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गुमशुदा की तलाश : अक्षरग्राम, सर्वज्ञ, परिचर्चा – जहां कहीं भी हो चले आओ, तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा.

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इंटरनेट पर हिन्दी के शुरूआती दिनों में हिन्दी के पाँव जमाने में कुछ खूबसूरत प्रकल्पों का बड़ा हाथ रहा है. इनमें अक्षरग्राम, उसका सर्वज्ञ, अनुगूंज तथा परिचर्चा का नाम सर्वोपरि रहा है. अक्षरग्राम में बहुत सी सामग्री है, जो हिन्दी और हिन्दी वालों के लिए बहुत काम की है. सर्वज्ञ में हिन्दी में लिखने पढ़ने की तकनीकी समस्याओं का तमाम समाधान उसमें संग्रहित आलेखों और कड़ियों में है. इसी प्रकार परिचर्चा फोरम में हिन्दी की तकनालाजी से लेकर घिसे-पिटे चुटकुले तक यानी हर मामले में परिसंवाद का अच्छा खासा और काम का संग्रह था. और, एक समय अक्षरग्राम साइट माइक्रोसॉफ्ट नेटवर्क तथा नवभारत टाइम्स के बाद तीसरे नंबर पर था. बीबीसी हिन्दी का नंबर 8 वां तथा वेबदुनिया हिन्दी का नंबर 10 वां था!

 

अभी ये सभी मृत-प्राय: पड़े हैं. नारद जी का भी स्वास्थ्य ठीक नहीं है. क्या इनमें पुन: जान नहीं फूंका जाना चाहिए? इसी तरह से चिट्ठाविश्व था हिन्दी का पहला चिट्ठा-संकलक. (देखें इसका जुलाई 2004 का पृष्ठ!) इसे भी ऐतिहासिक दृष्टि से ही सही, कहीं पर पुनर्जीवित नहीं किया जाना चाहिए?

क्या ये प्रकल्प चिट्ठाजगत् से जुड़ सकते हैं? या इनकी सामग्री चिट्ठाजगत् में सीधे ही या रिडायरेक्ट करते हुए डाली जा सकती है?

प्रसंगवश, क्या अब यह समय नहीं आ गया है कि ब्लॉगवाणी / चिट्ठाजगत जैसे प्रकल्प दिन-दूनी-रात चौगुनी प्रगति करने के लिए, आवश्यक संसाधनों (पैसा व मानव श्रम दोनों ही – डेडिकेटेड प्रोग्रामर व वेबमास्टर को नियमित नौकरी पर रखकर) को लगातार बनाए रखने के लिए, उन्हें अपना व्यवसायिक रूप अख्तियार नहीं करना चाहिए? अन्यथा ये अपने-अपने मालिकों से रिसोर्सेस ब्लीड करते रहेंगे और, खुदा न करे, किसी दिन बेमौत मर जाएँगे.

 

अक्षरग्राम के कुछ खूबसूरत पन्ने आर्काइव.ऑर्ग में यहाँ देख सकते हैं

टिप्पणियाँ

  1. परिचर्चा की याद तो मुझे भी है। वक्त पर बहुत बड़ी सहायता उसी से मिली थी।

    अपका चिन्तन भी अपनी जगह ठीक है

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  2. भाई सा'ब इसका रोना तो कब का रो चुका, अब दिल पर पत्थर रख लिया है. यादें बहुत सी है मगर लगता है लौटे दिन फिर न आएंगे. वैसे स्वागत के लिए तत्पर है.

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  3. चिट्ठाजगत की धरोहर को पूनर्जिवित करने में हम अपनी सेवाएं देने को तत्पर हैं, आप कोई हुकुम करों.

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  4. बात तो ठीक है - उन्हें व्यवसायिक रूप अख्तियार करना चाहिए?

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  5. सही सुझाव है आपका

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  6. चिन्तनीय विषय। सुरक्षा के लिए कुछ तो उपाय करने ही होंगे।

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  7. रवि जी |अच्छा विचार है आदेश कीजिये मैं तयार हूँ

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  8. रवि जी, वह दिन ही दूसरे थे।

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  9. Ratlami ji
    aapke vichar bahut samayik hai

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  10. सही बात है आपकी पर विज्ञापनों के अभाव में हिंदी ब्लागिंग का हाल भी हिन्दी प्रिंट मीडिया जैसा ही है.

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  11. वाकई रवि जी वो जमाना ही कोई और था। उपरोक्त मेरी सबसे प्यारी साइटें थी। ये साइटें अहसास दिलाती थी कि इंटरनेट के विशाल सागर में हम हिन्दी वालों का भी वजूद है।

    भूतपूर्व ब्लॉगर बने कोई दो साल होने को आए पर अब भी ये नाम सुनते ही चिट्ठाजगत की यादों में डूब जाता हूँ।

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  12. हिंदी ब्लाग जगत की शुरुआती दिनों की यादें हैं ये। इनका उपलब्ध होना बहुत जरूरी है। आलोक ने आज कहा है कि वो पंकज नरुला से संपर्क करके इसको फ़िर से उपलब्ध कराने के लिये कहेंगे।

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  13. रवि भाई,
    अक्षरग्राम की आकस्मिक बन्द होने के लिए मै क्षमाप्रार्थी हूँ। दरअसल पंकज (नरुला)भाई ने नया होस्टिंग प्लान लिया था, वहाँ पर वो साइटें शिफ़्ट कर रहे थे, सब कुछ टेस्टिंग सही चल रही थी, लेकिन जैसे ही हमने अक्षरग्राम का डोमेन उधर शिफ़्ट किया तो सिर्फ़ एक ही साइट चली बाकी नही चल पा रही थी। अब चूंकि पंकज भाई इस काम को देख रहे थे, इसलिए मैने हस्तक्षेप नही किया, फिर इधर ऑफिस के कामों मे इतना व्यस्त हो गया कि सामूहिक वैबसाइटे तो दूर, अब अपने ब्लॉग पर भी लिखना काफी कम हो गया है। लेकिन अभी भी जहाँ भी सम्भव हो सका मै इस बारे मे पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हूँ। सारा बैकअप उपलब्ध है, लेकिन हमे कुछ स्वयंसेवक चाहिए, फिर से टीम को खड़ा करना होगा, रेसेशन के इस दौर मे पुरानी टीम अपने अपने काम मे बुरी तरह से व्यस्त हो गयी है। आप पंकज भाई से सम्पर्क करिए, जैसा भी सम्भव होगा वे पूरा सहयोग करेंगे।

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  14. हम तो इस दुनिया में नये आये हैं। इन पुराने दिग्गजों की कहानी अनूप जी से सुन रखी है। थोड़ी कहानी मैने अपनी सद्यःप्रकाशित किताब “सत्यार्थमित्र” में आपके हवाले से बतायी भी है।

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  15. इस सेवा-कार्य में यदि मुझे किसी लायक समझा जाए तो याद भर कर लीजिएगा

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  16. मैं भी उपलब्ध हूँ सहयोग के लिए

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  17. बहुत अच्छा सुझाव है। हिंदी ब्लोगिंग के इतिहास का अभिलेखन होना चाहिए। यह किस तरह किया जाए यह तकनीकी विषय है, और जानकार लोग ही राय दे सकते हैं। पर इसे करना जरूरी है। चिट्ठाजगत, ब्लोगवाणी आदि का भी अभिलेखन होना चाहिए।

    जिन पुराने स्थलों का आपने जिक्र किया है, उनमें से किसी से भी परिचित नहीं हूं। ब्लोग दुनिया में मैंने कुछ महीने पूर्व ही पदार्पण किया है। पर हिंदी ब्लोगिंग को जमाने के लिए इन पुराने महारथियों ने जो काम किया है, उसके लिए उनका नमन करता हूं।

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  18. बिल्कुल सही बात है। बहुत सी यादें इनसे जुड़ी हैं। आज इन्हें याद करना नास्टेल्जिया में ले जाता है। यदि इन 'समवेत स्वर' को पुनर्जीवन मिल सके तो बहुत अच्छा होगा।
    पहले भी एकबार नारद के पुनरद्धार के लिए सामुहिक प्रयास हुआ था।
    इस बार भी अग्रज और जानकार लोग सुझाएँ। सब लोग हैं ही साथ में।

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  19. अरे हम कैसे भूलेंगे उन्हें...शुरुवाती दिनों में वे गुरु रहे हैं हमारे... अपने आपको आई.टी एक्सपर्ट समझते हैं लेकिन गुरु दक्षिणा देने के लिए सदैव तैयार हैं... हम ( सुक्रितिसोफ्ट.कॉम) आदेश पालन के लिए तैयार है...

    धन्यवाद!!

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