September 2008

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कैसी जानकारियाँ? नफा नुकसान का विवरण पिछली दफा आयोजित बार कैम्प3  में मौजूद रहे अनिल रघुराज के चिट्ठे पर यहाँ पढ़ें. और यदि आपको लगता है कि वास्तव में बार कैम्प में जानकारियाँ मिलती हैं, वो भी बिलकुल मुफ़्त, तो आईआईटी पवई मुम्बई में 4 और 5 अक्तूबर को होने जा रहे मुम्बई बार कैम्प 4 में अवश्य सम्मिलित हों. पिछला आयोजन एक दिनी था. अब यह दो दिन का आयोजन है – इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आपके ब्लॉगीय ज्ञान में कितनी वृद्धि संभावित है.

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   mumbai bar camp

संबंधित चिट्ठा – बार कैम्प मुम्बई – क्या आप भी आ रहे हैं? http://ullu.wordpress.com/2008/09/27/barcamp-mumbai-4/

हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के फ़ॉयरफ़ॉक्स 3.02 बीटा संस्करण यहाँ से डाउनलोड करें :

 

http://en-us.www.mozilla.com/en-US/firefox/all.html#beta_versions

 

डाउनलोड विंडोज, मॅक तथा लिनक्स तीनों प्लेटफ़ॉर्म के लिए उपलब्ध है.

हिन्दी का डायरेक्ट डाउनलोड लिंक विंडोज के लिए:

http://download.mozilla.org/?product=firefox-3.0.2&os=win&lang=hi-IN

तथा लिनक्स के लिए:

http://download.mozilla.org/?product=firefox-3.0.2&os=linux&lang=hi-IN

 

फ़ॉयरफ़ॉक्स 3 का संस्करण जब जारी हुआ था तब इसमें हिन्दी नहीं होने पर खूब हल्ला मचा था. इसी वजह से नए संस्करण में हिन्दी को शामिल करने के लिए ताबड़तोड़ कोशिशें की गईं और प्रतिफल सामने है.

आदम और हव्वा...

osama bin laden was a poet

 

व्यंज़ल :

जमाने की दुश्वारियाँ रही होंगी
वरना हम भी तो एक कवि थे

जलसे में उस दिन हादसा हुआ
सुना है वहाँ बहुत से कवि थे

कोई ये कैसे स्वीकारेगा भला
संगीन लिए लोग कभी कवि थे

कुपोषण से मर गया शहर मेरा 
क्योंकि शहर में सभी कवि थे

तुम क्या बताओगे हक़ीक़त रवि
सबको मालूम है तुम कवि थे
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(समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया)

tag  : osama bin laden’s poetry book, poet osama, osama’s book of poems

ठेठ भारतीय भाषा में प्रोग्रामिंग की सुविधा उपलब्ध करवाने वाले औजार हिन्दवी  का ऑनलाइन, नया संस्करण http://hindawi.in/online/  जारी किया गया है. यानी आप सीधे ही अपने ब्राउजर के जरिए भारतीय भाषाई प्रोग्रामिंग कॉसेप्ट को न सिर्फ सीख सकते हैं, वरन उसमें महारत भी हासिल कर सकते हैं. ऑनलाइन प्रोग्रामिंग औजार की खासियत ये है कि इसमें आपको अपने कम्प्यूटर में संस्थापित करने की आवश्यकता नहीं है, आप किसी भी जावा सक्षम ब्राउजर (चिंता मत कीजिए, सभी आधुनिक ब्राउजर इसमें सक्षम हैं) के जरिए अपने कम्प्यूटर, लैपटॉप पर और कुछ खास मोबाइल उपकरणों पर भी हिन्दी में प्रोग्रामिंग कर सकते हैं.

hindawi online hindi programming tool

हिन्दवी के ऑनलाइन कमांड टर्मिनल पर मदद टाइप करें व एंटर बटन दबाएं. आप देखेंगे कि आंतरिक कमांड की सूची दिखाई देगी. किसी भी कमांड का प्रयोग कर देखें. जैसे कि दिन कमांड से आपको टर्मिनल दिन व समय प्रदर्शित करेगा. सूची कमांड से सूची दिखेगी, इत्यादि. सारा कुछ मदद व अन्य जानकारी स्क्रीन पर भी दिखाई देती है.

हिन्दवी सीखने के लिए ऑनलाइन वीडियो ट्यूटोरियल भी उपलब्ध है, और भविष्य में इसमें और भी विस्तार करने की योजना है.

हिन्दवी प्रोग्राम परियोजना को पिछले वर्षों में कई विशिष्ट पुरस्कार मिल चुके हैं, और ये अपने तरह की विशिष्ट परियोजना है – भारतीय भाषाई क्लिष्ठता को देखते हुए कई विद्वानों ने हिन्दवी जैसी प्रोग्रामिंग परिकल्पना को असंभव सा करार दिया था. मगर अब यह ऑनलाइन भी उपलब्ध है.

 

इस परियोजना के विकासकर्ता अभिषेक और श्वेता चौधरी को बधाई व शुभकामनाएँ.

 

tag  : hindawi, programming in hindi, indian language programming, online hindi programming tool

swami vivekanand liberary

किसी ने कहा है कि आप मुझे किताबें दे दीजिए और बियाबान जंगल में छोड़ दीजिए. मैं ताजिंदगी तब तक कभी बोर नहीं होउंगा, जब तक कि मेरे पास पढ़ने के लिए किताबें रहेंगी. इंटरनेट युग में आपका पीसी, लेपटॉप और मोबाइल उपकरण इस जरूरत को पूरी करने में कुछ हद तक सक्षम तो है, परंतु वे भौतिक पुस्तकों का स्थान कभी ले पाएंगे अभी इसमें संदेह है.

भोपाल आते ही मेरे सबसे पहले के कार्यों में शामिल था पुस्तकालयों को तलाशना. मुझे यहाँ के पुराने, प्रसिद्ध सेंट्रल लाइब्रेरी के बारे में बताया गया. सेंट्रल लाइब्रेरी यहाँ के भीड़ भरे इलाके पुराना भोपाल, इतवारिया के पास है. पूछते पाछते वहाँ पहुँचा तो पाया कि सेंट्रल लाइब्रेरी का सामने का गेट रोड से दिखाई ही नहीं देता. लोहे का गेट जर्जर होकर जमीन में धंस गया है. एक पतली सी पगडंडी इमारत तक जा रही थी. अंदर पहुँचे तो जर्जर होती इमारत में पूरा पुस्तकालय उतने ही जर्जर हालत में मिला. पुस्तकालय के कार्यालयीन समय 3 बजे दोपहर (कार्यालयीन समय सुबह 11 से 5, रविवार एवं अन्य शासकीय अवकाश पर बन्द) के समय वहाँ कोई पाठक नहीं था. वहाँ मौजूद कुल जमा तीन स्टाफ में दो आपस में बातें करते बैठे थे व तीसरा अपनी कुरसी पर पैर फैलाए ऊंघ रहा था. सदस्यता बाबत पूछताछ की गई तो पता चला कि आपको अपनी आइडेंटिटी प्रूफ (?) बतानी होगी और 750 रुपए जमा करने होंगे जिसमें 500 रुपए डिपाजिट के रहेंगे और 250 रुपए सालाना सदस्यता शुल्क. सदस्य कोई 2 किताबें 500 रुपए मूल्य तक की ले जा सकता है.

इस पुस्तकालय का हिसाब किताब यानी इसके संकलन व इसकी सेवा मुझे कुछ जमी नहीं और मैंने दूसरे विकल्पों को तलाशा. पॉलिटेक्नीक चौराहे पर हिन्दी भवन में पंडित मोतीलाल नेहरू शासकीय पुस्तकालय के बारे में पता चला. वहां सदस्यता के लिए 550 रुपए देने होते हैं, कोई आइडेंटिटी प्रूफ आवश्यक नहीं है. 500 रुपए डिपाजिट के, 50 रुपए वार्षिक शुल्क जिसके एवज में 250 रुपए मूल्य की चाहे जितनी किताबें आप जारी करवा सकते हैं. संकलन में अधिकतर किताबें जर्जर हालत में रखी हुई व पुरानी दिखाई दे रही थीं. हाँ, हिन्दी व कुछ अंग्रेजी की पत्रिकाएँ भी थीं जिन्हें सदस्य जारी करवा सकते हैं. इसका कार्यालयीन समय सुबह 9.30 से शाम 6 बजे तक है. रविवार व अन्य शासकीय छुट्टियों में बंद. जब मैं वहाँ बारह बजे पहुंचा तो इस लाइब्रेरी में सिर्फ दो पाठक थे. वे रोजगार और निर्माण के पुराने अंकों को पढ़ रहे थे.

इस बीच किसी ने मुझे सुझाव दिया कि भोपाल की ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी क्यों नहीं देखते. इस लाइब्रेरी के बारे में पड़ताल किया तो पता चला कि इसका नया नामकरण विवेकानंद पुस्तकालय हो गया है और अब यह मप्र सरकार के अधीन है. न्यू मार्केट स्थित इस पुस्तकालय में पहुँचा तो उसके चकाचक कांच के गेट पर कड़क ड्रेस पहने दरबान ने सैल्यूट ठोंका और मेरे लिए दरवाजा खोला. मुझे लगा कि मैं किसी होटल में तो नहीं आ गया हूं. मैंने उससे दोबारा तसदीक की कि क्या मैं विवेकानंद लाइब्रेरी में ही हूं?

सामने रिसेप्शन पर कम्प्यूटरों पर दो व्यक्ति बैठे थे. इस लाइब्रेरी का सारा कार्य कम्प्यूटरों से होता है और आप किताबों को वहां रखे कम्प्यूटरों से सर्च भी कर सकते हैं. उनमें से एक से सदस्यता संबंधी पूछताछ करने पर उसने मेरे सामने एक शानदार ब्रोशर प्रस्तुत किया. उसमें सदस्यता के विविध विकल्प दिए हुए थे. उदाहरण के लिए, पारिवारिक सदस्यता में आपको 2300 रुपए वार्षिक जमा करवाने होते हैं और (कोई डिपाजिट नहीं,) आप एक बार में निम्न सामग्री जारी करवा सकते हैं –

  • बच्चों की 5 किताबें
  • 2 सीडी
  • 4 सामान्य किताबें
  • 2 आडियो
  • 2 पत्रिका
  • 2 डीवीडी
  • असीमित इंटरनेट का प्रयोग – मूल्यों का कोई बंधन नहीं

इस पुस्तकालय में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रायः सभी तरह की नई पुरानी किताबें, पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार पत्र इत्यादि सभी उपलब्ध हैं. पुस्तकालय पूरी तरह एयरकंडीशंड है, व इसे पूरा कारपोरेट लुक दिया गया है. बीच में बच्चों का खंड है जहाँ उनसे संबंधित किताबें हैं जिन्हें इस तरह से जमाया गया है जिसे देख कर ही बड़ों के भी बचपन के दिनों के लौट आने का अहसास होता है. पुस्तकालय में अच्छी खासी चहल पहल थी. इसका कार्यालयीन समय सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक है व रविवार को खुला रहता है व सोमवार को बन्द रहता है. समय समय पर यहाँ सेमिनार इत्यादि होते रहते हैं तथा यहाँ शिक्षा व नौकरी से संबंधित एक अलग खंड भी है. इसका जालस्थल भी है http://svl.nic.in

अब आपसे इनमें से किसी एक पुस्तकालय की सदस्यता लेने को कहा जाए तो आप किसकी सदस्यता लेंगे?

मगर ठहरिये. एक समस्या है. कारपोरेट लुक वाली, एयरकंडीशंड विवेकानंद लाइब्रेरी में सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा की ही किताबें और पत्र-पत्रिकाएं मिलती हैं. हिन्दी के लिए आपको या तो सेंट्रल लाइब्रेरी जाना होगा या मोतीलाल नेहरू पुस्तकालय.

तो क्या अंग्रेज़ी का पाठक ही सालाना ढाई हजार वार्षिक सदस्यता भर सकता है? और क्या उसे ही फ़ाइव स्टार सुविधा मिलेगी? हिन्दी के पाठक के पास क्या ऐसी काबिलीयत नहीं है कि वो दो-ढाई सौ रुपए सालाना से ज्यादा खर्च कर सकता हो और क्या उसे रद्दी सेवा, घटिया सुविधाओं और पुराने जर्जर पुस्तकों से ही संतोष करना होगा?

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tag – library, pustakalaya, swami vivekanand library, british council library

इससे बेहतर समय हो ही नहीं सकता था. 19 20 सितम्बर सॉफ़्टवेयर मुक्ति दिवस है और साथ ही साथ हिन्दी पखवाड़ा भी चल रहा है. संयोगवश, भारतीय भाषाई लिनक्स पर समर्पित संस्था इंडलिनक्स की आठवीं वर्षगांठ भी इसी हफ़्ते (16 सितम्बर) गुजरा है.

इस अवसर पर हिन्दी की एक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका लिटरेचरइंडिया http://literatureindia.com/hindi/ (ये द्विभाषी है यानी अंग्रेज़ी में भी है, इसीलिए नाम अंग्रेज़ी में है, इसीलिए कोई पंगा नहीं;) जो पूरी तरह मुक्त सॉफ़्टवेयर ज़ूमला पर आधारित है, उसका लोकार्पण समारोह आईआरसी चैनल फ्रीनोड (ये भी मुक्त जाल अनुप्रयोग है) पर #sarai चैनल पर होगा, जिसमें तमाम विश्व के पाठक इंटरनेट के जरिए शामिल हो सकते हैं

इसका लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक, कवि, अनुवादक ओर संप्रति वाणी प्रकाशन में संपादकीय सलाहकार नीलाभ करेंगे. यदि आपने अस्सी के दशक में बीबीसी हिन्दी सुना होगा तो नीलाभ की खनकदार आवाज उनकी शानदार, दमदार रिपोर्टिंग के साथ आपके कानों में अवश्य गूंजी होगी.

लिटरेचरइंडिया का इंटरनेटी लोकार्पण समारोह अपने किस्म का पहला व अनोखा आयोजन होगा जिसमें आप भी सादर आमंत्रित हैं.

यह समारोह 19 20 सितम्बर, शनिवार को शाम 4 बजे (भारतीय समय) आईआरसी फ्रीनोड (freenode) के चैनल #sarai पर आयोजित है. आप इस समारोह में इस चैनल पर ऑनलाइन रिले चैट सुविधा http://mibbit.com/ के जरिए आसानी से भाग ले सकते हैं. आपको किसी अन्य चैट क्लाएंट को अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित करने की आवश्यकता ही नहीं. आपने इसे पहले प्रयोग नहीं किया है तो आपकी सुविधा के लिए इसकी विधि बता रहे हैं जी करुणाकर :

mibbit - online irc chat

जिन्होंने IRC का पहले उपयोग न किया हो

1) http://www.mibbit.com/ पर जाएँ

2) Connect to IRC: की सूची में Freenode.net चुनें

3) अगर आपके ब्राउज़र में हिन्दी ठीक दिखता हो ठीक है नहीं तो Charset पर क्लिक करके सुनिश्चित करें कि वो UTF-8 ही है.

4) Nick: में अपना नाम या उपनाम अंग्रेजी में भरें, पूरा नहीं बस एक शब्दमें हो जैसे - ramlakhan, akbarali, mungerilal..इत्यादि

5) Channel(s): में #sarai भरें , फिर Go पर क्लिक करें बस

इसके बाद अगर आपके इन्टरनेट की गति कछुए से तेज हो तो, एक नया पेज लोड होगा जहाँ दाएँ और ऑनलाइन लोगों की सूची होगी , बीच के बडे डब्बे में वार्तालाप दिखेगा , और नीचे की पट्टी में आप अपना संदेश लिख कर उसे भेजने के लिए एंटर बटन दबाएँ. यदि सीधे हिन्दी में लिख सकें तो ठीक, नहीं तो कट-पेस्ट भी चलेगा, और अंग्रेज़ी और रोमन हिन्दी भी प्रयोग कर सकते हैं.

किसी एक व्यक्ति को संबोधित करने के लिए, दिख रहे नाम को पूरा लिखें या आलस दिखाते हुए नाम के शुरुआती अक्षर टाइप करें फिर टैब दबा कर नाम पूरा करें

बाकी चैट प्रक्रिया वही जैसा याहू , जीमेल आदि में करते हैं !

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google chrome - please do not upgrade now

यदि आपको नई-नवेली चीजें ललचाती हैं, और आप चाहते हैं कि आपके कम्प्यूटर पर हर हमेशा गूगल क्रोम का नया नवेला डेवलपर संस्करण (जिसे आम प्रयोग के लिए जारी नहीं किया गया होता है) स्वचालित अद्यतन होता रहे ताकि आप उसकी जांच परख कर सकें व एकदम नया (जो अभी बाजार में उतारा नहीं गया है ) गूगल क्रोम प्रयोग करते रहें तो आप अपने गूगल क्रोम की ऐसी सेटिंग गूगल क्रोम चैनल चूज़र सॉफ़्टवेयर के जरिए कर सकते हैं.

मगर, यहाँ पर मजे की बात ये है कि गूगल क्रोम चैनल चूज़र सॉफ़्टवेयर को चलाने पर इसके (क्रोम के हिंदी भाषाई वातावरण में) स्क्रीन में दो बटन नजर आते हैं. पहले बटन में लिखा होता है – अभी अद्यतन न करें (do not update now) तथा ठीक (ok). यदि आप ठीक पर क्लिक करते हैं तो अद्यतन रद्द (cancel) हो जाता है, तथा अभी अद्यतन न करें बटन पर क्लिक करने पर प्रोग्राम अद्यतन हो जाता है.

कमांड इन रिवर्स ऑर्डर? शुक्रिया क्रोम. हमने ये भी सीख लिया !

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पुनश्च: गूगल क्रोम की एक ख़ासियत आपके काम की हो सकती है – गूगल क्रोम के पता पट्टी में दाएं कोने पर वर्तमान पृष्ठ नियंत्रित करें बटन पर क्लिक कर आप खुले हुए पृष्ठ का डेस्कटॉप जाल अनुप्रयोग बना सकते हैं. यदि आप इंटरनेट पर बहुत सा कार्य करते हैं तो विविध साइटों के वेब अनुप्रयोग आपके अच्छे खासे काम के रहेंगे. एक बार आजमा कर देखें.

tag : do not upgrade google chrome now, bug, chrome, google chrome channel chooser software download link

thinking too much can make you fat

अगर आप अपनी कमर के घेरे के ऊपर बाल बराबर भी चिंतित हैं कि लाख जतन करने के बाद भी उसमें बाल बराबर भी कमी नहीं होती, उल्टे उसमें समयबद्ध, चक्र-वृद्धि होती जाती है, तो अब आपको चिंतित होने की आवश्यकता नहीं, उसके बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं.

आपके मोटापे के पीछे आपकी अकर्मण्यता, आपका अनियमित खानपान, आपकी रसीली, चटोरी जिह्वा का कोई हाथ नहीं. ये मैं नहीं कह रहा. ये बात वैज्ञानिक खोजों से सिद्ध हुई हैं. दरअसल आपके मोटापे के पीछे आपके उर्वर दिमाग का हाथ है. आपका दिमाग जितना ज्यादा सोचता है, उतना आपकी भूख बढ़ती है और आप उतना ही अधिक खाते हैं और नतीजतन उतने ही अधिक आप मोटे होते जाते हैं.

अब अगर आप स्वस्थ, हृष्ट पुष्ट और तनिक मोटे नजर आते हैं तो इसमें शर्म की, परेशानी की कोई बात नहीं. अपने मोटापे को छुपाने या उसे कम करने की कोई जरूरत नहीं. उलटे आपको अपने आप पर अपने मोटापे पर गर्व होना चाहिए. आप मोटे हैं इससे यह सिद्ध हो जाता है कि आप सोचते हैं. आपके पास एक अदद दिमाग है जो सोचता भी है. यदि आप अधिक मोटे हैं तो यकीनन आप अधिक सोचते हैं. यह तय है कि मोटापा जितना ज्यादा होगा, उतना ज्यादा वो व्यक्ति सोचता होगा. जो व्यक्ति सोचता है वही तो बुद्धिजीवी कहलाता है. तो, अब समानुपात सिद्धांत के आधार पर आप अंदाज लगा सकते हैं, लोगों को राज की ये बात बता सकते हैं कि बड़ा बुद्धिजीवी कौन हुआ?

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व्यंज़ल

जाने कितने राज धरे हैं
दिल में बहुत गुबार भरे हैं

मेरी रुसवाई का राज ये है
वो भी क्यों नाराज भरे हैं

राज की बात तो रही नहीं
कुछ करम हमने करे हैं

जिंदा रहने का ये राज है
जाने कितनी बार मरे हैं

ये राज बता ही दो रवि
डराने वाले क्यों बैठे डरे हैं
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(समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ इंडिया)

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tag  : satire, thinking too much can make you fat, vyangya, ghazal, gazal, vyanjal, hindi literature

  उन्मुक्त ने अपने पोस्ट में उबुन्टु लिनक्स की तारीफ की थी कि ये किस तरह से मुक्त स्रोत का ऑपरेटिंग सिस्टम हिन्दी वालों के लिए भी बढ़िया है. परंतु उन्हें उबुन्टु में अतिरिक्त अनुप्रयोगों के संस्थापना में थोड़ी सी दिक्कतें आईं थीं, और उन्होंने कहा था कि इस विषय पर कुछ लिखें.
दरअसल, उबुन्टु लिनक्स में आप बड़ी ही आसानी से अतिरिक्त अनुप्रयोगों को संस्थापित कर सकते हैं. इसके लिए दो प्रमुख तरीके हैं. पहला - कमांड लाइन से, व दूसरा चित्रमय पैकेज संस्थापक – सिनेप्टिक के जरिए.
1 शैल कमांड से उबुन्टु लिनक्स में अनुप्रयोगों को संस्थापित करना :
package installation in Ubuntu by command
इसके लिए बहुत ही आसान सा कमांड है. कमांड सिंटेक्स है –
sudo apt-get install <packagename>
उदाहरण के लिए आपको wine पैकेज संस्थापित करना है तो कमांड निम्न होगा –
sudo apt-get install wine
स्पेलिंग व केस का अतिरिक्त ध्यान रखें तथा उबुन्टु में रूट उपयोक्ता का पासवर्ड पहले से सेट नहीं होता और यदि आपने इसे सेट नहीं किया है तो यह कमांड बिना आपसे पासवर्ड पूछे wine अनुप्रयोग को संस्थापित कर देगा.
2 चित्रमय सिनेप्टिक पैकेज मैनेजर के जरिए उबुन्टु में अनुप्रयोगों को संस्थापित करना :
package installation in Ubuntu by graphical package manager synaptic2 (Small)
इसके लिए आप मेन्यू में जाकर तंत्र > प्रशासन > सिनेप्टिक पैकेज प्रबंधक (system > administration > syneptic package manager) पर क्लिक करें. सिनेप्टिक पैकेज प्रबंधक का विंडो खुलेगा जिसमें आप बाईं विंडो में सभी (all) पर क्लिक करेंगे तो दाएं विंडो में आपको उबुन्टु में स्थापित करने योग्य सैकड़ों नए अनुप्रयोगों की सूची दिखाई देगी. जिन अनुप्रयोगों को संस्थापित करना है, उन्हें क्लिक करें, और ठीक (ok) पर क्लिक करें.
package installation in Ubuntu by graphical package manager synaptic (Small)
आपके द्वारा चयनित अनुप्रयोग इंटरनेट से स्वचालित डाउनलोड होंगे व स्वचालित संस्थापित हो जाएंगे. चूंकि अनुप्रयोगों को संस्थापित करने की फ़ाइलें इंटरनेट से डाउनलोड होती हैं, अतः जाहिर सी बात है कि आपको संस्थापना से पहले अपने कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोड़ लेवें. और कनेक्शन उच्च गति का, ब्रॉडबैण्ड हो नहीं तो पैकेजों को डाउनलोड करने में अच्छा खासा समय लगेगा.
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हिन्दी लिनक्स पर हिन्दी में कुछ जानकारी : http://raviratlami.blogspot.com/2006/12/blog-post_26.html
उबुन्टु लिनक्स (लाइनक्स?) के बारे में हिन्दी में अन्य जानकारियाँ –
उबुन्टु 8.04
http://ankurthoughts.blogspot.com/2008/04/blog-post_4734.html
http://ankurthoughts.blogspot.com/2008/02/blog-post_24.html
http://ankurthoughts.blogspot.com/2007/11/blog-post_04.html
उबुन्टु के लिए कुछ सॉफ़्टवेयर:
http://ankurthoughts.blogspot.com/2007/10/3.html
http://ankurthoughts.blogspot.com/2007/10/blog-post_3869.html
http://ankurthoughts.blogspot.com/2007/09/rar.html
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battery inverter

पिछली पोस्ट कमरे कमरे पर... बहुत से पाठकों ने उत्कंठा जताई थी कि आखिर वे क्या वजहें रहीं थीं जिसके कारण एक रतलामी को भोपाली बनने को मजबूर होना पड़ा.

दरअसल, मामला जहाँ गुड़ वहां मक्खी का है. रेखा (पत्नी) का तबादला जब भोपाल हो गया तो उसके साथ मुझे भोपाल आना ही था. मैं ठहरा इंटरनेट-जीवी. किसी इंटरनेट जीवी को एक अच्छी गति का इंटरनेट कनेक्शन युक्त एक कम्प्यूटर दे दीजिए, और फिर उसे कहीं भी बिठा दीजिए – उसे नर्क और स्वर्ग में फ़र्क़ ही नजर नहीं आएगा. जिसके लिए तमाम दुनिया एक क्लिक पर हाजिर हो उसके लिए तो बस्तर और न्यूयॉर्क दोनों ही बरोबर! सो इसी उम्मीद में मैंने भी अपना बोरिया बिस्तरा भोपाल के लिए बाँध लिया.

पर, शायद नहीं. रतलाम, रतलाम होता है और भोपाल, भोपाल. भोपाल आते ही सबसे पहले यहां के भारी भरकम, तीव्र गति के ट्रैफ़िक, भीड़ भरी तंग गलियों ने स्वागत किया. रतलाम शहर की गड्ढे युक्त सड़कें आपकी रफ़्तार को 20 किमी से अधिक बढ़ने नहीं देतीं और ये अहसास दिलाती फिरती हैं कि जीवन के लिए कतई कहीं कोई जल्दी नहीं. यहाँ भोपाल में उल्टा है. चिकनी चौड़ी सड़कों पर थोड़े धीरे चले कि पीछे से किसी ने ठोंका. साथ ही आजू-बाजू दो-पहिया वाहनों से अटी पड़ी पुराने भोपाल की तंग गलियों में आमने सामने से चौपहिया वाहनों को निकलते हुए देखना किसी भी व्यक्ति के लिए ‘संसार का पहला आश्चर्य’ देखने के समान है.

नहीं, शायद ये दूसरा आश्चर्य होगा. मेरे लिए पहला आश्चर्य था भोपाल की निर्बाध बिजली. जब मैं रतलाम से चला था तो साथ में अच्छी तरह से सहेज कर साथ में अपना बैटरी-इनवर्टर भी लाया था. रतलाम शहर की नित्य की आठ घंटे से अधिक की नियमित-अनियमित विद्युत कटौती के बीच इनवर्टर ही मेरा एकमात्र सहारा था. परंतु मुझे क्या पता था, कि इनवर्टर जैसी चीजें भोपालियों के लिए अजूबा होंगी. यहाँ तो बिजली गुल ही नहीं होती. भई, आखिर प्रदेश की राजधानी जो है. अंदर की बात अब पता चली कि ‘रतलामियों’ के हक की बिजली काट काट कर राजधानी के राजा किस्म के ‘भोपालियों’ को दी जा रही है. जेट लेग की तरह मुझे निर्बाध बिजली के साथ सेट होने में कुछ समय लगेगा.

रतलाम में इनवर्टर मेरे जीवन का सेंट्रल पाइंट था. जब बिजली सप्लाई की कटौती होती थी, तो इनवर्टर की बिजली का ही सहारा होता था. तमाम जतन किए थे मैंने इनवर्टर की बिजली को अधिकतम, मितव्ययिता से उपयोग करने के. जब बिजली ज्यादा देर गुल हो जाती थी – और ऐसा अकसर, आए दिन होता था तो इनवर्टर की लो बैटरी’ की प्यारी सी सीटी की गूंज – कि भई अपना काम समेट लो, सहेज लो नहीं तो डाटा लॉस से भुगतना होगा – यहाँ भोपाल में सिरे से नदारद है. जब से यहाँ आया हूँ, उसकी आवाज सपने में भी सुनाई नहीं देती. आखिर मैंने ये क्या गुनाह कर डाला है? वो इनवर्टर, जिसके बगैर रतलाम में जीना मुश्किल था, यहाँ डब्बे में वैसा का वैसा ही बंद है. उस बेचारे इनवर्टर का भी क्या गुनाह है? उस इनवर्टर का क्या करूं ये भी समझ में नहीं आ रहा है. उसने मेरा लंबे अरसे तक साथ दिया है, तो उसे मैं कबाड़ में (भोपाल में इनवर्टर जैसा कॉसेप्ट ही नहीं है तो सेकंड हैंड भी कौन खरीदेगा?) बेच भी नहीं सकता. जब भी उस पर नजर पड़ती है तो एक उच्छवास सा उठता है और दिमाग में बात आती है – महलों के दिन भी फिरते हैं...

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tag : bhopal, battery, inverter, electricity, power cut, load shedding,

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