May 2008

आइए, जाँचिए अपने अंक.

प्रस्तुत है आपके लिए चिट्ठाकार वर्ग पहेली

चिट्ठाकार और चिट्ठे.

सीधे
3.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानुर्रहीम
5.
मानसिक नॉलेज
7.
अज्ञानी गुरू, दूसरे का लिखा कूड़ा समझे
8.
दिल में, पेट में, मन में जहां कहीं भी हो न हो, उगलना तो पड़ेगा
9.
छम्मकछल्लो
10.
आदि चिट्ठाकार और वर्तमान व्यंग्यकार में समानता
12.
डायरी वाला भारतीय
14.
कस्बे का रहवासी
19.
शब्दों के बीच सेतु बनाती हैं
20.
जहां का हर सेर सस्ता होता है
21.
नुकीली दृष्टि
23.
आज के जमाने में ठुमरी कौन गाता है
24.
हिन्दी का एक मात्र मालदार चिट्ठा
25.
कह न सकने के बावजूद

नीचे
1.
नेपाली हिन्दी चिट्ठाकार
2.
एक यात्री जो अक्षरों का जोड़ घटाना करता है
4.
लिखता तो है, कभी कभी, गाहे बगाहे
6.
चिट्ठाजगत् की माता
9.
इनके तो लब सचमुच आजाद हैं
11.
जरा मुस्कुरा दो ब्रदर
12.
कबाड़खाने का एक कबाड़िया
13.
फटा मुँह, कुछ दूसरे तरीके से
15.
राहुल उपाध्याय समेत हम सभी जिसमें लगे होते हैं
16.
कीचड़ में मरीचिका देखने दिखाने का साहस
17.
चार सौ बीस लेखक
18.
चिट्ठाकार का पूरा नाम जो फुरसत में लंबी पोस्टें लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, अलबत्ता पाठकों के पास फुरसत हो न हो
19.
हिन्दी ब्लॉग जगत् में पहली बार बकरी की लेंड़ी बिखेरी
22.
दूसरे के नाम की शाम

दिए गए संकेत से फटाफट उत्तर लिखिए और अपनी टिप्पणियों से उत्तर दीजिए. चूंकि टिप्पणियों में मॉडरेशन लगा है, अतः उन्हें कल इसी समय क्लीयर किया जाएगा ताकि आपके उत्तर दूसरों को पता न हो सके. उत्तर भी कल इसी समय यहीं लगाया जाएगा. ध्यान दें कि संयुक्ताक्षरों में आधा अक्षर के लिए भी एक खाना लागू है.


सभी सही उत्तरों के लिए 10 अंक - आप अपनी पीठ थपथपाएं, यानी आप सचमुच के चिट्ठा पाठक हैं.
एक से तीन गलत उत्तर - आपको चिट्ठा पाठक कहा जा सकता है.
चार से छः गलत उत्तर - आह, आपको थोड़ा ज्यादा पढ़ना होगा - जाहिर है, चिट्ठों को, और थोड़े ध्यान से.
सात या अधिक गलत उत्तर - जनाब, टिप्पणी करना छोड़िये, जरा चिट्ठे पढ़िए. ढेरों पढ़िए.


केडीई 4 के विंडोज वातावरण में सफलतापूर्वक चलाने के बाद आशा बंधी थी कि शीघ्र ही केडीई 4 के सैकड़ों प्रोग्रामों व अनुप्रयोगों को अंग्रेज़ी से इतर, अन्य भाषाई वातावरणों में चलाया जा सकेगा.

(विंडोज में चलते हुए केडीई हिन्दी के कुछ खेल व शिक्षण अनुप्रयोग . बड़े आकार में देखन हेतु चित्र पर क्लिक करें)

अब यह संभव है. यही नहीं, केडीई4 अनुप्रयोगों व प्रोग्रामों को विंडोज में वास्तविक बहुभाषाई वातावरण में चलाया जा सकता है, जो कि अब तक विंडोज में असंभव तो नहीं, परंतु अनुपलब्ध था.

केडीई के प्रोग्रामों में संस्थापित भाषाओं को चुनकर बहुभाषाई वातावरण में एक साथ काम किया जा सकता है. दिए गए चित्र में विंडोज़ एक्सपी (डिफ़ॉल्ट वातावरण अंग्रेज़ी) में केडीई 4 के कुछ बेहद लोकप्रिय खेलों को पंजाबी, तमिल, नेपाली और हिन्दी में एक साथ ही चलाया जा रहा है.

(बड़े आकार में देखन हेतु चित्र पर क्लिक करें)

एक और भाषाई दीवार ढही. केडीई को विंडोज में संस्थापित करने के लिए विस्तृत निर्देशों के लिए यह तथा यह आलेख पढ़ें.

अद्यतन : नए केडीई4 विंडोज में विंडो स्टार्टअप मेन्यू में संस्थापित प्रोग्रामों की सूची भी शामिल हो जाती है. जिससे केडीई प्रोग्रामों को प्रोग्राम मेन्यू से चलाया जा सकता है. मेन्यू हिन्दी में भी प्रकट होता है. नीचे का स्क्रीनशॉट देखें:

(चित्रों को बड़े आकार में देखने के लिए उन पर क्लिक करें)

अब आप अपने ब्लॉग पोस्टों को बगैर वर्तनी की गलती के लिख सकते हैं. हिन्दी वर्तनी जाँचक के नए संस्करण में कोई एक लाख के आसपास शब्द हैं. हालाकि इसमें अभी भी बहुत से शब्दों की प्रूफ़ रीडिंग बकाया है, मगर, इसे बीटा संस्करण मानकर इसकी खामियों को एक हद तक नजर अंदाज किया जा सकता है. आप अपने नए हिन्दी शब्दों को भी जोड़ सकते हैं तथा गलत वर्तनी को सुधारने हेतु दिए गए विकल्पों में से उचित शब्द चुन सकते हैं.
नया संस्करण अब फ़ॉयरफ़ॉक्स 3 पर भी बढ़िया चलता है.
कुछ प्रयोग हैं -
गूगल ट्रांसलिट्रेशन के जरिए लिखे गए हिन्दी शब्दों की वर्तनी जाँच सकते हैं. firefox spell check add on v3
गूगल ब्लॉगर (या वर्डप्रेस) पोस्ट संपादक में लिखे गए या कॉपी - पेस्ट किए गए पाठ की वर्तनी जाँच सकते हैं. यह नीचे दिया गया पाठ चिट्ठा - शास्त्र वार्ता से लिया गया है:
firefox spell check add on v3 a
गलत वर्तनी के लिए वैकल्पिक शब्दों में से चुन सकते हैं.
firefox spell check add on v3 b
वर्तनी जाँचक यहाँ से डाउनलोड करें.
इसे काम में कैसे लें? विस्तृत निर्देशों के लिए यह आलेख पढ़ें.
एकीकृत हिन्दी शब्दकोश संकलित करने हेतु जी. करुणाकर का धन्यवाद.
# अद्यतन - और हाँ, ये कमेंट विंडो (जहाँ टिप्पणी लिखते हैं) में भी बढ़िया काम करता है. यानी टिप्पणी में भी वर्तनी की गलती की संभावना कम.



यदि नहीं, तो आज से ही शुरू करें. खासकर उन स्थलों के वेब पते जहां आप अपनी जानकारियाँ भरते हैं. ये है गूगल एडसेंस खाता का पृष्ठ. एकदम असली दिखता. परंतु है नक़ली. पूरा का पूरा. आपको फ़िशिंग जाल में फ़ांसने के लिए पूर्णतः सुसज्जित. चित्र को बड़े, पूर्णाकार में देखने के लिए उस पर क्लिक करें.

यदि आपको कोई संदिग्ध किस्म का साइट या पता लगता है तो उसे आप फ़िश टैंक पर जाकर जांच सकते हैं.

चित्र सौजन्य एफ़-सेक्योर


जब आप मोजिल्ला के जरिए किसी पृष्ठ पर अंग्रेज़ी में कुछ पाठ लिखते हैं तो उसका डिफ़ॉल्ट अंग्रेज़ी वर्तनी जांचक आपकी सहायता करता है और आपके अंग्रेज़ी के गलत हिज्जों को वह लाल रंग से रेखांकित कर देता है. आप उस शब्द पर क्लिक करते हैं तो उसका संभावित सही वर्तनी सुझाता है. और आप सही, अच्छी अंग्रेज़ी लिख लेते हैं. जबकि हिन्दी लिखते समय आपकी हिन्दी हीन्दि हो जाती है और आपकी सहायता के लिए कोई औजार नहीं है.

पर, हिन्दी के लिए भी एक फ़ॉयरफ़ॉक्स प्लगइन जारी किया गया है. इस प्लगइन (hi-IN-dictionary.xpi फ़ाइल) को यहाँ सेhttp://www.esnips.com/r/hmfl/doc/b5589890-42aa-45fe-99f9-f04ebd71ae4d/hi-IN-dictionary डाउनलोड करें. ( यह प्लगइन अभी फ़ॉयरफ़ॉक्स की साइट पर उपलब्ध नहीं है. तथा यह संस्करण 1.5 से 2.x पर काम करती है. फ़ॉयरफ़ॉक्स 3 बीटा पर अभी काम नहीं करती.)


डाउनलोड के पश्चात इसे फ़ॉयरफ़ॉक्स से खोलें व इसे इंस्टाल हेतु चुनें.

संस्थापित होने के बाद फ़ॉयरफ़ॉक्स ब्राउजर के किसी भी इनपुट विंडो में हिन्दी लिखें या नक़ल कर चिपकाएं व दिए गए चित्रानुसार इनपुट बक्से में दायाँ क्लिक करें व भाषा में हिन्दी/इंडिया चुनें. बस, अब आपकी हिन्दी वर्तनी ‘कूत्ता’ को ‘कुत्ता’ बताएगा.

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)

अभी इस वर्तनी जांचक में मात्र पंद्रह हजार शब्द हैं, अतः इसमें अजदकी भाषा (प्रमोद जी, इसे प्रशंसनीय अंदाज में ही लें, आलोचना के रूप में नहीं,) की वर्तनी जांचने में निश्चित ही समस्या आएगी. वैसे, इस संख्या को बढ़ाने के लिए प्रयास चल रहे हैं.

इस औजार को प्रयोग करें व अपने अनुभव अवश्य बताएं ताकि इसे और परिष्कृत किया जा सके.

और हाँ, ये उन सभी प्लेटफ़ॉर्म में काम करता है जहाँ फ़ॉयरफ़ॉक्स चलता है - यानी विन्डोज़ , मेक ओएअस , लिनक्स इत्यादि पर भी :)

अद्यतन - लिंक ठीक कर दी गयी है .
अद्यतन - नया संस्करण यहाँ से डाउनलोड करें




चिट्ठा पठन-पाठन के पिछले विश्लेषण में मैथिली गुप्त की टिप्पणी के जरिए ब्लॉगवाणी का एक छोटा सा प्रायोगिक हथियार मिल गया. आप भी आंकड़ों का ये खेल स्वयं खेल सकते हैं. आप देख सकते हैं कि किसी चिट्ठे को ब्लॉगवाणी ने अब तक कितने पाठक भेजे. आप औसत निकाल सकते हैं कि आपके अब तक के लिखे गए चिट्ठों पर औसतन प्रति चिट्ठा कितने पाठक ब्लॉगवाणी के जरिए आए.

इसके लिए ब्लॉगवाणी में जाकर उस विशिष्ट चिट्ठे का ब्लॉगवाणी आईडी प्राप्त करना होगा. यह उस चिट्ठे के लिंक पर माउस रखने पर ब्राउजर के स्थिति पट्टी पर प्रकट होगा. आप चाहें तो यह कड़ी नोटपैड पर नकल कर चिपका कर भी पढ़ सकते हैं. अब उस आईडी को इस लिंक http://blogvani.com/Bloggerdetail.aspx?BlogID= के = चिह्न के बाद भरें और ब्राउजर में खोलें. उदाहरण के लिए हिन्द युग्म की आईडी है 388. तो http://blogvani.com/Bloggerdetail.aspx?BlogID=388 कड़ी को खोलने पर आपको उस चिट्ठे का अब तक का ब्लॉगवाणी के द्वारा भेजे गए पाठक की जानकारी मिलेगी.


इस तरह की सुविधा संभवतः चिट्ठाजगत् में भी होनी चाहिए, परंतु वह आमजन के पहुँच में है, इसका मुझे ज्ञान नहीं है.


मैंने कुछ ऐसे चिट्ठों के औसत जानने की कोशिश की जिन्हें आमतौर पर ब्लॉगवाणी के जरिए ज्यादा पढ़े जाते हैं.

चिट्ठा - औसत हिट्स
फुरसतिया – 89

ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल – 84

मोहल्ला - 79

भड़ास – 77

प्रत्यक्षा – 70

उड़न तश्तरी – 94


जाहिर है, उड़न तश्तरी 100 का जादुई आंकड़ा पार करने के बहुत करीब है. (मेरी खोजबीन में मुझे 100 या उससे अधिक औसत के चिट्ठे नहीं मिले, आपको मिले हों तो कृपया भूल सुधार करें) चूंकि ये आंकड़े सिर्फ ब्लॉगवाणी के जरिए आए पाठकों के हैं, और पाठक विविध तरीकों से चिट्ठों पर पहुंचते हैं, अतः इन आंकड़ों को सिर्फ संकेत स्वरूप माना जाना चाहिए.



गूगल हेल्थ का बीटा संस्करण आपके लिए तमाम स्वास्थ्य संबंधी सूचनाएं व निदान लेकर हाजिर हो गया है.

इसमें आप अपने जीमेल खाते से पंजीकरण कर सकते हैं और अपनी निजी चिकित्सकीय व पैथॉलाजी जांच इत्यादि जानकारी यहाँ भर सकते हैं. उन जानकारियों के अनुसार समय समय पर आपको स्वास्थ्य संबंधी जानकारियाँ व रोगों के निदान संबंधी परामर्श तो दिए ही जाएंगे, जाल स्थल पर उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की सुविधा भी गूगल हेल्थ से मिलेगी.



मैंने अपनी कुछ जानकारियाँ अपने प्रोफ़ाइल में भरीं और देखना चाहा कि अगले दस सालों में मेरे हृदयाघात से मरने का कितना खतरा है. यह कुछ डाटा प्रोसेसिंग सा करता रहा और इधर मेरे हृदय की धड़कन बढ़ती गई. जैसे जैसे इसकी प्रक्रिया पूर्ण होने का कम्प्लीशन बार भरता गया, मुझे लगा कि ये तो आज घंटे भर बाद की भविष्यवाणी करने वाला है. और....



और, ये लीजिए. एक पॉपअप विंडो प्रकट हुआ. जिसमें लिखे को पढ़कर मेरे हृदय को सुकून मिला. एप्लीकेशनघात हो गया था. मेरा हार्ट फेल होने के बजाए एप्लीकेशन फेल हो गया था. दोबारा इसे आजमाने की हिम्मत ही नहीं हुई. मगर, गूगल हेल्थ के जरिए यह जानना दिलचस्प होगा कि चिट्ठाकारों में से किसकी मृत्यु हृदयाघात से आने वाले दस सालों में होने वाली है?



वैसे, ये बात गूगल हेल्थ बताए या न बताए, यदि हम कम्प्यूटर के सामने बैठे चिट्ठा-चिट्ठा खेलते रहेंगे तो यकीनन हममें से अधिकतर की मृत्यु हृदयाघात से होने के खतरे तो आसन्न हैं ही...

100? 200? 500? 1000?

आपके चिट्ठे आखिर कितने लोग पढ़ते हैं? इस पर लिखने की जिम्मेदारी जब अंतत मुझ पर ठेल दी गई (बॉल अगले की कोर्ट में फेंक दी गई,) तो इस विषय में भले ही मेरी जानकारी सीमित हो, परिपूर्ण न हो, मेरी अपनी जानकारी के अनुसार मामले में कुछ उलटा सीधा दरियाफ़्त करने की कोशिश तो कर ही सकता हूं.

जैसे ही आप अपना चिट्ठा प्रकाशित करते हैं, इसमें लगे हुए यंत्र और स्क्रिप्ट तमाम दुनिया को सूचना (पिंग) देते हैं कि भाई एक नया चिट्ठा प्रकाशित हो गया है. आइए इसे पढ़िए. सर्च इंजनों, चिट्ठा संकलकों से लेकर व्यक्तिगत ग्राहकों - सभी तक ये अलग अलग जरिए से पहुँचता है. यहां से शुरू होता है आंकड़ो का अजूबा खेल.

आइए, देखते हैं कि रचनाकार की रचनाओं को कौन, कितना पढ़ता है.

ब्लॉगवाणी के जरिए रचनाकार के किसी चिट्ठे में पहुँचने वाले पाठक शायद ही कभी दो अंकों की संख्या को पार कर पाए होंगे. चित्र गवाह है – विवादित विषय पर भी संख्या 14 से पार नहीं गई.


रचनाकार के नियमित ग्राहक जो फ़ीडबर्नर से सब्सक्राइब करते हैं उनकी औसत संख्या है – 80.

यदि आप अपने चिट्ठे की पूरी फ़ीड प्रकाशित करते हैं, जैसे कि रचनाकार में होता है, तो चिट्ठाजगत की फ़ीड के जरिए पढ़ने वालों की संख्या भी शामिल की जा सकती है. मेरी जानकारी के अनुसार चिट्ठाजगत की फ़ीड के कोई चार सौ से अधिक ग्राहक हैं और इनके एक चौथाई भी यदि आपके चिट्ठे इसके जरिए पढ़ते हैं (इसके जरिए मैं बहुत से चिट्ठे नियमित पढ़ता हूं वऑपेरा ब्राउजर के फ़ीडरीडर के जरिए फुरसत से ऑफलाइन पढ़ने का यह बढ़िया तरीका है) तो यह संख्या 100 मानी जा सकती है. इसी तरह की सुविधा नारद के साथ भी है. परंतु उसके आंकड़े अनुपलब्ध हैं.

इन नियमित तौर तरीकों के अलावा हिन्दी पृष्ठों पर अब ज्यादातर पाठक सर्च इंजिनों के जरिए पहुँचने लगे हैं. रचनाकार का स्टेटकाउंटर का पिछले हफ़्ते का स्क्रीनशॉट देखें –


औसतन, प्रतिदिन कोई पाँच सौ पेज लोड हो रहे हैं जो औसतन 200 पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं. ये पाठक सीधे ही बुकमार्क के जरिए या सर्च इंजिनों के जरिए पहुँच रहे हैं. जैसा कि इनका आगे का परिवीक्षण बताता है -


तो, जाहिर है, रचनाकार के पृष्ठों को कोई चार सौ से अधिक पाठक नित्य पढ़ रहे होते हैं – यानी महीने के कोई बारह हजार से अधिक पाठक. ठीक इसी तरह, आपके चिट्ठा पृष्ठों को भी ढेरों लोग पढ़ रहे होते हैं, जिनका अंदाजा आपको नहीं होता है.

मगर ये बात भी तय है कि रचनाकार के कोई 850 पोस्टों में सामग्री की प्रचुरता है जिसके जरिए इसके पृष्ठों पर सीधे व सर्च इंजिनों के जरिए पहुँचने वाले पाठकों की संख्या ज्यादा है. किसी दिन चिट्ठा पोस्ट प्रकाशित नहीं भी होता है तब भी ये संख्या बरकरार रहती है. इसका अर्थ क्या हुआ? अर्थ वही हुआ जो इस चिट्ठे के शीर्षक में दिया गया है.

प्रोब्लॉगर डेरेन रोज ने कभी कहा था – कोई फोटोग्राफर सफल फोटोग्राफर तब बनता है जब तक कि वो दस हजार फोटोग्राफ खींचकर फेंक नहीं देता. उसी तरह कोई चिट्ठाकार (चिट्ठा समझें,) तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वो एक हजार पोस्ट नहीं लिख लेता.

तो, जब तक आप अपनी हजारवीं पोस्ट न लिख लें, (मेरे चिट्ठे को भी इस जादुई संख्या को पार करने में वर्षों लगेंगे) आंकड़ों के जाल में न उलझें. आपकी एक हजार एक वीं पोस्ट, यकीन मानिए, उतने ही संख्या में पाठकों को खींच लाएगी.

आमीन!




(1) कोंगु निधि
नाम आपको थोड़ा अजीब सा प्रतीत हो सकता है. यह हिन्दी पत्रिका कर्मचारी भविष्य निधि संगठन कोयंबत्तूर की गृह पत्रिका है. इसके प्रधान संपादक हैं युगमानस के चिट्ठाकार डॉ. सी. जयशंकर बाबु. यह पत्रिका कोयंबत्तूर क्षेत्र की राजभाषा गृह पत्रिका है जो मूलत: इस संगठन के ऑफ़िस में आंतरिक वितरण के लिए प्रकाशित होती है. इसकी ख़ूबी ये है कि इसमें प्रकाशित रचनाओं के प्रायः तमाम लेखक दक्षिण भारतीय हैं. इस वजह से भाषागत अनगढ़ता भले ही प्रकट होती हो, मगर कथ्य और भावों में उथलापन कहीं से नजर नहीं आता. कोंगु निधि भले ही सरकारी गृह पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रही हो, परंतु इसका कलेवर शानदार है. 60 पृष्ठों की पत्रिका (मार्च 08 अंक) में हर किस्म की रचनाओं को स्थान दिया गया है. हिन्दी तमिल सीखें पर एक पूरा आलेख है तो पूरा एक पृष्ठ हिन्दी के जालस्थलों की कड़ियों पर समर्पित है. पत्रिका विक्रय हेतु नहीं है, परंतु नमूना प्रतियों के लिए संपादक से संपर्क किया जा सकता है.

कहीं कहीं हिन्दी भाषा की अपरिपक्वता नजर आती है – जैसे कि कुरुक्किया काइन नाम के पकवान बनाने की विधि के लेखक का नाम कुछ यूँ दिया गया है – ‘ए. के. अच्युतन कुट्टी नायर की पत्नी’

संपर्क:
संपादक कोंगु निधि
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन
क्षेत्रीय कार्यालय, डॉ. बालसुंदरम रोड,
कोयंबत्तूर (तमिलनाडु) - 641018
kongunidhi@gmail.com
ऑनलाइन संस्करण http://knogunidhi.wordpress.com
******

(2)

समीरा

हिन्दी पत्रिका समीरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे हस्तनिर्मित (इकोफ्रेण्डली) काग़ज़ पर मुद्रित किया जाता है. समीरा एक परिपूर्ण हिन्दी वैचारिक व साहित्यिक पत्रिका है. साहित्यिक रचनाओं के अलावा इसमें सामाजिक सरोकारों से संबंधित विचारोत्तेजक आलेखों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है. हस्तनिर्मित काग़ज़ पर मुद्रित होने के बावजूद पत्रिका की साज सज्जा कमाल की है, और किसी भी ग्लॉसी काग़ज़ पर मुद्रित पत्रिका के मुकाबले ज्यादा आकर्षक प्रतीत होती है. काग़ज़ का त्रिआयामी मैटी रूप सुखद अहसास देता है. दृष्टिहीनों, दृष्टिबाधितों व बुजुर्ग पाठकों के लिए समीरा ने एक और पहल की है. समीरा पत्रिका का ऑडियो सीडी संस्करण भी उपलब्ध है, जिसे सुनकर पत्रिका का आनंद लिया जा सकता है. पत्रिका का मूल्य 20 रुपए है जो सामग्री व पृष्ठ संख्या के हिसाब से बहुत ही वाजिब प्रतीत होती है.

संपर्क:
संपादक समीरा
डीके 3/229/2 कोलार रोड, भोपाल.

ईमेल – sameera.magazine@gmail.com

******.

(3)

पर्यावरण विमर्श


भारत की पहली द्विभाषी (अंग्रेजी व हिन्दी) त्रैमासिक पर्यावरण केंद्रित पत्रिका है पर्यावरण विमर्श. पत्रिका, जैसा कि नाम से जाहिर है, पर्यावरण विषयों पर केंद्रित है. पचास पृष्ठों की पत्रिका के आधे पृष्ठों में हिन्दी में आलेख होते हैं तो बाकी के आधे पृष्ठों में अंग्रेजी में. पत्रिका द्विभाषीय तो है, परंतु दोनों ही भाषाओं में आलेख अलग अलग हैं. एक ही लेख का अंग्रेजी हिन्दी अनुवाद नहीं है. इसके संपादक रमेश मिश्र ‘चंचल’ हैं. पत्रिका पिछले 12 बर्षों से प्रकाशित हो रही है. यदि आप पर्यावरण प्रेमी हैं तो इसकी एक प्रति की कीमत 25 रुपए बहुत ही वाजिब लगेगी.

सम्पर्क
संपादक पर्यावरण विमर्श
एम. आई. जी. , 153 (भूतल)
सरिता विहार नई दिल्ली 110076
ईमेल - paryavaran.vimarsh@gmail.com
------.




आप सभी माता-पिताओं, पालकों के लिए खुशखबरी है कि अब आप विज्ञान और तकनीक के सहारे डिजाइनर बच्चे पा सकते हैं. स्टेम सेल पर हालिया हुई खोजों और जेनेटिक इंजीनियरिंग के बलबूते डिजाइनर बच्चे अब कल्पना की वस्तु नहीं रह गए हैं.

ऐसे में कुछ मजेदार परिस्थितियों की कल्पना क्या आप कर सकते हैं? दो डिजाइनर बच्चे आपस में झगड़ेंगे तो एक दूसरे के जेनेटिक क्वालिटी की मीनमेख कुछ यूँ निकालेंगे – मेरे में तीव्र बुद्धि का, जीनियस बनने का जीन है – तू मुझसे मैथ्स में पार नहीं पा सकता. दूसरा प्रतिकार करेगा - मुझमें सुपर एथलीट बनने का जीन है – एक मुक्का मारूंगा तो बत्तीसी बाहर आ जाएगी. एक कहेगा - मेरे पालक ने दस लाख खर्च कर ब्यूटी और ब्रेन का जीन डलवाया है. दूसरा बगलें झांकेगा और शाम को अपने पालकों से झगड़ा करेगा कि यदि उनमें अपने बच्चों में स्पेशल जीन डलवाने की, बच्चों को डिजाइनर बनवाने की कूवत नहीं थी तो आखिर उन्होंने बच्चे पैदा ही क्यों किए.

दो पालक कभी आमने सामने होंगे तो उनके मन में पहला प्रश्न ये उठेगा कि सामने वाले ने अपने बच्चे में क्या क्या डिजाइनर गुण डलवाए हैं. वे एक दूसरे के निर्णय का उपहास करेंगे – हुँह, ये भी कोई डिजाइनर गुण हुआ? और अपने निर्णय पर, अपने डिजाइनर बच्चे पर गर्व करेंगे. कभी वो निराशा में सिर छुपाया करेंगे कि सामने वाले जैसी कूवत उनकी नहीं थी अन्यथा वे भी अपने बच्चों को उनसे भी ज्यादा डिजाइनर बनवा सकते. कुछ डिजाइनर बच्चों के पालक घर में अपने बच्चों को गरियाया करेंगे – शर्म नहीं आती? तुम पर हमने बीस लाख रुपए खर्च कर डिजाइनर जीन क्या इसीलिए डलवाया है? उसका कोई प्रतिफल ही नजर नहीं आ रहा है. डिजाइनर बच्चे अपने पालकों से शर्म महसूस करेंगे – काश हमें भी डिजाइनर पालक मिलते! पालक डाक्टरों से झगड़ा करेंगे, सिविल सूट दाखिल करेंगे – जो डिजाइन हमने चाहा था – वो तो मिला ही नहीं, बल्कि कुछ दूसरा ही डिजाइन मिल गया है.

जाहिर है धार्मिक, जाति और रंग के आधार के अतिरिक्त एक और विभाजन व्यक्तियों में होने लगेगा. व्यक्ति की औकात इस बात पर निर्भर रहेगी कि कौन कितना डिजाइनर है. बिना डिजाइनर टैग लगे व्यक्ति की औकात जंगली, बाबा आदम के जमाने के, पिछड़े व्यक्ति की तरह होगी. जो ज्यादा डिजाइनर होगा, वो उतना ही ज्यादा प्रगतिशील कहलाएगा और आधुनिक-महाराजाओं यानी मंत्रियों की तरह लोगों की इज्जत उसे मुफ़्त में मिला करेगी.

आपको ऐसा नहीं लगता कि काश ये तकनीक पचास साल पहले आ चुकी होती तो आज हम भी डिजाइनर पैदा हुए होते...

------.
व्यंज़ल
------

जूते और लिबास तो हैं डिजाइनर
क्या दिल और मन हैं डिजाइनर

वक्त वक्त में फ़र्क़ तो है यकीनन
हमारे मुकाबले उनके हैं डिजाइनर

दुनिया उसी की जमाना उसी का
पलटकर जो बन गए हैं डिजाइनर

कह ले जमाना हमें इश्क में अंधा
उनकी तो हर अदाएं हैं डिजाइनर

देखो ये लौट के आ गया बुद्धू रवि
कहे थे बनने जा रहे हैं डिजाइनर

-----


(समाचार कतरन साभार - टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

आज से ठीक तीन वर्ष पहले हिन्दी चिट्ठासंसार में ले देकर सिर्फ पचास चिट्ठाकार थे. आइए देखते हैं कि उस दौरान चिट्ठाकार क्या और कैसे लिख रहे थे.

प्रस्तुत है 30 मई 2005 को छींटे और बौछारें में प्रकाशित मूल प्रविष्टि :


10 वीं अनुगूँज: चिट्ठियाँ लिखने के दिन, लगता है सचमुच लद गए.
**//**

*-*-*
जब मैंने 10 वीं अनुगूँज के लिए विषय दिया था तो उत्साहित था कि लोग-बाग जी भर के चिट्टियाँ लिखेंगे, चिट्ठियाँ लिखकर अपने पुराने दिनों की यादों को ताज़ा करेंगे या भविष्य का जायजा लेंगे, और चिट्ठियाँ लिखने की अपनी भूलती-बिसरती कला को एक बार फिर याद कर उसे परिष्कृत परिमार्जित करने की कोशिश करेंगे.

परंतु, साहबान, मैं गलत था, मेरा यह खयाल गलत था. मेरा यह विचार सिरे से ख़ारिज कर दिया गया. दरअसल, दुनिया अब तेज़ी से प्रगति पथ पर है और चिट्ठी लिखने पढ़ने का माद्दा लोगों के पास से ख़त्म होता जा रहा है.

इससे लगता है कि चिट्ठियाँ लिखने के दिन सचमुच लद गए. भले ही उसे हमें अपने कम्प्यूटर पर लिखने कहा जाए, चिट्ठियाँ लिखना हम भूलते जा रहे हैं. यही वजह है कि हिन्दी के पचास से ऊपर चिट्ठाकारों में से बमुश्किल आधा दर्जन चिट्ठियाँ ही पोस्ट हुईं. एक लिहाज से यह आयोजन असफल हो गया है. और इस असफल, दसवें आयोजन की बात यहीं, इसी पंक्ति पर क्यों न ख़त्म कर दी जाए?

पर, रुकिये, एक दूसरी निगाह डालें तो दिखता है कि कुछ ऐसी अच्छी चिट्ठियाँ भी पोस्ट हुई हैं, जिनके बारे में अगर हम बात करेंगे तो पाएंगे कि उनमें से एक-एक चिट्ठी सैकड़ों चिट्ठियों के बराबर वज़न रखती हैं. और इनमें से हर एक चिट्ठी 10 वीं अनुगूँज जैसे कई-कई आयोजनों को सफल बनाने का माद्दा रखती हैं.

तो, फिर, आइए इस आयोजन के लिए मिली तमाम चिट्ठियों को एक-एक कर पढ़ें-
अनुगूँज को पहले-पहल चिट्ठी भाई प्रेम पीयूषने भेजी. चिट्ठी क्या है, पूरा का पूरा सिन्दूरिया आम है. एक-एक पंक्ति पढ़ते जाएँ, सिन्दूरिया के स्वाद का अंदाज़ा लगाते जाएँ. काश, चिट्ठी के साथ पार्सल भी मिल पाता सिन्दूरिया आमों भरा. वैसे, अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके ऑगन का सिन्दूरिया कितना मीठा होगा. और, दीवार के पार उनकी डालों को, बच्चों के लिए आम टपकाते देख कर अगर, भाई प्रेम खुश हो रहे हैं, तो फिर निश्चित जानिये ये आम संसार के सबसे मीठे आम हैं. अन्यथा तो लोग अपने आँगन के आम को आजकल इसलिए काट देते हैं कि कहीं उनकी दीवारें क्रेक न हो जाए.

आमों का स्वाद तो काफी मीठा है ही, सुरजापूरी का स्वाद से यह स्वाद कुछ विशिष्ठ भी है । चार साल हो गये इस प्रसंग के । आसपास के पेङों में आम आये न आये इस सिन्दुरिया का आँचल खाली न जाता है । आजकल लदा पङा है यह आमों से , पिताजी भारी हो रहे डालों को बासों के दर्जन भर सहारे से टिकाये हैं । अब तो इसे काटने का याद पङते ही देह सिहर जाता है । बहुत पहले जब वह छोटा ही था, ठीक उसके जङ के पास घर की नियमित चाहरदीवारी भी खङी करनी पङी थी। मगर पंचफुटिया चाहरदीवारी से परे, आजकल सङक पर वह बच्चों के लिए कच्चे ही सही मगर वह कुछ आम टपकाता ही रहता है ।

चिट्ठियों के बीच ही, जीतू भाई ने भाई महावीर शर्मा की कविता “ससुराल से पाती आई है” का जिक्र किया. यह सारगर्भित, मजेदार, हास्य-व्यंग्य भरी कविता आपको हँसी के रोलरकोस्टर में बिठाकर यह बताती है कि प्रियतम की “ससुराल से पाती” “ससुराल की पाती” कैसे बन जाती है.

इस चिट्ठी की कुछ पंक्तियाँ मुलाहजा फ़रमाएँ:

ससुराल से पाती आई है !
पाती में बातें बहुत सी हैं, लज्जा आती है कहने में
जा कर बस लाना ही होगा, अब खैर नहीं चुप रहने में
—-
ससुराल के स्टेशन पर आ , मैं गाड़ी से नीचे आया
जब आंख उठा कर देखा तो टी.टी.आई सम्मुख पाया
मांगा उसने जब टिकट तो मैं बोला भैय्या मजबूरी है
कट गई जेब अब माफ करो , मुझ को एक काम ज़रूरी है
पर डाल हथकड़ी हाथों में , ससुराल की राह दिखाई है ।
ससुराल की पाती आई है ।।

उम्मीद है कि इस चिट्ठी से सीख लेकर, अब, हम, चाहे जितनी अर्जेंसी हो, चाहे जैसी भी प्यार भरी चिट्ठी तत्काल बुलावे का आए, अपनी यात्रा सोच समझ कर, जेबकतरों से सावधान रहकर करेंगे, नहीं तो हमारे ससुराल का पता बदलते देर नहीं लगेगी.
अगर आपके आँसू कुछ समय से सूख चुके हैं, भावनाओं का कोई प्रवाह कुछ समय से आपको द्रवित नहीं कर पाया है, जीवन के कठोर राहों ने आपके भीतर की भावनाओं को भी कठोर बना दिया है, या सीधे शब्दों में ही, अगर आप पिछले कुछ समय से रो नहीं पाए हैं, और रोना चाहते हैं तो इन सबका इलाज अपनी पाती में लेकर आए हैं भाई महावीर. वे खुद भी रोते हैं, और आपको भी मजबूर करते हैं कि आप उनके साथ जार-जार रोएँ. पर, जो आँसू आपकी आँखों से निकलेंगे, वे खुशी और सांत्वना के आँसू होंगे. मैं इन पंक्तियों को पढ़ कर घंटों रोया हूँ – क्या आप मेरा साथ नहीं देंगे?

‘ डैडी, जिस प्रकार आपने लन्दन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिन्दी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं। उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिन्दी भाषा सिखा रही हूं जिससे बड़ा हो कर अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं।मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!‘
सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!

आइए, अब अपने आँसू पोंछें और अगली चिट्ठी पढ़ें. बहन प्रत्यक्षा चिट्ठी लिखने की कोशिश करती हैं, और वादा करती हैं कि भविष्य में वे लंबे ख़त लिखेंगी. हमें उनके ख़त का इंतजार है. परंतु अपनी अभी की कोशिश में वे हम सबको उद्वेलित करती प्रतीत होती हैं कि सोचने और लिखने की प्रक्रिया को कभी विराम न दें:

अब अगर कोई बात मुकम्मल सी न लगे तो दोष मेरा नहीं..
तो लीजिये ये पाती है उन बंधुओं के नाम जो विचरण कर रहे हैं साईबर के शून्य में………..सब दिग्गज महारथी अपने अपने क्षेत्र में
और उससे बढ कर ये लेखन की जो कला है, चुटीली और तेज़ धार,..पढकर चेहरे पर मुस्कुराह्ट कौंध जाये, उसमें महिर…

पर मेरे हाथ में ये दोधारी तलवार नहीं..शब्द कँटीले ,चुटीले नहीं.
न मैं किसी वर्जना ,विद्रोह की बात लिख सकती हूँ…….

तो प्यारे बँधुओं..मैं लिखूँ क्या….? ‘मैं सकुशल हूँ..आप भी कुशल होंगे ” की तर्ज़ पर पर ही कुछ लिख डालूँ………..पर आप ही कहेंगे किस बाबा आदम के जीर्ण शीर्ण पिटारी से निकाला गया जर्जर दस्तावेज़ है……..
चलिये ह्टाइये….अभी तो अंतरजाल की गलियों में कोई रिप वैन विंकल की सी जिज्ञासा से टहल रही हूँ…….शब्दों के अर्थ नये सिरे से खोज़ रही हूँ…लिखना फिर से सीख रही हूँ…… हम भी धार तेज़ करने की कोशिश में लगे हैं..जब सफल होंगे तब एक खत और ज़रूर लिखेंगे..तब तक बाय

प्रत्यक्षा की दूसरी चिट्ठी आने में कुछ देरी है. तब तक के लिए किसी और की चिट्ठी पढ़ी जाए. अगली चिट्ठी भाई आशीष ने लिखी है प्रधान मंत्री के नाम. प्रधान मंत्री के नाम खुली और सार्वजनिक चिट्ठी यूँ तो उन्होंने लिखी है, परंतु ये बातें संभवत: देश का हर-एक नागरिक उनसे कहना चाहता है. फ़र्क़ यह है कि हममें इन कठोर बातों को प्रत्यक्ष कहने का साहस पैदा नहीं हो पाता. उम्मीद है कि इस चिट्ठी को भारत के कर्ता-धर्ता पढ़ेंगे और देश की भलाई के बारे में कुछ काम करेंगे. आशीष अपने पत्र में भारत के आम आदमी की दशा-दुर्दशा का जिक्र करते हुए प्रधान मंत्री से गुज़ारिश करते हैं:

आशा है आप और आपके मंत्री कुछ ऐसा करेंगे जिससे कि इस देश के आम आदमी का भला हो। आम आदमी से मेरा तात्पर्य है वो आदमी जो रोजी रोटी की तलाश में पसीना बहाता है जैसे कि हमारे किसान, मजदूर, सफाई कर्मी, रिक्शे वाले भाई, गरीब पुलिस वाले हवलदार इत्यादि जिनकी वजह से ये देश चल रहा है। ये लोग जो कि देश के प्राण हैं क्योंकि ये देख के लिये अनाज पैदा करते हैं, देश को साफ रखते हैं, आलीशान मकान और भव्य इमारतें बनाते हैं, कानून व्यवस्था बनाये रखते हैं, अधकचरे मकानों में रहते हैं, जिनके बच्चे शायद ही स्कूल जाते हैं और जो स्कूल जाते हैं वो अपने मां बाप के व्यवसाय को शायद ही अच्छी नजर से देखते हों, जिनके बच्चे कुपोषित हैं, जिनको बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवा की दरकार है पर मिलती नहीं है।

अगली पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फिर इस नाचीज़ को संबोधित करते हुए अपनी पाती में समस्त चिट्ठाकारों की वो धुनाई करते हैं कि बस क्या कहें. वैसे, उनकी यह चिट्ठी चिट्ठाकारों को ही नहीं, बल्कि इससे इतर, जगत के तमाम लोगों को, अपने अंतर्मन के भीतर झांकने और अपनी वास्तविकता का अहसास करवाती फिरती है. जब भीम को अपनी ताक़त का घमंड हुआ था तो हनुमान ने सिर्फ अपनी पूंछ से भीम को यह दिखा दिया था कि कहीं भी, कोई भी पूरा ताक़तवर नहीं हो सकता, और, ताक़त जैसी बातें रिलेटिव बातें हैं. भाई फ़ुरसतिया की चिट्ठी से मेरा भी वहम फ़ुर्र हो गया और मैं धरातल पर आ गिरा. आप भी अपनी ज़मीन जाँच लें:

अच्छा, बीच -बीच में यह अहसास भी अपना नामुराद सर उठाता है कि हम कुछ खास लिखते हैं। ‘समथिंग डिफरेंट’ टाइप का। हम यथासंभव इस अहसास को कुचल देते हैं पर कभी-कभी ये दिल है कि मानता नहीं। तब अंतिम हथियार के रूप में मैं किसी अंग्रेजीलेखक की लिखी हुई पंक्तियां दोहराता हूँ:-

“दुनिया में आधा नुकसान उन लोगों के कारण होता है जो यह समझते हैं कि वे बहुत खास लोग हैं।”

यह लंबी चिट्ठी अपने भीतर कईयों चिट्ठियों को समाए हुए है. यह वे खुद स्वीकारते भी हैं. दरअसल, अपने इस एक ही पत्र के माध्यम से बहुतों को, अलग-अलग तरीके से, अलग-अलग पत्र लिखते हैं:

हर आदमी खास ‘टेलर मेड’होता है। उससे निपटने का तरीका भी उसी के अनुरूप होता है। यह हम जितनी जल्दी जान जाते हैं उतना खुशनुमा मामलाहोता है।

बहरहाल ,अब इतना लंबा पत्र लिख गया कि कुछ और समझ नहीं समझ आ रहा है। थोड़ा कहा ,बहुत समझना। यह पत्र मैंने रविरतलामी के लिये लिखना शुरु किया था । पता नहीं कैसे दूसरे साथी अनायास आते चले गये। अपने एक दोस्त से बहुत
समय बाद मिलने पर मैंने उससे कहा कि मैं तुमको अक्सर याद करता हूँ। उसने जवाब दिया -याद करते हो तो कोई अहसान तो नहीं करते। याद करना तुम्हारी मजबूरी है.

फ़ुरसतिया जी का पत्र इस शेर के बग़ैर अधूरा ही रहता, जो मुझे ख़ासा पसंद आया:

धोबी के साथ गदहे भी चल दिये मटककर,
धोबिन बिचारी रोती,पत्थर पे सर पटककर।

चलिए, बहुत पटक लिए सर, अब आगे की चिट्ठी पढ़ते हैं. जीतू भाई को अपनी बीवी के लिए ड्राइवर, कुली, कैशियर बनते बनते उन्हें अपना ब्लॉग लिखने को समय नहीं मिल पा रहा, तो फिर वे चिट्ठी क्या ख़ाक लिखते. फिर भी, वे इतना तो उपकार कर गए कि अपनी प्रेम कहानी में इस्तेमाल की गई आख़िरी चिट्ठी हम सबके पढ़ने के लिए पोस्ट कर गए. इस वादे के साथ कि शिब्बू के ख़त के किस्से को वे शीघ्र ही बताएँगे. हमें उसका इंतजार है, पर तब तक उनकी आख़िरी, कवितामयी प्रेमपाती को क्यों न पढ़ लें:

तेरी खुशबू मे बसे खत मै जलाता कैसे
प्यार मे डूबे हुए खत मै जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मै जलाता कैसे
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा

जिनको एक उम्र कलेजे से लगाये रखा
दीन जिनको जिन्हे ईमान बनाये रखा
तेरी खुशबू मे बसे ख़त मै जलाता कैसे…..

इस बीच अनुगूँज को अगली चिट्ठी मिली भाई अतुल की. पढ़ने पर लगा कि क्या यह चिट्ठी है? पर, फिर लगा कि भाई, अगर अगले ने चिट्ठी भेजी है तो यह चिट्ठी ही है. और क्या मज़ेदार चिट्ठी है. चिट्ठी पढ़कर आपको हँसते-हँसते अगर पेचिश न हो जाए तो आप मेरा नाम बदल देना. अतुल भाई, आपकी ऐसी चिट्ठियों का इंतजार रहेगा. इधर लोग-बाग़ हँसना भूल गए हैं ना, इसीलिए. चिट्ठी को दुबारा पढ़कर थोड़ा और हँसा जाए:

हम बारातियो के साथ वह भी बाराती बनके बाहर आ गया था| वह बेवकूफ कैदी बाहर आकर शादी के पँडाल में जलेबी जीमने लगा और उसे हलवाई की ड्यूटी कर रहे दरोगा जी ने ताड़ लिया| वहाँ जेल में कैदियो के परेड शुरू होने पर एक कैदी कम निकलने से चिहाड़ मच गई थी| थोड़ी ही देर में स्थिति नियंत्रण में आ गयी| हलाँकि इस हाई वोल्टेज ड्रामे को देखकर कुछ बारातियो को पेचिश लग गई| अब वह सब तो फारिग होने फूट लिए उधर चौहान साहब देर होने की वजह से लाल पीले होने लगे|

अब, अगर आपकी हँसी रुक गई हो तो अगला ख़त पढें? पर इस बार इस बात की क्या गारंटी है कि अगला पत्र पढ़कर आप न हँसें? भाई तरूण पत्र तो लिखते हैं प्रीटी वूमन को परंतु वे हमारे-अपने जैसे स्मार्ट लोगों की स्मार्ट सोच का फ़ालूदा बनाते दिखाई देते हैं. इस पत्र में हास्य है, व्यंग्य है, अपनी तथाकथित स्मार्ट सोच पर करारी चोट भी है. अब आप हँसें, या रोएँ, फ़ैसला आपका है:

यहाँ एक बात मेरी समझ मे नही आयी कि हम सब लोग तो यहाँ ‘विदेशी’ हैं फिर क्‍यों एक दूसरे को देशी कहते हैं। ऐसे ही दिन गुजरने लगे। एक दिन फिर मै न्‍यूयार्क गया, इंडिया मे अपने शहर मे छोटी-छोटी गलियां हुआ करती थीं यहाँ ‘बिग-ग’लियां थीं। टाईम स्‍कवायर मे रात के वक्‍त ऐसा लगा जैसे सैकड़ों ‘चिराग २०००’ वोल्‍ट के जल रहे हों। वक्‍त गुजरने के साथ-साथ मेरा स्‍टेटस भी एन आर आइ का हो गया लेकिन मै अपने को ‘इ-एनआरआइ’ कहलाना पंसद करता था। एन आर आइ होते ही मै अमेरिका की बड़ी-बड़ी बातें करने लगा और इंडिया मुझे एक बेकार सा देश लगने लगा।

ये क्या? अगला पत्र मेरा अपना ही लिखा हुआ? इस पत्र की नुक्ता-चीनी करना अशोभनीय और अवांछित होगा, इसीलिए, चलिए, इसे बिना किसी टिप्पणी के, यूँ ही पढ़ लेते हैं:

मुझे याद आ रही है बीते हुए साल की जब तुम दोनों ने घनघोर मेहनत की थी. जब तुमने मिलकर तिनका-तिनका बटोरा था और मेरे अँगने में एक छोटा सा घोंसला बनाया था. शहर के कंकरीट के जंगल में प्राकृतिक तिनके तुम्हें कुछ ज्यादा नहीं मिले थे तो तुमने प्लास्टिक के रेशे, पॉलिथीन की पन्नियाँ और काग़ज़ के टुकड़ों की सहायता से अपने घोंसले का निर्माण किया था. तुम्हें वृक्ष की मजबूत टहनी नहीं मिली थी तो अपने घोंसले को तुमने कंकरीट की सीढ़ियों के नीचे से जा रहे तार के सहारे मजबूरी में बनाया था. तुम लोगों ने सिर्फ चोंच की सहायता से ऐसा प्यारा, सुंदर और उपयोगी घोंसला बनाया था कि मैं सोचता हूँ कि अगर तुम्हारे पास हमारी तरह सहूलियतें होती तो क्या कमाल करते.

अब मेरे हाथ में यह आख़िरी पत्र बचा है. भाई रमण का यह सारगर्भित, सोचने को मजबूर करता पत्र. यह एक प्रकार से पाती का मरसिया है, जो वे अपने पत्र के माध्यम से पढ़ रहे हैं. हम सब बड़े दुःख के साथ चिट्ठी को मरता हुआ देख रहे हैं. आइए, हम भी भाई रमण की इन पंक्तियों के साथ चिट्ठी की मौत का मातम मनाएँ:

मेरी प्यारी पाती,
मुझे बहुत दुख है कि तुम अब इस दुनिया में नहीं रही। खैर जहाँ भी हो, सुखी रहो। इस दुनिया में फिर आने की तो उम्मीद छोड़ दो क्योंकि इस दुनिया में तुम्हारा स्थान ईमेल ने ले लिया है। सालों हो गए तुम्हें गुज़रे हुए। वास्तव में तुम्हारी याद तो बहुत आती है। तुम्हारे रहते ही तुम्हारी पूछ बहुत कम हो गई थी, जैसा हर किसी के साथ बुढ़ापे में होता है। लोग खबर एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए पहले ही टेलीफोन का इस्तेमाल करने लग गए थे।

ॐ शांति शांतिः अथ श्री 10 वीं अनुगूँज आयोजनम सम्पन्नम् भवतः

सभी चिट्ठाकार मित्रों को साधुवाद.

पुनश्च: अगर किसी मित्र की चिट्ठी भूलवश पढ़ने-पढ़ाने में छूट गई हो, तो कृपया
मुझे क्षमा करते हुए तत्काल सूचित करें ताकि उसे भी पढ़-पढ़ा
लिया जाए.
*-*-*

google adsense centric spam blog कुछ लोगों के लिए ये तकनीक का बेजा इस्तेमाल हो सकता है, परंतु कुछ शातिरों के लिए धन बनाने की एक शानदार मशीन.

पर, क्या ये धंधा चल निकलेगा? मेरे विचार में ये धंधा क्या ऐसे किसी भी धंधे के ज्यादा दिन तक चल सकने की किसी तरह की कोई उम्मीद नहीं है. बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी आखिर.

गूगल के अनुवाद औजार जैसे स्वचालित मशीनी तकनीक का सहारा लेकर एक ही आलेख के हर संभव भाषा में अनुवाद कर एक ऐसा ही बहुभाषी ब्लॉग साइट बनाया गया है. जिसका प्राथमिक उद्देश्य ही प्रतीत होता है कि हर संभव तरीके से गूगल सर्च ट्रैफ़िक खींच कर एडसेंसी कमाई की जाए.

यह ब्लॉग स्थल भी हिन्दी के किसी वाक्यांश के गूगल में खोज के दौरान मिला. परंतु एक बार प्रयोक्ता के वहां जाकर देख आने के बाद क्या कभी गलती से भी दोबारा उसके द्वारा कदम वहां रखा जाएगा? शायद नहीं. भले ही आलेखों में कुछ सार तत्व हों (प्राथमिक दृष्टि से तो ऐसा कुछ ज्यादा नजर नहीं आता) मगर हर संभव भाषा में अनुवाद कर उन्हें एक ही (ब्लॉग) स्थल पर रखने का शातिराना तकनीकी खिलवाड़ वाकई नायाब, नए किस्म का है!

 google adsense centric spam blog1

वैसे, दूसरी निगाह में, क्या ये विचार शानदार नहीं है? क्यों न हम भी अपने हिन्दी ब्लॉग की सामग्री को उपलब्ध तकनीक के सहारे हर संभव भाषा में अनुवाद कर ब्लॉग में पोस्ट करें और अंतहीन कमाई का सिलसिला शुरू करें?

तो फिर, देर किस बात की ?? आइए, शुरू करें???

यह साक्षात्कार इतना प्रसिद्ध है कि अंग्रेज़ी में इसकी कोई दस कड़ियाँ (1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10) कॉपीस्केप के जरिए हासिल हो चुकी हैं. वैसे, मूल लेखक (कौन हैं?) को साधुवाद सहित इसका हिन्दी तर्जुमा प्रस्तुत है:

इन्फ़ोसिस में एक साक्षात्कार

परीक्षक : अपने बारे में कुछ बताएं.
परीक्षार्थी: मेरा नाम कोनदेश कुलकर्णी है. मैंने बबनराव ढोले-पाटिल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलाजी से टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियरिंग में बीई किया है.

परीक्षक: बबनराव ढोले-पाटिल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलाजी? आज से पहले इसका नाम मैंने नहीं सुना था!
परीक्षार्थी: बढ़िया! मैंने भी इसका नाम तब तक नहीं सुना था जब तक मैंने इसमें दाखिला नहीं लिया था. हुआ ये था कि क्रिकेट मैचों के कारण मेरी 12वीं का ग्रेड बिगड़ गया और इंजीनियरिंग एंट्रेंस सड़ गया. मुझे अच्छे कॉलेज में पेड सीट मिल रही थी. परंतु मेरे पिताश्री -मैं उन्हें ‘बाप’ कहना ज्यादा पसंद करता हूं- ने कहा “मेरे पास इतना ज्यादा पैसा तुम्हारी पढ़ाई में लगाने के लिए नहीं है”. दरअसल वे सही में ये कहना चाह रहे थे और मैं जानता था – “मैं कभी भी इतना सारा पैसा तुम पर लगा नहीं सकता”. तो मेरे पास इस कॉलेज में दाखिला लेने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था. वैसे, बबनराव ढोले पाटिल को आप शेतकरी महाविद्यालय समझ सकते हैं...

परीक्षक: ठीक है, ठीक है. पर आपने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छः साल में पूरी की है...
परीक्षार्थी : मैं तो सचमुच में चाहता था कि मेरी पढ़ाई 4 साल में पूरी हो जाए, और मैंने अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी, ताकि पढ़ाई की बोरियत का समय कम से कम रहे. परंतु आपको पता ही है ... ऐन परीक्षाओं के समय क्रिकेट टूर्नामेंट, फ़ुटबाल विश्वकप, विम्बलडन और यूएस ओपन टेनिस... इन सबके बीच पढ़ाई में ध्यान किसी अमानव का ही लग सकता होगा. जाहिर है, मैं दूसरे और तीसरे साल में रुक गया. और कुल मिलाकर 4 + 2 = 7 साल लग गए.

परीक्षक: परंतु 4+2 तो 6 होता है.
परीक्षार्थी: ओह, क्या सचमुच? अब मेरा गणित थोड़ा सा कमजोर है. परंतु मैं अब ध्यान रखूंगा. 4+2 होते हैं 6. ठीक है, अब याद रहेगा. धन्यवाद. क्रिकेट के खेल ने परीक्षाओं में सचमुच गहरा असर डाला है. मुझे तो लगता है कि इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

परीक्षक : यह जानकर अच्छा लगा कि आप चाहते हैं कि क्रिकेट मैचों में प्रतिबंध लगा दिया जाए.
परीक्षार्थी: नहीं नहीं, मैं तो परीक्षाओं की बात कर रहा था. पढ़ाई में परीक्षाएं क्या जरूरी हैं?

परीक्षक: ठीक है. अच्छा ये बताइए, जीवन में अब तक की आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही है?
परीक्षार्थी: जाहिर है, मेरी इंजीनियरिंग की डिग्री. मेरी माताश्री को कभी भरोसा ही नहीं रहा था कि इस जन्म में यह कार्य मैं पूरा कर भी पाऊंगा. जब मैं तीसरे वर्ष फेल हो गया था तो उन्होंने अपने रिश्तेदार के जरिए मेरे लिए एक लड़की और जॉब दोनों ही ढूंढ लिया था... वो तो उस लड़की का प्रोफ़ाइल था जो मेरी डिग्री प्राप्त करने की राह में मददगार हो गया वरना...

परीक्षक: क्या आपके भविष्य के कोई प्लान हैं आगे की उच्च शिक्षा के लिए?
परीक्षार्थी: हे हे हे... आप क्या मजाक करते हैं... निम्न शिक्षा पूरा करना ही इतना दर्दीला था..!!

परीक्षक: चलिए, कुछ तकनीकी बातें करते हैं. आप किस प्लेटफ़ॉर्म पर कार्य करते हैं?
परीक्षार्थी: मैंने प्लेटफ़ॉर्म पर कार्य तो नहीं किया है, परंतु मेरा घर अंधेरी प्लेटफ़ॉर्म के करीब है. और वाशी के पास में मेरा दोस्त रहता है. हम अकसर एक दूसरे के यहाँ जाते रहते हैं तो हमें विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म का पूरा आइडिया है. हम किसी में भी काम कर सकते हैं

परीक्षक: ओह, हाँ. अच्छा आपने किस लैंगुएज में महारत हासिल की है?
परीक्षार्थी: मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी. वैसे, मैं जर्मनी, फ्रांसीसी, रूसी और ऐसी ही अन्य अनेक भाषाओं में मौन रहकर अपनी बात बख़ूबी कह सकता हूं.

परीक्षक: ये बताइए, वीसी (VC), वीबी(VB) से बेहतर क्यों है?
परीक्षार्थी: अब हमारे पास क्या इत्ता कामन सेंस नहीं रहेगा. सी तो बी के बाद ही आता है ना. तो वीसी वीबी से बड़ा हुआ ना. कोई बता रहा था कि नई भाषा वीडी भी आ रहा है!

परीक्षक : असेंबली लैंगुएज के बारे में कुछ बताइए?
परीक्षार्थी : झूठ क्यों बोलूं, मैंने इसके बारे में कुछ सुना नहीं है. हां, परंतु मेरा विचार है कि ये नेता और मंत्री लोग जो असंसदीय भाषा असेंबली में बोलते हैं, शायद उससे कुछ रिश्ता होगा.

परीक्षक: आपकी परियोजनाओं के बारे में सामान्य अनुभव क्या रहे हैं?
परीक्षार्थी: मेरे सामान्य अनुभव तो ये रहे हैं कि परियोजनाएँ अधिकांश समय पाइपलाइन में रहती हैं!

परीक्षक: क्या आप बता सकते हैं कि अभी आप वर्तमान में क्या कर रहे हैं?
परीक्षार्थी: जी हाँ, जरूर. मैं अभी बाटा इन्फ़ोटेक में काम कर रहा हूं. जबसे मैंने बाटा इन्फ़ोटेक में काम करना शुरू किया है, तब से मैं बेंच पर हूँ. बीआईएल में काम करने से पहले लोग जब बोलते थे कि वे बेंच पर हैं, तो मुझे लगता था कि इतने लोग बेंच पर हैं तो यह विंडोज से भी बड़ा सॉफ़्टवेयर होगा जो बनाया जा रहा है..

परीक्षक: क्या आपके पास किसी तरह का परियोजना प्रबंधन का अनुभव है?
परीक्षार्थी: नहीं, परंतु यह इतना कठिन भी नहीं होना चाहिए. मुझे वर्ड और एक्सेल पता है. मैं बातें बहुत कर सकता हूं. मुझे पता है कि कैसे कम्प्यूटरों से इंटरनेशनल काल किया जा सकता है और मुझे पीसी स्पीकर का प्रयोग भी आता है. और, जरूरी बात ये कि मुझे बहुत से अंग्रेजी के तकनीकी शब्द जैसे कि 'शोस्टापर्स', 'हॉटफ़िक्सेस', 'सीएमएम', 'क्वालिटी',
'वर्जन कंट्रोल', 'डेडलाइन्स', 'कस्टमर सेटिस्फैक्शन' इत्यादि आते हैं. तथा मैं अपनी गलतियों के लिए दूसरों पर आरोप लगा कर उसे सिद्ध कर सकता हूं!

परीक्षक: आपको हमारी कंपनी से क्या आशाएं है?
परीक्षार्थी: ज्यादा तो नहीं, पर ..
1. मेरे हाथ में कम से कम महीने के 40,000 तो आना ही चाहिए.
2. मैं किसी जीवंत परियोजना में काम करना चाहूंगा. परंतु इसमें कोई डेडलाइन होना नहीं चाहिए. मेरा मानना है कि डेडलाइन से व्यक्ति के प्राकृतिक बुद्धिमत्ता और कौशल पर आघात पहुंचता है.
3. मैं फ्लैक्सी टाइमिंग पर विश्वास करता हूं. यानी कोई तय कार्य घंटे नहीं.
4. मूल भूत अधिकारों के विरूद्ध है ड्रेस कोड. बरमूडा और गमछा में भी, मूड के हिसाब से कार्य स्थल पर आने की इजाजत होनी चाहिए.
5. पाँच कार्य दिवस का सप्ताह हो. शनि, रवि की छुट्टी हो. बुध की छुट्टी भी हो तो और अच्छा. इससे दिमाग फ्रेश रहेगा और आउटपुट ज्यादा मिलेगा.
6. मैं साल में 3 बार विदेश जाना चाहूंगा – असाइनमेंट हो या न हो. मैं यूएस, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप पसंद करता हूं, परंतु यदि क्रिकेट का सीजन हो तो वेस्टइंडीज और अफ्रीका भी जाना चाहूंगा. तो आपने देखा है कि मेरी ज्यादा प्रत्याशाएं नहीं है आपकी कंपनी से. तो क्या मैं अपने आप को चयनित समझूं?

परीक्षक: हे हे हे हा हा हा... हमारे संगठन में आने का शुक्रिया. दरअसल आज से ज्यादा मनोरंजन हमारा कभी भी नहीं हुआ था. हम आपके साथ अवश्य काम करना चाहेंगे. इन्फ़ोसिस में आपका स्वागत है.:-)


पुराने दिनों को लोगबाग याद करते हैं तो क्या बुरा करते हैं. हर गुजरा हुआ पुराना दिन मीठी याद लिए हुए होता है और वो शर्तिया वर्तमान और आने वाले दिनों से ज्यादा अच्छा होता है.

अब, बीमा के मामलों को ही ले लें. ज्यादा नहीं, अभी चार-पाँच साल पुरानी बात ही ले लें. क्या खुशनुमा दिन थे वो भी. ले देकर इक्का दुक्का सरकारी बीमा कंपनियां होती थीं भारत में और उसके पूर्णकालिक-अंशकालिक एजेंट होते थे जो आमतौर पर वर्ष के आखिरी महीनों में टैक्स प्लानिंग और इंश्योरेंस और कभी कभी बचत के नाम पर इंश्योरेंस हेतु आग्रह करते दिखाई पड़ते थे.

मगर, बेड़ा गर्क हो इन मनमोहनी और चिदंबरमी आर्थिक सुधारों का कि दर्जनों बीमा कंपनियाँ देखते ही देखते चली आई हैं और कई चली आने की कवायद में हैं. गली मुहल्लों में इनके लकदक और चकाचक करते ऑफ़िस पे ऑफ़िस खुलते चले आ रहे हैं.

बात इन बेहिसाब कंपनियों और गली मुहल्ले में खुलते बीमा कंपनियों के ऑफ़िसों तक सीमित नहीं है. समस्या ये नहीं हैं. समस्या की जड़ दूसरी है. पुराने दिनों की मीठी यादों को और मीठी करती वर्तमान की समस्याएँ कुछ और ही हैं.

आप किसी पार्टी में गए हुए होते हैं. वहां कोई परिचित सा लगने वाला चेहरा नामालूम कहां से नमूदार होता है और तपाक से हाथ मिलाता है. बड़ी ही आत्मीयता से हाल चाल पूछता है. घर-परिवार स्वास्थ्य नौकरी व्यवसाय इत्यादि. आप कयास लगाते रह जाते हैं कि बंदे को कहां देखा था. फिर वो असली बात पर आ जाता है – मैंने फलॉ नई बीमा कंपनी की एजेंसी ली है. इसमें ये ये स्कीमें हैं और बहुत फ़ायदे मंद हैं. सरकारी एलआईसी तो लूटता है. फलॉ ये दूसरी कंपनी का रिटर्न ठीक नहीं है, उसमें निवेश उचित नहीं है. बोलिए, कब आऊँ?

आप कहीं ट्रेन या बस में जा रहे होते हैं, या फ़्लाइट के पकड़ने के लिए इंतजार कर रहे होते हैं, तब भी इसी किस्म की दुर्घटना आपके साथ होती है. आप बैंक में किसी काम से गए होते हैं, बुक शॉप में किताब खरीद रहे होते हैं, या फिर चौराहे पर कड़क मीठी चाय सुड़क रहे होते हैं या फिर सिनेमा या स्टेशन के सार्वजनिक मूत्रालय में आप होते हैं, और आपके साथ ये दुर्घटना घट जाती है.

हालात ये हैं कि आपका दूर के रिश्तों में चाचा, बाबा, काका, फूफा, फूफी और न जाने कौन लोगों को भी इन नए इंश्योरेंस कंपनियों ने लगता है जबरन एजेंसी पकड़ा दी है. रविवार की दोपहरी को आप आराम कर रहे होते हैं और या तो डोरबेल बजता है या टेलिफोन की घंटी. फिर उधर से प्रेम-प्यार और मनुहार से हाल चाल पूछे जाते हैं फिर अंत में असली मुद्दे पर आने में ज्यादा देर भी नहीं लगती – फलॉ बीमा कंपनी अभी अभी जॉइन की है. टारगेट पूरा करना है. आपकी कृपा हो जाए तो... रिश्तेदारी है, भई निभानी पड़ती है. आपको भी निभानी पड़ेगी ही.

आपके पास कुछ पैसा आ जाता है. आप सोचते हैं कुछ बढ़िया जगह निवेश किया जाए. चौराहे पर लगा फटा, परंतु विशाल पोस्टर याद दिलाता है – बजाज एलाएंज का बीमा निवेश – सबसे बेहतर. अख़बार के पहले पृष्ठ पर अवीवा का दावा चमक रहा होता है – सबसे फॉरवर्ड थिंकिंग निवेशक – अवीवा निवेशक. जबकि आईसीआईसीआई के एजेंट, जो जाहिर है, आपके दूर के परिचित रहे हैं, आपको समझा गए होते हैं कि उनका ही प्रॉडक्ट सबसे बेहतर है. उधर टीवी पर अलग राग अलापा जा रहा है – जो बीवी से करे प्यार वो कैसे करे रिलायंस इंश्योरेंस से इंकार. एचडीएफसी कहता है सिर उठा के जिओ. यानी अब तक आप सिर झुका के जी रहे थे. वैसे, भारत में सिर उठा कर जीने का बढ़िया सपना बेचा जा रहा है. और, किसी बीमा कंपनी का एक नहीं कोई दर्जनों प्रॉडक्ट होते हैं और उनमें से हर एक सबसे बेहतर होता है. आप पैसा जिसमें लगाएं, वो ही सबसे बेहतर प्रॉडक्ट होता है.

अंततः आपके साथ हालात ये हो जाते हैं कि आप लोगों से मुँह चुराने लग जाते हैं. जब सामने वाला हर व्यक्ति आज आपको इंश्योरेंस एजेंट नजर आने लगा है तब करें भी तो क्या?

ठीक आपकी ही तरह की समस्या से जूझते जूझते अचानक मेरे दिमाग में एक दिन बिजली सी कौंधी और एक बढ़िया सा हल जेहन में आया. दूसरे दिन मैं एक इंश्योरेंस दफ़्तर में गया और तुरत फुरत एक एजेंसी ले ली. घर पर नाम पट्टिका में बड़े अक्षरों में लिखवाया - बीमा एजेंसी.

तब से पता नहीं क्यों, परिचितों, रिश्तेदारों के फोन आने बंद हो गए. घर पर भी परिचितों, रिश्तेदारों का आना जाना कम हो गया (अब ब्लॉग लेखन-पठन पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा,). अब सरे राह कोई परिचित चेहरा आत्मीयता दिखाता नहीं दीखता. बल्कि कई तो कतराते हुए निकल जाते हैं. यदि कोई अज्ञानी-परिचित मिल भी जाता है, और आत्मीयता दिखाते हुए बीमा की बात निकालने की कोशिश करता भी है तो उससे पहले मैं ही बीमा के लिए आग्रह कर देता हूं. आखिर, बीमा आग्रह की विषय वस्तु है.

मेरी तो सलाह ये है कि आप अपनी न सही, अपने ब्लॉग का बीमा अवश्य करवाएं. कौन जाने कब, कैसी मुसीबत आन पड़े. कब वायरस और ट्रोजनों से आपका ब्लॉग संक्रमित हो जाए और इस इंटरनेटी आभासी दुनिया से ग़ायब हो जाए.

तो, देर किस बात की? हर चिट्ठाकार के लिए, हर चिट्ठाकार के जेब के अनुसार, शानदार, बेहतरीन ऑफर. न्यूनतम प्रीमियम किश्तें व अधिकतम रिटर्न के लिए मुझसे आज ही संपर्क करें.

बीमा, आग्रह की विषयवस्तु है...

----
व्यंज़ल
----
दोस्त सारे एजेंट हो गए

दोस्त सारे जब एजेंट हो गए
दोस्ती में हम भी एजेंट हो गए

मेरे शहर की फ़िजां यूं बदली
यहां के लोग सब एजेंट हो गए

रिश्तों में तब्दीलियाँ ऐसी हुईं
एक दूजे के लोग एजेंट हो गए

दिल के बदले मांगा दिल था
कहते हैं वो तुम एजेंट हो गए

दिन अब हमारे भी फिरेंगे रवि
आखिर हम भी एजेंट हो गए
----

गूगल बाबा की सौगातें हिन्दी के लिए जारी हैं. गूगल डॉक्स में कुछ समय पूर्व उपलब्ध हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा जो वापस ले ली गई थी, उसे बहाल कर दिया गया है और क्या ख़ूब किया गया है. यह एमएस ऑफ़िस हिन्दी की वर्तनी जांच सुविधा से सीधे टक्कर ले रहा है, और किसी मामले में कम नहीं है. बल्कि यह कहा जाए कि एमएस वर्ड से हिन्दी वर्तनी जांच से कुछ मामले में यह बीस है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. हाथ कंगन को आरसी क्या? नीचे स्क्रीनशॉट देखें.


एमएस वर्ड का हिन्दी वर्तनी जांच


जीमेल का हिन्दी वर्तनी जांच



गूगल डॉक्स का हिन्दी वर्तनी जांच

हाँ, पर इसमें एमएस वर्ड हिन्दी में उपलब्ध थिसॉरस की सुविधा नहीं है. पर, उसकी जरूरत आम प्रयोक्ता को उतनी नहीं है जितनी मूलभूत हिन्दी वर्तनी जांच की. हिन्दी वर्तनी जांच की यह सुविधा जीमेल में भी उपलब्ध है. यानी मेरे ईमेल में वर्तनी की गलती अब नहीं होगी. हाँ, ये लिखते लिखते ही वर्तनी नहीं जांचता. पूरा लिखने के बाद वर्तनी जांच पर क्लिक करने पर यह जांचता है. वर्तनी जांच हेतु विकल्प में हिन्दी भाषा चुनें. नए शब्दों पर क्लिक करने पर यदा कदा यह वैकल्पिक शब्द भी सुझाता है तथा आपके शब्दकोश में जोड़ने की भी सुविधा प्रदान करता है जिससे इसके डाटाबेस में शीघ्र ही प्रचुर शब्द भंडार एकत्र होने की संभावना भी है.

तो, अब ब्लॉग पोस्ट प्रकाशित करने से पहले उसे गूगल डॉक्स में जांच लें. निकट भविष्य में सीधे ब्लॉगर एडिट बक्से से यह सुविधा उपलब्ध होनी ही है.

पर, व्याकरण का क्या करूं? लिखते लिखते, कहीं कहीं जाता हूं के बजाए जाती हूं हो जाता है. उम्मीद करें कि इसकी भी सुविधा हमें जल्द मिलेगी.



पिछले हफ़्ते भारतीय भाषाओं के खोजक गुरुजी खोज द्वारा भारतीय फ़िल्म संगीत खोज के लिए एक नई सेवा प्रस्तुत किया गया.

वैसे तो हिन्दी फ़िल्मी गीतों को इंटरनेट पर ढूंढने के लिए कई प्रकल्प हैं, जिनमें एक प्रमुख, बढ़िया सेवा की कड़ी इस चिट्ठे की बाजू पट्टी में उपलब्ध है. यह सेवा भी अच्छे परिणाम देती है. परंतु आरंभिक जांच परख में गुरुजी संगीत खोज के परिणाम ज्यादा बेहतर रहे.

मैंने एक हिन्दी गाना उसके बोलों से ढूंढने की कोशिश की. जिसके बोल हैं – रेखा ओ रेखा जिसने तुम्हें देखा.


गुरूजी संगीत खोज इस गीत की कोई तीन कड़ियाँ खोज लाया और उसमें से कोई दो कड़ी पर उसके ऑनलाइन प्लेयर पर सुना भी जा सका. तीसरी कड़ी, बस देर तक लोड होती रही और बजी नहीं.


गुरुजी संगीत खोज में आप गानों के बोल, गायक, संगीत कार, फ़िल्म, गीत कार, कलाकार (एक्टर), एलबम इत्यादि के आधार पर भी खोज सकते हैं. 1932 से लेकर 2008 तक के हिन्दी (अन्य भारतीय भाषाओं के गाने भी) आप ढूंढ सकते हैं.

गुरुजी संगीत खोज में अभी आप हिन्दी गानों को सिर्फ रोमन में ही खोज सकते हैं. इसके पीछे कारण ये है कि अधिकतर सर्वरों में इन गानों को इनके रोमन नामों व उच्चारणों के आधार पर सहेजा गया है. जिससे यूनिकोड हिन्दी के द्वारा खोजा जाना अभी लागू नहीं हो पाया है. संभवतः भविष्य में रोमन-देवनागरी परिवर्तन के जरिए शायद ये भी संभव हो जाए.

कुल मिलाकर, यदि आप मेरी तरह संगीत के दीवाने हैं तो आपके लिए निश्चित ही काम की सेवा. अभी ही बुकमार्क कीजिए.



ग्रांड थेफ़्ट ऑटो 4 : हिंसा व यौन अपराधों से भरपूर, नया ताज़ातरीन वीडियो गेम

स्पेस वार और पांग जैसे शुरूआती कम्प्यूटर और वीडियो गेमों के प्रेमियों ने कभी ये अनुमान नहीं लगाया होगा. वीडियो गेम के पुरातन हीरो मारियो ब्रदर्स जैसे प्यारे व्यक्तित्व का ग्रांड थेफ़्ट ऑटों के आधुनिक निको बैलिक जैसे अपराधी और कामुक ख़ूनी के रूप में परिवर्तन - जिसका काम ही, यथा-नाम-तथा-गुण, मोटर-बाइकों और कारों की चोरी से प्रारंभ होता हो – निश्चित ही हाहाकारी है.
(ग्रांड थैफ़्ट ऑटो का हीरो - निको बैलिक)


(प्यारा सा, छुन्ना सा मारियो)

मगर, खेल प्रेमियों ने इसे हाथों हाथ लिया है. ये सचमुच आश्चर्य है कि दुनिया अपराध से इतना प्यार क्यों करती है? 29 अप्रैल 2008 को इसके जारी होने के पाँच दिनों के भीतर ही प्लेस्टेशन और एक्सबॉक्स 360 के लिए एक साथ जारी ग्रांड थेफ़्ट ऑटो 4 की 9 लाख 26 हजार प्रतियाँ हाथों हाथ बिक गईं और यह वीडियो खेलों में अब तक का सबसे ज्यादा बिकने वाला वीडियो गेम बन गया. चंद शुरूआती दिनों में ही इसके निर्माता रॉकस्टार नॉर्थ को कोई 200 करोड़ रुपए की आय हो चुकी है. एक अनुमान के अनुसार यह पाइरेट्स ऑफ कैरिबियन श्रेणी की सबसे सफल फ़िल्म से भी ज्यादा का व्यवसाय करेगी. यह ग्रांड थेफ़्ट ऑटो श्रेणी का ऐसा पहला वीडियो गेम है जिसे ऑनलाइन मल्टीप्लेयर मोड में भी खेला जा सकता है.

ग्रांड थेफ़्ट ऑटो में रॉकस्टार नार्थ का रेग तथा यूफ़ोरिया गेम इंजिन है जिसमें खेल का संचालन पहले से लिखे गए, तयशुदा दृश्यों पर चलने के बजाए कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग कर खिलाड़ी के चाल व मौजूद दृश्यों पर निर्भर करता है. इससे गेम खेलने वाले को हर बार एक नया सा अनुभव तो होता ही है, यह वास्तविक दुनिया का सा रोमांच भी देता है. तो जरा रोमांचित होकर सोचिए कि आप अपने किसी प्रतिद्वंद्वी का गला रेत रहे हों, वह तड़प रहा हो और उसके गले से भल – भल ख़ून बह रहा हो...

आमतौर पर, अभिभावक अपने बच्चों को वीडियो गेम खेलते देख संतुष्ट हो लेते हैं कि इससे ज्यादा नुकसान नहीं है, और यह एक तरीके का स्वस्थ मनोरंजन है, और कुछ मामले में इसके फ़ायदे भी हैं. मगर ग्रांड थैफ़्ट ऑटो 4 (इसके पूर्व के संस्करण भी ऐसे दृश्यों से भरपूर हैं) जैसे खेल जो अपराध, सेक्स और हिंसा के ताने बाने पर बुने हों, बाल मन पर किस तरह उलटा असर डाल सकते हैं इसकी कल्पना नहीं की जा सकती. वैसे तो ग्रांड थेफ़्ट ऑटो को वयस्क खेलों की श्रेणी में जारी किया गया है, मगर भारत जैसे देश में जहाँ चीयर गर्ल्स या सानिया मिर्जा के ड्रेस पर तो हो हल्ला मचाया जाता है, मगर इस तरह के वीडियो गेम बिना किसी सेंसर के वैध और अवैध (नकली, पायरेटेड) हर कहीं हर किसी को बेरोकटोक उपलब्ध हो जाते हैं. और इन पर किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती है. जाहिर है, इस क़िस्म के वीडियो खेलों में कहीं ज्यादा हिंसा और नंगई होती है, और वे कहीं ज्यादा नुकसान कर सकते हैं.

इस वीडियो गेम को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में जारी करने से पूर्व (वहां के कानून के पालनार्थ) इसमें निहित अत्यधिक हिंसा और उत्तेजक यौन / मैथुन दृश्यों को हटा दिया गया है. भारत में इस तरह का कानून वीडियो खेलों के लिए नहीं ही है – वीडियो गेमों के लिए सेंसर बोर्ड जैसा प्रकल्प नहीं है जो खेलों में निहित इस तरह की चीजों की जांच पड़ताल कर इन्हें जारी करे. और, यदि ये जांच पड़ताल होती भी हैं तो पाइरेसी के चलते वैसे भी इस तरह के कदम निष्प्रभावी ही रहेंगे.

इस तरह के हिंसा व सेक्स से भरे खेलों पर प्रतिबंध के लिए तमाम तरफ से विरोधों के स्वर उठते रहे हैं. फ्लोरिडा, अमरीका के वकील (ग्रांड थैफ़्ट ऑटो – न्यूयॉर्क शहर के नए, नक़ली रूप लिबर्टी सिटी पर आधारित है) जैक थॉमसन बहुत पहले से ही इस अभियान में लगे हैं कि बच्चों व किशोरों को ग्रांड थैफ़्ट ऑटो जैसे यौन दृश्यों व हिंसा से भरपूर खेलों की बिक्री किसी सूरत न हो सके. मगर इस खेल की रेटिंग वयस्क कर दी गई है परंतु इसके अवयस्कों द्वारा खरीदने बेचने पर पाबंदी नहीं है. ग्रांड थैफ़्ट ऑटो 4 भले ही भारत में अभी वैध रूप से विक्रय हेतु जारी नहीं किया गया हो, मगर इसकी पायरेटेड कॉपियाँ पालिका बाजार जैसी जगहों में आसानी से उपलब्ध हैं. जाहिरा तौर पर, बच्चों व किशोरों के पालकों को ही खबरदार रहना होगा.


आपसे मेरा एक छोटा सा सवाल है - धनवान कौन?

प्रसंगवश, आज ही डॉ. अनिल चड्ढा ने अपने चिट्ठे में पूछा है - भिखारी कौन?

भिखारी कौन है ये जानने के लिए आपको डॉ. अनिल चड्ढा के चिट्ठे के ऊपर दिए गए लिंक पर जाना होगा. और धनवान कौन है ये जानने के लिए शेयर बाजार के खबरों व विश्लेषणों पर आधारित विश्व के पहले हिन्दी पोर्टल मोलतोल.इन पर जाना होगा. यदि आप समझते हैं कि आप धनवान नहीं हैं, तो धनवान बनने के लिए टिप्स और युक्तियाँ पाने के लिए यहाँ जाएं. और यदि आप समझते हैं कि आप धनवान हैं, तो अति-धनवान बनने के लिए, और अधिक धनवान कैसे बनें इस हेतु जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए उपयोगी मोलतोल.इन से बेहतर कोई और जगह हो सकती है भला!

मोलतोल.इन का आरंभिक कलेवर और सामग्री स्तरीय दिखाई देता है. पाठकों व निवेशकों को शेयर बाजार में निवेश के प्रभावी तरीकों के बारे में, उम्मीद करें कि यह साइट नियमित रूप से अपडेट करती रहेगी.

मोलतोल.इन को शुभकामनाएं.

तो फिर, अब जरा सोच समझ कर बताएं, आप अपने आप को धनवान मानते हैं कि नहीं?

हम सभी के भीतर एक मूढ़मति छुपा हुआ होता है. किसी कार्य को, किसी ट्रिक को, किसी टिप को आजमाने के लिए हमें तरीके ढूंढने होते हैं, जुगाड़ लगाने होते हैं. और, बहुधा, आसान से लगने वाले कार्य भी सीधे-सीधे पल्ले नहीं पड़ते.

इन्हीं बातों के मद्देनजर लिखी गईं तमाम विषयों के डमी के गाइड और परिपूर्ण ईडियट की गाइडें बाजार में अच्छी खासी संख्या में बिकती रही हैं.

मेरा शुरूआती कम्प्यूटिंग ज्ञान डमीज गाइड टू यूनिक्स और डमीज गाइड टू विंडोज के सहारे ही परवान चढ़ा था. अभी भी कभी कहीं पर अटकता हूं तो ये किताबें काम आती हैं क्योंकि कभी स्मृत्तिलोप यदा कदा होता ही रहता है, तो कभी अब तक नहीं आजमाए गए नए पुराने जुगाड़ों के लिए भी उनके पन्ने पलटने पड़ते हैं.

ब्लॉगर के लिए भी एक डमीज गाइड है. यह ऑनलाइन है और मुफ़्त है. हालाकि अभी ये किसी सूरत में परिपूर्ण नहीं है, मगर फिर भी कुछ शुरूआती विस्तृत गाइड तथा टिप्स और ट्रिक्स इसमें उपलब्ध हैं, जो ब्लॉगर के चिट्ठाकारों के लिए बहुत काम के हैं.

और, यदि आप वर्डप्रेस इस्तेमाल करते हैं तो फिर तो आपके लिए पूरे का पूरा वर्डप्रेस फ़ॉर डमीज किताब उपलब्ध है. अभी खरीद लाएँ अपने ब्लॉगिंग अनुभव में चार चांद लगाने के लिए. और, ये देखिए, यहां पर चिट्ठाकारी के लिए जड़मतियों का गाइड (ईडियट्स गाइड टू ब्लॉगिंग) भी तो उपलब्ध है!

तो जाइए, कुछ नई बातें वहां से सीख लीजिए और अपने ज्ञान को हमसे साझा कीजिए.

और, मूढ़मतियों के गाइड के नाम से कतई शर्मिंदा न हों.

क्योंकि, स्मार्ट पीपल रीड्स ईडियट्स गाइड!

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget