टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

आदमी के बेबस होने के तो, और भी हजारों कारण हैं...

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आदमी, खूबसूरत औरत के सामने बेबस हो जाता है. ठीक है. तो, वो ज्यादा खूबसूरत औरत के सामने ज्यादा बेबस हो जाता होगा. विश्व सुंदरी के सामने तो वो सर्वाधिक बेबस हो जाता होगा. शायद यही कारण है कि आदमी, सदैव से, चिरंतन काल से औरतों को परदों-प्रतिबंधों में रखता आया है. चाहे वो बुरका हो साड़ी का पल्लू हो या पश्चिमी हैट – औरतों को ढांप कर अपने बेबसपने को एक हद तक ढांपने का, उसे काबू में करने का ये बड़ा बढ़िया तरीका गढ़ लिया था आदमी ने!

वैसे, जनता (माने आदमी हो या औरत) तो गाहे बगाहे बेबस होता ही रहता है. जनता के बेबस होने के दर्जनों, जन्मजात कारण हो सकते हैं. कुछ कारण तो जग जाहिर हैं ही –

  • चुनावों के समय जनता भारी बेबस हो जाती है. हर पार्टी के छोटे-बड़े नेता लोगन बड़े बड़े वादे करने थोक के भाव में जनता के दरबार में चले आते हैं. जनता बेचारी बेबस हो जाती है कि वो इन वादों को कहां रखे, क्या करे, क्या न करे. दरअसल, बेबस जनता के पास इन वादों को संभालने का कोई जरिया नहीं होता है, इसीलिए अकसर ये चुनावी वादे कभी पूरे नहीं हो पाते.

  • भारतीय सड़कों पर चलते समय तमाम विश्व की जनता बेबस हो जाती है. भारत की सिंगल लेन की सड़कों पर भारी भीड़, वाहनों के रेलमपेल, गड्ढों, ट्रैफ़िक जाम के बीच में बैठे गाय गरू और अगल बगल तंबू लगाए ठेले खोमचे वालों के बीच चलते हुए सिर्फ भारतीय जनता है जो बेबस नहीं होती है, पर, इसके उलट, जब खाली, छः आठ लेन की चमचमाती सड़कों पर कभी भूले भटके भारतीय जनता पहुँच जाती है तो बेबस हो कर उसके पैर कांपने लगते हैं, और वो वहीं की वहीं खड़ी रह जाती है.

  • जनता जब सरकारी ऑफिस में जाती है तो बेबस जाती है. वैसे, इस तरह के बेबसपने का इलाज सरकारी अफसर टेबुल के नीचे फीस लेकर तुरत-फुरत कर देते हैं. पर ये इलाज सारी जनता के बूते की बात भी तो नहीं है.

  • जनता बाजार जाती है तो दुकानों में सामानों के भाव सुनकर बेबस हो जाती है.

  • साहित्यकार (चाहें तो सहूलियत के लिए ब्लॉगर पढ़ लें,) जनता एक दूसरे के साहित्य (यहाँ भी सहूलियत के लिए ब्लॉग पढ़ लें,) सृजन को देख देख कर बेबस होती रहती है और इस वजह से उलटे सीधे बयान बाजी करती रहती है – एक दूसरे के लेखन को कूड़ा कचरा बताती रहती है.

अजी अब और क्या गिनाएँ, संख्या बढ़ा कर हमें आपको बेबस करने का ऐसा भी कोई इरादा नहीं है कि आप बेबस होकर कर इधर कभी मुँह न करने की कसम लेकर जाएँ.

व्यंज़ल

फिर तेरी याद आई तो बेबस हो गया

आज तो अकारण यूं ही बेबस हो गया


किसी ने आज फिर रची है प्रेम कविता

यारों देखो तो फिर कोई बेबस हो गया


दिमाग तो हमने रख रखे थे काबू में

क्या बताएँ अपना दिल बेबस हो गया


मुद्दत से इंतजार था मौसम बदलने का

जो बहार आई तो बस बेबस हो गया


बातें तो बहुत की थी जेहाद की रवि ने

हथियार पकड़ते ही वो बेबस हो गया

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एक टिप्पणी भेजें

पढ़ कर बड़ा बेबस सा फील कर रहे हैं, टिप्पणी करनी ही पड़ेगी...

आपके सामने
हम भी बेबस हैं टिप्पणी करने के लिए :-)

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, आभार

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ........बहुत बढिया

इतने लोग बेबस हो गए तो मैं भी बेबस हो गया, अजी टिपियाने के लिए....

बातें तो बहुत की थी जेहाद की रवि ने

हथियार पकड़ते ही वो बेबस हो गया । ....
बहुत खूब ।

बहुत बेबस किया जी आपने हमें, पर कविता अच्छी बन पड़ी है।

टिपण्णी करने को तो बेबस कर ही दिया है ...
काश सरकार,ब्लोगर्स(हम नहीं ),जनता भी बेहतर करने को बेबस हो जाये..!!
बहुत शुभकामनायें ..!!

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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