आ रही है?

गजब की है यह लगोटी गाथा ।

लंगोटियां ही लंगोटियां...
बढ़िया मार्केटिंग हो गयी गाँधी लंगोट की ...!!

गाँधी के नाम को बेचना बहुत आसान हो गया हे. जो जब चाहे, जेसे चाहे बेचने में लगा हुआ हे और मजा ले रहा हे. ये सोता हुआ भारत हे मेरे दोस्त, इसे सोने दो. अभी न जाने गाँधी बापू के नाम से क्या-क्या बिकना बाकि हें.
रास्ता दिखाने वालो का अब यही सम्मान होना बाकि हे. गाँधी बापू के नाम की मर्यादा का तो हमें सम्मान करना ही पड़ेगा. आब वक़्त आ गया हे की उनके नाम के इस्तेमाल पर पाबन्दी को लेकर चर्चा होनी चाहिए.
शाश्वत तिवारी, पत्रकार
लखनऊ

मैंने अफ़लातून जी के यहँ गाँधी जी रिश्तेदार का इस तरह का सुकर्म पढ़ा था, फिर तो ये कुछ और ही है…

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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