January 2008


ये माना जाता रहा है कि महिलाएँ अपनी उम्र को लेकर बहुत सतर्क रहती हैं और वो हमेशा से ये चाहती रही हैं कि उनकी उम्र 16 बसंत पार करके ठीक वहीं पर ठहर जाए. उधर पुरुष वर्ग भी अपने बाइसेप्स को 20-21 वर्ष पर या बहुत हुआ तो 25 वें ग्रीष्म पर स्थिर कर देना चाहते हैं. माथे पर उम्र की लकीरें, बालों पर उम्र की सफेदी, गालों पर उम्र के गड्ढे छुपाने के लिए अरबों-खरबों जतन किये जाते रहे हैं. महिलाओं के उम्र से संबंधित ढेरों चुटकुले आपको याद होंगे तो पुरुषों के उम्र से पहले ही सठियाने के चुटकुले भी कोई कम नहीं होंगे. ये तो कहावत भी है कि किसी भद्र महिला से उसकी उम्र और भद्र पुरुष से उसकी आय नहीं पूछनी चाहिए.

पर, अब आप राहत की सांस ले सकते हैं. आप पुरुष हों या महिला, अब किसी को भी अपनी उम्र छिपाने की जरा सी भी आवश्यकता नहीं है. अब अपनी असली उम्र को बताने में किसी को भी कोई झिझक, कोई शर्म नहीं होनी चाहिए. बल्कि कुछ मायनों में, विश्वास रखिए, लोग कुछ जोड़ जाड़कर अपनी उम्र बताने लगेंगे – अपनी वास्तविक उम्र से अधिक बताने लगेंगे. आखिर, कोई भी अपने आपको डम्ब, बेवकूफ़, बुद्धिहीन कहलवाना पसंद करेगा भला?

एक नए अध्ययन के अनुसार यह सिद्ध हो गया है कि व्यक्ति की स्मार्टनेस, उसकी बुद्धिमत्ता उसके उम्र बढ़ने के साथ साथ बढ़ती ही जाती है. अभी तक तो ये माना जाता रहा था कि किसी व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ काल उसकी जवानी के दिनों में होता है – 20-30 की उम्र में तब उसकी बुद्धि उसका शरीर उसका मस्तिष्क सबसे उर्वर होता है क्योंकि बाद में शारीरिक-बौद्धिक क्षमताएँ घटने लगती हैं. परंतु इस नए अध्ययन ने इस धारणा को उलट दिया है. डेनमार्क के अराहस विश्वविद्यालय में कोई साढ़े चार हजार व्यक्तियों पर अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में उनके 20 वें वर्ष की आयु पर और फिर बीस साल बाद, 40 वें वर्ष की आयु पर उनके तमाम किस्म के स्मार्टनेस को जांचा परखा गया. अध्ययन में पाया गया कि 40 वर्ष की आयु की उम्र में आकर व्यक्ति ज्यादा, कहीं ज्यादा स्मार्ट हो जाता है. तो, इस तरह यह साबित किया जा चुका है कि उम्र आपकी स्मार्टनेस में इजाफ़ा करते हैं और, उम्रदराज व्यक्ति ज्यादा सयाने होते हैं.

जरा कल्पना करें कि इसके निहितार्थ क्या होंगे? तमाम परिभाषाएँ बदलेंगी. अब आप जरा किसी को ये कॉम्प्लीमेंट देकर देखिए – आप आज बहुत यंग लग रहे/रही हैं. वो बंदा आप पर निकल लेगा. आप अप्रत्यक्ष रूप से उसके स्मार्टनेस को कम कर के आंक रहे होते हैं. वो यंग होगा, जवान होगा तो उसकी स्मार्टनेस जाहिर है कम होगी. वो उम्रदराज होगा तो उसकी स्मार्टनेस ज्यादा होगी, वो ज्यादा बुद्धिशाली होगा. तो अब आपको सामने वाले को दूसरी, सही तरह से कॉम्प्लीमेंट देना सीख लेना चाहिए. अब किसी से मिलें तो कहें – आज आप जरा ज्यादा उम्रदराज लग रहे हैं. सामने वाले को खुशी होगी – उसे अपने आप पर, अपनी स्मार्टनेस पर गर्व होगा.

नए तरह के ब्यूटी पार्लर खुलेंगे. पुराने तरीकों, पुराने विश्वासों के पार्लरों की दुकानें पुरानी तकनीक की तरह कालातीत हो जाएंगी और उनमें कोई नहीं जाएगा, या फिर उन्हें अपना धंधा-अपना व्यवसायिक नजरिया बदलना पड़ेगा. उम्र के चंद बढ़े हुए साल की लकीरें माथे पर डालने वाले एजिंग पार्लर खुलेंगे. नाई की दुकानों में बालों में सफेदी की लटें डालने वालों की लाइनें लगा करेंगीं, और एंटीएजिंग क्रीम की जगह फास्टएजिंग क्रीम का प्रचलन चल निकलेगा.

अपने ऑर्कुट प्रोफ़ाइलों को लोग अद्यतन करने लगेंगे. अब वे अपने प्रोफ़ाइल में अपने जवान, यंग दिखने वाले फोटुओं के बजाए कुछ उम्रदराज से दिखाई देने वाले फोटो लगाएंगे ताकि वे ज्यादा स्मार्ट के रुप में पहचाने जा सकें. और इस तरह से उनके हजारों लाखों फैन-फॉलोअर्स बन सकें. क्योंकि अब लोग यंग, जवान चेहरे वाले ऑर्कुटिया पर निगाह डालना बंद कर देंगे. लोग सोचेंगे- ये तो यंग है, जवान है. इसे अभी स्मार्ट होने में अभी चंद वर्षों की देर है. और इसीलिए तमाम लोग फ़ोटोशॉप के इफ़ैक्ट का प्रयोग कर अपने फोटो ज्यादा उम्र के बनाएंगे और ऑर्कुट पर टांगेंगे. और कभी खुदा न खास्ता कभी किसी से प्रत्यक्ष भेंट हो गई तो वे अपने फोटो के बनिस्बत अपने जवान दिखने का राज - कुछ यूं छुपाते फिरेंगे – वो क्या है ना, पिछले हफ़्ते फ़्लू का प्रकोप हो गया था, थोड़ी तबीयत नासाज सी हो गई थी, काया दुबला गई है इसीलिए यंग लग रहा होऊंगा, परंतु मैं हूं उम्रदराज ही. यकीन मानिए. यानी, स्मार्टनेस में कमी का कोई कारण नहीं चलेगा. कतई नहीं चलेगा. उम्र की बात हो तो बिलकुल नहीं.

कोई व्यक्ति किसी जॉब का इंटरव्यू देने जाएगा तो वो अपना स्मार्टनेस बढ़ाने के लिए चेहरे पर थोड़ा झुर्रियाँ डलवा लेगा. भले ही उसका सर्टिफ़िकेट कुछ कहे, मगर अपने व्यक्तित्व में वो उम्र की खेंच डलवाएगा. कुछ अतिरेकी किस्म के लोग अपने सर्टिफिकेटों में अवैध तरीके से उम्र बढ़ाएंगे ताकि वे ज्यादा स्मार्ट समझे जाएँ और इस तरह इंटरव्यू में उनके चुने जाने की संभावनाएँ ज्यादा हों. प्लास्टिक सर्जनों को और सौंदर्य विशेषज्ञों को विशेष पुनश्चर्या कार्यक्रमों में भाग लेना होगा. उन्हें नए तरह की ट्रेनिंग लेनी होगी. जवान काया में उम्रदराजी के चिह्न डालने के.

कंपनियों के ह्यूमन रिसोर्स विभाग को अपनी स्ट्रैटेजी बदलनी होगी. उन्हें अपनी योजना में रातों रात सुधार करने होंगे तभी वो बाजार की दौड़ में बने रह सकेंगे. क्योंकि फिर हर कोई ऐसा कर रहा होगा. कंपनियों के जॉब ऑफ़र्स के विज्ञापनों में चाहिए यंग, डायनॉमिक, स्मार्ट की जगह अब होगा – चाहिए उम्रदराज, डायनामिक. अब वे स्मार्ट नामक टैग को हटा ही देंगे विज्ञापनों में. उम्रदराज जो आ गया है शब्द में. उम्रदराज है तो स्मार्ट तो होगा ही. अब तक यंग के साथ वांछित स्मार्ट लगा रहना जरूरी था. उम्रदराज के साथ स्मार्टनेस फ्री में मिलेगा. अतिरिक्त. चाहे-अनचाहे. और, अब तक तो होता था कि समान योग्यता होने पर युवाओं को चुना जाता था, अब समान योग्यता होने पर उम्रदराजों को चुना जाएगा और शायद ये भी हो सकता है कि कुछ मामलों में उम्रदराजों की कुछ योग्यताओं में कमी भी दिल से स्वीकारी जानें लगेगी – वे ज्यादा स्मार्ट जो होंगे. सेवानिवृत्ति की आयु आगे खिसकेगी तो साथ ही औसत भर्ती की उम्र भी. अब आदमी अपना स्मार्टनेस हासिल करते करते 40 वसंत पार कर लेगा तब एचआर विभाग की नजरें इनायत उस पर होंगीं.

तो, अगर आप अपने आपमें लम्बा, वृहद् वास्तविक स्मार्टनेस चाहते हैं तो जल्दी ही बूढ़ा होना शुरू कर दें. आज, अभी से!

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व्यंज़ल

नज़र बदली है तो वो है उम्र का तकाजा

कोई बदल सका है भला उम्र का तकाजा


उसे मेरी बेवफ़ाई नहीं कहना मेरे सनम

लोग कहते हैं फकत है उम्र का तकाजा


तेरे सिजदे में मेरा सर अब झुकता नहीं

क्या कोई बीमारी है या उम्र का तकाजा


क्रांति की बातें अब समझ में नहीं आतीं

यारों मान भी जाओ ये उम्र का तकाजा


देखो मानने लगा है स्वयं को स्मार्ट रवि

इस सोच के पीछे है बस उम्र का तकाजा

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स्मार्टनेस कहाँ – चिट्ठा लेखक में या चिट्ठापाठक में? एक डॉक्टर में या इंजीनियर में? एक प्रोफ़ेसर में या एक लिपिक में ? ठहरिए, पहले पूरी पोस्ट पढ़िए, फिर बताइएगा.

दैनिक भास्कर में एन रघुरामन् मैनेजमेंट फंडा नाम से नित्य एक कॉलम लिखते हैं जिसमें वे प्रबंधन के गुर बताते हैं. आमतौर पर वे संक्षिप्त में बहुत सी काम की बातें बताते हैं और प्रायः उनमें से अधिकतर उनके स्वयं के अनुभवों से भरे रहते हैं. और अच्छे खासे दिलचस्प होते हैं.

परंतु आज के (इंदौर उज्जैन संस्करण 25 जनवरी 2008) अपने आलेख में उन्होंने प्रोफ़ेशनल स्मार्टनेस की जो बातें कहीं हैं, वे निहायत ही बेतुकी और उनकी सीमित सोच को दर्शाती हैं. या फिर शायद जिस तरह से लोगों की जुबान फिसलती है, वैसी उनकी लेखनी फिसल गई है.

अपने आलेख – स्मार्टनेस कहाँ एमबीए या सीए? में (जो शायद एमबीए कोचिंग संस्था पीटी द्वारा प्रायोजित प्रतीत होती है...) उन्होंने इंटरनेट पर सदियों पुराने टहल रहे और लाखों मर्तबा फारवर्ड किए जा चुके चुटकुले को एमबीए और सीए हेतु जिस तरीके से एडॉप्ट किया है वो किसी भी रूप में सही प्रतीत नहीं होता. और अंत में उनका निष्कर्ष कि “फंडा यह कि एमबीए हमेशा सीए से बुद्धिमान होते हैं” तो किसी सूरत ठीक नहीं है – और वो भी किसी बासी चुटकुले के दम पर निकाला गया निष्कर्ष! इसी चुटकुले के दम पर कल को वे (या कोई भी दूसरा बंदा) यह कह सकते हैं कि डाक्टर इंजीनियर से बुद्धिमान होते हैं (या ठीक इसके उलट!)¡

ये तो वही बात हुई – स्मार्टनेस कहाँ – वकील में या न्यायाधीश में? या फिर स्मार्टनेस कहाँ – चिट्ठा लेखक में या चिट्ठापाठक में?

आप ही बताएँ.

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व्यंज़ल

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इस जमाने में चल सकूं वो स्मार्टनेस कहाँ

कहाँ पर नहीं और दिखाऊं स्मार्टनेस कहाँ


लोग कहते हैं बदल गया है जमाना बहुत

मैं लाऊं गुजरे जमाने का स्मार्टनेस कहाँ


लोग मुझपे हंसते हैं होशियारी दिखाते हो

यूं अभी मैंने दिखाया मेरा स्मार्टनेस कहाँ


कोई तो मुझे भी दुनिया दिखलाओ यारों

आईने में ढूंढा किया हूं मेरा स्मार्टनेस कहाँ


बनाता रहा हूँ मैं अपने रस्ते खुद ही रवि

दूसरों के रस्ते चलूं तो वो स्मार्टनेस कहाँ


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केंद्रीय हिंदी संस्थान – आगरा की पत्रिका – गवेषणा का अक्तूबर – दिसम्बर 2007 का अंक भाषा एवं सूचना प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है. इस अंक में सूचना प्रौद्योगिकी (इनफ़ॉर्मेशन तकनालॉजी) पर कोई 29 आलेख हैं जो पत्रिका के 200 पृष्ठों में समाए हुए हैं. हिन्दी भाषा व फ़ॉन्ट की समस्याओं से लेकर यूनिकोड और हिन्दी इंटरनेट इत्यादि पर लगभग सभी विषयों पर इसमें आलेख हैं. रेडहैट के राजेश रंजन जो कि लिनक्स के हिन्दी में स्थानीयकरण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, ने “भारतीय उप महाद्वीप, स्थानीयकरण आंदोलन और मुक्त स्रोत” नाम से एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है.

चिट्ठाकारी पर भी मेरा एक आलेख छपा है (जिसे कोई छः आठ माह पहले लिखा गया था) जिसका चित्र नीचे दिया जा रहा है. चित्रों पर क्लिक कर उन्हें बड़ा कर आप पढ़ सकते हैं.

पृष्ठ 1 (बड़े आकार में पढ़ने के लिए चित्रों पर क्लिक करें)

पृष्ठ 2

पृष्ठ 3

पृष्ठ 4

पृष्ठ 5

अन्य विवरण व संपर्क:

पत्रिका - गवेषणा

अंक 88/2007

मूल्य - 40/- रुपए

केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा

हिंदी संस्थान मार्ग, आगरा 282005

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छटांक भर सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो लाओ यार...

मेरे कल के चिट्ठाजगत् की सुविधा के बारे में आलेख पर देबाशीष ने तथा जे पी नारायण ने पूरी बातों को खुल कर स्पष्ट कर ही दिया है, मगर फिर भी कुछ मित्रों को मेरी भाषा नहीं जमी. कूड़ा शब्द इस चिट्ठा-प्रविष्टि से उठाया गया है, जो 2006 का है. तब हम चिट्ठाकारों ने एक दूसरे के चिट्ठापोस्टों को कूड़ा कहकर खूब मौज लिए थे और इस बात का किसी ने कोई ईशू नहीं बनाया था. इस बार भी मुझे ऐसा ही लगा था परंतु मैं बेवकूफ़, कमअक्ल, ग़लत था.

रहा सवाल कूड़ा वाली बात का तो ये बात रिलेटिव प्रस्पेक्ट में कही गई थी. और मैंने किसी चिट्ठा विशेष का तो नाम ही नहीं लिया था. जो नाम लिया था वो मेरे खुद के चिट्ठे का नाम था. चूंकि मुझे मेरी स्थिति अच्छी तरह ज्ञात है. मेरे व्यंग्य आलोक पुराणिक के व्यंग्यों के सामने कूड़ा हैं. मेरी ग़ज़ल-नुमा घटिया तुकबंदी जिन्हें मैं व्यंज़ल कहता हूँ किसी भी साधारण सी ग़ज़ल के सामने कूड़ा है. मेरी ब्लॉगिंग प्रतिबद्धता ज्ञानदत्त् पाण्डेय के सामने कूड़ा है क्योंकि नित्य, सुबह पाँच बजे पूजा अर्चना की तरह ब्लॉग लिखकर पोस्ट नहीं कर सकता. अनिल रघुराज और प्रमोद सिंह की तरह न तो मेरे पास भाषाई समृद्धता है न होगी – उनके सामने मेरा लिखा, मेरे अपने स्वयं के प्रस्पेक्टिव में कूड़ा ही है. मेरा तकनीकी ज्ञान देबाशीष, ईस्वामी, पंकज नरूला, अमित, जीतेन्द्र चौधरी इत्यादि के सामने कूड़ा ही है, और इन्हें मुझे स्वीकारने में कोई शर्म नहीं है. यही बात क्यों, मैं अपने पिछले पाँच-दस साल पहले के लिखे को कूड़ा मानता हूँ. मैं अभी उन्हें पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि अरे! मैंने ये क्या कूड़ा कबाड़ा लिखा था. हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने अपनी जवानी में एक रोमांटिक उपन्यास लिखा था. उसे वे कूड़ा मानकर बाद में छपवाए ही नहीं, और बाद में अभी हाल ही में हंस के पाठकों की राय जाननी चाही कि उस भाषायी, कथ्य और रचना की दृष्टि (स्वयं राजेन्द्र यादव की दृष्टि से) से उस कूड़ा को छपवाना चाहिए या नहीं. निराला ने जब पहले पहल हिन्दी में तुकबन्दी रहित, रीतिकालीन छंदबद्ध से अलग रबरनुमा कविता लिखी तो उसे कूड़ा कहा गया. आज छंदों वाली कविता शायद ही कोई लिखता हो...

पर फिर, दिनेश राय द्विवेदी के शब्दों में यही तो ब्लॉगिंग का अपना मजा है!

कूड़ामय ब्लॉगिंग जारी आहे....

व्यंज़ल

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छटांक भर सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो लाओ यार

माना जिंदगी कठिन है कभी तो हंसो यार


जमाना पढ़े या न पढ़े तुम्हें रोक नहीं सकता

कूड़ा लिखो कचरा लिखो कुछ तो लिखो यार


यूँ इस तरह जमाने का मुँह ताकने से क्या

कुछ नया सा इतिहास तुम भी तो रचो यार


ऐसी बहसों का यूं कोई प्रतिफल नहीं होता

पर बहस के नाम पर किंचित तो कहो यार


मालूम है कि लोग हंसेंगे मेरी बातों पे रवि

जब बूझेंगे पछताएंगे जरा ठंड तो रखो यार

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यूं तो (यहाँ हिन्दी माना जाए) ब्लॉग पोस्टों में 80 प्रतिशत कूड़ा कबाड़ा सदैव सर्वदा मिलते रहने की थ्योरी और वाद-विवाद हिन्दी ब्लॉगिंग के पुरातन समय http://hindini.com/fursatiya/?p=119 से ही जारी है, मगर ये बात भी तय है कि कूड़े के कूड़ा-पन की ग्रेविटी दिनोंदिन बढ़नी ही है, भले ही प्रतिशत वहीं पर झूलता रहे.

हाल ही में जे पी नारायण http://behaya.blogspot.com/2008/01/blog-post_2134.html ने इस बात को फिर http://behaya.blogspot.com/2008/01/blog-post_20.html गहराई से उठाया. कुछ इसी तरह की समस्या अशोक पाण्डेय http://kabaadkhaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html#c3007857872533696971 के साथ भी हुई थी. तब अशोक पाण्डेय व जेपी नारायण की बातों पर मेरा कहना था कि आप ब्लॉगिंग के कूड़े फैलने से किसी क़िस्म की रोक नहीं लगा सकते. हाँ, कूड़े-कबाड़ से आप कल्टी मार सकते हैं. आप इस बात पर स्वतंत्र हैं कि आप अपनी नाक कहाँ घुसाएँ – ताकि गंध अपने पसंद, अपने विचारों के अनुरूप हो. और हिन्दी के हर चिट्ठाकार से मेरा यही कहना है. इंटरनेट पर तमाम तरह की तकनीक उपलब्ध है जिससे यह काम किया जा सकता है, और आसानी से किया जा सकता है.

तो, आइए, कूड़ा कबाड़ों को अपने पठन-पाठन से दूर करने के कुछ ठोस उपाय ढूंढें. कुछ ऐसे उपाय ढूंढें जो हमें ये अहसास दिलाएँ कि जैसे इन कूड़ा पोस्टों का वजूद ही न हो. ये हमारी आंखों के सामने ही न आ सकें.

वैसे भी, जब दिन में 100-150 पोस्टें आने लगी हैं और जिनकी संख्या दिन ब दिन बढ़ेंगी तब ऐसे उपाय ही काम आएंगे क्योंकि किसी भी दिए गए दिन, शर्तिया आप 10-15 बेहतरीन पोस्टें ही पढ़ पाएँगे और बेहतर पोस्टों में से और बेहतर पोस्ट ही पढ़ पाएंगे.

तो, लीजिए पेश है आपके लिए #1 सॉलिड उपाय.

  1. चिट्ठाजगत् http://www.chitthajagat.in/ में आप अपना खाता बना लें – यानी अपने को पंजीकृत कर लें यदि आप अभी तक नहीं हुए हैं तो. यदि कोई समस्या है तो सबसे ऊपरी दाएँ कोने पर प्रक्रिया – step-by-step पर क्लिक करें, और बताए अनुसार पंजीकरण करें.
  2. चिट्ठाजगत् में अपने खाते में सत्रारंभ (लॉगइन) कर लें.
  3. चिट्ठाजगत् में सारे टैब पर क्लिक करें. यहाँ आपको पिछले दिनों में प्रकाशित हुए हिन्दी चिट्ठों की सारी प्रविष्टियाँ दिखाई देंगीं. बाजू में दो गुलाबी दिल दिखाई देंगे. आपको बीच वाले दिल को चुनना है जिसमें माउस रखने पर दिखाई देता है – चिट्ठा पसंद करें. वह भी तब, जब कोई चिट्ठा आपकी पसंद का, आपके विचारों का हो. तो अपने पसंदीदा तमाम चिट्ठों के सामने दिए गए बीच वाले दिल पर क्लिक करते जाएँ और इस तरह चिट्ठाजगत में पीछे के पृष्ठों पर जाते जाएँ (शायद चिट्ठाजगत् 10 पिछले पृष्ठों तक की सामग्री दिखाता है.) और एक एक कर अपने पसंदीदा चिट्ठों को पसंद करते जाएँ.
  4. जब आप अपनी पसंद पूरी कर लें (जिसमें आप बाद में और जोड़ सकते हैं) तो फिर बाद में चिट्ठाजगत् में मेरा टैब पर (पृष्ठ में सबसे ऊपरी बाएँ कोने पर) क्लिक करें और अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ें – जिन्हें आपने अपनी रूचि के अनुरूप चुना है. अब चिट्ठाजगत् आपके चुने गए चिट्ठों के अलावा कोई दूसरा चिट्ठा आज के बाद से आपको आपके इस विशिष्ट पन्ने पर नहीं दिखाएगा. अब आप ये शिकायत मत कीजिएगा कि हिन्दी ब्लॉगों में कितना कूड़ा फैला है. कूड़ा सदा सर्वदा रहेगा – सड़क पर भी गड्ढे और गंदगी रहती है. इसका ये अर्थ तो नहीं कि गड्ढों पर से और गंदगी को समेटते हुए जाया जाए. गड्ढे से बचकर और गंदगी से दूर रहकर ही हम सब सड़क पर चलते हैं.
  5. चलिए, हमने चिट्ठाजगत् पर अपने पसंदीदा चिट्ठों का एक पसंदीदा पृष्ठ तैयार कर लिया. अब यदि पसंदीदा चिट्ठा दो पोस्ट के बाद कूड़ा फैलाने लगे तब? मैंने पाया कि चिट्ठाजगत् में एक बग है – वो ये कि वहाँ मेरा पृष्ठ में से चिट्ठों को निकाल बाहर करने की सुविधा अभी नहीं है. जहाँ चिट्ठा पसंद करें लिखा आता है, वहां पर पहले से पसंद किए चिट्ठे में भी चिट्ठा पसंद करें लिखा आता है. उसे चिट्ठा निकाल फेंके होना चाहिए. वैसे, वे ये वादा कर रहे हैं कि शीघ्र ही इसमें और भी सुविधाएँ जोड़ी जाएंगी. तब, उम्मीद करें कि हमें यह बहुत ही आवश्यक, उपयोगी सुविधा मिल जाएगी. चिट्ठाजगत में मेरा चिट्ठाजगत की फ़ीड नहीं है, बल्कि चिट्ठाजगत की मुख्य फ़ीड ही मिलती है. इसे भी सही किया जाना चाहिए. मैं चाहता हूँ कि मुझे मेरे पसंदीदा चिट्ठों की ही फ़ीड मिले – कूड़ा कबाड़ा की नहीं! साथ ही, मेरे जैसे कुछ आराम पसंदों के लिए, यह कार्य कुकी आधारित भी होना चाहिए, पंजीकरण की जरूरत ही न हो. और, यदि जोड़ें के बजाए निकाल बाहर करें विकल्प हो, जो मेरे कूड़ा खण्ड में संकलित होता रहे (छटे चौमासे तिर्यक निगाह डालने के लिए कि क्या पता कुछ अच्छी बातें लिखी जा रही हों, और साथ ही नए नए शामिल किए जा रहे चिट्ठे इवेल्यूएशन के लिए छूटें नहीं) जिसमें दो विकल्प हर विषय वार चिट्ठों में उपलब्ध हो - 'मेरा' व 'कूड़ा' हो, तो और उत्तम!
  6. व्यक्तिगत तौर पर मैं ब्लॉगवाणी http://www.blogvani.com  पसंद करता हूँ – उसके साफसुथरे, आंखों को सुकून देने वाले रूप (अनक्लटर्ड एंड आई कैण्डी) के कारण. परंतु अभी उसमें यह सुविधा नहीं है. मेरी सार्वजनिक मांग है कि यह सुविधा उसमें जोड़ी जाए. और, नारद http://narad.akshargram.com/  जी के क्या कहने – जब वे धमाका करेंगे तो जरूर ही वे ये सुविधा साथ में जोड़ेंगे – क्योंकि जब 5-10 हजार चिट्ठे होंगे तब तो उनमें एक साथ निगाह डालना भी असंभव होगा!

तो, अब हिन्दी चिट्ठों में फैल रहे कूड़े आपकी नजरें इनायत न हों, गैंग वार करने वाले, ग्रुपिज्म फैलाने वाले चिट्ठे आपकी निगाहों में न आएँ तो, फ़ूहड़ विक्षिप्तिया आत्मालापों में रत ‘रविरतलामी के हिन्दी चिट्ठे’ जैसे चिट्ठों को निकाल फेंकिए अपने मेरा चिट्ठाजगत http://mera.chitthajagat.in/ से! आज ही, अभी ही!

और हाँ, अब जबकि हमने आपको हिन्दी चिट्ठों को सलीके से, बिना गंध लिए, पढ़ना सिखा दिया है, आप भविष्य में हमें न गरियाइयेगा कि यहाँ कितना कूड़ा कबाड़ा फैला रहे हो मियाँ!




और इस चिट्ठे के 439!
ये चित्र देखें-


ये फ़ीड बर्नर फ़ीड काउंट के चित्र हैं जो अभी भारतीय समयानुसार 11 बजे दिनांक 19 जनवरी 2008 को लिया गया है. 4389 पाठक संख्या वाला चित्र रचनाकार का है और 439 आंकड़ा वाला चित्र इस चिट्ठे का है.

अगर ये सही है, तो ये तो वाकई कमाल है. परंतु ठहरिये. ये तो सीधा सीधा फ़ीडबर्नर की तकनीकी दिक्कत मालूम देती है. या फिर कोई स्पैमर इन्हें बॉट के जरिए सब्सक्राइ किए जा रहा है. ठंड रखिए. मामला सही होगा तो ये भी सेंसेक्स की तरह मुंह के बल गिरेगा. हिन्दी ब्लॉगों के पाठक इतने नहीं हैं. ये आंकड़ा हासिल करने में कोई पाँच साल और लगेंगे - मेरे चिट्ठे के 439 पहुँचने के लिए. रचनाकार के लिए कोई भविष्यवाणी नहीं, क्योंकि ये तो पाठकों व रचनाकारों का स्थल है.

आपके चिट्ठे को आपके बहुत से पाठक नियमित सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं और गूगल-वर्डप्रेस के डिफ़ॉल्ट आरएसएस फ़ीड में ये बात दिखाई नहीं देती कि ऐसे पाठक कितने हैं. इसे जानने के लिए और तमाम अन्य एनालिसिस तथा पाठकों की सुविधाओं के लिए फ़ीडबर्नर की फ़ीड अलग से कई चिट्ठों पर दी जाती रही है जैसा कि इस चिट्ठे में है. ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निवारण गोष्ठी जो स्काईप के जरिए हुई थी, उसमें सागर नाहर ने अपने चिट्ठे पर फ़ीडबर्नर के चिकलेट व ईमेल से चिट्ठा पढ़ने की सुविधा लगाने में आ रही समस्या के बारे में बताया था. मेरा पन्ना में जीतेन्द्र चौधरी अपने चिट्ठे का वर्ष 2008 के रूझान की बातें करते समय फ़ीडबर्नर जैसी सुविधा अपने चिट्ठे में नहीं रखने के कारण उनके चिट्ठे को नियमित सब्सक्राइबर द्वारा पढ़े जाने वाले आंकड़े नहीं बता पा रहे हैं. यदि उनके चिट्ठे पर फ़ीड बर्नर लगा होता तो वे इस आंकड़े को अवश्य बता पाते.

तो आज नाहर जी की समस्या दूर की जा रही है – परंतु सिर्फ ब्लॉगर के लिए. शायद यह उनके नए तकनीकी दस्तक में काम आ जाए. मैं वर्डप्रेस इस्तेमाल नहीं करता हूँ, अतः ये नहीं कह सकता कि इनमें बताए चरण वर्डप्रेस के लिए काम आ सकेंगे. वैसे, काम आना चाहिए, क्योंकि ज्यादा अंतर नहीं होता. फिर भी, वर्डप्रेस के लिए जीतू जी से आग्रह है कि वे ऐसा ही ट्यूटोरियल लिख कर पाठकों का ज्ञान वर्धन करें, और इसे अपने लोकप्रिय चिट्ठे पर भी लगाएं ताकि लोगों को देख कर इसे लगाने की प्रेरणा मिले.

  1. सबसे पहले फ़ीडबर्नर पर नया खाता खोलें. यदि खाता पहले से है तो साइन इन करें. आपको पहले ही पृष्ठ पर दिखाई देगा – बर्न ए फ़ीड राइट दिस इंस्टैंट. इनपुट बक्से में अपने चिट्ठे का यूआरएल भरें और इसके बाजू में दिए अगला (नेक्स्ट) बटन को दबाएँ. (2)
  1. अगले पृष्ठ पर आइडेंटिफ़ाई पेज सोर्स आएगा जिसमें डिफ़ॉल्ट एटम पर होगा. इसे चाहें तो वैसा ही रहने दे सकते हैं, परंतु आप आरएसएस हेतु नीचे के दूसरे बटन को क्लिक कर चुन लें और अगला (नेक्स्ट) बटन को दबाएँ. (3)
  1. अगले पृष्ठ पर फ़ीड टाइटिल दिखाई देगा. चेतावनी : यदि आपका ब्लॉग शीर्षक हिन्दी में दिखाई दे रहा हो तो इसे अंग्रेज़ी में (रोमन) में बदल लें, नहीं तो सारा ताम झाम बेकार हो सकता है और हो सकता है कि आपकी फ़ीड काम नहीं करे. यहाँ ताज़ा समाचार हिन्दी में दिखाई दे रहा है. इसे मैंने Taza Samachar कर दिया. वहीं पर आपको फ़ीड एड्रेस दिखाई देगा. उसके ठीक सामने इनपुट बक्से पर अपने ब्लॉग को इंगित करता या ब्लॉग नाम डालें. मैंने यहाँ पर taza-samachar डाला है. इस पते को ध्यान से नोट कर सुरक्षित रख लें. जो इस तरह होगा – http://feeds.feedburner.com/taza-samachar यह आपके फ़ीड का नया पता है. अब एक्टिवेट फ़ीड बटन को क्लिक करें. (4)
  1. अगले चरण में नेक्स्ट बटन को क्लिक करें. जो आपको अगले पृष्ठ पर ले जायेगा.(5)
  1. इस पृष्ठ पर आप कुछ अन्य विशेषताओं को जोड़ सकते हैं. परंतु इन्हें बाद में भी किया जा सकता है. अतः यहाँ हम कुछ भी नहीं करते हैं और आगे बढ़ने के लिए नेक्स्ट बटन को क्लिक करते हैं (6)
  1. यहाँ पर आपको कई विकल्प मिलते हैं. चूंकि हम ब्लॉगर की बात कर रहे हैं, अतः यहाँ पर हम कुछ ब्लॉगर स्पेसिफिक सेटिंग करेंगे. वर्ड प्रेस वाले बख़ूबी आगे बढ़ सकते हैं. यहाँ पर रीडायरेक्ट योर ब्लॉगर फ़ीड टू फ़ीडबर्नर फ़ीड नाम के लिंक पर क्लिक करें. इससे आपके ब्लॉग के अब तक के सब्सक्राइबर – यानी नियमित सब्सक्राइब कर पढने वाले पाठकों की संख्या को भी इसमें जोड़ लिया जाएगा. (7)
  1. यहां पर इसके लिए आपको ब्लॉगर में लॉगइन कर सेटिंग करनी होगी. ब्लॉगर में लागइन कर चिट्ठे की सेटिंग में साइट फ़ीड पर फुल विकल्प चुनें (ध्यान रखें कि पूरी फ़ीड देने से ही पाठक ज्यादा मात्रा में सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं) (जिफ1)
  1. यहीं पर पोस्ट फ़ीड रीडायरेक्ट यूआरएल इनपुट बक्से में अपना नोट किया गया पता जो कि इस केस में है - http://feeds.feedburner.com/taza-samachar उसे भरें.(जिफ2)
  1. आपने अब तक अपने चिट्ठे के लिए फ़ीडबर्नर खाता खोल लिया है, फ़ीड बना लिया है और उसे ब्लॉगर से जोड़ लिया है. अब आगे इसके कोड हम अपने चिट्ठे पर लगाते हैं. इसके तीन कोड (कम या ज्यादा भी लगा सकते हैं) लगाने से बेहतर होगा. पहला फ़ीड चिकलेट का जो नारंगी वर्गाकार यूआरएल दर्शाता है, दूसरा फ़ीडबर्नर काउंट का जो आपके पाठकों की संख्या को दिखाता है तथा तीसरा ईमेल से चिट्ठे की ग्राहकी (सब्सक्राइब) लेने का. तीनों के तरीके आमतौर पर एक ही हैं जो कोड द्वारा या विजेट द्वारा संपन्न किए जा सकते हैं. यदि आप विजेट से करना चाहें तो यह और भी आसान है. अब या तो क्रमांक 6 में बताए पृष्ठ पर वापस जाकर या फ़ीड बर्नर पर नए बनाए खाते में क्लिक कर उस फ़ीड की सेटिंग को खोलें तथा पब्लिसाइज बटन पर क्लिक करें. चिकलेट चूज़र पर क्लिक करें (8)
  1. फिर वहाँ पर सबसे नीचे स्क्रॉल करें. चिकलेट का डिफ़ॉल्ट आइकन नारंगी वर्गाकार ही रहने दें. वैसे तो इसे दर्जनों अन्य उपलब्ध चिकलेटों से भी बदल सकते हैं, बस उसके रेडियो बटन को क्लिक कर. फिर जो कोड आपको दिखाई देगा, उसे कॉपी कर लें और ब्लॉगर चिट्ठे के लेआउट में बाजू पट्टी में पेज एलिमेंट चुनकर एड एचटीएमएल स्क्रिप्ट विकल्प चुनकर कोड चिपका दें व टैम्प्लेट सहेज लें. या फिर दूसरा आसान विधि विजेट द्वारा इसे लगाएँ. कोड कापी करने के बजाये यूज एज विजेट इन विकल्प में ड्रापडाउन में ब्लॉगर चुनें और गो बटन को क्लिक करें. (9)
  2. आपको ब्लॉगर के खाते में ले जाया जाएगा जहाँ आपको उस चिट्ठे को चुनने का विकल्प दिया जाएगा जिसमें इसे संस्थापित करना है. चिट्ठे को चुनें और एड विजेट पर क्लिक कर इसे विजेट के रूप में संस्थापित करें (10)
  3. उपर्युक्त 9, 10 तथा 11 चरणों को फ़ीड काउंट तथा ईमेल सब्सक्रिप्शन्स के लिए भी दोहराएं.
  4. लीजिए, हो गया आपका चिट्ठा फ़ीड से पूरी तरह बर्न. और अब ये कुछ ऐसा दिखेगा – (12)

फ़ीडबर्नर बहुत सारे बढ़िया आंकड़े भी दिखाता है. यहाँ सबसे ऊपर प्रदर्शित चित्र मेरे इस चिट्ठे के फ़ीड सब्सक्राइबरों का आंकड़ा, ग्राफ़िकल रूप में है.

और चूंकि गूगल ने फ़ीडबर्नर को खरीद लिया है, तो यह गूगल से बढ़िया इंटीग्रेट हो जाता है. और यदि आपने एडसेंस लगाया हुआ है तो यह आपके फ़ीड को एडसेंस से समृद्ध भी करता है और आपको डालरों – सॉरी सेंटों से (अभी हिन्दी वालों के लिए तो यही मुफ़ीद है,) समृद्ध करता है – है न सोने में सुहागा?

आपने रेशमा की आवाज में वो गाना सुना होगा. अइयो रब्बा कभी प्यार न करना. शायर ने अपनी लेखनी में दर्द तो भरा ही था, रेशमा की दर्दीली आवाज ने उसमें और चार चाँद लगा दिए.

तो जो हाल उस गीत में वर्णित है, यारों, सचमुच वही हाल इधर भी है. आप पीएम बन जाना, सीएम बन जाना, ये बन जाना, वो बन जाना, पर निर्णायक न बनना. और, हिन्दी ब्लॉगों के तो कतई नहीं. बहुत दर्द है यहाँ.

इससे पहले इंडीब्लॉगीज़ में एक बार निर्णायक बना था. तब भी कुछ बातें उठी थीं. मगर इतनी नहीं. एकाध साल बाद देबाशीष ने फिर से निर्णायक बनने के लिए कहा तो मैंने व्यस्तता का बहाना कर टाल दिया था (देबू भाई, शायद आपको याद हो,). इस बार मानस जी के आग्रह को टाल नहीं सका था. और, यदि पुरस्कृतों में दूसरे कोई तीन अन्य नाम होते, इंडिकेटिव सूची में कोई पचीसेक अन्य दूसरे नाम होते, तब भी, यकीन मानिए, बात वही, उसी तरह की होती जो अभी भी हो रही है!

और हद तो ये हो रही है कि आदरणीय ममता जी, जिनका ईमेल पता तक मेरे पास नहीं था, और निर्णय के बारे में उन्हें खबर करने और बधाई देने के लिए मैंने उनका ईमेल पता चिट्ठाकार समूह पर सार्वजनिक पूछा था (लोग तो ये भी कहेंगे कि एलीबी गढ़ रहा है साला!) उनसे जातिगत संबंधों की बातें कही जा रही हैं (जातिवाद ब्लॉगरी में भी लागू है गुरु, अपुन श्रीवास्तव है तो तमाम श्रीवास्तवों को ही तो चुनेगा ना!) – तो यह स्पष्ट कर दूं कि उनसे मेरा संबंध मात्र एक हिन्दी चिट्ठाकार का दूसरे हिन्दी चिट्ठाकार जितना ही है. ये महज संयोग है कि दोनों के जातिनाम श्रीवास्तव हैं. तो ये क्या विजेताओं और निर्णायकों के लिए कोई गुनाह है? मैंने यहाँ पर स्पष्टीकरण दिया है कि ममता जी को चार में से फर्स्ट एमंग इक्वल मान कर और डायस पर एक स्त्री ब्लॉगर को देखने की हम सभी निर्णायकों की अदम्य इच्छा ने उन्हें चुना तो हमने क्या कोई गुनाह किया है?

आज व्यंज़ल की जगह पेश है डिस्को. खालिस दर्दे डिस्को.

बी ए ब्लॉग अवार्ड सेलेक्टर...


हू हू हू ओ या या  या आआआ...

वान्ना मेनी स्लीपलेस नाइट्स?
वान्ना ड्रीडफुल, हांटिंग, हॉरिबल नाइटमेअर्स?
बी ए ब्लॉग सेलेक्टर
बी ए ब्लॉग अवार्ड सेलेक्टर
धम चिका धूम हुम हू हू ओ या या आआआ...
बी ए ब्लॉग अवार्ड सलेक्टर हो हो हो....

वान्ना डिग योर पास्ट?
वान्ना क्वेश्चंड योर कैपेबिलिटीज़?
वान्ना शो योर कास्ट क्रीड एंड क्रेडेंशियल्स?

बी ए ब्लॉग सेलेक्टर

बी ए हिन्दी ब्लॉग अवार्ड सेलेक्टर

धम चिका धूम हुम हू हू ओ या या आआआ...
बी ए ब्लॉग अवार्ड सलेक्टर हो हो हो....

 

वान्ना सी टर्निंग आईज़?

वान्ना सी मोकिंग फेसेस एट यू?

वान्ना मेकिंग फ़न ऑव योर सेल्व?

बी ए ब्लॉग सेलेक्टर

बी ए हिन्दी ब्लॉग अवार्ड सेलेक्टर

धम चिका धूम हुम हू हू ओ या या आआआ...
बी ए ब्लॉग अवार्ड सलेक्टर हो हो हो....

 

वान्ना बैग पार्डन टू एवरी सैन एंड इनसैन?

वान्ना गो एक्स्प्लेनिंग एवरी रैट एंड कैट?

वान्ना मेक योर ब्लॉगिंग लाइफ फुल्ली मैश?

बी ए ब्लॉग सेलेक्टर

बी ए हिन्दी ब्लॉग अवार्ड सेलेक्टर

धम चिका धूम हुम हू हू ओ या या आआआ...
बी ए ब्लॉग अवार्ड सलेक्टर हो हो हो....

धम चिका धूम हुम हू हू ओ या या आआआ...
बी ए हिन्डी ब्लॉग अवार्ड सलेक्टर हो हो हो....

(लिनक्स/यूनिक्स तंत्र का बेहतरीन, लोकप्रिय डेस्कटॉप वातावरण केडीई 4, जिसके हिन्दीकरण के लिए सराय द्वारा स्वीकृत परियोजना पर कार्य जोरों से चल रहा है, जारी किया जा चुका है. इसकी प्रमुख खासियत यह है कि अब इसके सैकड़ों मुफ़्त उपलब्ध अनुप्रयोग विंडोज तंत्र - जी हाँ, आपने सही सुना... विंडोज तंत्र के लिए भी उपलब्ध हैं. यह घोषणा केडीई के मूल साइट पर यहाँ उपलब्ध है जिसे नीचे पुन: उद्धृत किया जा रहा है. आप देखेंगे कि तमाम विश्व में जारी इस घोषणा में भारतीय भाषाएँ छाई हुई हैं - बांग्ला, गुजराती, मलयालम, मराठी, पंजाबी तथा हिन्दी में यह घोषणा हुई है. )

इनमें भी उपलब्ध हैं: अंग्रेज़ी बांग्ला (भारत) कटलन चेक स्पेनी फ़्रांसीसी गुजराती इब्रानी इतालवी लातवियाई मलयालम मराठी पंजाबी पुर्तगाली (ब्राजीलियाई) रूसी डच स्लोवियाई स्वीडिश

केडीई परियोजना प्रस्तुत करता है बेहतरीन मुफ़्त सॉफ़्टवेयर डेस्कटॉप का चौथा प्रमुख संस्करण

अपने चौथे प्रमुख संस्करण के साथ केडीई समुदाय केडीई ४ के युग में प्रवेश कर गौरवान्वित महसूस कर रहा है.

जनवरी ११, २००८ (इंटरनेट).

केडीई समुदाय को यह घोषणा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि केडीई ४.०.० अब उपलब्ध है. यह महत्वपूर्ण संस्करण एक लंबे तथा गंभीर विकास चक्र के अंत का द्योतक है जिसके फलस्वरूप केडीई ४ संभव हुआ तथा साथ ही केडीई ४ के नए युग की शुरूआत हुई.


केडीई 4.0 डेस्कटॉप

केडीई ४ लाइब्रेरियों में सभी क्षेत्रों में बड़े महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं. फ़ोनॉन मल्टीमीडिया फ्रेमवर्क सभी केडीई अनुप्रयोगों में प्लेटफ़ॉर्म से स्वतंत्र रहकर मल्टीमीडिया का समर्थन प्रदान करता है, सॉलिड हार्डवेयर इंटीग्रेशन फ्रेमवर्क उपकरणों (निकाले जा सकने वाले) के साथ आसान संवाद बनााता है तथा बेहतर ऊर्जा प्रबंधन हेतु औजारों को प्रदान करता है.

केडीई ४ डेस्कटॉप में कुछ प्रमुख नई क्षमताएँ आ चुकी हैं. प्लाज़्मा डेस्कटॉप शैल में फलक, मेन्यू तथा डेस्कटॉप विजेटों और डैशबोर्ड फंक्शनों युक्त एक नया डेस्कटॉप इंटरफ़ेस है. केडीई के विंडो प्रबंधनक, केविन में अब उन्नत चित्रमय प्रभाव का समर्थन है जो आपके विंडोज के साथ आसान इंटरैक्शन करता है.

बहुत से केडीई अनुप्रयोगों में भी सुधार किए गए हैं. वेक्टर आधारित कलाकृतियों द्वारा दृश्यमय अपडेट, अंडरलाइंग लाइब्रेरियों में परिवर्तन, उपयोक्ता इंटरफ़ेस में सुधार, नई-नई विशेषताएँ, तथा नए-नए अनुप्रयोग -- आप जो भी चाहेंगे, वो केडीई ४ में मिलेगा. दस्तावेज़ प्रदर्शक ऑकुलर तथा नया फ़ाइल प्रबंधक डॉल्फ़िन ये दो अनुप्रयोग हैं जो केडीई ४ की नई तकनॉलाज़ी को सुस्पष्ट करते हैं.

ऑक्सीजन आर्टवर्क टोली ने डेस्कटॉप में ताज़ी सांस भर दी है. केडीई डेस्कटॉप के सभी भाग जो उपयोक्ताओं को नज़र आते हैं, उनमें सुधार किया गया है. ऑक्सीजन के पीछे ये दो मूल विचार हैं- सुंदरता और सामंजस्यता.

डेस्कटॉप
  • प्लाज़्मा एक नया डेस्कटॉप शैल है. डेस्कटॉप तथा अनुप्रयोगों के साथ इंटरैक्ट करने के लिए प्लाज़्मा फलक, मेन्यू तथा अन्य सहज मेन्यू प्रदान करता है.
  • केविन जो कि केडीई का जाँचा परखा विंडो प्रबंधक है, में अब उन्नत सर्जनात्मक विशेषताएँ हैं. हार्डवेयर एस्सलरेटेड पेंटिंग से विंडोज के साथ आसान व अधिक सहज इंटरेक्शन होता है.
  • केडीई ४ की कलाकृति है ऑक्सीजन. आंखों को लुभाने वाले, सुंदर कलाकृतियों के विचारों को ऑक्सीजन सुसंगत रूप से प्रदान करता है.
केडीई के नए डेस्कटॉप इंटरफ़ेस के बारे में और अधिक जानकारी के लिए केडीई ४.० चित्रमय गाइड पढ़ें.
अनुप्रयोग
  • कॉन्करर केडीई का जाँचा परखा वेब ब्राउज़र है. कॉन्करर हल्का फुल्का है, अच्छे से अंतर्निर्मित है, तथा यह ताजातरीन मानकों जैसे कि सीएसएस ३ का समर्थन करता है.
  • डॉल्फ़िन केडीई का नया फ़ाइल प्रबंधक है. डॉल्फ़िन को उपयोगिता के मद्देनज़र रखते हुए बनाया गया है तथा यह इस्तेमाल में आसान तो है ही, यह बहुत ही शक्तिशाली औजार भी है.
  • तंत्र विन्यास के साथ नया नियंत्रण केंद्र प्रस्तुत किया गया है. केसिसगार्ड तंत्र मॉनीटर - तंत्र के रिसोर्स तथा क्रियाकलापों की देखभाल आसानी से करता है.
  • ऑकुलर, केडीई ४ का दस्तावेज़ प्रदर्शक बहुत से फ़ॉर्मेट का समर्थन करता है. केडीई ४ के बहुत से अनुप्रयोगों में ऑकुलर एक ऐसा अनुप्रयोग है जिसे ओपनयूज़ेबिलिटी परियोजना के सहयोग से उन्नत बनाया गया है
  • शिक्षाप्रद अनुप्रयोग ऐसे पहले किस्म के अनुप्रयोग हैं जो केडीई ४ की तकनॉलाज़ी का पोर्ट कर तथा इस्तेमाल कर बनाए गए हैं. तत्वों का चित्रमय पीरियाडिक टेबल प्रोग्राम केएल्जियम तथा मार्बल डेस्कटॉप ग्लोब शिक्षाप्रद अनुप्रयोगों में से दो ऐसे ही रत्न हैं. शिक्षाप्रद अनुप्रयोगों के बारे में और अधिक जानने के लिए चित्रमय गाइड पढ़ें.
  • बहुत से केडीई खेलों को भी अद्यतन किया गया है. केडीई खेलों जैसे कि केमाइन्स - बम हटाने वाला खेल तथा केपैट - ताश का पेशेंस खेल का रूप सुधारा गया है. इसके लिए नए वेक्टर कलाकृतियों तथा ग्राफ़िकल क्षमताओं को धन्यवाद देना होगा कि अब खेल ज्यादा बेहतर तरीके से तंत्र रीजॉल्यूशन से स्वतंत्र हो चुके हैं.
कुछ अनुप्रयोगों के बारे में और भी विस्तार से केडीई ४.० चित्रमय गाइड में बताया गया है.


फ़ाइल प्रबंधक, तंत्र विन्यास, तथा काम करता हुआ मेन्यू

लाइब्रेरियाँ
  • ऑडियो और वीडियो प्ले करने के लिए फ़ोनॉन, अनुप्रयोगों में मल्टीमीडिया क्षमताएँ प्रदान करता है. आंतरिक रूप से, फ़ोनॉन बहुत से बैकएण्ड का प्रयोग करता है, जो कि रनटाइम पर स्विच हो सकते हैं. केडीई ४ का डिफ़ॉल्ट बैकएण्ड एक्जाइन है जो कि बहुत से फ़ॉर्मेट के लिए बेहतरीन समर्थन प्रदान करता है. उपयोक्ताओं को उनके मल्टीमीडिया की क़िस्मों के आधार पर फ़ोनॉन आउटपुट उपकरणों को चुनाव करने देता है.
  • स्थिर तथा निकाले जा सकने वाले हार्डवेयरों के केडीई अनुप्रयोगों में इंटीग्रेशन के लिए इसका सॉलिड हार्डवेयर इंटीग्रेशन फ्रेमवर्क काम करता है. तंत्र के ऊर्जा प्रबंधन, नेटवर्क कनेक्टिविटी तथा ब्लूटूथ उपकरणों के इंटीग्रेशन में भी सॉलिड का महत्वपूर्ण भाग होता है. आंतरिक रूप से सॉलिड; एचएएल, नेटवर्क प्रबंधक तथा ब्लूएज ब्लूटूथ स्टैक की क्षमताओं को संयोजित करता है परंतु ये अवयव अनुप्रयोगों को तोड़े बगैर, अधिकतम पोर्टेबिलिटी प्रदान करते हुए बदले जा सकते हैं.
  • कॉन्करर, केडीई के वेब ब्राउज़र द्वारा जाल पृष्ठों को दिखाने के लिए केएचटीएमएल रेंडरिंग इंजिन का प्रयोग किया जाता है. केएचटीएमएल बहुत ही हल्का-फुल्का है तता आधुनिक मानकों यथा सीएसएस ३ का समर्थन करता है. केएचटीएमएल ऐसा पहला इंजिन है जो प्रसिद्ध एसिड २ जांच में पास हुआ है.
  • थ्रेडवीवर लाइब्रेरी जो कि केडीईलिब्स के साथ आता है, जो आज के मल्टीकोर तंत्रों के बेहतर इस्तेमाल के लिए उच्च स्तरीय इंटरफेस प्रदान करता है जिससे तंत्र के उपलब्ध रिसोर्सों के इस्तेमाल से ही केडीई अनुप्रयोग बढ़िया और ज्यादा दक्ष प्रतीत होते हैं.
  • ट्रॉलटेक के क्यूटी ४ लाइब्रेरी पर बने होने के कारण, केडीई ४ इस लाइब्रेरी के छोटे फुटप्रिंट का उन्नत दृश्यमय क्षमताओं में प्रयोग कर सकता है. डेवलपरों की आसानी के लिए तथा बड़ी मात्रा में उच्च स्तरीय फंक्शनलिटी प्रदान करने के लिए केडीईलिब्स, क्यूटी लाइब्रेरी को एक बेहतरीन एक्सटेंशन प्रदान करता है.

केडीई के टेकबेस ज्ञान लाइब्रेरी में केडीई लाइब्रेरियों के बारे में और अधिक जानकारियाँ हैं.

चित्रमय गाइड देखें...

केडीई ४.० का चित्रमय गाइड केडीई ४.० के बहुत से नए व उन्नत तकनॉलाज़ी के बारे में एक त्वरित विहंगावलोकन दिखाता है. बहुत से स्क्रीनशॉटों के जरिए, यह आपको केडीई ४.० के विभिन्न भागों के बारे में बताता है तथा आपको उपयोक्ता के लिए किए गए नए सुधारों व नई जोशीली तकनॉलाज़ी की जानकारियाँ देता है. डेस्कटॉप जहाँ से आप प्रारंभ करते हैं, अनुप्रयोग जैसे कि तंत्र विन्यास, ऑकुलर - दस्तावेज़ प्रबंधक तथा डॉल्फ़िन - फ़ाइल प्रबंधक इत्यादि की नई विशेषताओं के बारे में बताया गया है. शिक्षाप्रद अनुप्रयोगों तथा खेलों के बारे में भी बताया गया है.

इसे चलाकर देखें...

यदि आपको इसे चलाकर देखने, इसकी जांच परख करने या इसमें अंशदान करने हेतु पैकेज प्राप्त करने में दिलचस्पी है तो आप इसे बहुत से वितरणों से आप डाउनलोड कर सकते हैं. इन वितरणों में केडीई ४.० पैकेज इसके जारी होने के ठीक बाद से डाउनलोड हेतु उपलब्ध होंगे. पूरी तथा वर्तमान सूची केडीई ४.० जानकारी पृष्ठ से प्राप्त की जा सकती है, जहाँ आपको स्रोत कोड के लिंक, कम्पाइल करने तथा सुरक्षा व अन्य समस्याओं के बारे में जानकारियाँ भी मिलेंगी.

निम्न वितरणों ने सूचित किया है कि केडीई ४.० के पैकेज या लाइव सीडी वे उपलब्ध करवा रहे हैं:

  • आर्कलिनक्स २००८.१ का केडीई४ आधारित अल्फ़ा संस्करण इस रिलीज के ठीक बाद तथा इसके ३ या ४ हफ़्तों बाद अंतिम संस्करण संभावित है.
  • डेबियन केडीई ४.० पैकेज प्रायोगिक शाखा में उपलब्ध हैं. केडीई डेवलपमेंट प्लेटफ़ॉर्म लेनी में भी आ रहा है. इसके बारे में डेबियन केडीई टोली द्वारा घोषणा की प्रतीक्षा कीजिए. अफ़वाहें हैं कि लाइव सीडी के लिए भी प्लानिंग कर ली गई है.
  • फ़ेदोरा में फ़ेदोरा ९ में केडीई ४.० होगा जो कि अप्रैल में जारी होगा, जिसका अल्फ़ा संस्करण २४ जनवरी को जारी होगा. केडीई ४.० पैकेज प्री-अल्फ़ा राहाइड रेपॉसिटरी में हैं.
  • जेंटू लिनक्स केडीई ४.० बिल्ड http://kde.gentoo.org यहाँ दे रहे हैं.
  • कुबुन्टु तथा उबुन्टु पैकेज आने वाले "हार्डी हेरॉन" (८.०४) में केडीई ४.० शामिल होगा तथा "गस्टी गिबॉन" (७.१०) हेतु अद्यतनों के लिए उपलब्ध रहेगा. केडीई ४.० को आजमाने के लिए एक लाइव सीडी भी उपलब्ध कराया जाएगा. और विवरण कुबुंटु.ऑर्ग की घोषणाएँ में देखे जा सकते हैं.
  • मैंड्रिवा २०००८.० के लिए पैकेज प्रदाय करेगा तथा इसका लक्ष्य २००८.१ के ताज़ा स्नैपशॉट के साथ लाइव सीडी तैयार करने का है.
  • ओपनएसयूएसई पैकेज उपलब्ध हैं ओपनएसयूएसई १०.३ तथा ओपनएसयूएसई १०.२ के लिए ( एक क्लिक से संस्थापना हेतु). इन पैकेजों के साथ केडीई ४ लाइव सीडी भी उपलब्ध है. आने वाले ओपनएसयूएसई ११.० रिलीज में केडीई ४.० शामिल रहेगा.

केडीई ४ के बारे में

केडीई ४.० एक नायाब, मुफ़्त सॉफ़्टवेयर डेस्कटॉप है जिसमें रोजाना के इस्तेमाल के लिए तथा विशिष्ट प्रयोगों के लिए भी ढेरों काम के अनुप्रयोग हैं. प्लाज़्मा नाम का एक नया डेस्कटॉप शैल केडीई ४ के लिए विकसित किया गया है जो कि डेस्कटॉप तथा अनुप्रयोगों के बीच संवादों के लिए एक नए, सहज किस्म का इंटरफेस प्रदान करता है. कॉन्करर वेब ब्राउज़र वेब को डेस्कटॉप के साथ एकीकृत करता है. डॉल्फ़िन फ़ाइल प्रबंधक, ऑकुलर दस्तावेज़ प्रदर्शक तथा तंत्र विन्यास नियंत्रण केंद्र मिलकर मूलभूत डेस्कटॉप सेट को पूरा करते हैं.
केडीई को केडीई लाइब्रेरियों पर बना है जो केआईओ तथा क्यूटी४ के उन्नत प्रदर्शन क्षमताओं के बल पर नेटवर्क में संसाधनों पर पहुंच को आसान बनाते हैं. फ़ोनॉन तथा सॉलिड जो कि केडीई लाइब्रेरी के भाग हैं सभी केडीई अनुप्रयोगों में मल्टीमीडिया फ्रेमवर्क तथा बेहतर हार्डवेयर एकीकरण प्रदान करते हैं.

(मूल आलेख यहाँ पढ़ें)


2007 के प्रारंभ में सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव की संभावनाओं को देखते हुए हमेशा की तरह कुछ वार्षिक भविष्यवाणियां की गई थीं जिनमें कुछ तो पूरे हुए और कुछ का तो पता ही नहीं चला. सबसे बड़े असफल भविष्यवाणियों में से एक - गूगल के कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम के 2007 में अवतरण की अटकलों को माना जा सकता है जो कि अंततः महज कोरी कल्पना ही सिद्ध हुई. मगर यह कोरी कल्पना 2007 के अंत तक आते-आते गूगल के मोबाइल फ़ोनों के लिए मुक्त स्रोत के ऑपरेटिंग सिस्टम एंड्राइड के नाम से अंततः परिवर्तित रूप में फलीभूत हो ही गई. अब देखना यह है कि एंड्राइड आने वाले वर्षों में क्या गुल खिलाता है. वैसे, ये बात तो तय है कि आने वाले वर्ष मोबाइल कम्प्यूटिंग के ही होंगे, क्योंकि हर व्यक्ति के जेब में अब एक अदद मोबाइल फोन अब वक्त की जरूरत बन चुकी है.

वर्ष 2007 के कुछ सबसे बड़े फ़्लॉपों की सूची में माइक्रोसॉफ़्ट का विंडोज विस्ता अपने आप को शामिल रखने में सफल रहा है. हालाकि यह नवंबर 2006 में जारी हुआ था, मगर इसे 2007 का उत्पाद कहना उचित होगा. सीनेट और जेडडीनेट से लेकर टेक-रिपब्लिक और पीसीवर्ल्ड तक की 2007 की शीर्ष फ्लॉप सूचियों में विंडोज विस्ता मौजूद है. कारण अनेक हैं, और हर एक के अपने अलग हैं. यदि उपयोक्ता अपने नए नवेले कम्प्यूटरों के साथ आए पूर्व संस्थापित विंडोज विस्ता को निकाल कर विंडोज एक्सपी पर वापस जा रहे हैं तो फिर तो यह कहा ही जा सकता है कि निश्चित ही यह फ़्लॉप रहा है. विंडोज विस्ता के फ्लॉप रहने के कुछ प्रमुख वजहों में शामिल हैं – अत्यधिक उन्नत हार्डवेयर की आवश्यकता तथा विंडोज विस्ता में पुराने अनुप्रयोगों, प्रोग्रामों व हार्डवेयरों के समर्थन का सर्वथा अभाव. देखना दिलचस्प होगा कि 2008 में आने वाले सर्विस पैकों के जरिए विस्ता की इन खामियों को किस हद तक दूर किया जाता है और यह अपना स्थान बना पाने में सफल होता है या नहीं. दूसरी तरफ लिनक्स कई क्षेत्रों में सफल रहा. इस ऑपरेटिंग सिस्टम में उन्नत 3डी डेस्कटॉप संभव हुआ और लिनक्स के अनगिनत, सैकड़ों संस्करण जारी हुए और इनमें से कुछ विशिष्ट संस्करणों ने आम प्रयोक्ताओं के डेस्कटॉपों में अपनी जगह बनाई. विश्व की सबसे ज्यादा पर्सनल कम्प्यूटर बेचने वाली कंपनी डेल ने भी उबुन्टु लिनक्स संस्थापित कम्प्यूटर व लैपटॉप बेचना प्रारंभ किया.....

आगे पढ़ने के लिए यहाँ चटखा लगाएँ...

(ऊपर का चित्र साभार सीआईओ टुडे)


बहुत-बहुत धन्यवाद इस शोध का. आभार, इस नए अध्ययन निष्कर्ष का. अब मैं अपनी असफलता का ठीकरा अपने जीन के सिर पर फोड़ सकता हूँ. किसी भी असफल काम के लिए, अब मैं अपने जीन को जिम्मेदार ठहरा सकता हूँ.

वैसे भी, जब किसी शिशु का जन्म होता है, लोग नवजात को देखते ही बोलते हैं – यह अपनी मां/पिता पर गया/गई है. कभी-कभी दादा-दादी या नाना-नानी की प्रतिकृति भी दिखाई देने लगती है, और कभी किसी टिप्पणी से ये भी आभास हो सकता है कि जैसे जेनेटिक गुण पड़-पड़दादा से भी ट्रांसफर हो के चले आ रहे हों.

तो, अब मैं पूरी तरह रिलेक्स हो गया हूँ. अपनी असफलताओं के पीछे अब तक मुझे बड़ा टेंशन होता था. अपने आपको मैं कोसता रहता था. अपनी अलाली, अपनी अकर्मण्यता, अपनी कूपमण्डूकता और न जाने क्या क्या के लिए मैं शर्मिंदा रहता था और सोचता कि अब मैं आगे से और अधिक मेहनत करूंगा, अपने आलस्य को छोड़कर सफलता के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊंगा.

मगर इससे होता क्या. वही होता जो मंजूरे जीन होता. और जो होता आया है, और जो मुझे अब पता चला है – मेरे अब तक के सफलताओं-असफलताओं, आचार-व्यवहार-विचार के लिए निगोड़ा मेरा ये जीन जिम्मेदार है. अब जबकि मुझे पता चल गया है कि मेरे पर्सोना से लेकर मेरे उठने बैठने के अंदाज और सिर के झड़ते बालों से लेकर सार्वजनिक जीवन में सफल-असफल होने तक में मेरे जीन का हाथ है, तो फिर किस बात का टेंशन.

अब मैंने अपना टेंशन खत्म कर दिया है. मुझे मालूम हो गया है कि अब तक जो होता आया है और आगे जो होता रहेगा उसके लिए मैं नहीं, मेरा जीन जिम्मेदार है. और, जीन को तो मैं बदल नहीं सकता – जब तक कि ऐसे वैज्ञानिक आविष्कार न हो जाएँ कि आदमी अपना जीन बदलने लगे – (तब फिर मैं सर्वाधिक सफल बनने वाले ब्रेड पिट, टॉम हैंक्स या अंबानीज़-मित्तल्ज़ के से जीन, अपने में डलवा लूंगा,) तब तक तो रिलेक्स. फुल रिलेक्स.

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माट्साब की क्लास मैं ध्यान से अटेंड करता रहा था. नए साल पर (जिसमें मैंने नया-नया कुछ देखने की खूब कोशिश की थी, और असफल रहा था - शायद ये भी जीन का असर रहा हो...) माट्साब ने मुशायरा आयोजित किया था. उसके लिए मैंने दो व्यंज़ल रचे थे जो कि जाहिर है उन मापदण्डों पर खरे नहीं थे अतः मुशायरे में अपना स्थान बनाने में असफल रहे थे...

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व्यंज़ल 1

लोग तो कहेंगे कि है भी ये कोई ग़ज़ल

परंपराएं तोड़ने पर बनती है इक ग़ज़ल


जमाना चपलता से कुछ यूं बदल गया

मोहब्बतों से प्रकाशवर्ष दूर हो गई ग़ज़ल


सच मानें तो वो भी एक दंगा फसाद था

उस भीड़ में यूँ हमने भी गाई थी ग़ज़ल


जुमलों की जमावटें करें तो किस तरह

मेरी कराहों से बने तो बने कोई ग़ज़ल


रवि है अपना शागिर्द खुद उस्ताद खुद

मेरी ग़ज़ल को माने न माने कोई ग़ज़ल

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व्यंज़ल 2

नए साल पर है मेरी ग़ज़ल

कायदों से परे है मेरी ग़ज़ल


यूँ रस्ते तो बहुत गुजरते हैं

नई पगडंडी पे है मेरी ग़ज़ल


न मुहब्बत और न मजहब

नए खयालात है मेरी ग़ज़ल


तुम्हारी वो कल की बात थी

आने को कल है मेरी ग़ज़ल


रवि ने कहा वो कहता रहेगा

भले ही बेकार है मेरी ग़ज़ल


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दिनांक 5 जनवरी 2008 शनिवार की ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निवारण गोष्ठी के संबंध में एक मित्र ने पूछा –

रवि भाई
स्काईप गोष्ठी का क्या रिस्पांस रहा। आपके चिठ्ठे पर भी इसका कोई विवरण नहीं है, क्या आप इस पर एक रपट भेज सकते हैं...
सधन्यवाद

---.
मेरा उत्तर था-

भाई जी,
स्काईप गोष्ठी घोर असफल रही. आयोजक और मेरे अलावा सिर्फ सागर नाहर ही पहुँचे. अब या तो चिट्ठाकारों को कोई समस्या ही नहीं रही या फिर उन्हें स्काइप का प्रयोग करने में समस्या रही :)
तो, इसकी रपट क्या बनेगी. और इसीलिए चिट्ठे पर विवरण भी नहीं है ;)

बहरहाल, आयोजक श्री प्रतीक शर्मा को बहुत बहुत धन्यवाद एवं श्री सागर नाहर का अत्यंत आभार जिन्होंने शामिल होकर इस आयोजन की लाज तो रखी... :)

(श्री दिनेश राय द्विवेदी एवं श्री रामचंद्र मिश्र तकनीकी कारणों से कनेक्ट नहीं हो पाए, जिसका अफ़सोस है)

इस पर उनका प्रत्युत्तर आया –

मुझो तो अफसोस से ज्यादा खुशी इस बात की है कि आपने इतने आगे की सोची, आप क्या समझते हैं कि कोई भी नया प्रयोग पहले दिन ही सफल हो जाता है...

तो, चलिए, इस ऑनलाइन चिट्ठा समस्या गोष्ठी की इस असफलता का ठीकरा भी जीन पर फोड़ते हैं – चिट्ठाकारों के जीन पर!

--------.

व्यंज़ल 3

लीक से हट के चलना तो मेरे जीन में है

किसी रूटीन से बच के जीना रूटीन में है


यूँ तो कब्र में लटके हैं अपने पाँव मगर

हमने अपने को अब भी माना टीन में है


ये तो पता है कि सांपों के कान नहीं होते

मगर, जाने क्या जादू संपेरे के बीन में है


सियासतों का दौर अब कुछ ऐसा चला है

निर्मम अपराधी हर जगह, हर सीन में है


नए जमाने में परिभाषाएँ कुछ यूँ बदलीं

गिना जाता वो जाहिल रवि जहीन में है

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चिट्ठे में विजेट कैसे लगाएँ?

चिट्ठे में एडसेंस कैसे लगाएँ?

चिट्ठे में चित्र कितने आकार का लगाएँ?

फ़ॉन्ट परिवर्तन कैसे करें?

शुषा कृति देव से मंगल में कैसे बदलें?

सबसे सरल रूप में हिन्दी कैसे टाइप करें?

ये कैसे करें, वो कैसे करें.....

इन सबका समाधान आज दिनांक 5 जनवरी 2007 को ऑनलाइन चिट्ठा समस्या गोष्ठी में भारतीय समयानुसार, दोपहर 3 से 5 बजे प्रस्तावित है.

विस्तृत जानकारी यहां देखें.

आप सभी सादर आमंत्रित हैं

अद्यतन - अब से कोई पौन घंटे बाद भारतीय समयानुसार दोपहर तीन बजे गोष्ठी प्रारंभ हो रही है. स्काइप में इस गोष्ठी में शामिल होने के लिए निम्न नंबर डायल करें. यदि कोई समस्या हो तो बाजू पट्टी में सी-बॉक्स में ऑनलाइन संदेश दें

स्काइप पर डायल करने का नंबर +9900111759345403406

वाह! मनी.

जी हां, पैसा. और इस बात को फिर से, गंभीरता से बताया जा रहा है वेब-दुनिया में. इस दफ़ा वेब दुनिया में ब्लॉग चर्चा में अवतरित हुआ है कमल शर्मा का ब्लॉग वाह मनी.

ब्लॉग चर्चा में कमल शर्मा का विस्तृत साक्षात्कार भी प्रकाशित हुआ है – जिसमें वे बता रहे हैं कि किस तरह अपने ब्लॉग -  वाह मनी के माध्यम से सौ लोगों को करोड़ पति बनाने का लक्ष्य उन्होंने रखा है. और, पंद्रह तो रास्ते पर पहले से ही हैं. तो यदि आप भी अभी करोड़ पति नहीं हैं, और बनने की इच्छा रखते हैं तो सबसे पहला काम आपको क्या करना है?

क्या इसे भी बताने की आवश्यकता है?

प्रत्येक हिन्दी चिट्ठाकार को निम्न दस संकल्प लेने चाहिएँ. ये संकल्प उन्हें चिट्ठासंसार में प्रसिद्धि, खुशहाली व समृद्धि दिलाने में शर्तिया मददगार होंगे.

  1. मैं टिप्पणी करूंगा – हर तरह की, हर किस्म की, नियमित, नामी-बेनामी-सुनामी-कुनामी. शुरुआत इस चिट्ठे पर टिप्पणी देकर कर सकते हैं. प्रति दस टिप्पणियों पर एक प्रति-टिप्पणी की गारंटी, तथा साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस चिट्ठे पर टिप्पणी प्रदान करने पर सफलता की संभावना अधिक है.

  2. मैं नित्य कम से कम एक चिट्ठा पढूंगा – ठीक है, प्रतिदिन सौ दो सौ चिट्ठे प्रकाशित होने लगे हैं और इनकी संख्या 2008 में एक्सपोनेंशियली बढ़नी ही है और एक पाठक के रुप में कोई भी इनमें से सभी पोस्टों को अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पढ़ सकता मगर वो रोज कम से कम एक, इस चिट्ठे को तो पढ़ ही सकता है. तो, अच्छे प्रतिफल के लिए अपने संकल्प में इस चिट्ठे की हर प्रविष्टि को पढ़ने में अवश्य शामिल करें

  3. मैं सप्ताह में कम से कम एक पोस्ट लिखूंगा. वैसे तो कोई भी हिन्दी चिट्ठाकार नित्य न्यूनतम चार पोस्ट (अमित अग्रवाल और डेरेन रोज़ इसीलिए सफल हुए हैं, पर वो अंग्रेज़ी की बात है) ठेल सकता है, मगर अजर गजर टेबल राइटिंग से बनती बात बिगड़ सकती है, या रोज लिखने पर लेखन मसाला कोई छः महीने में खतम होने की संभावना है या राइटर्स ब्लॉक के घेर लेने की आशंका है... वैसे, इस चिट्ठे को लिंक करते हुए या इसकी सामग्री के बारे में बात करते हुये नित्य लिखेंगे तो सामग्री की कमी नहीं पड़ेगी, हिट मिलने और सफल होने की संभावना भी जरा ज्यादा रहेगी.

  4. मैं फोरमों, सोशल नेटवर्किंग (ऑर्कुट, फेसबुक इत्यादि), ईमेल समूहों में नित्य प्रति चिट्ठों की बातें करूंगा. पर अपने चिट्ठे की नहीं. दूसरों के चिट्ठे की. जैसे ही आपने अपने चिट्ठे की बात करने की ग़लती की तो आपको बहिष्कृत कर दिया जाएगा. जब आप दूसरों के चिट्ठों की बातें करेंगे तो लोग आपकी तारीफ़ करेंगे. बोलेंगे देखो बंदा क्या मसाला खोज कर लाया है – वाह! वाह! साधुवाद!. आप यदि इस चिट्ठे के प्रविष्टियों की चर्चा नियमित रूप से, बढ़ा-चढ़ा कर करेंगे तो लाभ होने की संभावना द्विगुणित है.

  5. मैं हर तीसरी पोस्ट में कोई नई युक्ति, नई टिप, नई बात बताऊंगा. आप देखेंगे कि त्वरित पैसा बनाने की युक्ति या ब्लॉग हिट होने की युक्ति वाली पोस्टें कितनी हिट हुआ करती हैं. इंस्टैंट सफल युक्तियों के लिए इस ब्लॉग की प्रविष्टियों से आइडिया (जो कि जाहिर है, अंग्रेज़ी ब्लॉगों से उड़ाए हुए होते हैं,) उड़ा सकते हैं और उसे अपने एंगल से अपने हिसाब से पोस्ट कर सकते हैं या उसका खंडन कर सकते हैं.

  6. मैं महीने में कम से कम एक “एम” फ़ैक्टर वाला विवादित पोस्ट करूंगा. मोदी, मोहल्ला... मीका-राखी सावंत याद है? विवाद से त्वरित प्रसिद्धि मिलती है. फिर आप उसे ताउम्र भुनाते रहिए. विवाद प्रारंभ करने के लिए धर्म आधारित चिट्ठा प्रविष्टि का तो ख़ैर कोई तोड़ ही नहीं है. विवादों के लिए इस चिट्ठे की हिन्दी-अंग्रेजी युक्त घालमेल की हुई हिंगिलिश भाषा को भी समय समय पर उठा सकते हैं, जो किसी भी एम फ़ैक्टर से ज्यादा लाभ देने की ताक़त रखते हैं. यक़ीन न हो तो आजमा कर देख लें.

  7. मैं घोर व्यवसायिक बनूंगा. हिन्दी चिट्ठों का इतिहास गवाह है - एकाध फुरसतिया जैसे उदाहरणों को छोड़ दें जो निस्पृह भाव से पोस्टें भी लगातार लिख रहे हैं और चिट्ठा चर्चा भी किए जा रहे हैं - अव्यावसायिक चिट्ठाकार कितने ही आए, और चार छः महीने में झांकी दिखाकर चले गए. यह तो ब्लॉग हेडर के नीचे एडसेंस के दो-दो विज्ञापन हैं जो चिट्ठाकार की मानसिक हलचल को नित्य निखारते हैं, और बनाए भी रखते हैं. इस चिट्ठे का ही उदाहरण देख लें – चिट्ठे के हेडर के ऊपर विज्ञापन ठुंसा पड़ा है जो इस चिट्ठे को, इस चिट्ठाकार को ऊर्जा देता है. यकीन मानिए, एडसेंस का एक एक सेंट एक से एक धांसू पोस्ट लिखने के लिए आपको ऊर्जावान बनाता है और बनाता रहेगा. और, यदि आप सचमुच के संत हैं, तो इस चिट्ठाकार का एडसेंस अपने चिट्ठे पर प्रयोग करें. इससे और अधिक चिट्ठा समृद्धि प्राप्त होगी. कोड के लिए शीघ्र संपर्क करें.

  8. मैं तमाम विजेट लगाऊंगा – सीधी सादी सरल चीजें किसी को भी नहीं लुभातीं. मिर्च मसाला युक्त, साज सजावट युक्त, अलग हटकर, सजे धजे चिट्ठे पाठकों को आकर्षित करते हैं. गानों के, गर्मागर्म फोटो के, यूट्यूब वीडियो के, ताज़ा समाचारों के, ब्लॉग प्रविष्टियों के, सुडोकू पहेलियों के और नामालूम क्या क्या विजेटों से अपने चिट्ठे के बाजू पट्टी को भर दें. फिर देखें – आपकी प्रविष्टि धांसू हो या घटिया, पाठक विजेटों के नाम से खिंचे चले आएंगे और यहीं जमे बैठे रहेंगे. सबसे बढ़िया, टाइम टेस्टेड आइडिया तो यह है कि इस चिट्ठे की फ़ीड का विजेट लगाएं. फिर किसी अन्य विजेट की आपको आवश्यकता ही नहीं होगी क्योंकि इस चिट्ठे को जादू-टोने से अभिमंत्रित किया गया है जो चिट्ठों को संपूर्ण सफलता प्रदान करता है.

  9. मैं टैगियाऊंगा. टैग बेबी टैग. अपने चिट्ठे की हर प्रविष्टि को टैग से भर दें. लिखें राम पर, परंतु टैग लगाएँ रहीम पर. चिट्ठा प्रविष्टि हो 250 शब्दों की, परंतु टैग हो 500 शब्दों के. अपनी चिट्ठा प्रविष्टि, अब चाहे वो जिस विषय पर हो, उसमें ब्रिटनी स्पीयर्स प्रैगनेंट, पैरिस हिल्टन न्यूड इत्यादि के टैग लगाएँ फिर देखें आपकी चिट्ठा प्रसिद्धि का जादू. वैसे, ज्यादा अच्छी और हिन्दी ब्लॉग जगत में वास्तविक सुख-समृद्धि-प्रसिद्धि के लिये इस चिट्ठे से संबंधित टैग लगाएँ. जैसे कि रवि रतलामी हिन्दी चिट्ठा हिन्दी ब्लॉग इत्यादि.

  10. मैं उपर्युक्त सभी 9 संकल्पों का कड़ाई से पालन करूंगा, वर्ष भर.

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