April 2008

आप पूछेंगे कि लिनक्स में चोखेरबालियों का क्या काम? थोड़ा धीरज रखिए. आगे पढ़िए.

वैसे तो इस पोस्ट को उन्मुक्त के चिट्ठे पर अवतरित होना चाहिए था, क्योंकि वे लिनक्स प्रेमी तो हैं ही, अपना संपूर्ण कार्य लिनक्स पर ही करते हैं. मैं विंडोज और लिनक्स के बीच डूबता उतराता रहता हूं, क्योंकि अभी भी बहुत से भाषाई औजार जिनपर मैं काम करता हूँ, उनके विकल्प न तो पूरे तौर पर विंडोज विस्ता में मौजूद चलते हैं न लिनक्स पर.

लिनक्स को स्त्रियाँ भी बेहद पसंद करती हैं. और, लिनक्स प्रेमी पुरुषों का तो कहना ही क्या!
लिनक्स प्रेमी स्त्रियों के लिए एक साइट है – अंग्रेज़ी में, जिसका नाम है – लिनक्स चिक्स.ऑर्ग लिनक्स चिक्स.ऑर्ग का भारतीय चेप्टर भी है, जो 2005 से शुरू हुआ था. भारतीय लिनक्स चोखेरबालियों का उनका एक अपना ग्रह भी है.

अब आते हैं, मुद्दे पर. शीर्षक पर. क्या ये हिट खेंचू टाइप शीर्षक है? शायद हाँ, शायद नहीं.
पर, लिनक्स चिक्स का विशुद्ध भारतीयकरण : लिनक्स चोखेरबालियाँ से बेहतर किसी के दिमाग में सूझता हो तो बताएँ :)

blog co in - a new blog platform on wordpress

वर्डप्रेस में अपने स्वयं के चिट्ठे पर एडसेंस जैसी सुविधा लगाने के लिए आपको स्वयं का डोमेन लेना होता है और स्वयं ही वर्डप्रेस का प्रबंधन करना होता है. हमारे जैसे मुफ़्त खोरों के लिए वर्डप्रेस डॉट कॉम की सुविधा ही ठीक लगती है, परंतु उसमें हम बहुत सी सुविधाएँ मनमर्जी से लगा नहीं सकते – जैसे कि एडसेंस.

ब्लॉग.को.इन यह सुविधा प्रदान कर रहा है.

मैंने एक जांच खाता खोला और एक जांच पोस्ट बनाया. कुछ प्रयोगों के पश्चात् मेरे निष्कर्ष ये रहे –

यह एडसेंस लगाने की सुविधा ब्लॉगरों को दे तो रहा है, परंतु इसमें एडसेंस प्लगइन जैसा कुछ लगा है जो एडसेंस को रेंडमली प्रदर्शित करता है. इसमें लोचा यह है कि कोई तीन दफ़ा पेज लोड करने पर उपयोक्ता का एडसेंस एक बार दिखता है, तो ब्लॉग को इन का दो बार (औसत रूप से, इसका उलटा भी हो सकता है – संभाव्यता कुछ भी हो सकती है). यानी आपके कंटेंट और आपकी सामग्री पर ब्लॉग को इन का फ़ायदा. भई, ये बात स्पष्ट कहीं पर लिख देते तो अच्छा होता. प्रयोक्ता इतने नासमझ भी नहीं हैं!

दूसरी बात, जब भी आप इसके किसी भी ब्लॉग का पेज लोड करते हैं तो इसका अंतर्निर्मित स्वचालित आरएसएस सब्सक्रिप्शन पॉप अप विंडो प्रकट करता है जो आपसे पूछता है कि क्या आप इसकी ग्राहकी लेना चाहेंगे? पाठकों को इतना बेवकूफ़ समझ रखा है क्या जो बार बार पूछने से तंग आकर सब्सक्रिप्शन ले लेंगे? या फिर, विंडोज विस्ता से टिप ले ली है जो हर काम के लिए आपसे पॉप अप विंडो के जरिए पूछता रहता है...

blog co in - a new blog platform on wordpress 2

कुल मिलाकर एक बेहद बकवास किस्म की सेवा. एकदम डेस्पेरेट लोग ही शायद इसमें खाता खोलें. प्रोफ़ेशनलिज़्म का नामोनिशान नहीं. पर हाँ, इन समस्याओं को वे दूर कर दें, तो इस सेवा के लोकप्रिय होने में देर नहीं लगेगी. क्योंकि ऐसी कोई सेवा जो वर्डप्रेस आधारित ब्लॉग बनाने की मुफ़्त सुविधा प्रदान करे जिसमें चिट्ठाकार अपने स्वयं के कुछ विशिष्ट गॅजेट जैसे कि एडसेंस लगा सकें, मेरी जानकारी में तो नहीं है. (आपको पता हो तो साझा करें)

प्रसंगवश, तरकश पर मुफ़्त ब्लॉग सेवा भी हाल ही में प्रारंभ की गई है, जो बहुत ही प्राथमिक स्तर का प्रतीत होती है. मेरा लिखा जांच पोस्ट देखें.  तरकश ब्लॉग सेवा से निवेदन है कि ऊपर दिए गए ब्लॉग.को.इन की समीक्षा से प्रेरणा लें और उसकी कमियों को दूर करते हुए नए किस्म की सेवा प्रदान करें, तो उनकी सेवा भी बखूबी चल निकलेगी.


पर, मेरे जैसे औसत दिखने वाले, एवरेज लुकिंग लोगों के लिए खुशी की बात ये है कि हम टॉम क्रूज जैसे सुंदर, हैंडसम लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा भरोसेमंद होते हैं. और, ये पुख्ता बात मैं नहीं, एक सर्वेक्षण का परिणाम कह रहा है.

वैसे तो सभी की चाहत होती है, सुंदर, हैंडसम दिखने की. युगों युगों से तमाम तरह के उपाय किये जाते रहे हैं अपने आप को सुंदर दिखाने के लिए. इसमें जहाँ प्रकृति भी जेनेटिक रूप से सहयोग देती रही है तो कृत्रिम रूप से सुंदर दिखने हेतु कपड़े, गहने, सौंदर्य-प्रसाधन, ब्यूटी पॉर्लर, सौंदर्य-शल्य-चिकित्सा इत्यादि के बाजार भी दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं और फल फूल रहे हैं. परंतु सुंदर दिखने की इस कोशिश में लोग अपनी क्रेडिबिलिटी, दूसरों का भरोसा तो नहीं खो रहे? सर्वेक्षण के नतीजों से लगता तो ऐसा ही है.

यह सर्वेक्षण आपकी सोच में भारी बदलाव ला सकता है. अब आप किसी अत्यंत खूबसूरत, अतिसुंदर व्यक्ति को देखेंगे तो आपके मन में उसके प्रति भरोसे का कोई भाव नहीं उभरेगा. साधारण सुंदर व्यक्ति पर आप साधारण रूप से भरोसा कर सकेंगे और जहाँ भी आपको मेरे जैसे औसत दिखने वाले लोग मिलेंगे, उन पर आप पूरा भरोसा कर सकेंगे.

तो, क्या अब हमें अपने क्रीम, पाउडर, लोशन, जेल, शेविंग-एपिलेटर मशीन, शैम्पू, कंडीशनर, नेल-एनॉमल इत्यादि... इत्यादि... को कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए?

अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मेरा उत्तर होगा – भरोसा गया भाड़ में, भई, मैं तो सदा सर्वदा सुंदर, हैंडसम दिखते रहना चाहूंगा. और, जब आपने यह पूछ ही लिया है, तो याद आया, मेरा एएक्सई कोलोन खत्म हो गया है, अभी जाता हूँ बाजार, यही कोई दर्जन भर खरीद लाने!

(समाचार कतरन – साभार टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

----

व्यंज़ल

----.

खुद को यकीन हो वो भरोसा कहां से लाऊं


गर कोई बेच रहा है तो भरोसा वहां से लाऊं

खुद को यकीन हो वो भरोसा कहां से लाऊं


इस जहान में तो मिट गया है नामोनिशान

कहीं और मिलता हो तो भरोसा वहां से लाऊं


उनने कहा मुहब्बत में न सही तो रकीबी में

जहाँ भी मिलता हो वो भरोसा वहां से लाऊं


द्वेष की दीवारों को तोड़ने के संसाधन तो हैं

उनके उपयोग का तो भरोसा कहां से लाऊं


चेहरों पे चेहरे नहीं होते हैं दोस्तों के रवि

जानता तो हूँ मगर वो भरोसा कहां से लाऊं

-----.

(चित्र को पढ़ने लायक बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें)

दैनिक हिन्दुस्तान में कल सस्ता शेर की बड़ी मंहगी चर्चा हुई. इधर भास्कर इंदौर के साप्ताहिक पेशकश दस्तक के नियमित स्तंभ ब्लॉग यायावरी में यूनुस खान के रेडियोवाणी के बारे में विस्तार से लिखा गया है. यह आलेख भास्कर के ई-पेपर के इंदौर संस्करण के आज के अंक में पृष्ठ 9 पर भी उपलब्ध है.
इससे पहले यूनुस खान का अपने ब्लॉग रेडियोवाणी पर शमशाद बेगम पर लिखा आलेख इस गुजरे शनिवार के नवरंग में प्रकाशित हुआ था. प्रसंगवश, इसी गुजरे हफ़्ते रविवार को रसरंग में रचनाकार में पूर्व प्रकाशित संजय सेन सागर की कविता भी प्रकाशित हुई है.


मुख्यधारा की मीडिया में चिट्ठों की चर्चाएं व सामग्री का पुनर्प्रकाशन - आई एम लविंग इट!


विश्व के सर्वोत्तम ऑनलाइन अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश को वायदे के मुताबिक प्रस्तुत कर रहे हैं खांडबहाले.कॉम जिन्होंने विश्व का सर्वप्रथम अंग्रेज़ी-मराठी शब्दकोश प्रस्तुत किया है.

इसका इंटरफेस तीव्र है, बिना किसी तामझाम युक्त. खोज परिणाम भी संतुष्ट करते हैं. परंतु यह सर्वोत्तम है, इस कथन का आधार स्पष्ट नहीं होता.

यह ऑनलाइन ही कार्य करता है. और पूरे समय ऑनलाइन कार्य करने वालों के लिए उत्तम है चूंकि यह मुफ़्त उपलब्ध है, और ब्राउजर आधारित होने के कारण हर प्लेटफ़ॉर्म पर चलता है.

प्रसंगवश, इंटरनेट पर उपलब्ध मुफ़्त के संसाधनों के जरिए ऑफलाइन उपयोग हेतु एक वृहद अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश अनुनाद ने बनाया है जिसे मैंने आज ही अपलो़ड किया है, जिसे आप अपने इस्तेमाल के लिए यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. यह अपने पूर्व के संस्करण से बहुत ही अच्छा व उन्नत तो है ही, इसका शब्द भंडार भी प्रचुर है.

चलिए, हम भाषा प्रेमियों के लिए अब ढेरों विकल्प मौजूद हैं - और वो भी एक से बढ़कर एक!
----

अद्यतन # यह बात ध्यान में लाई गई है कि शब्दकोश का निर्माण मेरे द्वारा उपलब्ध करवाई गई जीपीएल सामग्री से लेकर फ्रीवेयर रूप में जारी किया गया है, जो उचित नहीं है, अतः शब्दकोश डाउनलोड स्थल से हटा लिया गया है, व लिंक भी हटा ली गई है. पाठकों की असुविधा के लिए खेद है. जिन साथियों ने इन्हें पहले ही डाउनलोड किया है उसे जीपीएल प्रोग्राम मानें.



दुःखी, क्रोधित, बेजार, परेशान दिखाई देते रहकर आखिर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

बात भले ही बहुतों के गले न उतरे, मगर ये तो सिद्ध हो ही गया है. खुशियाँ यूँ ही आपके पास चली नहीं आतीं. खुशियाँ पाने के लिए आपको अपने बाल सफेद करने होते हैं. और यदि आप मेरी तरह के हुए, तो, अच्छे खासे बाल खोने भी पड़ते हैं.

वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का तो काम ही यही है. चंद सेंपल ले लिया, उस पर जमकर अध्ययन कर डाला, निरीक्षण पत्रक बनाया, और दन्न से निष्कर्ष निकाल लिया. इसी बिना पर अब वे कहते हैं कि उम्र के साथ साथ आदमी ज्यादा खुश होता जाता है – यानी वो ज्यादा खुश होता है बनिस्वत अपने पहले के उम्र के.

तो क्या हमारे जैसे लोगों को, जो अपने जीवन के अर्ध शती की ओर तेजी से दौड़ लगा रहे हैं, इस निष्कर्ष को पढ़ कर ज्यादा खुश होना चाहिए कि भइए, अब हम भी ज्यादा खुश रहने लगे हैं. पर, फिर साठ-सत्तर वाले नहीं कहेंगे - मूर्खों, ज्यादा खुश मत हो, यह अधिकार हमारा है. अभी तो हम ज्यादा खुश हो रहे हैं. तुम्हें उस स्तर तक पहुँचने में दस-पंद्रह बसंत और पार करने होंगे.

और, युवा? क्या वे यह सोच सोच कर दुःखी न हो रहे होंगे कि वो चाहे कितना भी प्रयास कर लें, दुनिया की तमाम जहमतें उठा लें, आकाश से श्याम विवर तोड़ लाएँ, प्रसन्नता उनके खाते में तो नहीं ही आनी है – वो तो बड़े बूढ़ों की अमानत है? और बूढ़े ये सोच कर खुश हों कि तुम जवान छोरे, चाहे जितना प्रयास कर लो, हमारे जैसे खुश तो तुम %$#@ कभी भी नहीं हो सकते. थोड़ा ठंड रखो, जरा इंतजार करो, तनिक बुढ़ापा लाओ, और फिर देखो खुशियाँ खुद ब खुद आपके पास चुटकी में यूँ कैसे चली आती हैं.

मैं हमेशा से ही ज्यादा से ज्यादा खुश होना चाहता रहा हूं, पर बूढ़ा कभी नहीं. आज पहली बार इस शोध नतीजे ने मेरे मन के भीतर एक नई आस जगाई है. मैं जल्दी से जल्दी बूढ़ा, और ज्यादा बूढ़ा हो जाना चाहता हूं. ताकि मैं ज्यादा, और ज्यादा खुश रह सकूं.

क्या आप भी खुश नहीं होना चाहते? ज्यादा खुश?

----.

व्यंज़ल

----.

कहते हैं खुशी में इक उम्र का हाथ है

मेरे दुखों में न जाने किस का हाथ है


अजब किस्सा है मेरी इन झुर्रियों का

वक्त से पहले पड़ीं तो वक्त का हाथ है


मैंने कभी समझा नहीं गुनहगार उसे

जमाना भले समझे उसी का हाथ है


पता चला है कि मेरे शहर के दंगों में

यारी दोस्ती व रिश्तेदारी का हाथ है


कैसे स्वीकारे रवि अपनी बदहाली में

उसका अपना कितना खुद का हाथ है


----.

इसी तेवर की अन्य रचना पढ़ें –

उम्रदराजी का स्मार्टनेस

----

(समाचार कतरन - साभार टाइम्स ऑफ इंडिया)


आप ब्लॉगर पर कुछ ऐसा लिख मारते हैं जो किसी अन्य को पसंद नहीं आता है. आपके विचार दूसरे को किसी सूरत नहीं जमते. नतीजतन वो आपके चिट्ठे को फ्लैग करता है. इसमें देरी सिर्फ चंद अन्यों द्वारा ऐसे ही फ्लैग लगाने की होती है और आपका चिट्ठा प्रतिबंधित कर दिया जाता है. मिटा दिया जाता है. बहुत सी जगह सरकारें भी चिट्ठों को प्रतिबंधित कर देती हैं जो उनके कार्यों की आलोचनाएं करते हैं.

परंतु अब आप इस तरह के प्रतिबंधों की चिंता किए बगैर, अपने अनसेंसर्ड विचारों वाले चिट्ठे लिख सकते हैं व उन्हें धड़ल्ले से प्रकाशित कर सकते हैं. आपके चिट्ठे को पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी. यह वादा एक नई ब्लॉग सेवा बेवर्ड्स द्वारा किया जा रहा है.

बेवर्ड्स सेवा वही, पुराने द पाइरेट बे वाले ला रहे हैं जो तमाम दुनिया के असली सॉफ़्टवेयर निर्माताओं को अरसे से ठेंगा दिखाते हुए अपने सर्वरों पर तमाम किस्म के पाइरेटेड सॉफ़्टवेयर लोड कर रखे हैं और जिनके नियमित उपयोक्ता लाखों की तादाद में हैं. द पाइरेट बे पर आप बाबा आदम के जमाने के डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम से लेकर ताजातरीन विस्ता तक प्राप्त कर सकते हैं.

बेवर्ड्स सेवा वर्डप्रेस पर आधारित है, व विज्ञापनों द्वारा समर्थित होगी – जाहिर है, बेवर्ड्स सेवा का उद्देश्य शुद्ध व्यवसायिक है.

हालांकि बेवर्ड्स सेवा यह दावा कर रही है कि स्विस कानून के दायरे को निभाती चिट्ठों की सामग्री पूरी तरह अनसेंसर्ड रहेगी और वे चिट्ठों और चिट्ठाकारों को पूरी संरक्षा प्रदान करेंगे. मगर यदि आप भारत में रह कर कुछ उत्पाती किस्म के चिट्ठे लिखना चाहते हैं, तो इसे भूल जाइए. याद कीजिए बाजी.कॉम के प्रसंग को. बाजी.कॉंम के किसी उपयोक्ता द्वारा प्रतिबंधित सामग्री अपलोड करने के कारण बाजी.कॉम के सीईओ को गिरफ़्तार कर लिया गया था. और, शायद आपको ये भी याद हो कि ब्लॉगस्पॉट पर किसी चिट्ठे पर विवादास्पद धार्मिक विषयक लेख लिखे जाने पर भारत सरकार ने चिट्ठाकारों को ब्लॉगिंग एथिक्स सिखाने के चक्कर में संपूर्ण ब्लॉगस्पॉट पर समूचे भारत में प्रतिबंध लगा दिया था!

हाँ, यदि बेवर्ड्स टोटल एनॉनिमस (परिपूर्ण अनाम) रूप से चिट्ठा प्रकाशन की सुविधा प्रदान करता है, तब बात कुछ दीगर है. तो, देर किस बात की. एक खाता खोल लीजिए, अभी ही. और हमें बताइए कि वे ऐसी कितनी कैसी सुविधा दे रहे हैं.

जी हाँ, और, ये बात ब्लॉगिंग में भी लागू होती है और लिनक्स कमांडों में भी!

इस बात को सिद्ध करने के लिए आपको अभी हाल ही की एक मजेदार घटना सुनाता हूं.

दिलकार नेगी की किताब ब्लॉगिंग छोड़ें सुख से जिएं से प्रेरित एकोऽहम् श्री विष्णु बैरागी कल रात एक वैवाहिक प्रीतिभोज समारोह में टकरा गए. अभी वे राइटर्स ब्लॉक की स्थिति में हैं और ब्लॉग लेखन बंद है. हालांकि स्थानीय समाचार पत्र में उनका नियमित स्तंभ नियमित प्रकाशित हो रहा है.

परंतु वे हिन्दी ब्लॉगों का अध्ययन मनन करते रहते हैं. चिट्ठा-पठन के दौरान विस्फ़ोट के किसी प्रविष्टि ने उन्हें प्रेरित किया कि वे भी अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से रखें.

विष्णु बैरागी पहले कुछ समय तक सक्रिय चिट्ठाकार रह चुके हैं, और उनकी धारदार टिप्पणियाँ भी चिट्ठों को मिलती रही थीं.

परंतु, अरे, यह क्या? वे भूल गए कि टिप्पणी देने के लिए हिन्दी कैसी लिखी जाती है! जबकि सक्रिय ब्लॉगिंग से वे ज्यादा दिनों से दूर नहीं हैं.

है कि नहीं यूज़ इट ऑर लूज़ इट का परफ़ेक्ट मामला?

और, इस बात को तो धुरंधर लिनक्स मास्टर भी स्वीकार रहे हैं. एकदम बोल्ड और पूरे अपरकेस में!

इस लेख की सीख:

अपने हुनर का इस्तेमाल करते रहें अन्यथा शर्तिया आप उन्हें खो देंगे.

----.


क्या आप भी जब तब समय का रोना रोते रहते हैं? क्या आप इस बात पर दुःखी रहते हैं कि आपके पास करने को बहुत कुछ हैं, मगर समय का सदैव टोटा लगा रहता है? दूसरी तरफ एक अध्ययन ये सिद्ध करता है कि ज्यादा नहीं, सिर्फ कोई दस साल पहले के आपके जीवन के मुकाबले आपके पास दिन के चौबीस के बजाए इकत्तीस घंटे हैं! यह अध्ययन ये बताता है कि आज का मनुष्य बेहतर उपकरणों, नए नायाब किस्म के गॅजेटों इत्यादि की सहायता से बहुत से मल्टीटास्किंग किस्म के कार्य एक ही समय में करता है और इस वजह से वो इतना सारा कार्य कर लेता है जो आज से दस साल पहले का आदमी इकत्तीस घंटे में भी न कर सकता था. यानी दूसरे शब्दों में आज आपके पास दिन के इकत्तीस घंटे होते हैं. और, कमाल ये है कि आप फिर भी समय के टोटे का रोना रोते रहते हैं!

आप कम्प्यूटर पर अपने चिट्ठे टाइप कर रहे होते हैं तो साथ में चल रहा विनएम्प मीडिया प्लेयर छोड़ गए बालम हाय अकेला छोड़ गए गाना बजा रहा होता है. एक तरफ थंडरबर्ड का विंडो खुला होता है जिसमें ईमेल का आदान प्रदान चल रहा होता है तो दूसरी तरफ चैट विंडो खुला होता है जिसमें दोस्तों से गप बाजी चल रही होती है. ऊपर एक छोटे से विंडो में समाचार वीडियो म्यूट मोड में चल रहा होता है और हेडलाइन शेयर सेंसेक्स पर नजर जब तब टिक जाती है. नीचे टास्कबार में आर एस एस फ़ीडों जिसमें तकनीकी समाचार से लेकर चुटकुले तक शामिल होते हैं, एक के बाद एक नई प्रविष्टियों की सूचना आपको दे रहे होते हैं. उधर ब्लॉगवाणी का ब्राउज़र विंडो अलग खुला होता है जिसमें कौन ब्लॉगर किस ब्लॉगर को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष गाली दे रहा है, ऐसे मजेदार, रस युक्त ब्लॉग पोस्टों और प्रतिपोस्टों के लिए ललचाई निगाह अलग जमी हुई होती है. इस बीच पति/पत्नी बीच-बीच में आस-पड़ोस की कोई कहानी किस्सा अलग सुना रहा/रही होता/होती हैं जिन्हें आप आदतन हां – हूँ कर सुनते हैं और कभी बिना सुने भी हां हूं कर देते हैं, जिसके कारण आमतौर पर घरेलू हिंसाएँ भी होती हैं.

इस बीच घर का लैंडलाइन दूरभाष व बाजू में लटका मोबाइल जब तब अलग अलग नए नए किस्म के रिंगटोन घनघनाते रहते हैं और कभी वार्ता तो कभी एसएमएस संदेश पठन-लेखन का दौर अनवरत जारी रहता है.

कहीं बाहर जाने निकलते हैं तो कार का इंजन चालू होने से पहले एफ़एम या कार स्टीरियो पहले चालू होता है. फुरसत में गाना सुनने के लिए किसी के पास आज टाइम है भला? खाना खाते वक्त डाइनिंग टेबल के सामने लगे टीवी पर समाचार से लेकर रीयलिटी शो – सब पर बराबर-बराबर निगाह लगी रहती है, और सभी शो देखना मजबूरी रहती है. रिमोट की कुंजियाँ दब दब कर बेहाल हुई जाती हैं मगर ढंग का चैनल कभी भी नहीं मिलता. सुबह अख़बार वाचन के साथ साथ दैनिंदनी कर्म तो ख़ैर दशकों से साथ-साथ चल रहा है. कुल मिलाकर, एक ही समय में दो या दो से अधिक कार्य करना तो आदत बन गई है, और उसके बगैर अब तो किसी की हाजत भी संभव नहीं.

सोने जाने से पहले आप अपने पोस्ट का ड्रॉफ़्ट समय सुबह पाँच बजे सेट करना नहीं भूलते ताकि सोते समय भी इंटरनेट पर कहीं दूर स्थित सर्वर आपकी खातिर ठीक पाँच बजे आपके पोस्ट को ठेल दे. इधर आपके कम्प्यूटर पर कैलेण्डर व स्वचालित रिमाइन्डर शेड्यूलर अनुप्रयोगों के जरिए बहुत से कार्य जैसे कि किसी को जन्मदिन का संदेश ईमेल करना या रात्रि दो बजे के पश्चात (मुफ़्त असीमित डाउनलोड सुविधा समय काल पर) स्वचालित डाउनलोड जैसे कार्य आपके लिए स्वचालित होते रहते हैं.

मगर, फिर भी, आपके पास समय का टोटा रहता है. बहुत टोटा रहता है. बहुत से कार्य करने के लिए आपके पास समय ही नहीं होता है. टाइम ही नहीं होता है.

तो, फिर, आपको दिन में कितने घंटे चाहिए? बहत्तर? छियान्बे? निन्यान्बे?


हिन्दी शब्दों के अर्थ व उनके प्रयोगों के उद्धरणों युक्त विशाल शब्द भंडार हिन्दी वर्डनेट आईआईटी मुम्बई द्वारा तैयार किया गया है और यह ऑनलाइन प्रयोग के लिए एक अरसे से उपलब्ध है. इस वर्डनेट को आप अपने कम्प्यूटर पर ऑफलाइन प्रयोग के लिए एक अनुप्रयोग के तौर पर संस्थापित कर सकते हैं. यह निजी व गैर व्यवसायिक प्रयोग के लिए मुफ़्त उपलब्ध है.

हिन्दी वर्डनेट अनुप्रयोग की जिप फ़ाइल यहां से डाउनलोड करें. फिर इसे किसी डिरेक्ट्री में अनजिप करें. उस डिरेक्ट्री में जाएं और यदि आप विंडोज पर हैं तो RUN.BAT नामक फ़ाइल पर दोहरा क्लिक करें. यदि आप लिनक्स इस्तेमाल कर रहे हैं तो कमांड टर्मिनल से run.sh चलाएं.

वर्डनेट खिड़की प्रारंभ होगा जिसमें आप इनपुट विंडो में हिन्दी शब्दों को भर कर उनके अर्थ व प्रयोगों को भली प्रकार समझ सकेंगे. शब्दों के संज्ञा, विशेषण, क्रिया और क्रिया विशेषण के रूप में अलग-अलग छांट कर भी देख सकते हैं.

इसके इनपुट विंडो में हिन्दी अक्षर डालने हेतु एक ऑनलाइन कुंजीपट भी है जिसमें क्लिक करके हिन्दी इनपुट किया जा सकता है. आप चाहें तो शब्द सूची में से भी शब्द छांट सकते हैं.


अब आप अपने हिन्दी के चिट्ठों में वेबस्टर शब्दकोश की सुविधा अंतर्निर्मित कर सकते हैं.

जरा यह कड़ी देखें. इसमें दिए गए पाठ के किसी भी हिन्दी शब्द पर दोहरा (डबल) क्लिक करें. जैसे कि सरल शब्द पर. फिर थोड़ा सा इंतजार करें.

एक पॉपअप विंडो कुछ इस तरह प्रकट होगा.

है न कमाल?

और, यदि आपका मानना है कि आप मेरी तरह सरल भाषा में लिखते हैं तो आप दूसरे तरह की सुविधा भी लगा सकते हैं, जैसे कि इस चिट्ठे के बाजू पट्टी में लगा है – वेबस्टर शब्दकोश खोज का विंडो. इसमें आपके पाठक अंग्रेज़ी तथा हिन्दी समेत अन्य बहुत सी भाषाओं में शब्दों के अर्थ खोज सकते हैं.

कोड प्राप्त करने व निर्देशों के लिए वेबस्टर की साइट पर यहाँ जाएँ.

शब्दकोश खोज का कोड आप लेआउट के जरिए लगा सकते हैं, परंतु पाठ पर दोहरा क्लिक कर अर्थ बताने वाली सुविधा के लिए आपको अपने टैम्प्लेट का एचटीएमएल संपादित करना होगा. आप कोड को body टैग के बीच कहीं भी डाल सकते हैं, परंतु सबसे आखीर में डालें तो यह सुविधा जनक होगा. जैसे कि नीचे चित्र में दिया हुआ है-

क्या आप ऐसी कोई आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे जिसमें अगाथा क्रिस्टी के लेखन जैसा सस्पेंस हो, जेम्स हेडली चेईज़ की किताबों जैसा टाइट कथानक हो, गुलशन नंदा के उपन्यासों जैसा रोमांस (भले ही कार्य के प्रति) हो, स्वेट मार्डेन की किताबों जैसा प्रेरणास्पद हो और जे. के. रोलिंग के पॉटर सिरीज जैसा मजेदार, जादुई कथानक हो?

हो सकता है, आपका टेस्ट मुझसे जुदा हो, परंतु अभी हाल ही में मैंने एक किताब पढ़ी, जिसमें मुझे कुछ ऐसा ही आनंद आया. कोई 300 पृष्ठों की इस बेहद दिलचस्प, पाठकों को बाँध कर रखने वाली किताब को मैं एक ही बैठक में पढ़ गया.

इस किताब का नाम है – जी, हाँ, आपने सही कयास लगाया : आई वॉज. जिसे लिखा है, जी हाँ, एपल कम्प्यूटर के जन्मदाता स्टीव वॉजनिक ने.

यह किताब स्टीव के उर्वर मस्तिष्क की महा-गाथा है. उन्होंने विस्तार से, परंतु कहीं भी तकनीकी नहीं होते हुए, ताकि आम पाठकों को भी ये समझ में आ जाए, अपने कई पहले-पहल आविष्कारों की कहानी लिखी है. इस प्रयास में कहीं कहीं स्टीव अतिवादी भी हो गए हैं – मैं पहला, मैं प्रथम, विश्व का मैं अद्भुत प्रथम (चाहे तीन रिमोट एक साथ चलाने वाले पहले व्यक्ति के रूप में) बताने के चक्कर में कहीं कहीं उनका स्वाभाविक अभिमान भी झलकता है. पर, इस किताब की सिर्फ और सिर्फ इस खामी को बख़ूबी नजरअंदाज किया जा सकता है.

स्टीव लिखते हैं कि वो कभी झूठ नहीं बोलते और झूठ नहीं बोल सकते क्योंकि उनके माता पिताओं ने बचपन में ऐसे संस्कार दिए. बाद में उन्होंने टेलिफ़ोन नेटवर्क पर कब्जा कर मुफ़्त एसटीडी आईएसडी काल करने का यंत्र बनाकर विक्रय किया, जिसे वे स्वीकारते हैं कि वो एक अवैध कार्य था. और एक बार पुलिस के द्वारा अपने यंत्र के साथ रंगे हाथ पकड़े जाने पर उन्होंने पुलिस वालों को उल्लू बनाया कि ये संगीत के नोट्स निकालने वाला इलेक्ट्रॉनिक यंत्र है (उन्होंने एक साधारण से टोन जनरेटर से टेलिफ़ोन नेटवर्क पर कब्जा जमाने का यंत्र विकसित किया था). इस यंत्र का उन्होंने विक्रय भी किया, परंतु उन्होंने स्वयं जब भी टेलिफोन पर बात किया तो वैध काल किया, इस यंत्र की सहायता से मुफ़्त काल नहीं.

किताब दिलचस्प, प्रेरणास्पद उद्धरणों से भरा है. एक बार उन्हें चार दिन के भीतर सॉफ़्टवेयर गेम बनाने का चैलेंजिंग कार्य मिला तो वे चार दिन और चार रात लगातार काम करते रहे, जागते रहे. अंत में जब कार्य पूर्ण हो गया और उसकी जांच दूसरे कर रहे थे, तब उनके पास आराम करने के लिए कुछ घंटे थे. मगर वे सोए नहीं – क्या पता कोई बग निकल आए जिसे तत्काल दुरुस्त करना पड़े!

इस मजेदार, प्रेरणास्पद किताब के कुछ दिलचस्प अंश आपके लिए प्रस्तुत है –

एपल में अपने कैरियर के दौरान मैं ऐसे सैकड़ों गीक और तकनॉलाजी पंडितों से मिला जो सीधे एक साथ कई-कई सीढ़ी छलांग लगाने की कोशिश करते हैं – यह प्रयास कभी भी सफल नहीं होता. कभी भी नहीं. ऊपर की मंजिल पर पहुँचने में सीढ़ी का हर पायदान, एक बार में एक, हर मामले में कहीं ज्यादा बेहतर होता है.

हर मनुष्य में सामाजिकता होती है – मैं चूंकि अंतर्मुखी और शर्मीला था, अतः मैं कुछ प्रभावी काम करता था जिसकी चर्चा हो, जो झलके जैसे कि – इलेक्ट्रॉनिक प्रोजेक्ट बनाना और प्रैंक (छुप कर की गई शरारतें) करना.

एक बार एक सर्किट से मुझे 25 हजार वोल्ट का ऐसा झटका लगा कि मैं उछल कर पाँच फुट पीछे जा गिरा. बाद में बिजली के झटकों से मेरा भय खत्म हो गया और मैंने एक ऐसा मशीन बनाया जिसमें लोग अपना अंगूठा रखते थे और एक चकरी तेजी से चलने लगती थी जिससे लोगों के अंगूठे में बिजली का करंट दौड़ने लगता था जो बढ़ते ही जाता था. और विजेता वो होता था जो सबसे ज्यादा देर तक अपना अंगूठा वहां बनाए रख सकता था.

मैं ये मानता हूँ कि सरकार सिर्फ और सिर्फ वही करती है जो उसके लिए फायदेमंद होती है. और वो हर किस्म के झूठ बोलती है जिससे उसका फायदा हो. वो जनता के भले के लिए कुछ भी नहीं करती है.

मार्केटिंग विभाग ने इंजीनियरों को मजबूर किया कि अतिरिक्त चिप और अतिरिक्त सॉफ़्टवेयर लोड कर (जाहिर है अधिक मंहगा उत्पाद बना कर) एपल 3 को पुराने, बेहद लोकप्रिय एपल 2 के रूप में (कंपेटिबल मोड में) चलाने पर एपल 3 की विशेषताएँ व नई सुविधाएं न चलें.

इस किताब को लिखने का मेरा एक और उद्देश्य रहा है – मैं हमेशा से अपने आप को एक प्राथमिक शिक्षक के रूप में देखता रहा हूं. तो मैंने लोगों को सिखाने के लिए, कि कैसे वे नए नए ईजाद कर सकते हैं, अपनी ऊर्जा को वो किस तरह लगाए रख सकते हैं, ये किताब लिखी है.

अपने आप पर भरोसा रखें, विश्वास रखें. कभी डगमगाएं नहीं. किसी भी मामले में हममें से अधिकतर, मीडिया या दूसरों के द्वारा बताए गए श्वेत श्याम रंग ही देखते हैं. परंतु एक आविष्कारक के रूप में, कुछ नया करने वाले के रूप में आपको अपने तरीके से, धूसर रंग देखना होगा, और उस तरीके से काम करना होगा.

तो, यदि आप कुछ नया, धूसर सा पढ़ना चाहें तो ले आएं ये किताब. प्रत्येक के पठन के लिए अत्यंत अनुशंसित. ये किताब आपके विचारों के दृष्टिकोण (पर्सपेक्टिव) को बदलकर रख देने की ताकत रखती है. शर्तिया.

---

आई वॉज़

स्टीव वॉजनिक – साथ में गिना स्मिथ

आत्मकथा

प्रकाशक – हेडलाइन रीव्यू

आईएसबीएन नं. – 0 7553 1407 7

पृष्ठ – 313

मूल्य – 395

----.

पठन-पाठन के लिए अत्यंत अनुशंसित कुछ अन्य किताबें –

आधुनिक युग का धर्म-ग्रंथ :

व्हाई मेन लाई एंड वीमन क्राई तथा,

हू मूव्हड माई चीज़



अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश की चर्चा छिड़ने पर जैसे ही हिमांशु ने तकनीकी-हिन्दी चिट्ठा समूह में यह बताया कि मोनियर विलियम्स रचित संस्कृत-अंग्रेज़ी शब्दकोश फ़ाइल डाउनलोड कर ऑफ़लाइन प्रयोग किया जा सकता है, अनुनाद ने उसे तत्काल एक सुंदर सा आमुख (इंटरफ़ेस) प्रदान कर दिया. परंतु उसमें इनपुट आईट्रांस में ही दे पा रहे थे, यूनिकोड हिन्दी में नहीं. फिर पी.के. शर्मा ने कमान संभाली और, ये हो गया तैयार एक बढ़िया – संस्कृत – अंग्रेजी शब्दकोश. इन कर्मयोगियों को धन्यवाद.

संस्कृत अंग्रेज़ी शब्दकोश यहाँ से डाउनलोड कर प्रयोग करें. यह मुफ़्त उपलब्ध शब्दकोश भी ब्राउज़र आधारित है और इसीलिए इसे किसी भी प्लेटफ़ॉर्म में और मोबाइल उपकरणों में भी प्रयोग में लिया जा सकता है.

पिछली पोस्ट में अंग्रेज़ी-हिन्दी ऑफ़लाइन शब्दकोश की कड़ियाँ गलत चली गई थीं. कड़ियों को ठीक कर दिया गया है.

आपकी सुविधा के लिए कड़ी फिर से दी जा रही है-

अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश डाउनलोड कड़ी


अनुनाद ने एक पुराने, मुफ़्त उपलब्ध हिन्दी - अंग्रेज़ी शब्दकोश के एचटीएमएल फ़ाइल पर कुछ जावा स्क्रिप्ट कोड डाल कर उसे एक बढ़िया रूप प्रदान किया है, जो कि न सिर्फ तेज चलता है, बल्कि ऑन-द-फ़्लाई शब्दों को खोजबीन कर आपके सामने लाता है. एक और सुंदर, उपयोगी कार्य के लिए उन्हें धन्यवाद.

इस शब्दकोश की खासियत ये है कि चूंकि यह ब्राउज़र आधारित है, अतः यह हर प्लेटफ़ॉर्म पर चलता है - यानी विंडोज पर भी, लिनक्स पर भी और मॅक पर भी. यहाँ तक कि आपके मोबाइल फ़ोन के ऑपेरा मिनी में भी यह चल सकता है (?).

इसका देबाशीष का बनाया ऑनलाइन संस्करण पहले से ही उपलब्ध है, परंतु आपके कम्प्यूटर पर बैठा (संस्थापित), हमेशा मौजूद ऑफ़लाइन शब्दकोश जाहिर है, हर हाल में ज्यादा काम का है. हालाकि इसकी शब्द सीमा परिपूर्ण नहीं कही जा सकती है, मगर आम प्रयोग के लगभग सभी अंग्रेज़ी शब्दों के अर्थ इसमें वाक्य प्रयोग सहित मिल जाते हैं.

अभी तक इस शब्दकोश फ़ाइल का प्रयोग मैं लिनक्स तंत्र (क्योंकि विंडोज तंत्र पर बहुत से हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश उपलब्ध हैं) पर पाठ फ़ाइल के रूप में प्रयोग करता था व शब्दों के अर्थ ढूंढने के लिए जीएडिट (नोटपैड जैसा अनुप्रयोग) की सहायता लेता था जो बहुत ही झमेला भरा होता था. अब इसके आसान इंटरफ़ेस ने काम अत्यंत आसान कर दिया है.

अंग्रेज़ी - हिन्दी शब्दकोश यहाँ से डाउनलोड करें (कड़ी पर दायाँ क्लिक करें व ऐसे सहेजें विकल्प चुनें, या फिर कड़ी को क्लिक करें और जब पृष्ठ लोड हो जाए तो सहेज लें. ध्यान दें कि फ़ाइल बड़ी है अतः डाउनलोड होने में समय लग सकता है)

अद्यतन # डाउनलोड कड़ी ठीक नहीं थी, जिसे ठीक कर दिया गया है. पाठकों की असुविधा के लिए खेद है.

अद्यतन # यह बात ध्यान में लाई गई है कि शब्दकोश का निर्माण मेरे द्वारा उपलब्ध करवाई गई जीपीएल सामग्री से लेकर फ्रीवेयर रूप में जारी किया गया है, जो उचित नहीं है, अतः शब्दकोश डाउनलोड स्थल से हटा लिया गया है, व लिंक भी हटा ली गई है. पाठकों की असुविधा के लिए खेद है.


(चित्र में दी गई सामग्री पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक कर इसे बड़े आकार में देखें)

लिनक्स फ़ॉर यू के अप्रैल 2008 के अंक में फ़ॉस.इन 2008 परियोजना विजेता - केडीई हिन्दी टोली के बारे में एक संक्षिप्त आलेख प्रकाशित हुआ है. आलेख दिलचस्प है. परंतु कुछ बिन्दु छूट से गए लगते हैं. टोली के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ राजेश रंजन की तस्वीर नहीं लगी है. राजेश ने अभी हाल ही में क्रमश: नाम से चिट्ठा लेखन प्रारंभ किया है और उनकी लेखन शैली भी उनके जैसी ही ग़ज़ब की है.
( हिन्दी टीम के महत्वपूर्ण सदस्य राजेश रंजन)


हिन्दी टीम के जी. करूणाकर भारतीय भाषाई लिनक्स में स्तम्भ स्वरूप माने जाते रहे हैं और शुरूआती नींव उन्हीं के द्वारा डाली गई है. भाषाई तकनीक की जानकारी व विशेषज्ञता के बारे में सभी उनका लोहा मानते हैं. और, मैं उनके पर्सनल टेलिस्कोप का लोहा मानता हूँ, जिससे वे मंगल ग्रह के गड्ढों व शनि के छल्लों का अध्ययन करते रहते हैं.


डॉ. गोरा मोहंती अमेरिका में एस्ट्रोफ़िजिक्स के वैज्ञानिक रहे हैं, और जब उनका भाषाई प्रेम जागा तो वे वापस आकर इंडलिनक्स टोली से जुड़े और अभी वे फ्लॉस और भाषाई तकनीक पर इतने काम कर रहे हैं कि उन्हें सांस लेने की भी फुरसत नहीं है. वे लग-दिल्ली (LUG - लिनक्स यूज़र ग्रुप दिल्ली) के एक सक्रिय सदस्य हैं, जो किसी भी सदस्य की समस्या को हल करने में हर हमेशा तत्पर दीखते हैं.


इतिहासकार, संपादक, शोधार्थी और भाषाविद् रविकांत अभी अपना एक महत्वपूर्ण शोध पूरा करने में तीव्रता जुटे हैं, जिसकी एक झलक आपको जल्द ही दिखाई जाएगी. वैसे, उनके शोध के विषय मनोरंजक होते हैं - जैसे कि - ऑटो के पीछे क्या है?


और, अंत में, मैं अपने बारे में क्या कहूं? मैं, तो बस एक फ्रॉड हूँ!



अब तक आप पुस्तचिह्न सेवाओं का प्रयोग अंग्रेज़ी में ही करते आए हैं. इस चिट्ठे के नीचे लगा हुआ पुस्तचिह्न सेवा भी अभी अंग्रेज़ी वाला है. परंतु हिन्दी चिट्ठे में अंग्रेज़ी पुस्तचिह्न का क्या काम? विकल्प नहीं होने से यह अब तक लगा हुआ है.

इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए खालिस हिन्दी में भी पुस्तचिह्न सेवा प्रारंभ की गई है. प्रचार दिस नाम की यह ताज़ातरीन सेवा कितनी काम की निकलती है, यह इसके प्रयोग के पश्चात ही पता चल सकेगा.


वैसे तो आप इसके विजेट को अपने चिट्ठे में बगैर पंजीकरण के लगा सकते हैं, परंतु इसका पूरा लाभ लेने-देने के लिए इसमें पंजीकरण अनिवार्य है. मैंने प्रयोग करने हेतु एक खातानाम व ईमेल से पंजीकरण की कोशिश की. आधा घंटा बीत जाने के बाद भी प्रामाणीकरण हेतु ईमेल नहीं आया, जो कि अनावश्यक रूप से आवश्यक है.

मुझे लगा कि शायद पंजीकरण में कुछ समस्या हो गई होगी. दुबारा कोशिश की तो प्रचार दिस के मजेदार आभासी व्यक्तित्व श्रीमान् एन गोपालकृष्णन ने मेरा कुछ यूँ स्वागत किया :

फिर मैंने फ़ीडबैक देने की कोशिश की. हिन्दी में सेवा है तो हिन्दी में फ़ीड बैक तो स्वीकारनी ही चाहिए. इनपुट बक्से ने हिन्दी मजे में स्वीकारा.

अब इंतजार है वेलिडेशन और फ़ीडबैक के फ़ीडबैक ईमेल का. आप भी प्रयोग कर देखें और अपने अनुभव बताएं.

अद्यतन $# चेतावनी! इसका स्क्रिप्ट गूगल विज्ञापन दिखाने लगा है. अतः इसे हटाया जा रहा है. यह वेब अनुप्रयोग सही प्रतीत नहीं होता है.

अद्यतन # 2 - कृपया उक्त चेतावनी अनदेखा करें. दरअसल यह फ़ॉयरफ़ॉक्स का जाना पहचाना बग है. इस संबंध में आलोक मिश्रा द्वारा कुछ छानबीन किया गया है व तथ्य रखे गए हैं -
----
We were able to reproduce the issue. This looks like a firefox browser issue related to its session history for iframes.
The ad which you saw in "PrachaarThis" widget was actually your own google ad shown in the wrong iframe because of the firefox bug.

The issue is already logged in with Mozilla but is not resolved as of Firefox 2.0. Here are the related bugs in case you are interested in knowing more:
https://bugzilla.mozilla.org/show_bug.cgi?id=295813
https://bugzilla.mozilla.org/show_bug.cgi?id=342905
https://bugzilla.mozilla.org/show_bug.cgi?id=279048

If you would like to reproduce the issue you can just put empty iframes [iframe src="]a" href="http://google.com/"["http://google.com"[/a] ]]/iframe] ) where you pasted the PrachaarThis widget code and after few refreshes you'll magically see google ads there instead of google.com page. This would prove that the issue is not PrachaarThis specific.

As this is a Firefox related issue your IE\Safari\Opera users should not see this issue. Even on Firefox you would see this only on multiple refreshes.

We'll deploy a fix shortly which will render the widget differently for Firefox users till the time these bugs are fixed.

Once again, thanks for bringing this issue to our attention. If you are convinced by my explanation please remove the warning from the post. If not, please let me know and I'll write an even longer email :)
जाहिर है, अब प्रचार दिस जैसा हिन्दी का खूबसूरत वेब अनुप्रयोग वापस इस चिट्ठे पर आ गया है.

इस इनपुट के लिए आलोक मिश्रा को धन्यवाद.

ज्ञानदत्त पाण्डेय ने बड़ी मेहनत से कोई पाँच घंटे में यह गर्दभ-ऊंट स्लाइड शो बनाया है. बहुत ही शानदार. उद्धरण योग्य. परंतु इसमें एक झमेला है. आप पहले डाउनलोड करें, फिर उसे चलाकर देखें. तो हममें से बहुत से अलालों को (मैं इसे छोड़कर जाने वाला ही था, परंतु जाने क्या सोचकर क्लिक कर डाउनलोड कर ही लिया) ये झंझटिया काम लगता है. वैसे भी आजकल यू-ट्यूब के जमाने में पावरपाइंट प्रेजेन्टेशन किसी सेमीनार के अलावा अपने कम्प्यूटर पर कौन देखता होगा भला?

तो मैंने इसे फ्री पावरपाइंट-वीडियो कनवर्टर प्रोग्राम से वीडियो में परिवर्तित कर दिया, और एक छोटी सी तबले की जुगलबंदी का ऑडियो भी वीडियो में डाल दिया ताकि प्रस्तुतिकरण थोड़ा और मनोरंजक लगे.

तो, अब इस शानदार प्रस्तुति को अपने मित्रों को पावरपाइंट संलग्नक के रूप में नहीं, बल्कि फंकी यू-ट्यूब कड़ी के रूप में भेजें. बदले में उनका आभार (मन ही मन दी गई गाली नहीं,) आपको मिलने की पूरी गारंटी, नहीं तो इस पोस्ट को पढ़कर बरबाद हुआ आपका समय आपको वापस लौटाने की भी पूरी गारंटी :)









सबसे बड़ा बेवकूफ़ कौन? एक अख़बार का सर्वे बता रहा है कि संसार का सबसे बड़ा बेवकूफ़ बुश है. पर वो तो अमरीका का है. उससे हम भारतीयों का क्या लेना देना. तो चलिए दूसरे स्थान के विजेता पर नज़र मारते हैं. अरे, वहां तो आप विराजमान हैं! आम आदमी का झंडा लेकर पगुराए बैठे हैं. पहले लगा कि ये सर्वे बकवास है – ऐसा कैसे कोई सर्वे आपके या मेरे जैसे ‘आम आदमी’ को सबसे बड़ा बेवकूफ़ कह सकता है भला? इससे पहले कि मैं सर्वेयरों और उस अख़बार को गरियाता और उन्हें लानतें मलामतें भेजने के लिए कुंजीपट टकटकाता, मेरे ज्ञान चक्षु कुछ खुले और मुझे मेरी बेवकूफ़ियाँ एक-एक कर नज़र आने लगीं.

कल ही की तो बात है. चौराहे से स्टेशन तक का ऑटो किया. ऑटो वाले ने बड़े ही शराफत से मीटर डाउन किया और बिना कोई मोल तोल किए ले चला. स्टेशन पर पहुँचा तो देखा कि मीटर पर किराया सामान्य से डेढ़ गुना बता रहा था. मैं शराफत से बेवकूफ़ बन चुका था. जाहिर है, ऑटो का मीटर टैम्पर किया हुआ था, और रीडिंग ज्यादा बता रहा था.

लौटते में जाने कैसे याद आ गया कि घर पर मूंग खत्म हो गया है. वरना जेब में परची डालकर खरीदारी को निकलता हूँ तो भी भूल जाता हूं कि जेब में कोई परची भी है. किराने की एक दुकान पर रुका और पूछा – भाई साहब बढ़िया क्वालिटी का मूंग है क्या? बड़ा दाने का, हरा. दुकानदार मुस्कराया और बोला हां, है ना साहब. उसने सेंपल दिखाया. बोला, अंकुरित मूंग सेहत के लिए अच्छा रहता है. बड़े बड़े दाने एकदम चमक रहे थे. रंग ख़ूब हरा था. मैंने ले लिए. बाद में घर आकर पानी में भिगोया तो पाया कि मूंग का पूरा हरा रंग पानी में आ गया है. आह! तो चमचमाते हरे रंग के मूंग को हरे रंग से रंगीन चमचमाता बनाया गया था – कृत्रिम तरीके से. ये पता भी नहीं था कि रंग खाने वाला था या कपड़ा रंगने वाला. मैंने वो मूंग फेंक दिया – किसी जानवर के खाने लायक भी नहीं लगा था. जाहिर है, मैं बेवकूफ़ बन गया था. अब मुझे उस दुकानदार की मुस्कुराहट का राज पता चला. वो मुझे, एक आम आदमी को, बेवकूफ़ बनाकर व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंक रहा था.

सरकारी तंत्र तो मुझ जैसे आम आदमी को जब तब बेवकूफ़ बनाते ही रहते हैं. उदाहरण के लिए, मेरे घर पर नगरनिगम का जलप्रदाय कनेक्शन है. जलप्रदाय की चाक-चौबंद व्यवस्था यूं है कि मानसून में जब ऊपर से बारिश हो रही होती है, और सर्वत्र पानी ही पानी नजर आता है तब नल भी बिलानागा, पूरे फोर्स से पानी उगलता रहता है. जहाँ अप्रैल का खतरनाक महीना आता है, वातावरण में सर्वत्र सूखा हो जाता है तो इसका भी फ़ोर्स डाउन हो जाता है. मई जून की भयंकर गर्मी में यह सूख सा जाता है. ऊपर से ऐसे समय अड़ोस-पड़ोस के लोग नल में डायरेक्ट पम्प लगाकर पानी खींचने की कोशिश में एक दूसरे को और नगरनिगम के जलप्रदाय व्यवस्था को बेवकूफ़ बनाने की नाकाम कोशिशें करते रहते हैं. ऐसे में बिजली विभाग भी अंडरफ्रिक्वेंसी के नाम पर अघोषित विद्युत कटौती कर जब तब मुझ आम आदमी को और ज्यादा बेवकूफ़ बनाता रहता है. धरती मैया को भी अपने सपूतों की कारस्तानी पर गुस्सा आने लगा है लिहाजा, वो भी मेरी बेवकूफ़ियों पर हंसते हुए अपना जलस्तर मई जून में और ज्यादा नीचे कर लेती है.

नेता लोगन की तो बात ही छोड़ दीजिए. जब दस हजार करोड़ के कर्ज माफ़ी की घोषणा सुनी तो मेरे मित्र का बधाई संदेश आया. अब तो बढ़िया चल रहा होगा बंधु. तुम्हारे सारे कर्ज माफ करने की घोषणा हो चुकी है. मैं पलट कर भिन्नाया. क्या यार, तुम भी क्या बात करते हो. इससे हमारे गांव के पटेल का ही फायदा हुआ है जो बैंकों से न जाने किस किस स्कीम से लाखों का कर्ज उठाया है. हम गरीब किसान पर तो साहूकार का कर्ज है. वो माफ करने के बजाए ब्याज दर बढ़ा रहा है. हमको तो रात बेरात पैसे की दरकार होती है. साहूकार से पैसा लेना ही पड़ता है...

लालू ने शान से कहा ट्रेन का किराया घटाया है, बढ़ाया नहीं. बहुत दिन से कहीं जाना था जो टाल रहा था. किराया घटाने की बात सुनकर मन प्रसन्न हो गया और वहां जाने का मन बनाया. जाने आने का टिकट लिया. सीट खाली नहीं था. तत्काल कोटा में खाली था सो मजबूरी में उसी का टिकट लिया. किराया तत्काल प्रभार के नाम पर 200 रुपये ज्यादा था. वापसी का टिकट दस रूपये और ज्यादा का. पूछा क्या वापसी में ट्रेन का किलोमीटर बढ़ जाता है? टिकट बाबू हंस दिया – सोचा अजीब बेवकूफ़ है. समझता नहीं.

अब छोड़िए, क्या क्या बेवकूफ़ियाँ गिनाऊँ. सिद्ध तो ख़ैर, हो ही गया है!

-----.

व्यंज़ल

-----.

मुझे प्यारी हैं मेरी अपनी बेवकूफ़ियाँ

जिंदा रहने को हैं जरूरी बेवकूफ़ियाँ


मुहब्बत में दानिशमंदो का काम नहीं

चलती हैं वहां सिर्फ निरी बेवकूफ़ियाँ


इश्क गर ज़िंदा है तो कुछ इस तरह

कुछ उसकी तो कुछ मेरी बेवकूफ़ियाँ


ऐसा करें क्यों न कुछ ठहाके लगा लें

चलो सुनें सुनाएं मेरी तेरी बेवकूफ़ियाँ


जमाना मुझे किस तरह बताएगा रवि

बखूबी मालूम हैं मुझे मेरी बेवकूफ़ियाँ

------.

(चित्र साभार, टाइम्स ऑफ इंडिया)



राजेश ने अपने पिछले पोस्ट में फ़ॉयरफ़ॉक्स के हिन्दीकरण के बारे में विस्तार से लिखा है. राजेश इस समय सक्रिय रूप से फ़ॉयरफ़ॉक्स के नवीनतम संस्करण को हिन्दीकृत करने में लगे हुए हैं, और उनका कार्य लगभग समाप्ति पर है. उम्मीद करें कि फ़ॉयरफ़ॉक्स 3 में संस्थापना के दौरान ही हिन्दी चयन के विकल्प की अंतर्निर्मित सुविधा आपको मिले.

मगर, फिलहाल आप अपने फ़ॉयरफ़ॉक्स (जो भी संस्करण चला रहे हों,) को फ़ॉयरफ़ॉक्स हिन्दी इंटरफ़ेस एडऑन के जरिए हिन्दीमय कर सकते हैं. और बड़ी आसानी से. हिन्दी इंटरफ़ेस का अनुवाद वैसे तो ठीक-ठाक है पर कहीं अटपटा लग सकता है - जैसे कि, लिंक स्थान कॉपी करें. मगर हिन्दी में काम करने का मजा ही अलग है.



फ़ॉयरफ़ॉक्स को हिन्दीमय कैसे करें?



फ़ॉयरफ़ॉक्स ब्राउज़र में काम करते हुए यहां क्लिक करें व जो विंडो खुलेगी उसमें ब्राउज़र एड आन संस्थापित करने का विकल्प चुनें. फ़ॉयरफ़ॉक्स फिर से चालू करें. बस हो गया!



-------.

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget