सड़ने के लिए, क्या अब भी, सचमुच, कुछ बाकी बचा भी है योर ऑनर?

sadti hui nyaya pranali

शायद नहीं.
मैं, अपना स्वयं का उदाहरण देना चाहूंगा.
रतलाम में बिजली चोरी का एक प्रकरण बनाया गया था. सालों पहले – शायद सात-आठ साल पहले. उस प्रकरण में मेरी भी गवाही थी चूंकि बिजली के मीटर की टेस्टिंग मेरे ऑफ़िस से की गई थी. बाद में मैंने नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी 2003 में. न्यायालय में तब तक केस की सुनवाई ही नहीं हुई. पिछले वर्ष 2007 में ताबड़तोड़ तिथियाँ लगने लगीं – शायद यहाँ के कोर्ट में कोई स्पेशल ड्राइव (उसके बगैर शायद कोई काम नहीं होता...) चलाया गया था. मैं कोई तीन पेशियों पर गया, मगर कभी वकील के नहीं रहने से, तो कभी किसी और वजह से गवाही ही नहीं हो सकी.

पिछले दिनों मेरे भोपाल निवास पर एक हेड कांस्टेबल वारंट लेकर उपस्थित हुआ. वो ठेठ रतलाम से सिर्फ और सिर्फ इसी काम के लिए आया था. वो उसी बिजली चोरी के प्रकरण में गवाही की सूचना देने आया था. मैंने उससे पूछा कि आज के इलेक्ट्रॉनिक जमाने में आप स्वयं क्यों आ गए. इसकी प्रतिलिपि स्थानीय पुलिस को देते तो वहां से भी यह मुझ तक पहुँच जाता. मुझे फोन, फैक्स पर या ईमेल से सूचना देते तब भी बात बन सकती थी. रजिस्ट्री डाक, स्पीड पोस्ट या कूरियर से तो दूसरे-तीसरे दिन सूचना की डिलीवरी हो सकती थी.

मगर ये बातें कांस्टेबल की समझ में नहीं आईं. वो बोला – साहब, कोर्ट का मामला है. वहां तो ऐसे ही चलता है!

कोर्ट के वारंट से भय खाकर मैं गिरता पड़ता, आठ घंटे की निहायत तकलीफ़देह यात्रा पूरी कर नियत समय पर रतलाम पहुँचा तो पाया कि जज आकस्मिक अवकाश पर हैं.

गवाही उस दिन भी नहीं हो सकी. यूँ लगा शायद अपराधी मैं होऊं और सज़ा मुझे मिल रही है.

 

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व्यंज़ल
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सारा कुछ तो सड़ गया
जो चलता था अड़ गया

सबकी आँखों का तारा
मेरी आँख में गड़ गया

मरता क्या न करता
मैं भी पैरों पे पड़ गया

नहीं थी फितरत मेरी
जाने कैसे मैं लड़ गया

जमाने की मार से रवि
सूखे पेड़ सा झड़ गया

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टिप्पणियाँ

  1. वाकई इतनी सड़ांध है कि कोई पास भी फटकना नहीं चाहता। हमारा क्या हम तो वहीं रहने के लिए अभिशप्त हैं।

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  2. कदाचित्‌ इसलिए बड़े बुज़ुर्ग लोग बरसों से कहते आ रहे हैं कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पड़ व्यक्ति धोबी का कुत्ता बन जाता है जो न घर का रहता है न घाट का!!

    लोकतंत्र और तानाशाही में यह अंतर है कि तानाशाही में कम से कम एक दो व्यक्तियों के सिर दोष मढ़ा जा सकता है लेकिन लोकतंत्र में किसको पकड़ें यही समझ नहीं आता, पूरा तंत्र ही रोगग्रस्त है।

    यह भी एक कारण है कि किसी भी मामले में कोई व्यक्ति गवाही नहीं देना चाहता, कचहरी के किसी मामले से ताल्लुक नहीं रखना चाहता; जो एक बार जाल में फंस गया उसकी शामत आ जाती है, वादी और प्रतिवादी की चाहे आए या न आए!! :(

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  3. देश ने, काम करने के लिए प्रक्रिया तय की थी । आज तो प्रक्रिया पूरी करना ही एक मात्र (शायद सबसे बडा) काम रह गया है ।

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  4. श्री रवि जी,
    पढ़कर मन में आक्रोश हुआ, ऐसा लगा क्या सच कहना या सच का साथ देना सजा होता है ऐसी ही कुछ बातें हैं जिन्हें मैं अपने ब्लाग पर जल्द ही उपलब्ध कराने का प्रयत्न करूंगा।

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  5. बिल्कुल सही-साट लिखा है।

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  6. जो समय के साथ बदलेगा नहीं, सड़ जायेगा.

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  7. यदि सूखे पेड़ सा झड़ गया
    तो समझो मामला बिगड़ गया |

    हिम्मत रखिये |

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  8. बहुत कटु सत्य लिखा है आपने ! हमारी न्यायीक परिपाटी में ही कुछ फेर बदल की आवश्यकता है ! वर्तमान में तो आपको यह दंश झेलना ही पडेगा ! कोई भी आपको राहत ये परम्परा नही देगी ! आपका व्यंजल बहुत लाजवाब है ! बहुत शुभकामनाएं आपको !

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  9. You have done good work, I see. I don't read Hindi very well, but your profile is impressive.

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  10. is des ke kanoon vavastha bakwas hai, mere father ka ek case pichle 18 salo se chal raha hai, kabhi number nahi aata, to kabhi judge sahab chutti pe hote hai, to kabhi meeteeing mai hote hai to kabhi koi judge mer gaya ho to reference me hote hai, kabhi hamare vakil sahab ko time nahi hota to kabhi samane wale vaikl ke pass time nahi hota, kabhi chutti hote hai to kabhi vakalion ke strike. pichle baar to 2005 mai last date aai thi uske baad abhi tak nahi aai.

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  11. जमाने की मार से सूखे पेड़ सा झड़ गया -झड़ क्या गया हुज़ूर निर्जीब सा जमीन पर ही गिर गया ,जमाने वाले जिसे देख कर ठोकर मरकर कोई लाँघ कर ,कोई किनारे से बच कर निकलता चला जा रहा है =लड़ना किसी की फितरत नही होती मगर मजबूरियों में आदमी अपनी प्रकृति के विपरीत भी काम कर जाता है =फितरत के विपरीत लड़ गए तो लड़ गए अब क्या शिकवा और क्या गिला

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