March 2008


आह! वो भी क्या दिन थे! ईमेल के बिना जिंदगी कितनी आसान थी. जो भी मेल (ईमेल का स्नेल, सर्प रूपी संस्करण) आता था वो डाकिया दे जाता था – दिन में एक बार. सुबह सुबह. वो डाक कभी भी इस मात्रा में नहीं पहुंची कि उन्हें पढ़ा नहीं जा सके या उनका जवाब नहीं दिया जा सके.

अब तो आमतौर पर हम सब ने एकानेक ईमेल खाता बनाया हुआ है. और हमारे प्रत्येक खाता के ईमेल बक्से भयानक रूप से हर हमेशा भरे हुए रहते हैं. एकाध दिन की छुट्टी आपने नेट से ली नहीं कि मामला और बिगड़ जाता है. वायग्रा और इंटरनेट लाटरी जैसे स्पैम ईमेलों की गिनती तो खैर अलग ही बात है जो स्पैम फ़ोल्डरों से भी तमाम तिकड़मों से बच निकल कर आपके इनबॉक्स में आए दिन नित्य घुसे चले आते हैं. जब तक आप किसी एक ईमेल को खोल कर पढ़ रहे होते हैं और उसका मर्यादा परक जवाब लिखने की सोच रहे होते हैं इतने में आपके ईमेल-डाकिया का डेस्कटॉप कार्यपट्टी प्रतीक झकझकाने लगता है और बताता है कि आपके आईडाक-बक्से में इस दौरान कोई पाँच ईमेल और आ चुके हैं. अपने आरएसएस फ़ीडों, ओरकुट, फेसबुक, आईएम संदेशों और ट्विटर इत्यादि के संदेशों को मिला लें तो मामला और अकल्पनीय हो जाता है.

पिछले दिनों मेरे एक परिचित ने मुझसे शिकायत की कि मैंने उनके पहले के चार ईमेल का जवाब ही नहीं दिया, जबकि बिपाशा बसु के हॉट चित्र के बारे में बताते उसके पांचवे ईमेल, जिसमें उसने जान-बूझ कर गलत कड़ी लगा दी थी, का जवाब फट से देकर पूछा था कि भई वो कड़ी काम नहीं कर रही है सही कड़ी तो बताओ. अब मैं उस परिचित को किस मुंह से बताता कि भई, प्राथमिकता नाम की भी कोई चीज होती है. जब आपके पास घंटे के सौ ईमेल आ रहे हों तो सबको तो जवाब नहीं दिया जा सकता ना. और, जवाब तो दूर की बात है, इस जीवन में सबको तो पढ़ा भी नहीं जा सकता ना – आखिर आदमी की और भी अन्य आवश्यकताएं भी तो होती हैं!

लोगबाग अकसर स्पैम को गरियाते हैं. स्पैम मेल से उन्हें तकलीफ़ होती है. मगर मुझे कई मर्तबा स्पैम ने गंभीर अवस्था से बाहर निकाला है. कोई जरूरी ईमेल का जवाब जानबूझकर नहीं देना हो, या अपनी भुलक्कड़ी आदत से लाचार, पाँच मिनट में यू-ट्यूब पर कोई जरूरी वीडियो देखकर लिखता हूँ की तर्ज पर भूले गए ईमेल के स्मरण-ईमेल के प्रत्युत्तर में साफ तौर पर, आसानी से, गले उतरने वाला बहाना लिखा जा सकता है – माफ़ कीजिएगा, आपका ईमेल मिला नहीं था – शायद स्पैम हो गया होगा. इतनी बढ़िया सुविधा को गरियाना ठीक नहीं है. मेरे विचार में स्पैम जैसे खूबसूरत, अत्यंत काम की तकनीक का ईजाद शायद इसीलिए ही हुआ होगा.

मेल बाक्स के अकल्पनीय रूप से भरने का मामला तब और गंभीर हो जाता है जब कोई तीज त्यौहार आता है. नया साल, क्रिसमस, होली-दीवाली-दशहरा-ईद आता है. एक दूसरे को शुभकामनाएं देने-लेने का धूल से सस्ता ( डर्ट चीप ) साधन ईमेल के अलावा और कोई हो सकता है भला? और इसी वजह से आपका इनबॉक्स इन खास दिनों में कई गुनी रफ़्तार से भरने लगता है. ऐसे संदेशों में किसी को कोई खास जवाब भी नहीं लिखना होता है – और किसी अच्छे संदेश को आगे फ़ॉर्वर्ड करने में कोई ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती. नजीतन, प्रत्युत्तरों और ईमेल फ़ॉर्वर्डों के कारण आपका ईमेल इनबक्सा और ज्यादा, और ज्यादा भरने लगता है. इतना कि फिर आपको सोचना पड़ता है कि डिलीट आल बटन दबाकर अपना ईमेल-दीवाला ही निकाल दें ताकि फिर न रहेगी बांस न बजेगी बांसुरी.

मगर असली समस्या तब आती है जब आप कोई महत्वपूर्ण संदेश किसी को भेजते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो ऑनलाइन होगा और अगला दन्न से जवाब देगा(गी). पर जवाब आता नहीं. चार घंटे निकलते हैं तो सोचते हैं कि वो मीटिंग या कार्य में व्यस्त होगा, उससे फारिग होते ही आपको जवाब लिखेगा. बारह घंटे बिना जवाब के निकल जाते हैं तो आप सोचते हैं कि वो कहीं बाहर यात्रा इत्यादि पर होगा. चौबीस घंटे निकलते हैं तो कयास लगाते हैं कि शायद आपका संदेश उसके स्पैम में चला गया होगा. आप उसको फोन करने की सोच नहीं सकते क्योंकि आजकल फोन करना पुरानी तकनॉलाजी और बैकवर्ड तो माना ही जाता है, चार लोगों के बीच कोई अपने मोबाइल में बात करता है तो फूहड़ भी माना जाता है. और जाहिर है आप सामने वाले को ऐसी फूहड़ सिचुएशन में डालना नहीं चाहते. आप दोबारा स्मरण ईमेल भेजते हैं. जवाब नहीं आना होता है, नहीं आता. किसी कार्यशाला में हाऊ टू हैंडल एक्स्ट्रीम ईमेल्ज नाम के अपने प्रस्तुतिकरण में एक बंदे ने ऐसी अवस्था में एक अनुभूत प्रयोग करने की सलाह दी थी - ईमेल के शीर्षक को भड़काऊ, उकसाऊ रखें. अंदर सामग्री भले ही दूसरी हो, शीर्षक दिलचस्प बना दें. हॉट बिपाशा के शीर्षक युक्त ईमेल को सामने वाला बंदा अपने स्पैम फ़ोल्डर में जाकर, ढूंढ कर न सिर्फ शर्तिया पढ़ लेगा बल्कि जवाब भी देगा.

यूँ, हमारे जैसों के विपरीत ध्रुवों में रहने वाले जीव भी इस धरती पर हैं. मुझे पिछले दिनों किसी खास व्यक्ति ने अपना बिजनेस कार्ड दिया था. उस पर उनका ईमेल पता दर्ज था. कुछ याद आने पर मैंने उन्हें ईमेल कर दिया. जवाब नदारद. स्मरण भेजा. जवाब फिर भी नदारद. लगा कि मेरा सारा जेन्युइन ईमेल सामने वाले का स्पैम फ़ोल्डर खा रहा होगा. अपने तमाम बैकवर्डनेस को आगे करते हुए, कार्ड में दिए गए मोबाइल पर काल किया. पूछा तो उत्तर मिला कि वे तो हफ़्तों महीनों ईमेल ही चेक नहीं करते हैं. कोई ईमेल भेजता है तो फोन पर सूचना देता है तब देखते हैं. ईमेल व होम-साइट का पता बिजनेस कार्ड पर देना फैशन है ना, इसलिए दिया हुआ है. लोग पिछड़ा न समझने लगें. पर, ऐसे विपरीत ध्रुवों में रहने वाले लोग ही आज के जमाने में सुखी हैं. क्यों सही कहा ना मैंने?

-----.

(पाँच साल पहले का (उ)ईमेल यहाँ पढ़ें)


गिरगिट का प्रतिरूप इंडीनेटर लेकर आ रहे हैं ब्लॉगवाणी.

शायद ये अभी जांच-पड़ताल अवस्था में है.

इस चिट्ठे का गुजराती में इंडीनेटरिया पृष्ठ देखें.

निश्चित ही इस तरह की संकल्पनाओं व प्रतिस्पर्धा से भारतीय भाषा इंटरनेट पर समृद्ध होगी.

इंडीनेटर को ढेरों शुभकामनाएं.


तो, मुम्बई ब्लॉगर बारकैम्प में 29 मार्च को शामिल होने के लिए अपने कैलेण्डर में इस तिथि को दर्ज कर लें.

इस बार कैम्प में विविध विषयों पर जिनमें चर्चा होनी है, भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग का भविष्य भी शामिल है, और, जाहिर है, इस चिट्ठे का दिलचस्प (?) शीर्षक भी एक विषय है.

तरूण चन्देल, ब्लॉगकैम्प मुम्बई के संचालक का निमंत्रण स्वरूप ईमेल आपके के लिए प्रस्तुत है:

****.

प्रिय मित्रों मेरा नाम तरुण चंदेल है तथा में ब्लोग्काम्प मुम्बई का आयोजक हूँ| ब्लोग्काम्प मुम्बई ब्लोग्गेर्स का एक जमावड़ा है जहाँ हम सब मिलकर ब्लोग्गिंग जगत पर विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा करते हें| अधिक जानकारी आप हमारी विकी से प्राप्त कर सकते हैं| मैं सोच रहा था की क्यों ना ब्लोग्काम्प में हम हिन्दी ब्लोग्गिंग पर एक चर्चा करें| विचार ऐसा है कि बहुत सारे ऐसे लोग हैं (जिनमे मैं भी शामिल हूं) जो हिन्दी ब्लोग्स पढ़ना बहुत पसंद करते हैं पर उन्हें कुछ शंकाए हैं जैसे कि हिन्दी में ब्लोग करना क्या english में करने जितना आसान है? क्या हिन्दी ब्लोग्स google के सर्च रिजल्ट्स में आते हैं? ये कुछ एक सवाल हैं उन अनेक सवालों में से जो अन्य ब्लोग्गेर्स के दिमाग में हैं. इसलिए मुझे लगता है की हमे हिन्दी ब्लोग्गिंग पर एक चर्चा करनी चाहिऐ ब्लोग्काम्प में. ज़रूरी नही है की ये चर्चा powerpoint slides के साथ की जाये, हम "चाय पर दो बातें" जैसी चर्चा भी कर सकते हैं, जहाँ पर आप एक समूह में इस विषय से लोगों को परिचित करवाएंगे और फिर हम उस मंच को अन्य लोगों के लिए खोल देंगे ताकि वो अपने प्रशन आप सब से पूछ सकें| यदि आपको लगता है की ये एक अछा कार्य है तो कृपया जवाब दीजियेगा इस पत्र का तथा हमारी विकी पर भी आप अपना नाम जोड़ दीजियेगा. आप ये सन्देश अपने अन्य हिन्दी भाषी ब्लोग्गर्स मित्रों को भी पहुंचा दीजियेगा क्यूंकि मेरे पास आपके ही ईमेल थे| धन्यवाद, तरुण चंदेल ब्लॉगर | मुम्बई | भारत ईमेल: tarunchandel AT gmail.com Site: www.tarunchandel.com

*****.

हिन्दी चिट्ठाकारों, खासकर मुम्बई व आसपास के चिट्ठाकारों से विशेष आग्रह है कि इस आयोजन में शामिल हों व यथा संभव आपमें से कोई हिन्दी चिट्ठाकारी पर कोई प्रस्तुतिकरण भी दें.


हिन्दी ब्लॉगों में वर्तनी की ग़लतियों के लिए गाहे-बगाहे नुक्ता चीनी होती रही हैं. इसके लिए सबसे बड़ा कारण है, हर प्लेटफ़ॉर्म पर चल सकने वाले हिन्दी वर्तनी जांचक प्रोग्राम की घोर अनुपलब्धता.

मुक्त स्रोत के आस्पैल में हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा उपलब्ध तो है, परंतु वो अभी आधी अधूरी है और स्वयं गलतियों से भरपूर है. अतः इसका कोई अर्थ नहीं है. इसमें अभी कोई अस्सी हजार शब्द हैं, जिन्हें कई स्रोतों से एकत्र किया गया है – बहुधा स्वचालित तरीके से. वर्तनी जांच हेतु पूर्व में एक प्रयास हो चुका है, जिसमें चिट्ठाकार समूह से जुड़े कुछ सदस्यों ने सक्रिय रूप से भूमिका निभाई थी, परंतु वह कार्य अधूरा ही रह गया था. हंसपैल में उपलब्ध हिन्दी वर्तनीजांचक भी मात्र पंद्रह हजार हिन्दी शब्दों का है, जो बहुत काम का नहीं है.

इन अस्सी हजार शब्दों की वर्तनी की जांच की जानी आवश्यक है ताकि आस्पैल हिन्दी वर्तनी जांचक भी स्वयं परिपूर्ण हो सके. आस्पैल हिन्दी वर्तनी जांचक का ओपनऑफ़िस प्लगइन अप्रैल 2008 में जारी किया जाना प्रस्तावित है तथा इसी समय फ़ॉयरफ़ॉक्स व विंडोज के लिए भी इसका इंस्टालर बनाया जाना प्रस्तावित है. जिससे यह लिनक्स व विंडोज में ओपनऑफ़िस व अन्य अनुप्रयोगों में उपलब्ध हो सकेगा.

इन अस्सी हजार शब्दों को कोई 40 फ़ाइलों में, प्रत्येक लगभग 2000 शब्दों में बांटा गया है. आपसे अनुरोध है कि आप इनमें से कोई फ़ाइल चुन लें व उसकी वर्तनी ठीक कर दें. फिर कोई अन्य फ़ाइल, जिसकी वर्तनी किसी अन्य ने जांची है, उसका रीव्यू कर दें. इस कार्य के लिए कोई तीन हफ़्ते का समय है. इस बीच यह कार्य हो जाए तो वास्तव में यह एक वृहत, लंबे समय से लंबित कार्य न सिर्फ सम्पन्न होगा, हम सभी के फ़ायदों के लिए मुक्त स्रोत में हमेशा, हर किसी के प्रयोग के लिए उपलब्ध रहेगा. मुक्त स्रोत के कार्य सामुदायिक सहयोग से ही होते हैं व संभव होते हैं. आपके अनुदान व सहयोग के बिना, शायद ये कभी संभव नहीं हो पाएगा.

फ़ाइल में संपादन संशोधन के लिए विस्तृत विवरण यहाँ दर्ज है.

अपने हिस्से की फ़ाइल यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.

वहां पर ये जरूर दर्ज करें कि आप कौन सी फ़ाइल जांच रहे हैं, ताकि दोहरे कार्यों से बचा जा सके. आपको इसके लिए पंजीकृत होना होगा जो कि बहुत आसान है. यदि ये झंझटिया लगता है तो बताएं, आपका नाम दर्ज कर फ़ाइल आपको भेज दी जाएगी.

फ़ाइल यूनिकोड हिन्दी टैक्स्ट रूप में है जिसे आप वर्ड या नोटपैड इत्यादि में खोलकर संपादित कर सकते हैं.

वर्तनी जांच के पश्चात् फ़ाइल को मुझे या जी करूणाकर karunakar AT indlinux.org पर भेज सकते हैं.

यदि कोई समस्या, सुझाव हैं तो टिप्पणियों में दर्ज कर सकते हैं या मुझे या जी करूणाकर को अलग से ईमेल कर सकते हैं.

तो, आपके लिए सिर्फ 2000 शब्दों की ही तो बात है. किसी सप्ताहांत को थोड़ा सा फुरसत निकालिए और इस कार्य को कर ही डालिए. वर्तनी की गलतियों सहित चिट्ठों को पढ़ने से मुक्ति की दिशा में शायद ये एक और ठोस कदम होगा... जिसमें जाहिर है, आपकी भी भागीदारी रहेगी.

आपके प्रयासों के लिए आप सभी को अग्रिम धन्यवाद.


आपकी पसंद क्या है?

कल्पना करें कि आपने आज अपने कम्प्यूटर पर किसी अनुप्रयोग में कोई बढ़िया सा आलेख लिखा है और उसे किसी ऑफ़िस दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट में सहेज कर रख लिया है. इसे कोई सौ बरस बाद आपका पड़-पोता कहीं से ढूंढ निकालता है, और उसे वो पढ़ना चाहता है. तब तक दुनिया बहुत बदल चुकी होगी. अनुप्रयोग बदल चुके होंगे. पठन-पाठन के तरीके बदल चुके होंगे. पर, एक चीज शर्तिया नहीं बदली होगी, वो है आपके दस्तावेज़ का फ़ॉर्मेट. और आपके उस दस्तावेज़ को सौ साल बाद भी पढ़ने के, उसके उपयोग करने के ठोस तरीके रहने चाहिए होंगे. यहाँ, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए कि आपने आज किस प्लेटफ़ॉर्म पर, किस अनुप्रयोग के जरिए कौन सा दस्तावेज़ बनाया है. सौ साल बाद आपके पड़पोते को वो प्रयोग में आने लायक होना ही चाहिए. और, सौ साल बाद क्यों, अभी आप उस दस्तावेज़ को अपने मित्र या संबंधी को जो आपसे भिन्न कम्प्यूटर प्लेटफ़ॉर्म प्रयोग करता है, भेजें तो भी यही स्थिति होनी चाहिए. मगर नहीं है. ओपन ऑफ़िस का ओडीटी फ़ॉर्मेट में सहेजा गया दस्तावेज़ आप एमएसऑफ़िस 2007 में नहीं खोल सकते तो एमएसऑफ़िस 2007 में नवीनतम फ़ॉर्मेट में सहेजा गया दस्तावेज़ आप ओपन ऑफ़िस में नहीं खोल सकते. इनका प्रयोग दूसरे प्लेटफ़ॉर्म में करने के लिए आपको अतिरिक्त प्लगइनों की आवश्यकता होती है. और, यहाँ हिन्दी फ़ॉन्ट की तो बात ही नहीं हो रही है – अंग्रेज़ी सामग्री में भी ये समस्या आती है, जो कि आनी नहीं चाहिए. प्रयोक्ता को ये स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वो किसी भी प्लेटफ़ॉर्म में किसी भी अनुप्रयोग का प्रयोग कर जो दस्तावेज़ बनाए वो हर जगह प्रयोग में आएं. जैसे कि आपके कम्प्यूटर पर ओपनऑफ़िस में बनाए दस्तावेज़ आपके मित्र के विंडोज मोबाइल उपकरण पर भी प्रयोग में आ सकें.

इन्हीं समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ समय से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट के आईएसओ मानकीकरण के प्रयास चल रहे हैं जिनमें दो प्रमुख प्रतिभागी हैं – ओपन डाक्यूमेंट फ़ॉर्मेट (ओडीटी) तथा ओपन एक्सएमएल. पहला ओपन ऑफ़िस व स्टार ऑफ़िस में पहले से समर्थित है तथा दूसरा माइक्रोसॉफ़्ट के प्लेटफ़ॉर्म से आया है. दोनों ही पक्षों में अपने फ़ॉर्मेट को मानकीकृत किए जाने के लिए लॉबीइंग की जा रही ह.ै ओपनडाक्यूमेंट को आईएसओ प्रमाणन मिल चुका है, और माइक्रोसॉफ़्ट ओपनएक्सएमएल के आईएसओ मानकीकरण हेतु प्रयासरत है. मानकीकरण में विभिन्न सदस्य देशों के शासकीय अशासकीय विभागों द्वारा मतदान के जरिए मामला सुलझाया जाना है. और, समस्या यहीं से शुरू होती है.

कुछ दिन पहले रीडिफ़ में ये खबर छपी कि माइक्रोसॉफ़्ट ने भारतीय एनजीओ सदस्यों को अपने ओपनएक्सएमएल फ़ॉर्मेट को समर्थन में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) को पत्र लिखने के लिए दबाव डाला. जाहिर है, दस्तावेज़ के मानकीकरण में बीआईएस के भी महत्वपूर्ण मत हैं. इसी सिलसिले में आईबीएम इंडिया द्वारा भारतीय संगठनों को लिखे गए पत्र के मजमून भी जगजाहिर हुए – जाहिर है उनके विचार अलग ही होंगे – ओडीएफ़ के पक्ष में.

ओडीएफ़ या ओपनएक्सएमएल का ये युद्ध नया नहीं है. पिछले कई वर्षों से जारी है यह युद्ध. और जब तक ओपनएक्सएमएल के लिए आईएसओ प्रमाणन के लिए मतदान नहीं हो जाता तब तक ये जारी रहेगा. अपने अपने तर्कों में, जाहिर है, कोई भी पीछे नहीं हैं. और, आइसोलेशन में पढ़ें तो हर एक का तर्क दमदार लगता है.

एक प्रयोक्ता के तौर पर, आपको क्या चाहिए? ओपनडाक्यूमेंट या ओपनएक्सएमएल? आप कहेंगे भाड़ में जाएं ये दस्तावेज़ फ़ॉर्मेट. हमें क्या लेना देना, जब तक कि हमारा काम बढ़िया तरीके से चले. सही कहना है आपका. एक प्रयोक्ता के तौर पर किसी दस्तावेज़ के किसी खास फ़ॉर्मेट में होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता जब तक कि दस्तावेज़ों के आपसी साझा में कोई समस्या न आए. अनुप्रयोगों में उन्हें आपस में और कहीं पर भी इस्तेमाल किये जाने लायक तकनॉलाज़ी अंतर्निर्मित होनी ही चाहिए. और, भविष्य में ये होना ही है ये बात भी तय है.

---


ब्लॉगर सहायता यहाँ पर अब पूरा हिन्दी में उपलब्ध है. परंतु अभी इस पर कार्य जारी है ऐसा प्रतीत होता है. कहीं कड़ियाँ छूटी हैं (28 वीं कड़ी के बाद काम नहीं कर रहा) तो कहीं चित्र के लिंक नहीं दिए गए हैं. भाषा भी सपाट, जल्दी से समझ में जल्दी नहीं आने लायक व ज्यादा ही तकनीकी प्रतीत होती है. मगर फिर भी, चलिए हिन्दी में सम्पूर्ण सहायता (लगभग सभी विषयों को शामिल किया गया है) ब्लॉगर में अब उपलब्ध हो ही गई है तो इसके लिए साधुवाद तो देना ही होगा!

ब्लॉगर सहायता

नीचे हमारे सबसे ज़्यादा अकसर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं. आपको निम्नलिखित भाषाओं में और अधिक विस्तृत सहायता सामग्री मिल सकती हैः

English (US)

अकसर पूछे जाने वाले प्रश्नः

  1. मैं ब्लॉगर खाता कैसे बनाऊँ?
  2. मैं ब्लॉगर ब्लॉग कैसे बनाऊँ?
  3. मैं ब्लॉगर कैसे पोस्ट करूँ?
  4. मैं तस्वीरें कैसे पोस्ट करूँ?
  5. मैं लॉगइन नहीं हो पा रही/रहा. मैं क्या करूँ?
  6. मैं ब्लॉग कैसे हटाऊँ?
  7. मैं अपना खाता कैसे रद्द करूँ?
  8. क्या मेरा ऐसा ब्लॉग हो सकता है, जिस पर एक से अधिक व्यक्ति पोस्ट करें?
  9. मैं अपनी प्रोफ़ाइल में अपनी तस्वीरें कैसे जोड़ सकती/सकता हूँ?
  10. मैं अपने बाहरी वेब होस्ट में FTP (या sFTP) संपर्क कैसे सेटअप करूँ?
  11. अपने ब्लॉग पर मैं कस्टम डोमेन का प्रयोग कैसे करूँ?
  12. ब्लॉगर मोबाइल कैसे काम करता है?
  13. मैं अपनी पोस्ट को लेबल कैसे करूँ?
  14. मैं अपने ब्लॉग में AdSense कैसे जोड़ूँ?
  15. मैं अपने ब्लॉग के लिए साइट फ़ीड कैसे सक्षम करूँ?
  16. "ध्वज" बटन क्या है?
  17. मैं अपने ब्लॉग पर टिप्पणियाँ कैसे मॉडरेट करूँ?
  18. मैं ब्लॉगर की रूपाकार विशेषता का प्रयोग कैसे करूँ?
  19. मेरे पोस्टिंग फ़ॉर्म पर शब्द पुष्टिकरण क्यों है?
  20. मेरा ब्लॉग अक्षम क्यों किया गया है?
  21. क्या मैं पोस्टिंग के समय कुँजीपटल शॉर्टकट का प्रयोग कर सकती/सकता हूँ?
  22. मैं लिप्यंतरण विशेषता का प्रयोग कैसे करूँ?
  23. मैं ब्लॉगर के पोस्ट संपादक का प्रयोग कैसे करूँ?
  24. मैं अपने ब्लॉग के लिए कस्टम डोमेन कहाँ ख़रीद सकती/सकता हूँ?
  25. मैं अपने ब्लॉग में प्रदर्शित तिथियों का फ़ॉरमेट कैसे बदल सकती/सकता हूँ?
  26. पोस्ट टेम्प्लेट क्या है?
  27. वापसी लिंक क्या हैं और मैं उनका प्रयोग कैसे करूँ?
  28. शब्द पुष्टिकरण विकल्प क्या है?
  29. क्या मैं अपने ब्लॉग के रूपाकार का HTML संपादित कर सकती/सकता हूँ?
  30. मेरे ब्लॉग का शीर्षक कहाँ प्रकट होगा?
  31. URL क्या है?
  32. "सूचीबद्ध करना" सेटिंग क्या करती है?
  33. एन्कोडिंग सेटिंग क्या करती है?
  34. FTP सर्वर क्या है?
  35. पथ क्या है?
  36. सूची के मुकाबले समूचे ब्लॉग को पुनः प्रकाशित करने में क्या अंतर है?

पूरा सहायता आलेख यहाँ पढ़ें


एजुकल्ट : शिक्षा, रुचि, मनोरंजन से संबंधित प्रोग्रामों व पठन-पाठन सामग्रियों का भंडार

अपनी पुरानी, बैकअप की गई फ़ाइलों में खोजबीन करते समय यह फ़ाइल दिख गया, जिसे मैंने कोई सात-आठ साल पहले इंटरनेट से उतारा था. सैकड़ों काम की सामग्रियों को देखकर मैंने इसकी कड़ियों की एक फ़ाइल बना कर सुरक्षित रख छोड़ा था. तब से इसमें और भी सामग्रियाँ जुड़ गई हैं. इस साइट पर आपको ढेरों प्रोग्राम, रुचिकर – मनोरंजक पाठ, चित्र, सबक, विविध विषयों पर बारंबार पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर और न जाने क्या क्या मिलेंगे.

साइट चूंकि एंटीवायरस बनाने वाली कंपनी की है, अतः सारे प्रोग्राम व सामग्रियाँ हानिरहित तो हैं हीं, हममें से प्रत्येक के लिए कुछ न कुछ काम का निकल ही जाएगा. आज की स्थिति में वहां पर 1800 से ज्यादा फ़ाइलें (जिप या ईएक्सई फ़ॉर्मेट में) उपलब्ध हैं, जिन्हें डाउनलोड कर प्रयोग किया जा सकता है.

चूंकि यह साइट बहुत लंबे समय से प्रचलन में है, इसमें बहुत से प्रोग्राम विंडोज 95 के जमाने के हैं जो हो सकता है कि आपके नए कम्प्यूटर पर न चलें. मगर फिर भी बहुत से नए प्रोग्राम व जानकारियों के भंडार यहाँ हैं ही. (हालांकि उनकी प्रामाणिकता के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है.)

यहाँ भंडारित सामग्री के कुछ नमूने – चीनी अबेकस, 555 सर्किट, योग पर 8 व्याख्यान, ABBA के बारे में बारंबार पूछे जाने वाले सवाल ( अब आप ये मत पूछिएगा कि ABBA क्या है!) , थॉमस अल्वा एडीसन की जीवनी व उनके आविष्कार, बार टेंडर के लिए सम्पूर्ण गाइड....

आपको लग रहा होगा कि बस, बस और मत गिनाओ... जल्दी से उस साइट का नाम बताओ...

तो लीजिए, यहां चटका लगाएं.

इसी का एक और वैकल्पिक पता

(यहाँ प्रदर्शित चित्र कुकुरमुत्ता-ज्वाला भी इसी साइट की किसी फ़ाइल से लिया गया है, और जाहिर है इस साइट की आमतौर पर सारी सामग्रियाँ आम इस्तेमाल के लिए मुफ़्त हैं. ये सब, जाहिर है, अंग्रेज़ी में हैं. क्या वो दिन आएगा जब ऐसी सामग्रियाँ हमें हिन्दी में भी मिलें?)

(दक्षिण भारतीय भाषा का एक चिट्ठा. यदि ये लिपि आपको नहीं आती तो भी क्या आप इसे पढ़ सकते हैं? पढ़ कर समझ सकते हैं?)

सबसे पहले आपके लिए कुछ होम वर्क. जरा ये कड़ी देखें. अब इस कड़ी पर जा कर देखें.

हो गए न चमत्कृत?

भोमियो में ऐसी सेवा पहले से ही थी. परंतु वह अज्ञात कारणों से अकाल मौत मर गया. अब चिट्ठजगत् में यह सुविधा आ चुकी है.

(हाँ, अब पढ़ सकते हैं. धन्यवाद गिरगिट!)

जिन चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में विविध भाषाओं में पढ़ने के भोमियो की कड़ियाँ लगा रखी हैं, उन्हें बदल कर यहां दी गई विधि से चिट्ठाजगत के फ़ॉन्ट परिवर्तक लगा लें. कौन जाने किस भाषा का मुरीद आपके चिट्ठे को पढ़ने को बेचैन हो रहा हो?


हिन्दी का एक और (गूगल कस्टमाइज़) इंटरनेट सर्च इंजिन

इंटरनेट पर खास हिन्दी सामग्री ढूंढने के लिए आज दर्जनों सर्च इंजिन हैं. इसी कड़ी में गूगल सर्च एपीआई तथा फ़ोनेटिक हिन्दी इनपुट को विशेष पसंदीदा तरीके से जमाकर एक नया हिन्दी खोजक प्रस्तुत किया गया है- यंतरम

इस खोजक की खासियत ये है कि इसके इनपुट फ़ील्ड में सीधे ही फोनेटिक हिन्दी से टाइप कर सकते हैं.(या दूसरी भारतीय भाषा में हैं, तो उस भाषा में, फोनेटिक सीधे ही सर्च बक्से में टाइप कर सकते हैं). यानी यह उन प्रयोक्ताओं के लिए खासा उपयोगी होगा जो सर्च इंजिन के इनपुट फ़ील्ड में सीधे ही टाइप नहीं कर पाते हैं और उन्हें सर्च टर्म को कट-पेस्ट कर झंझट भरा इस्तेमाल करना होता है.

मैंने सेल्फ गूगल करते हुए रवि नाम का सर्च किया. जैसा कि आप ऊपर के चित्र में देख सकते हैं, परिणाम ठीकठाक ही रहे. जाहिर है, यह कस्टमाइज सर्च इंजिन खास हिन्दी व भारतीय हिन्दी साइटों के लिए ऑप्टीमाइज़्ड है.

इसमें डिफ़ॉल्ट हिन्दी तथा अंग्रेज़ी के अलावा कन्नड़, तेलुगु में भी इंटरनेट पर खोजा जा सकता है.

अपनी साइट पर इसकी सर्च पट्टी लगाने हेतु इसका कोड आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं


बचपन के दिन, अगर सटीकता में कहें तो. अभी चिट्ठाकार समूह पर हिन्दी के भविष्य के बारे में बात करते-करते रुख़ कुछ मुड़ा और बचपन और कॉमिक्स विषय पर बहुत ही बढ़िया चर्चा चली. इसी तारतम्य में मेरा पन्ना पर अपने जमाने के कॉमिक्स के बारे में मजेदार आलेख पढ़ने को भी मिला.

आजकल के हिन्दी कॉमिक्स में सुपर कमांडो ध्रुव, तिरंगा, भोकाल डोगा, (डोगा के कुछ मुफ़्त ईकॉमिक्स डाउनलोड यहाँ से करें) इंसपेक्टर स्टील, नागराज, फ़ाइटर टोड्स इत्यादि बड़े ही ऊटपटांग नाम सहित ऊटपटांग कैरेक्टर्स आते हैं. इनमें एक्शन और विजुअल्स तो ग़ज़ब के होते हैं, परंतु स्टोरी लाइन बहुत ही बकवास होती है. जो मजा फैंटम और मैनड्रेक को पढ़ने में आता था वो इनमें नहीं आता. और, चाचा चौधरी, उनका दिमाग तो कम्प्यूटर से भी तेज चलता है. मगर बच्चे, उन्हें तो कॉमिक्स चाहिए चाहे वो जैसा भी हो. उन्हें ये भी, और वो भी, और पढ़ा-बिनपढ़ा सब बड़े अच्छे लगते हैं और जाहिर है, छीना-झपटी मचती रहती है. नए कॉमिक्स चरित्रों में गमराज और बांकेलाल मुझे भी पसंद हैं क्योंकि वे हास्य व्यंग्य बिखेरते हैं. आर्ची तो आज भी पसंद है :)

बाल-पत्रिकाओं में चंपक का अपना अलग स्थान है. इसका स्थाई कॉमिक कैरेक्टर चीकू भी बहुत प्यारा है. अब तो चंपक का जोगो डिस्क युक्त मल्टीमीडिया संस्करण भी आता है. महज बीस रुपए में मल्टीमीडिया सीडी रॉम युक्त चंपक तो वाकई लाजवाब होता है.

(चंपक जोगो डिस्क के बच्चों के फ्लैश आधारित गेम्स लिनक्स पर कॉन्करर ब्राउज़र पर चलते हुए)

चंपक के मल्टीमीडिया संस्करण के सीडी रॉम में बच्चों के लिहाज से फ्लैश आधारित कम्प्यूटर गेम्स व चित्रकारी करने के प्रोग्राम (जो कि लिनक्स में भी बढ़िया चलते हैं) और ढेर सारे वीडियो व वालपेपर इत्यादि होते हैं.

कॉमिक्स की बातें करते बचपन लौट आया... वैसे भी हम यदा कदा बचपना और बचपन-भरी शरारतें करते ही रहते हैं... अपने ब्लॉग पोस्टों में .... टिप्पणियों में.... (माफ़ कीजिए, यहाँ कड़ियाँ नहीं, :) – जस्ट किडिंग...? ! & $ #^)

चाहो तो दुनिया में तमाम खताएं कर लेना यारों

पर अपने अंदर के बच्चे को मरने मत देना यारों

---

व्यंज़ल

वो मेरा कथन नहीं था जस्ट किडिंग

दुनिया बड़ी आसान है जस्ट किडिंग


मेरी उम्मीद में सदैव रहा था हिमालय

मेरे पैर कुछ यूं चले कि जस्ट किडिंग


मैंने मुहब्बत में अलाव तक जला दिए

वो देखकर हँस दिए पूछे जस्ट किडिंग


मेरी संजीदा वाकयों को अनदेखा किया

भृकुटियाँ तनीं जब किया जस्ट किडिंग


मुश्किल घड़ियाँ आसानी से कटेंगे रवि

जीवन को यूं जियो जैसे जस्ट किडिंग

----

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिये इस पर क्लिक करें)

इंटरनेट पर आज का सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी पृष्ठ कौन सा है?

अज़दक और अलेक्सा (एलेक्सा?) में अ के अलावा एक और चीज कॉमन है. लोकप्रियता. आज का अलेक्सा का सर्वाधिक लोकप्रिय 101 और आगे हिन्दी साइट का पन्ना खोलेंगे तो पाएंगे कि वहां पर अज़दक विराजमान हैं. जी, हाँ, प्रमोद सिंह का ब्लॉगस्पॉट का अज़दक!

दूसरे नंबर पर है वेब दुनिया हिन्दी खेल पृष्ठ.

जानकार लोग तमाम तर्क गढ़ लें, या अलेक्सा की रैंकिंग को लानत-मलामत भेजें, सही ग़लत ठहराएँ, हम तो कहेंगे, अज़दक है नंबर वन! (101 वां) अब भले ही अज़दक की बहुत सी पोस्टों का अर्थ समझने के लिए सिर खुजाने पड़ते हैं (सिर के बाल कम होने का एक कारण ये भी तो नहीं, ऐं?)

अज़दक को ढेरों बधाईयाँ.

मेरे इस ब्लॉग का नंबर अज़दक के बाद, एक सौ आठवें अनुक्रम पर है.

वैसे, सबसे पहले नंबर #1 पर है जीमेल, 2 पर है वेब दुनिया तथा 3रे नंबर पर है गूगल हिन्दी वेब खोजक.

और, चौथे नंबर पर है, होल्ड कीजिए, अल शिया. इससे पहले तो मैंने हिन्दी की इस वेबसाइट का नाम नहीं सुना था, पर, जाहिर है, है यह प्रसिद्ध !

संबंधित प्रविष्टि : इंटरनेट का सर्वाधिक मज़ेदार हिन्दी पृष्ठ

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)

खांडबहाले, जो कि हिन्दी-अंग्रेज़ी-हिन्दी बोलता शब्दकोश के निर्माता भी हैं, ने अपने सीडी रॉम पर उपलब्ध कम्प्यूटरीकृत अंग्रेज़ी-मराठी शब्दकोश को ऑनलाइन मुफ़्त इस्तेमाल के लिए जारी किया है.

खांडबहाले का अंग्रेज़ी-मराठी ऑनलाइन शब्दकोश अत्यंत परिष्कृत है, इसका इंटरफ़ेस गूगल खोज जैसे पृष्ठ की याद दिलाता है – साफ सुथरा, और तेज. जब आप good शब्द से ढूंढते हैं, तो आगे पीछे good युक्त सारे शब्दों के अर्थ बताता है, जो कि बहुत ही उपयोगी है. सबसे नीचे did you mean के रूप में मिलते जुलते शब्दों को भी इंगित करता है.

खांडबहाले के पास हिन्दी-अंग्रेज़ी-हिन्दी का बोलता शब्दकोश भी है. इसमें कोई चार लाख से ऊपर अंग्रेज़ी शब्दों के हिन्दी अर्थ हैं. उनसे आग्रह है कि हिन्दी का यह परिष्कृत शब्दकोश वे इंटरनेट पर उपलब्ध करवाएँ. मैंने आग्रह कर दिया है, आप भी उनसे उनके इस ईमेल पर आग्रह कर सकते हैं - sales@khandbahale.com

अंग्रेज़ी-मराठी ऑनलाइन शब्दकोश यहाँ देखें


ठीक है, तलवारें नहीं, और म्यान भी नहीं.

आपके पर्सनल कम्प्यूटर में कितने ऑपरेटिंग सिस्टम हैं? आपको अपने पीसी में कितने ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता है? उदाहरण के लिए, मेरे पीसी में कोई 4-5 ऑपरेटिंग सिस्टम हैं (एकाध घटत बढ़त होते रहती है,), और लॅपटॉप पर 3 – इसके साथ आया विंडोज़ विस्ता जो प्रारंभ से ही हाइबरनेशन पर है, क्योंकि वो इनकेइनके तरह मेरे भी बहुत से काम नहीं आता, 2 - विंडोज़ एक्सपी तथा 3- सबायो लिनक्स.

वैसे, आमतौर पर पर्सनल कम्प्यूटर या लॅपटॉप पर एक से अधिक ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता आपको नहीं ही होती है, यदि आप कुछ सॉफ़्टवेयर जांच-परख इत्यादि में शामिल नहीं होते हैं.

परंतु साइकी नामक इन सज्जन ने अपने कम्प्यूटर पर 145 (जी हाँ, पूरे एक सौ पैंतालीस!) ऑपरेटिंग सिस्टम लगाया हुआ है. और ये वर्चुअल मशीन पर नहीं हैं. एक ही मशीन के फिजिकल हार्डडिस्क पर है, और इनमें से किसी में भी बूट किया जा सकता है. इनमें से अधिकांश, जाहिर हैं, लिनक्स के वितरण हैं. संक्षिप्त विवरण कुछ यूं है-

3 तरह के डॉस – डॉस 6.22, डॉस 7.1 तथा फ्री-डॉस

5 तरह के विंडोज – विंडोज़ 3.1, विंडोज़ 98, विंडोज 2000, विंडोज एक्सपी होम तथा विंडोज़ विस्ता

बाकी के सारे लिनक्स संस्करण – नए-पुराने सभी.

मजे की बात ये कि उनका कम्प्यूटर कोई विशिष्ट नहीं है. एएमडी 3200+ प्रोसेसर व 1 जीबी रैम सहित. बस उसमें 2x300 जीबी तथा 2x250 जीबी के चार हार्ड डिस्क लगे हैं, और इनमें कुल मिलाकर कोई 152 पार्टीशन हैं (जाहिर है, हर ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एक तथा कुछेक अन्य विशिष्ट प्रयोजन हेतु)

और, ये सारे ऑपरेटिंग सिस्टम एक ही कम्प्यूटर में आराम से साथ हैं! वो भी बिना किसी खास मुश्किल के!

अपने कम्प्यूटर में एक से ज्यादा, बहुत ज्यादा - 145 ऑपरेटिंग सिस्टम कैसे लगाएँ?

पूरी जानकारी यहाँ और यहाँ पढ़ें, और आप भी अपने कम्प्यूटर में कोई दर्जन दो दर्जन ऑपरेटिंग सिस्टम भरने की सोचें.

क्या कहा? जरूरत नहीं? ठीक है, पर अगला जब 145 भर सकता है, तो क्या हम दर्जन भर नहीं भर सकते?


इस बेहद दिलचस्प, मजेदार, मच्छर-चालीसा को मेरे एक जहीन मित्र ने मुझे ईमेल फ़ॉरवर्ड से भेजा है. इसके मूल रचयिता का नाम नहीं मालूम है, परंतु उन अज्ञात अनाम रचनाकार को सलाम. उनके प्रति बेहद आदर, सम्मान व आभार सहित इसे यहाँ पुनर्प्रकाशित कर रहा हूँ. यदि वे इन पंक्तियों को पढ़ पा रहे हों तो कृपया सूचित करें, ताकि उन्हें श्रेय दिया जा सके. या सुधी पाठकों को पता हो कि ये पंक्तियाँ किनकी हैं?

------.


मच्छर चालीसा

जय मच्छर बलवान उजागर, जय अगणित रोगों के सागर ।
नगर दूत अतुलित बलधामा, तुमको जीत न पाए रामा ।

गुप्त रूप घर तुम आ जाते, भीम रूप घर तुम खा जाते ।
मधुर मधुर खुजलाहट लाते, सबकी देह लाल कर जाते ।

वैद्य हकीम के तुम रखवाले, हर घर में हो रहने वाले ।
हो मलेरिया के तुम दाता, तुम खटमल के छोटे भ्राता ।

नाम तुम्हारे बाजे डंका ,तुमको नहीं काल की शंका ।
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारा, हर घर में हो परचम तुम्हारा ।

सभी जगह तुम आदर पाते, बिना इजाजत के घुस जाते ।
कोई जगह न ऐसी छोड़ी, जहां न रिश्तेदारी जोड़ी ।

जनता तुम्हे खूब पहचाने, नगर पालिका लोहा माने ।
डरकर तुमको यह वर दीना, जब तक जी चाहे सो जीना ।

भेदभाव तुमको नही भावें, प्रेम तुम्हारा सब कोई पावे ।
रूप कुरूप न तुमने जाना, छोटा बडा न तुमने माना ।

खावन-पढन न सोवन देते, दुख देते सब सुख हर लेते ।
भिन्न भिन्न जब राग सुनाते, ढोलक पेटी तक शर्माते ।

बाद में रोग मिले बहु पीड़ा, जगत निरन्तर मच्छर क्रीड़ा ।
जो मच्छर चालीसा गाये, सब दुख मिले रोग सब पाये ।

बहुत पहले मैंने भी एक मच्छरिया ग़ज़ल (व्यंज़ल) लिखा था. यह मच्छरिया ग़ज़ल कोई पंद्रह साल पुरानी है, जब मलेरिया ने मुझे अच्छा खासा जकड़ा था, और, तब उस बीमारी के दर्द से यह व्यंज़ल उपजा था---


मच्छरिया ग़ज़ल 10

मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह

आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।


घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ

इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।


डीडीटी, ओडोमॉस, अगरबत्ती, और आलआउट

अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।


एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है

इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।


सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का

मच्छरों से बचने अब शाम छोटा चाहिए ।

------.

गर्मी बढ़ रही है, और नतीजतन मच्छरों की संख्या भी. मेरा घर, मेरा शहर मच्छरों से अंटा-पटा पड़ा है. इंटरनेट पर कितने मच्छर हैं? मैंने जरा मच्छरों को इंटरनेट पर ढूंढने की कोशिश की- परिणाम ये रहे-

गूगल पर 4500

और याहू! पर 12000 से ऊपर!

अब समझ में आया, माइक्रोसॉफ़्ट, याहू पर क्यों निगाहें डाले बैठा है! और, हम याहू! से क्यों दूर रहते हैं? मच्छरों की भरमार जो है!

अद्यतन # 1 - देवेन्द्र पाण्डेय ने निम्न ईमेल कर बताया है कि इस मच्छर चालीसा के रचयिता श्री कैलाश (या कलश) पाण्डेय हैं.
पाण्डेय जी को धन्यवाद, एवं आभार.
Hi Ratlamiji,
I read MACHHAR ChALISA in your blog. Tried to coment it but could't becaz BLOG PROBLEM or my internet knowledge. This MACHHAR CHALISA is written by Shri Kalash Pandey (virakt), Mumukchhu Bhavan,Assi.Varanasi. I heard it by him in a KAVYA GOSHTHI 2 or 3 years ago. I m trying his phone no. If I succeed i will e-mail u. then U can talk yourself..................................Devendra Pandey. SARNATH, VARANASI.

----.

(मच्छर का चित्र - साभार, बीबीसी)

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget