December 2007


· नया साल नई समस्याएँ लेकर आता है.

· नया साल सर्वथा नवीन, नूतन समस्याएँ लेकर आता है.

· नया साल पुराने संकल्पों को ही लेकर आता है.

. नए साल के संकल्प जिस गंभीरता से लिए जाते हैं वे उससे ज्यादा गंभीरता से निभाए नहीं जाते.

· नए साल में पुराने संकल्प ज्यादा गंभीरता से लिए जाते हैं और वे उसी गंभीरता से निभाए नहीं जाते.

· नए साल के नए संकल्पों का भी आमतौर पर वही हश्र होते हैं जो आपके पिछले संकल्पों के हुए थे.

· नए साल के नए संकल्प लेने में आसान परंतु निभाने में असंभव होते हैं.

· नए साल की पहली सुबह हमेशा हैंगओवर लेकर आती है.

· नया साल भी पुराने साल की तरह गुजरता है.

· नया साल पुरानी चीजों को ही लेकर आता है.

· नए साल में भी आपके विचार कोई जादू नहीं करेंगे.

· नया साल आता बहुत देर से और गुजरता बहुत जल्दी से है.

· नए साल में प्रगति निश्चित है – टैक्सेशन में, प्रदूषण में, महंगाई में, वायरस में, स्पैम में...

· नए साल में नए विचार आएंगे जो पहले के विचारों की तरह ही, काम नहीं करेंगे.

· नए साल के बीतने का अनुभव भी पुराने साल जैसा ही रहेगा.

· मुस्कुराएँ. नया साल क्रूर होता है.

· किसी भी दिए गए व्यक्ति के अच्छे-अच्छे नए साल तो पहले ही बीत चुके होते हैं.

· समय गुजरता जाता है, (नए) साल एकत्रित होते जाते हैं.

· नए साल की दिशा पुरानी जैसी ही होती है और उसे जितना बदलने की कोशिश की जाती है वो उतनी ही तीव्रता से पुरानी दिशा पर चलती है.

· नए साल में भी खुशियाँ नहीं खरीदी जा सकेंगी.

· नए साल में आप नए नहीं हो जाते.

· नया साल प्रायः हर एक के लिए अनुकूल होता है परंतु वो अगले के अगले साल आता है.

· शुक्र मनाएँ कि बुरा साल गुजर गया. बहुत बुरे साल नए सालों में ही आते हैं.

· नए साल में सुअवसर नहीं आता. वो हमेशा पिछले साल आकर चला जा चुका होता है या फिर वो अगले के अगले साल में आने वाला होता है.

· नया साल नई गलतियों के लिए ढेरों सुअवसर लेकर आता है.

· इतिहास हमेशा अपने को दोहराता है. नए साल में भी ऐसा ही होगा.

· नया साल हमेशा नई संभावनाओं को लेकर आता है. नया साल पुराने साल की तरह कैसे गुजरे इस तरह की नई संभावनाएँ.

· नया साल कुछ भी सिद्ध नहीं करता.

· नए साल पर मनाए जाने वाले पार्टी का आकार व तीव्रता पुराने साल के खराब गुजरने के समानुपाती होता है.

· हर नया साल नई आशाएँ अपेक्षाएं लेकर आता है और आने वाले नए साल के लिए वैसा ही छोड़ जाता है.

· किसी भी दिए गए नए साल के सामने उसके ठीक पहले का गुजरा हुआ साल कठिन प्रतीत होता है.

· नए साल में कुछ भी नहीं बदलता. आप भी नहीं.

· यह सबसे बड़ा अंधविश्वास है कि नया साल होता है.


इंटरनेटी हिन्दी के लिए वर्ष 2007 अच्छा-खासा घटनाओं भरा रहा और कुल मिलाकर एक विहंगम दृष्टि डालें तो यह वर्ष हिन्दी के लिए बड़ा ही लाभकारी रहा.

साल के शुरूआत में ही हिन्दी जगत को नायाब तोहफ़ा मिला था – इंटरनेट के जाने पहचाने, सुप्रसिद्ध साहित्यिक जाल स्थल अभिव्यक्ति और अनुभूति अंततः यूनिकोड में आ गए. इसके ठीक कुछ ही दिनों बाद खबर मिली कि हिन्दी समाचारों की लोकप्रिय साइट प्रभासाक्षी ने नित्य 3 लाख हिट्स पाने का रेकॉर्ड प्राप्त कर लिया. प्रभासाक्षी कृतिदेव श्रेणी के फ़ॉन्ट पर आधारित है और यूनिकोड पर आने हेतु प्रयोग चल रहे हैं.

फरवरी 07 आते आते विश्व की सबसे बड़ी वेब पोर्टलों में से एक, याहू ने भी हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को अपना लिया. बाद के कई महीनों में तो कई बड़ी साइटें और समाचार पत्र स्थल जैसे कि वेब दुनिया से लेकर दैनिक भास्कर तक शामिल हैं, सभी यूनिकोड में परिवर्तित हो गए. तब तक विंडोज विस्ता भी आ चुका था जिसमें हिन्दी का अंतर्निर्मित समर्थन उपलब्ध है – यानी आपको विंडोज एक्सपी की तरह इसके संस्थापना सीडी के जरिए अलग से हिन्दी संस्थापित करने की आवश्यकता नहीं है. और इसके इंटरफेस को भी आप हिन्दी में बखूबी इस्तेमाल कर सकते हैं.

लिनक्स भी पीछे नहीं रहा था और सीडॅक द्वारा पूर्णतः भारतीय भाषाई संस्करण बॉस जारी किया गया जिसमें हिन्दी एक प्रमुख भाषा के रूप में मौजूद है, और जिसमें सैकड़ों अनुप्रयोग और प्रोग्राम हिन्दी भाषा में हैं.

मार्च में पता चला कि गूगल ने अपने गूगल डॉक्स में हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा प्रदान कर दी है. यह सुविधा जीमेल के हिन्दी संस्करण में पहले से ही उपलब्ध थी. इसी दौरान, हिन्दी ब्लॉग जगत में पत्रकारों का पदार्पण हुआ और फिर प्रिंट और दृश्य मीडिया में हिन्दी ब्लॉगों के चर्चे होने लगे. यूं तो हलचल पहले भी हो रही थी, परंतु राष्ट्रीय अख़बार में पहली पहल हिन्दुस्तान टाइम्स में हुई, और बाद में एनडीटीवी के शनिवारी-सुबह के कार्यक्रमों में हिन्दी ब्लॉगों के अच्छे खासे चर्चे होते रहे.

अप्रैल में गूगल ने हिन्दी चिट्ठाकारों को यह कह कर बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की कि वे अब हिन्दी में चिट्ठाकारी कर सकते हैं. जबकि कोई तीन चार साल पहले से ही हिन्दी में धुंआधार चिट्ठाकारी हो रही थी. दरअसल, ब्लॉगर में हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन औजार जोड़ने की खुशी में वे क्या कहना चाह रहे थे ये ही भूल गए थे. वैसे, इंटरनेटी हिन्दी के लिए यह साल की सबसे बड़ी खबर रही, और सबसे बड़ी वैश्विक पहुँच वाली भी, क्योंकि गूगल ब्लॉगर की वैश्विक पहुंच है, या सबसे बड़ी और आसान ब्लॉग सेवा है और सेटिंग में हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन जोड़ने का विकल्प (?) हर ब्लॉगर उपयोक्ता को दिखाई देता है.

जल्द ही गूगल डेस्कटॉप नामक औजार भी हिन्दी में उपलब्ध हो गया. इसी समय हिन्दी के यूनिकोडित जाल स्थलों को अंग्रेजी सहित अपने मनपसंद भारतीय भाषाओं में पढ़ने का सुविधाजनक ऑनलाइन उपाय भी हमें मिला. हालाकि गिरगिट जैसा प्रकल्प पहले से ही उपलब्ध था, परंतु भोमियो ने उसे और आसान बना दिया.

मई आते आते कैफ़े हिन्दी का नई तकनीक का हिन्दी टाइपिंग औजार आ गया. इस बीच कुछ अच्छे ऑनलाइन टाइपिंग औजार पहले भी आ चुके थे. और हिन्दी का मुफ़्त, पाठ से वार्ता (टैक्स्ट टू स्पीच) प्रोग्राम भी जारी हो चुका था.

जून में चिट्ठासंकलक नारद के एक चिट्ठे पर प्रतिबंध से पैदा हुए विवाद ने चिट्ठाकारों में ध्रुवीकरण, गैंगबाजी, माफिया, चिट्ठामठाधीश जैसी कल्पनाओं और संभावनाओं को पैदा किया. इस बीच हिन्दी चिट्ठों का एक संकलक नुमा प्रकल्प पहले से ही आ चुका था. और, जुलाई आते आते चलती रेलगाड़ी से विश्व का पहला हिन्दी चिट्ठापोस्ट लिखा गया जिसने हिन्दी में व्यवसायिक चिट्ठाकारी को सफल होने में खासा योगदान भी दिया था.

इसी दौरान चिट्ठासंकलक ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत् एक-एक कर प्रारंभ हुए, और क्या हुए. अब तो चिट्ठासंकलकों के बीच प्रतियोगिताएँ जम कर चल रही हैं कि कौन ज्यादा से ज्यादा सुविधाएँ दे सकता है. और इस कारण से हिन्दी का ब्लॉग लेखक मुदित है. पर, संकलकों की यह आपसी प्रतियोगिता अप्रिय, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के स्तर पर आ पहुंची थी जिसका अफसोस इस वर्ष हम सभी को रहेगा. तमाम मोबाइल फ़ोनों, स्मार्ट फ़ोनों में हिन्दी में इंटरनेट प्रयोग की सुविधाएँ मिलने लगीं और हिन्दी साइटें भी मोबाइल के उपयुक्त होने लगीं. मोबाइल फ़ोनों में हिंगलिश (ऊपर सैमसुंग फोन के विज्ञापन का छोटा हिस्सा देखें) जैसी सुविधाएँ मिलने लगीं.

इस साल हिन्दी नामधारी फ़ाइलों को जिप करने यानी संपीडित करने की युक्ति (रार फ़ॉर्मेट में) विनरार के जरिए मिली. वैसे तो विंडोज (एक्सपी और ऊपर के) के अंतर्निर्मित सुविधा में तथा लिनक्स तंत्रों में आप हिन्दी नामधारी फ़ाइलों को पहले से ही जिप कर सकते थे, परंतु एक प्रचलित औजार के जरिए सहूलियत से यह कार्य करने की सुविधा हिन्दी में पहली बार मिली.

भाषाई दीवारों को तोड़ने की एक और कोशिश चिट्ठाजगत् ने की जिसे ब्लॉगवाणी ने आगे बढ़ाया. ये संकलक अब हिन्दी चिट्ठों को आसान रोमन लिपि में भी दिखाने लगे. अक्तूबर आते आते खबर मिली की माइक्रोसॉफ़्ट ने भारतीय भाषाओं के लिए मुफ़्त फ़ॉन्ट परिवर्तक जारी किया है जो कई फ़ॉन्टों के साथ बेहतरीन और आश्चर्यजनक परिणामों के साथ कार्य करता है. रजनीश ने भी इसी साल अपने जालस्थल पर ऑनलाइन फ़ॉन्ट परिवर्तन की बेहतरीन सुविधाएँ प्रदान कीं, वहीं इस स्थल पर कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ भी जुड़ीं. बालेंदु ने एनकोडिंग टूटने से भ्रष्ट हुई हिन्दी को पढ़ने के लिए एक बढ़िया इंटरफेस युक्त ऑनलाइन औजार बनाया. वर्ष 2007 में हिन्दी के लिए एक और अच्छी बात यह रही कि इंटरनेट पर नाम दर्ज करने वाली संस्था आईसीएएनएन ने जाल-पतों को हिन्दी में देने के लिए परीक्षण प्रारंभ कर दिए. हालाकि हिन्दी में कुछ आंशिक मात्रा में जाल पते पहले से ही चल रहे थे, मगर पूरी तरह से हिन्दी मय जाल पतों के लिए यह पहला आधिकारिक कदम माना जाता है.

नवंबर में एक नए हिन्दी ब्राउज़र का पदार्पण हुआ जो कि मोजिल्ला फ़ॉयरफ़ॉक्स पर आधारित है. दिसम्बर आते आते खबर मिली की माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस 2007 हिन्दी में जारी कर दिया गया है और जांच परख के लिए मुफ़्त डाउनलोड के लिए उपलब्ध है.

और हाँ, इस वर्ष भी, पाठकों की कृपा से यह पृष्ठ हिन्दी का विश्व का सर्वाधिक मजेदार जालपृष्ठ बना रहा.

(मेरी क्षुद्र जानकारी में इतना ही. यदि आपके पास कुछ और इनपुट हों तो उन्हें कृपया अवश्य शामिल करें)

किसी बढ़िया तेज रफ़्तार फ़िल्म के क्लाइमेक्स के ठीक पहले टीवी पर एक छोटा सा ब्रेक ले लिया जाए और अंतहीन विज्ञापनों का सिलसिला प्रारंभ हो जाए तो शर्तिया आपको विज्ञापनों से घृणा होने लगेगी. परंतु रुकिये, हममें से बहुतों के लिए विज्ञापन अच्छे हैं, और, वे और बेहतर होने जा रहे हैं...

गूगल अपना नया नवेला सेलफोन, जिसके बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि वो फरवरी 2008 में आने वाला है, उन लोगों को मुफ़्त में वितरित किए जाएंगे जो विज्ञापनों को पसंद करते हैं – मेरा मतलब है, विज्ञापनों को झेल सकते हैं. माइक्रोसॉफ़्ट भी पीछे नहीं है. माइक्रोसॉफ़्ट का स्लिमट्रिम ऑफ़िस सूट जो कि माइक्रोसॉफ़्ट वर्क्स कहलाता है, बहुत संभव है आपको आपके नए कंप्यूटर पर पहले से संस्थापित मिले, वो भी मुफ़्त. बस, इसके लिए आपको कुछ विज्ञापनों को झेलना होगा, जो कि आपके आनलाइन होने पर रीफ्रेश होते रहेंगे.

किसी उत्पाद को मुफ़्त में प्रयोग के लिए यदि हमें विज्ञापनों को कुछ सेकंड झेलना भी हो तो क्या फ़र्क पड़ता है. अगर लाइसेंस्ड विंडोज और एमएस ऑफ़िस विज्ञापनों के साथ मुफ़्त में मिलें, तो भाई, कोई पायरेटेड क्यों ले?

विज्ञापनों के भरोसे ही गूगल आपको इंटरनेट का मसाला ढूंढ कर दिखाता है, ब्लॉगर की यह सेवा प्रदान करता है जिसमें यह चिट्ठा होस्ट है. ...और आप भी विज्ञापनों के भरोसे इस चिट्ठे पर नित नई (भले ही वो बेकार, बेकाम, उबाऊ हों) प्रविष्टियाँ पढ़ते हैं :)

एक नए अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ है कि पारंपरिक टेलिविजन विज्ञापनों से ज्यादा असरकारी और फायदेमंद जालपृष्ठों के विज्ञापन होते हैं. यानी निकट भविष्य में हमारे ब्लॉग पृष्ठों में विज्ञापन हथियाने की होड़ मचने वाली है. प्रसून जोशी और प्रहलाद कक्कड़ - ये बात क्या आपको पता है?

विज्ञापन, अच्छे हैं...

shrink pic (WinCE)

पिछले दिनों मेरा पॉप3 ईमेल क्लाइंट जाम हो गया. मेरा थंडरबर्ड जाम हो गया, जबकि कनेक्शन बढ़िया था. वो किसी एक ईमेल को डाउनलोड करने का प्रयास कर रहा था. समस्या की जड़ में जाकर देखा तो पता चला कि वो कोई 6 मेबा के एक चित्र को डाउनलोड करने की कोशिश कर रहा था. वह चित्र मेरे एक मित्र ने भेजा था जिसने नया नया हाई एण्ड कैमरा लिया था.

हम सभी अपने ईमेल व चिट्ठों में चित्रों का जमकर प्रयोग करते हैं. चाहे वे डिजिटल कैमरे से खींचे गए हों या फिर कम्प्यूटर स्क्रीनशॉट से लिए गए. डिजिटल कैमरों से खींचे गए चित्रों की गुणवत्ता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और इसी वजह से उनका आकार भी. जब 39 मेगापिक्सल कैमरा कैमरे से कोई चित्र खींचा जाएगा तो जाहिर है उसका आकार 8-10 मेगाबाइट से कम क्या होगा. और, यदि आप जाने अनजाने इस चित्र को किसी मित्र को भेज देते हैं तब? तब उसका ईमेल क्लाइंट यदि डायलअप पर हुआ तो वो जाम ही हो जाएगा. और यदि ब्रॉडबैण्ड पर हुआ तब वो इसे डाउनलोड तो कर लेगा, परंतु यदि उसे देखना भर है, या कहीं जाल-पृष्ठ में प्रयोग करना है, इसका प्रिंटआउट नहीं लेना है तब इतने बड़े आकार के फोटो का कोई अर्थ ही नहीं है. बड़े आकार और अधिक मेगापिक्सल के चित्रों का महत्व तभी है जब आप उसका प्रिंटआउट बड़े आकार में ले रहे होते हैं. बड़े आकार में प्रयोग किए गए चित्र आपके जाल पृष्ठों (जिनमें आपका ब्लॉग पृष्ठ भी शामिल है,) को आकार में बड़ा बनाता है तथा इससे न सिर्फ बैंडविड्थ नाहक खर्च होता है, आपका पृष्ठ भी देरी से लोड होता है. एक शोध के मुताबिक यदि आपका पृष्ठ 10 सेकण्ड से अधिक देर में लोड होता है तो पाठक वहां से चंपत हो जाता है.

चलिए इसी बहाने कुछ चिट्ठों की समीक्षा करते हैं. कैसे लाऊँ जिप्सियाना स्वभाव में चार चित्र प्रयोग किये गए हैं जो कि क्रमशः 90, 124, 63 और 119 किबा के हैं. यानी इनका कुल आकार आधा मेगाबाइट तो हो ही गया. जबकि चित्रों को जिस तरह से और जिस आकार में प्रस्तुत किया गया है, उसके लिए प्रत्येक चित्र 10 किबा से अधिक नहीं होना चाहिए. यानी आवश्यकता से 10 गुना अधिक रिसोर्स का प्रयोग किया गया है जो चिट्ठाकार के लिए भी ठीक नहीं है और उसके पाठकों के लिए भी.

भूमिका लंबी हो गई. चलिए, मुद्दे पर आते हैं. ईमेल तथा जाल पृष्ठों पर छोटे तथा कम आकार के चित्रों का ही प्रयोग करना चाहिए. चिट्ठे पर कम आकार के चित्रों के प्रयोग का एक बढ़िया उदाहरण एक अनाम रेलवई को धन्यवाद में है जहाँ गांधी जी का चित्र 10 किबा का है, परंतु दूसरे अन्य चित्र 30 किबा से अधिक हैं. जबकि पृष्ठ में वे लगभग समान आकार के दिख रहे हैं. परंतु यहाँ पर हेडर का चित्र बहुत बड़े आकार (281 किबा का है जबकि इसे 100 किबा से कम होना चाहिए, और यदि संभव हो तो 50 किबा तक) का है (ब्लॉगर में 8 मेबा आकार तक का चित्र अपलोड कर सकते हैं!) जिससे पृष्ठ को लोड होने में बहुत समय लगता है. हालाकि नए ब्राउजर और नई तकनीकों से बड़े चित्रों को डायनामिकली आकार बदल कर प्रदर्शित किया जाता है ताकि आकार के कारण पृष्ठ लोड होने में समस्याएँ कम आए, मगर थोड़ी सी समस्याएँ तो होती ही हैं, और खासकर तब जब चित्रों को सीधे ही लिंक किया गया हो.

अब प्रश्न है कि बड़े चित्रों को सरल, सुंदर तरीके से छोटा कैसे करें? इसके लिए सैकड़ों हजारों अनुप्रयोग हैं, और हर कोई ताल ठोंक कर कह सकता है कि ये वाला या वो वाला अच्छा है. पर, मैंने दो अनुप्रयोगों को बहुत ही काम का और अत्यंत आसान पाया है और ये मुफ़्त में उपलब्ध भी हैं.

पहला है विंडोज पावर टॉयज (डाउनलोड). इसे संस्थापित करिए और किसी भी चित्र के फ़ाइल पर दायाँ क्लिक कर रीसाइज विकल्प चुनें और मन वांछित आकार दें. जाल पृष्ठों के लिए हैंडहेल्ड पीसी विकल्प (240x300 पिक्सेल) सबसे कम आकार के, परंतु उत्तम गुणवत्ता के चित्र बनाता है.

दूसरा है श्रिंक पिक (डाउनलोड). यदि आप अकसर ईमेल से चित्रों को भेजते हैं तो आपके लिए यह अनुप्रयोग अत्यंत काम का है. एक बार इसे संस्थापित कर लें और भूल जाएँ. यह सिस्टम ट्रे में बैठ कर आपकी सेवा करता रहेगा. पूर्वनिर्धारित सेटिंग के अनुसार जब भी आप किसी चित्र को ईमेल से (चाहे आउटलुक, थंडरबर्ड हो या याहू-जीमेल) भेजने के लिए संलग्न करेंगे तो यह स्वचालित ही उन्हें छोटा कर देगा. आपको चित्रों को अलग-अलग छोटा करने की आवश्यकता ही नहीं है. यदि आप ईमेल से फोटो ब्लॉगिंग कर रहे हैं तब तो यह आपके और भी काम का है.

हो सकता है कि आपने इस काम के लिए कोई और अनुप्रयोग इस्तेमाल में लिए होंगे जो कि हो सकता है इस्तेमाल और विशेषताओं में इनसे भी अच्छे हों. उसके बारे में हम सभी जानना चाहेंगे.

tona totka

ये किसी एडसेंसिया ब्लॉग पोस्ट की बात नहीं हो रही है. दरअसल इस ब्लॉग पोस्ट का आइडिया मोकालू गुरु के भूत ने पिछले दिनों मेरे सपने में आकर दिया था.

किताबों की फुटपाथिया दुकानों में आपको ऐसी सैकड़ों किताबें मिल जाएंगीं जिनमें लाल किताब से लेकर तंत्र मंत्र और जादू टोने तक – यानी हर किस्म की सामग्री मिलेगी. और, शायद यही वजह है कि भारत में आज भी जादू टोना और तंत्र मंत्र चल रहा है. कुछ समय पहले तक कादम्बिनी जैसी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिका में राजेन्द्र अवस्थी वार्षिक तंत्र मंत्र विषेशांक निकाला करते थे जिसकी बिक्री और अंकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती थी और अंक निकलते ही मार्केट में सोल्ड आउट हो जाता था. और क्यों न हो, आखिर, तंत्र मंत्र की शक्ति ही ऐसी होती है.

तो उस सपने से वशीभूत हो एक किताब मैं भी ले आया. किताब है पं. शशि मोहन बहल की लिखी और मनोज पब्लिकेशन्ज, बुराड़ी दिल्ली से प्रकाशित “देखन में छोटे लगें लाभ दें भरपूर – सरल टोनों-टोटकों द्वारा सर्वबाधाओं से मुक्ति” संस्करण 2007 – आईएसबीएन नं. 978-81-313-0315-2 मूल्य 60 रुपए.

किताब में कोई बीस खण्डों में विविध प्रकार के टोने टोटके दिए गए हैं जिनमें धन प्राप्ति से लेकर (हिन्दी ब्लॉगों में एडसेंसिया भी संभव है,) दुश्मन पर विजय इत्यादि के टोने-टोटके शामिल हैं. मुझे उम्मीद थी कि नए जमाने के ताजा संस्करण में मेरे हिन्दी ब्लॉग पर काल-मुर्ग-छाया-प्रभाव (जिसके चलते न पाठक पैदा हो रहे हैं न इनकम जनरेट हो रही है) के इलाज का कोई टोना टोटका दिखेगा. मगर किताब के पूरे 103 पन्ने चाट लेने के बाद भी ऐसा कोई टोटका ब्लॉगों के हिट कराने का नहीं मिला. लिहाजा ये किताब चिट्ठाकारों के लिए शर्तिया फालतू है.

मगर, ठहरिये. चिट्ठाकार आखिर मनुष्य तो हैं ही. कुछ टोने इसी किताब से ढूंढ लाया हूँ आपके लिये. हो सकता है इनमें से कुछ आपके भी काम आएँ.

1

आलसी, स्नान से घृणा (जीतू भाई, आप ये स्वीकारते हैं,) करने वालों के लिए-

पुनर्वसु नक्षत्र के दिन मेहंदी की जड़ और चंदन लाकर अपने पास रख लें. आपके शरीर से दुर्गंध नहीं आएगी. (पृष्ठ 99)

(तो, जब शरीर से दुर्गंध नहीं आएगी तो स्नान की आवश्यकता को तो सिरे से नकारा ही जा सकता है. नहाने के साबुन बनाने वाली कंपनियों के व्यापार बाधित होने की संभावना है. शेयर होल्डर्स ध्यान दें.)

2

चिट्ठाकारों का अपना आलस्य दूर करने के लिए-

रविवार के दिन शराब की एक बोतल खरीद लें. सर्वप्रथम उसे भैरव पर अर्पण करें. इसके बाद उस बोतल को 7 बार आलसी व्यक्ति के ऊपर से उतारकर किसी को दान कर दें या दिन ढले किसी चौराहे, मरघट या पीपल के पेड़ के नीचे रख आएं. वह व्यक्ति आलस्य छोड़कर सभी काम करने लगेगा. (पृष्ठ 103)

(ठीक ललल लिक्कखा है. शररराब तो मररररियल लललोगों हिक्क... में भी ज्ज्ज्ज्जान डाल देता है हिक्क...)

3

बेनामी टिप्पणीकारों का परिचय जानने के लिए-

उल्लू का सिर, मैनसिल और हरताल – तीनों को पीसकर एक गुटिका तैयार कर लें. इसे अपने पास रखने से अंधेरे में भी दिखाई देता है. (पृष्ठ 100)

(भारतीय सेना बुड़बक है जो दुश्मन की गतिविधि पर रात्रि में निगाह रखने के लिए सॉफ़िस्टिकेटेड, अत्यंत महंगे नाइट विजन दूरबीन खरीदती है. और, इस तरह की गुटिका, ब्लॉगों में बेनामी टिप्पणियाँ करने वालों को पहचानने के लिए बनाई जानी चाहिए. यानी ऐसी गुटिका चिट्ठाकार पहन ले तो उसे बेनामियों के आईपीपते समेत नामपता भी दिखाई दे जाए. उम्मीद है, ग्राहकों की अच्छी खासी मांग पर संभवतः किताब के अगले संस्करण में यह टोटका सम्मिलित कर लिया जाएगा)

4

हिन्दी चिट्ठाकारी में सफलता प्राप्ति के लिए-

पीपल के वृक्ष के नीचे शाम को 7 दीपक जलाकर 7 बार परिक्रमा करें. उसके पश्चात् 7 लड्डू कुत्ते को खिलाएँ. ऐसा करने से मन प्रफुल्लित रहेगा और समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होगी. (पृष्ठ 42)

(क्या हिन्दी ब्लॉग लेखन में भी? टोटका तो ठीकेठाक लगता है, चलिए, आने वाले साल 2008 के लिए, इसे आज, अभी ही आजमाते हैं.)

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दोस्तों, हम सभी चिट्ठाकारों को समय समय पर तकनीकी दिक्कतें झेलनी होती हैं. खासकर हिन्दी के मामले में. हममें से कोई भी – फिर से एक बार, कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, और आज का विषय विशेषज्ञ कल को बेकार हो जाता है क्योंकि तकनीक नित्य बदलती रहती है. जाहिर है, आज का हमारा लिखा-पढ़ा कल को बेकार हो जाता है. ऐसे में अपने ज्ञान को नित्य ब्रशअप करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है.

इसी बात को मद्देनजर रखते हुए होशंगाबाद के श्री प्रतीक शर्मा, दिनांक 6 5 जनवरी 2008 दिन शनिवार को दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक एक ऑनलाइन चिट्ठा समस्या निराकरण गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं. इस तरह की (परंतु तकनीकी नहीं,) गोष्ठी पहले भी आयोजित की जा चुकी है. यह गोष्ठी ऑनलाइन होगी, और स्काइप के जरिए आपसी वार्तालाप (इंस्टैंट मैसेंजर से नहीं,) के जरिए होगी – यानी ज्ञान का आदान-प्रदान आपस में बोल-बताकर किया जा सकेगा. इस ऑनलाइन गोष्ठी में पूरे समय तक बने रहना आवश्यक नहीं है – आप अपनी सुविधानुसार 10-15 मिनट का भी समय दे सकते हैं.

इसके लिए आपको अपने कम्प्यूटर पर स्काइप (यहां से डाउनलोड करें) को संस्थापित करना होगा, और प्रतीक शर्मा के इस चिट्ठे में दिखाए तरीके से स्काइप में लॉगइन कर बात करना होगा. आपको इसके लिए किसी तरह का खर्च नहीं लगेगा. बस इंटरनेट कनेक्शन और माइक्रोफ़ोन-मल्टीमीडिया युक्त कम्प्यूटर होना चाहिए और कनेक्शन बढ़िया गति वाला होना चाहिए.

तो आप अपनी हिन्दी चिट्ठाकारी संबंधी समस्याओं को एकत्र कर लीजिए और उसका हल प्राप्त करने के लिए अपने कैलेण्डर में शनिवार, 6 5 जनवरी 2008 का दिन इंगित कर लीजिए. और, साथ ही यदि आपने हिन्दी चिट्ठाकारी में कुछ प्रयोग किए हैं, कुछ ज्ञान आपको है, कुछ टिप हैं आपके पास तो अवश्य ही आप अपने ज्ञान से हमारा भी, व हिन्दी चिट्ठासंसार का ज्ञानवर्धन करें.

हालांकि हमारी अपनी समस्त समस्याओं के त्वरित और तात्कालिक हल का दावा तो नहीं किया जा सकता, परंतु इस दौरान इस पर व्यापक विचार विमर्श तो किया ही जा सकता है.

इस सम्बंध में और जानकारियाँ इसी चिट्ठा प्रविष्टि पर अद्यतन की जाती रहेंगीं. अपने सुझाव-समस्याएँ-तथा गोष्ठी के विषय जिन पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए – इत्यादि इत्यादि आप अपनी टिप्पणियों में दे सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए प्रतीक शर्मा से उनके इस पते पर संपर्क करें

hindi_seekho AT yahoo.com

भूल सुधार :

अद्यतन : कृपया क्षमा करें, ग़लती से दिनांक 5 जनवरी की जगह 6 जनवरी प्रकाशित हो गया था जिसे ठीक कर दिया गया है. ऑनलाइन समस्या निवारण संगोष्ठी शनिवार, दिनांक 5 जनवरी 3-5 बजे होगी

अद्यतन #2 : स्काइप में डायल करने के लिए कल शनिवार 5 जनवरी दोपहर दो बजे एक डायल नंबर जनरेट किया जाएगा. उस नंबर पर डायल कर आप इस गोष्ठी में शामिल हो सकेंगे. वह नंबर इस चिट्ठे पर यहीं दोपहर दो बजे के आसपास लिखा जाएगा तथा चिट्ठाकार सूची पर भी उपलब्ध कराई जाएगी.

अद्यतन #3- अब से कोई पौन घंटे बाद भारतीय समयानुसार दोपहर तीन बजे गोष्ठी प्रारंभ हो रही है. स्काइप में इस गोष्ठी में शामिल होने के लिए निम्न नंबर डायल करें. यदि कोई समस्या हो तो बाजू पट्टी में सी-बॉक्स में ऑनलाइन संदेश दें

स्काइप पर डायल करने का नंबर +9900111759345403406

ओपन ऑफ़िस मुफ़्त एवं मुक्त उपलब्ध ऑफ़िस सूट है, जिसे एमएस ऑफ़िस के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. उन्मुक्त इसे प्रारंभ से ही इस्तेमाल करते रहे हैं और लिनक्स तंत्र में मैं भी इसे प्रयोग करता रहा हूँ.

ओपन ऑफ़िस में हिन्दी वर्तनी जांच की सुविधा अंतर्निर्मित नहीं है. परंतु आप स्वयं इसे कुछ सरल चरणों के जरिए संस्थापित कर सकते हैं. इसके लिए निम्न चरण हैं-

  1. हिन्दी शब्दकोश यहाँ से डाउनलोड कीजिए –

http://ftp.services.openoffice.org/pub/OpenOffice.org/contrib/dictionaries/hi_IN.zip

  1. इसे आप किसी उपयुक्त फोल्डर/डिरेक्ट्री में अनजिप कर लें.

अनजिप करने पर आपको अतिरिक्त फ़ाइलों के साथ ये निम्न दो फ़ाइलें मिलेंगी –

 hi_IN.aff 
 hi_IN.dic


  1. इन दोनों फ़ाइलों को आपको ओपन ऑफिस के शब्दकोश डिरेक्ट्री/फोल्डर में नकल करना होगा. आमतौर पर ओपन ऑफिस की शब्दकोश फ़ाइलें लिनक्स में इस डिरेक्ट्री में होती हैं –
/usr/lib/openoffice/share/dict/ooo

तथा विंडोज तंत्र में प्रोग्राम फ़ाइल/ओपन ऑफ़िस डिरेक्ट्री में किसी dict सब-डिरेक्ट्री में (आरंभिक संस्थापना के समय यदि इसे बदला गया होगा तो यह जुदा भी हो सकता है.)


  1. इसी डिरेक्ट्री में (जहाँ आपने दोनो फ़ाइलें नकल की हैं,) dictionary.lst नाम की एक फ़ाइल होगी. इसमें आप यह प्रविष्टि जोड़ें (नोटपैड या जीएडिट से संपादित कर) –

DICT hi IN hi_IN

ओपन ऑफ़िस प्रारंभ करें, हिन्दी में कुछ लिखें और अपनी गड़बड़ लिखी हिन्दी के नीचे लाल रंग की लाइन देखें जो कि गलत वर्तनी को इंगित करता है.

परंतु ध्यान दें इसके शब्द भंडार में कोई सोलह हजार ही शब्द हैं, अतः यह बहुत से सही हिन्दी शब्दों की वर्तनी को भी गलत बताएगा. फिर भी, आम बोलचाल और लेखन के बहुत से शब्द इसमें हैं, और इसी लिए नहीं मामा से काना मामा अच्छा!

(जी. करूणाकर एवं गोरा मोहंती से प्राप्त इनपुट के आधार पर, अतः इन्हें धन्यवाद.)

हिन्दी वर्तनी जांचक युक्त (यूनिकोड) कुछ अन्य मुफ़्त सॉफ़्टवेयर हैं-

हिन्दी राइटर

शब्द जावा (डाउनलोड)

दैनिक भास्कर उज्जैन के आज (गुरूवार 20 दिसंबर 2007) के संस्करण में यूनुस खान (जी हाँ, अपने रेडियोवाणी वाले) की निम्न कविता प्रकाशित हुई है – (मुझे भास्कर की साइट पर रचना की कड़ी खोजने से भी नहीं मिली, हालांकि अब ये साइट यूनिकोड पर आने लगी है. अतः कविता की स्कैन की गई छवि के साथ ही कविता भी प्रस्तुत है:)

yunus khan ki kavita chote sahar ke bachhe

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छोटे शहर के संकोची बच्चे

हम छोटे शहर के बच्चे थे

अब बड़े शहर के मुंशी हैं

और जा रहे हैं और बड़े शहर के मजदूर बनने की तरफ.

 

हमने जवानी में कविताएँ लिखी थीं और

कलम चलाते रहने का वादा किया था खुद से.

जवानी की डायरी में अभी भी मौजूद हैं

वे गुलाबी कविताएँ.

 

पर कलम अब मेज पर पड़ी जंग खा रही है

और हम कीबोर्ड के गुलाम बन गए हैं.

मित्र हम दुनिया को बदलने के लिए निकले थे

और शायद दुनिया ने हमें ही बदल दिया

भीतर-बाहर से

 

अब हम नापतौल कर मुस्कराते हैं

अपनी पॉलिटिक्स को ठीक रखने की जद्दोजहद करते हैं...

झूठी तारीफ़ें करते हैं, वादे करते हैं कोरे और झूठे

और हर शाम सिर झटककर दिनभर बोले

झूठों को जस्टीफाई कर लेते हैं

 

हम छोटे शहर के बड़े दोस्त थे, जिंदगीभर वाले दोस्त.

लेकिन बड़ी दुनिया के चालाक बाजार ने

खरीद लिया हममें से कुछ को

और कुछ की बोली अब भी लगाई जा रही है

हम छोटे शहर के संकोची बच्चे

आज कितनी बेशर्मी से बेच रहे हैं खुद को.

-यूनुस खान

(ये कविता तो लगता है कि जैसे मेरे ऊपर ही लिखी गई है ... और, इसीलिए मैंने इसे यहाँ फिर से प्रकाशित किया है)

hindi computri ki kahani

इसी पृष्ठ पर वेद प्रकाश की किताब पर लिखी मेरी समीक्षा भी संक्षिप्त रूप में छपी है. साथ ही ब्लॉग यायावरी स्तम्भ में रविकांत ओझा ने हाल ही में ब्लॉग जगत् में ब्लॉगर बनाम साहित्यकार पर हुई बहस का एक बेहतरीन अवलोकन पेश किया है. अवलोकन की स्कैन की गई छवि निम्न है:

blogger banam sahityakar

blogger banam sahityakar2

पुस्तक समीक्षा

हिन्दी कंप्यूटरी

सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार

hindi computriहिन्दी कम्प्यूटरी के भूत-वर्तमान-भविष्य की रोचक, उत्तेजक, मनोरंजक, अत्यंत ज्ञानवर्धक, और साथ ही, जाहिर है विडंबना-गाथाओं से भरपूर, कहानी हिन्दी अधिकारी वेद प्रकाश ने अपनी किताब - हिन्दी कंप्यूटरी - सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार में लिखी है.

ved prakash

(वेद प्रकाश)

प्रारंभ में ही अपनी बात कहते हुए वेद प्रकाश बताते हैं –

.....हमारे कार्यालय में सभी सरकारी कार्यालयों की तरह अंग्रेज़ी का माहौल था. हिंदी के नाम पर प्रतियोगिताएँ, पुरस्कार योजनाएँ, हिंदी बैठकें भी चलती रहती थीं. इनके साथ ही अंदर ही अंदर हिंदी में काम की मात्रा धीरे-धीरे ही सही बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कार्यालय में कंप्यूटर का प्रवेश हुआ. शुरू में यह काफी सीमित था. कंप्यूटर पर टाइप मात्र करने वाले लोग किसी टैक्नोक्रेट के समान श्रद्धा से देखे जाते थे. हिंदी विभाग के लोग तो सहम कर उधर ताकते तक न थे. ...

अपनी बात को वे कुछ इस तरह आगे बढ़ाते हैं –

...हिंदी अधिकारी होने के नाते मन में कम्प्यूटरों में हिन्दी इस्तेमाल नहीं कर पाने की बातें कहीं कसकती भी थी. इसी कशमकश में दिन बीत रहे थे कि हमारे मुख्यालय ने हिंदी सॉफ्टवेयर की सीडी भेज दी. यह सीडी भारत सरकार के संस्थान सी-डेक के हिंदी सॉफ्टवेयर एएलपी (एपेक्स लैंग्वेज़ प्रोसेसर) की थी. यह एक डॉस-आधारित स्वतंत्र बहुभाषी हिंदी शब्द संसाधक था. लगभग उतना ही शक्तिशाली और सुविधा संपन्न जितना कि उस समय वर्ड स्टार नामक अंग्रेज़ी सॉफ्टवेयर था. उनके इस कदम ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी. सबसे ज्यादा हम ही खिले हुए थे. मैं सोच रहा था कि अब हिंदी के विकास और प्रसार को कौन रोक सकता है.

लेकिन जल्द ही मुझे पता चल गया कि कंपनी का काम जिन सॉफ्टवेयरों में होता है, यह उनसे काफी अलग और काफी सीमित है. मेरे उत्साह पर तुषारापात हो गया. पर कोई बात नहीं. कंप्यूटर की पवित्र-पावन दुनिया में हिंदी का प्रवेश तो हुआ.

लेकिन ठहरिए, इसके साथ एक और समस्या आई. जो एएलपी सॉफ्टवेयर हमें भेजा गया था उसमें केवल इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल था. चूँकि वह मैनुअल टाइपराइटर के कुंजीपटल से बुनियादी रूप से भिन्न था इसलिए हमारी टाइपटिस्ट ने उस पर टाइप करने से मना कर दिया. इस चक्कर से निकलने के लिए हमने सोचा कि एक कुंजीपटल खरीद लेते हैं जो रेमिंग्टन के हिंदी कुंजीपटल जैसा हो. ताकि हमारी टाइपिस्ट को उस पर काम करने में कठिनाई न हो.

कुंजीपटल विक्रेता ने हमारा ज्ञान वर्धन किया कि यह मामला कुंजीपटल का नहीं, सॉफ्टवेयर का है, इसलिए बेहतर हो कि हम उसका कंपनी का सॉफ्टवेयर खरीद लें जिसमें इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल के साथ-साथ रेमिंग्टन कुंजीपटल और एग्ज़ीक्यूटिव कुंजीपटल भी दिया गया है.....”

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पुस्तक को निम्न 9 अध्यायों में बंटा है. वैसे तो अध्यायों के शीर्षकों से ये भ्रम हो सकता है कि मामला पेचीदा और तकनीकी होगा, मगर तकनीकी बातों को बड़े ही रोचक और सरल भाषा में भली प्रकार से उदाहरणों से समझाया गया है, जिससे आम, गैर-तकनीकी पाठक को भी हिन्दी कम्प्यूटरी की कहानी पढ़ने में आनंद मिलता है और पठनीयता आद्योपांत बनी रहती है.

1 सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी समाज

2 हिंदी समाज के लिए सूचना प्रौद्योगिकी क्यों आवश्यक है?

3 हिंदी का मानक कोड क्यों?

4 यूनिकोड- समस्याएँ अनेक समाधान एक

5 ये हिंदी फोंट क्या हैं?

6 विंडोज़ 2000 और विंडोज़ एक्सपी में हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को सक्रिय कैसे करें?

7 हिंदी में टाइप कैसे करें?

8 परिवर्धित देवनागरी बनाम इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल- राष्ट्रीय एकता की और बढ़ता कदम.

9 हिंदी सॉफ्टवेयर उपकरण – देर आयद दुरस्त आयद

लेखक पुराने हिन्दी फ़ोंटों की पेचीदगियों के बारे में मनोरंजक तरीके से कुछ यूँ खुलासा करते हैं -

“...इस बात को ज़रा ठंडे दिमाग से समझिए। यानी कि, मान लीजिए, 184 के स्थान पर, जिसे इस्की कोड में ‘क’ के लिए नियत किया हुआ है, यदि एक सॉफ्टवेयर निर्माता ने ‘ग’ रख दे और दूसरा सॉफ्टवेयर निर्माता ने इसी स्थान पर ‘च’ रख दे तो क्या होगा। पहले निर्माता के सॉफ्टवेयर में तैयार दस्तावेज़ में जहाँ-जहाँ ‘ग’ टाइप किया हुआ है, दूसरे सॉफ्टवेयर में खोलने पर वहीं-वहीं ‘च’ दिखाई पड़ेगा। और मानक इस्की कोड का इस्तेमाल करने वाले सॉफ्टवेयर में वहाँ ‘क’ दिखाई देगा; यानी बेतरतीब, अर्थहीन, अक्षरों का समूह स्क्रीन पर दृष्टिगोचर होगा। और मित्रो, यही हुआ भी है। आज हिंदी में कंप्यूटर पर आने वाली महत्वपूर्ण कठिनाइयों का यही कारण है। इंटरनेट, ई-मेल, ई-वाणिज्य और ई-शासन के बढ़ते घोड़े की लगाम हिंदी सॉफ्टवेयर निर्माताओं ने इसी तरह थामी है। इनके कोड व्यवस्था में नित नए प्रयोगों ने भारतीय भाषाओं के उपयोक्ताओं को बेहद परेशान किया है।

मानकीकरण न किए जाने और उसे न अपनाने के पीछे हिंदी सॉफ्टवेयर निर्माताओं की थोड़ी स्वार्थलिप्सा भी थी। अलग फोंट कोड के कारण यदि कोई संगठन या कंपनी एक बार उनके सॉफ्टवेयर को खरीद ले तो हमेशा उनके ही सॉफ्टवेयर खरीदने को मजबूर था, नहीं तो वह संगठन या कंपनी अपने विभिन्न कंप्यूटरों में तैयार हिंदी दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान नहीं कर पाएगी। यही नहीं, न केवल उन्होंने अपने कोड दूसरे फोंट निर्माताओं से अलग रखे बल्कि अपने ही विभिन्न उत्पादों के लिए भी विभिन्न कोड बनाए ताकि उनके एक उत्पाद का ग्राहक दूसरे उत्पाद के फोंट इस्तेमाल न कर पाए।

इनकी इस स्वार्थलिप्सा के शिकार हुए सरकारी कार्यालय जिनमें राजभाषा नीति के चलते हिंदी का प्रयोग करना था तो दूसरी तरफ डेस्क टॉप पब्लिशर, जिन्हें भारतीय भाषाओं के मुद्रण को गला-काट प्रतियोगिता भरी दुनिया में टिके रहना था, नित नए फोंटों को अपनाते हुए।

इस अन्यायपूर्ण लूट में कोई फोंट निर्माता पीछे नहीं था।

इस मामले में भारत सरकार भी अपनी जिम्मेवारी से नहीं बच सकती। दूसरे देशों की सरकारों की तरह भारत सरकार का यह कर्तव्य था कि वह इस फोंट कोड के मानकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाती और इस दिशा में हो रहे निजी प्रयासों की कड़ी निगरानी करती, जैसाकि दूसरे देशों की सरकारों ने किया, तो फोंट कोड के कारण उत्पन्न समस्या पैदा ही नहीं होती.

शायद यह स्थिति अनंत काल तक चलती रहती यदि इंटरनेट के प्रसार ने सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और आपस में वितरित करने के लिए मजबूर न किया होता, जिसके कारण एक नया फोंट मानक उभर कर आया—यूनिकोड।

लेकिन इन सुविधाओं का द्वार आपके लिए तभी खुलता है जब आप यूनिकोड अपनाते हैं। नहीं तो हिंदी कंप्यूटरी की दुनिया की अराजकता जस की तस विराजमान है।

हिंदी सॉफ्टवेयर निर्माता अब अपने सॉफ्टवेयरों में अपने फोंटों से यूनिकोड में कनवर्ज़न की सुविधा, और अन्य सॉफ्टवेयरों से कन्वर्ज़न की सुविधा का बड़े ज़ोर शोर से उल्लेख करते हैं। इन्होंने पहले तो अपने सॉफ्टवेयरों में किसी मानक का अनुपालन न करके हिंदी कंप्यूटरी के विकास में रुकावटें पहुँचाईं और अब खुद को मसीहा के तौर पर पेश कर रहे हैं। और इसके लिए एक बार फिर इन समस्याओं से अनजान हिंदी विभागों से मोटी कमाई कर रहे हैं। ...

पुस्तक में हिन्दी कम्प्यूटरी संबंधी जानकारियों का खजाना भरा हुआ है. ये बात मुझे स्वीकारने में कोई शर्म नहीं है कि बहुत सी नई चीजें मैंने भी इस पुस्तक के जरिए जानीं. पुस्तक से ही उद्भृत एक उदाहरण :

अब एक बानगी विशेष कार्यों के लिए बने सॉफ्टवेयरों में हिंदी की सुविधा व समर्थन की। नीचे हम उन उन्नत कंप्यूटरी के उत्पादों एक सूची दे रहे हैं जो अपने खास कामों के लिए पूरी दुनिया में छाए हैं और साथ ही यूनिकोड के रास्ते हिंदी को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान करते हैं:--

ऑपरेटिंग सिस्टम- कंप्यूटर पर कोई भी कार्य करने से पहले उस पर ऑपरेटिंग सिस्टम होना बहुत ज़रूरी होता है। ऑपरेटिंग सिस्टम हमारी भाषा और कंप्यूटर की भाषा के बीच पुल का काम करते हैं। यदि हमारा ऑपरेटिंग सिस्टम यूनिकोड समर्थक हो और हमने उसमें हिंदी को सक्रिय किया हुआ हो तो उस पर चल रहे किसी भी सॉफ्टवेयर के यूनिकोड समर्थक होते ही उसमें हिंदी समर्थन स्वतः ही आ जाता है। इसके लिए हमें किसी थर्ड पार्टी फोंटों की आवश्यकता नहीं होती। नीचे कुछ यूनिकोडसेवी ऑपरेटिंग सिस्टम दिए गए हैं---

· माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज़ सीई, विंडोज़ 2000, विंडोज़ एनटी और विंडोज़ एक्सपी

· लिनक्स-जीएनयू ग्लिबसी 2.2.2 और नवीनतम के साथ /केडीई भी हिंदी में

· एससीओ यूनिक्सवेअर 7.1.0

· सन सोलेरिस

· एपल के मैक ओएस 9.2, मैक ओएस 10.1, मैक ओएस एक्स सर्वर, एटीएसयूआई

· बेल लैब्स प्लान 9

· कॉम्पैक्स ट्रू64 यूनिक्स, ओपन वीएमएस

· आईबीएम एआईएक्स, एएस/400, ओएस/2

· वीटा न्यूओवा का इन्फर्नो

· नया जावा प्लेटफार्म

· सिम्बिअन प्लेटफार्म

हिन्दी कंप्यूटिंग में रूचि रखने वालों के लिए यह पुस्तक निसंदेह उपयोगी और ज्ञानवर्धक होगी.

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हिन्दी कंप्यूटरी

सूचना प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक सरोकार

लेखक:

वेद प्रकाश

273, पाकेट-डी,

मयूर विहार, फेज़ 2,

दिल्ली-110091

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प्रकाशक:

लोकमित्र

1/6588, सी-1, रोहतास नगर (पूर्व)

शाहदरा, दिल्ली-110032

दूरवाक् : 22328142

 

सर्वाधिकार@ वेद प्रकाश

प्रथम संस्करण 2007 ईस्वी

मूल्य : एक सौ पचहत्तर रुपये

chithakar banam sahityakar (WinCE)

(पिछले दिनों अनिल ने ब्लॉगर बनाम आम साहित्यकार पर विचारोत्तेजक लेख लिखा था जिसे आगे बढ़ाते हुए दिलीप ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में गैंग और माफ़िया की बातें कीं और आरोप लगे कि लोगों ने ब्लॉग दुकानें सजा ली हैं. मगर, मेरा मानना है कि चिट्ठाकारी में गैंग और माफिया जैसी चीजें सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक हैं, ठेठ कल्पना की उपज हैं और न कभी हो सकती हैं और न हो सकेंगी. जिसकी दुकान में माल बढ़िया, सार्थक होगा मक्खियों के माफ़िक पाठक और टिप्पणीकार वहीं मंडराएंगे. और, साथ ही, चिट्ठाकार सदैव ही आम साहित्यकार से एक कदम आगे रहेगा. और, यकीन मानिए, भविष्य में चिट्ठाकारी के जरिए ऐसे साहित्य रचे जाएंगे जिसकी कल्पना भी हमें (अब भी!) नहीं होगी. कारण ऑब्वियस है. चिट्ठों में संपादकीय संस्तुति, संपादकीय कैंची जैसी चीजों का सर्वथा अभाव और चिट्ठों की सर्वसुलभता, उसका अमरत्व और चिटठों के बहुआयामी-मल्टीमीडिया युक्त होना. प्रस्तुत आलेख बालेंदु के वृहत आलेख से प्रेरित है और इसे रेडियो वार्ता हेतु बेस के लिए तैयार किया गया था. चूंकि ब्लॉगर बनाम साहित्यकार की बहस कई मंचों पर चल रही है, इसे यहाँ प्रकाशित करना समीचीन होगा)

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अगर आप बकरी की लेंड़ी के ऊपर भाषा से अलंकृत कोई कविता लिखते हैं तो क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि उसे कोई प्रकाशक या संपादक प्रकाशित कर आपको उपकृत करेगा? संभवतः नहीं.

परंतु निजी ब्लॉगों के जरिए आप इंटरनेट पर इस तरह की तमाम प्रयोग धर्मी रचनाओं को धड़ल्ले से प्रकाशित कर सकते हैं. और, न सिर्फ प्रकाशित कर सकते हैं, बल्कि इस तरह की आपकी ऑफ़-बीट रचनाओं और सर्वथा नवीन रचनाशैली के प्रशंसकों और पाठकों की कतारें भी लग सकती हैं.

और, जो बकरी की लेंड़ी पर कविता का जो उदाहरण दिया गया है, वो कोई काल्पनिक नहीं है. बकरी की लेंड़ी (http://azdak.blogspot.com/2007/06/blog-post_14.html ) नामक यह कविता, मशहूर साहित्यकार और फ़िल्म समीक्षाकार प्रमोद सिंह ने अपने ब्लॉग अजदक पर लिखा और उस कविता पर बहुत से पाठकों ने उत्साहजनक टिप्पणियाँ भी कीं. जिनमें शामिल हैं – हिन्दी के स्थापित और बहुचर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक – जिनकी तारीफ के ये शब्द थे –

क्या कहने, लिटिल लेंड़ी में क्या अनुप्रास अलंकार साधा है प्रमोदजी। वाह, वाह।“

निजी ब्लॉगों पर संपादक, प्रकाशक और मालिक स्वयं रचनाकार होता है. अतः यहाँ प्रयोग अंतहीन हो सकते हैं, प्रयोगों की कोई सीमा नहीं हो सकती. यही कारण है कि जहाँ आलोक पुराणिक (http://alokpuranik.com/ ) नित्य प्रति अपनी व्यंग्य रचनाओं को अपने ब्लॉग में प्रकाशित करते हैं तो दूसरी ओर भारतीय प्रसाशनिक सेवा की लीना महेंदले (http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/ ) सामाजिक सारोकारों से संबंधित अपने अनुभवों को लिखती हैं.

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या में पिछली छमाही में तेजी से वृद्धि हुई है. पत्रकारों व स्थापित लेखकों के आने से ब्लॉगों के पाठक संख्या में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है. प्रिंट मीडिया में भी हिन्दी ब्लॉगों के चर्चे होने लगे हैं. कथादेश में अविनाश नियमित कॉलम लिखते हैं. कादम्बिनी का अक्तूबर अंक हिन्दी ब्लॉग विशेषांक था, जिसमें बालेंदु दाधीच (http://www.balendu.com/hindi_blogs_article_by_balendu_sharma_dadhich.htm ) ने विस्तार से, बड़े ही शोधपरक अंदाज में हिंदी ब्लॉगों के बारे में बताया है.

आज हिन्दी ब्लॉग जगत् विषयों की प्रचुरता से सम्पन्न हो चुका है, और इसमें दिन प्रतिदिन इजाफ़ा होता जा रहा है. इरफान का ब्लॉग सस्ता शेर (http://ramrotiaaloo.blogspot.com/ ) प्रारंभ होते ही लोकप्रियता की ऊँचाईयाँ छूने लगा. इसमें उन आम प्रचलित शेरों, दोहों, और तुकबंदियों को प्रकाशित किया जाता है, जो हम आप दोस्त आपस में मिल बैठकर एक दूसरे को सुनाते और मजे लेते हैं. ऐसे शेर किसी स्थापित प्रिंट मीडिया की पत्रिका में कभी प्रकाशित हो जाएँ, ये अकल्पनीय है. सस्ता शेर में शामिल शेर फूहड़ व अश्लील कतई नहीं हैं, बस, वे अलग तरह की, अलग मिज़ाज में, अल्हड़पन और लड़कपन में लिखे, बोले बताए और परिवर्धित किए गए शेर होते हैं, जो आपको बरबस ठहाका लगाने को मजबूर करते हैं.

तकनालाजी पर भी हिन्दी ब्लॉग लिखे जा रहे हैं. ईपण्डित (http://epandit.blogspot.com/ ) सेल गुरु (http://cell-guru.blogspot.com/ ) और दस्तक (http://nahar.wordpress.com/ ) नाम के चिट्ठों में तकनालाजी व कम्प्यूटरों में हिन्दी में काम करने के बारे में चित्रमय आलेख होते हैं. हालाकि तकनालाजी विषयों पर अभी हिन्दी में ब्लॉग कम हैं. बहुतेरे हिन्दी ब्लॉग कविता, हिन्दी साहित्य, व्यंग्य और कहानी पर ही हैं. बहुत से ब्लॉगों में समसामयिक घटनाओं पर त्वरित टिप्पणियाँ प्रकाशित की जाती हैं.

कुछ हिन्दी ब्लॉग सामग्री की दृष्टि से अत्यंत उन्नत, परिष्कृत और उपयोगी भी हैं. जैसे, अजित वडनेकर का शब्दों का सफर (http://shabdavali.blogspot.com/ ). अपने इस ब्लॉग में अजित हिन्दी शब्दों की उत्पत्ति के बारे में शोधपरक, चित्रमय, रोचक जानकारियाँ देते हैं जिसकी हर ब्लॉग प्रविष्टि गुणवत्ता और प्रस्तुतिकरण में लाजवाब होती हैं. इस ब्लॉग की हर प्रविष्टि हिन्दी जगत् के लिए एक घरोहर के रूप में होती हैं. मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर के पत्रकार रमाशंकर अपने ब्लॉग सेक्स क्या (http://sexkya.blogspot.com/ ) में यौन जीवन के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियाँ देते हैं. बाल उद्यान (http://baaludyan.blogspot.com/ ) में बाल रचनाएँ होती हैं तो रचनाकार (http://rachanakar.blogspot.com/ ) में हिन्दी साहित्य की हर विधा की रचनाएँ.

अर्थ शास्त्र, शेयर बाजार संबंधी गूढ़ जानकारियाँ अपने अत्यंत प्रसिद्ध चिट्ठे वाह मनी (http://wahmoney.blogspot.com/ ) में कमल शर्मा नियमित प्रदान करते हैं. वे अपने ब्लॉग में निवेशकों के लाभ के लिए समय समय पर टिप्स भी देते हैं कि कौन से शेयर खरीदने चाहिएँ और कौन से निकालने. शेयर मार्केट में उतार चढ़ाव की उनके द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ अब तक पूरी खरी उतरी हैं.

चूंकि ब्लॉग प्रकाशनों में संपादकीय कैंची सर्वथा अनुपस्थित होती है, अतः हिन्दी ब्लॉग जगत भी भविष्य में अवांछित, अप्रिय सामग्रियों से भरने लगेगा इसमें कोई दो मत नहीं. हालाकि इस तरह की ब्लॉग सामग्री हाल फिल हाल नगण्य ही है, मगर जब यह माध्यम चहुँओर लोकप्रिय होने लगेगा तो इसमें फूहड़ता का समावेश अवश्यंभावी है. कुछ ब्लॉग पोस्टों में बेनामी टिप्पणियों के माध्यम से इसका आगाज़ हो ही गया है.

क्या आपको भड़ास, कबाड़खाना, अखाड़े का उदास मुदगर, नुक्ताचीनी, नौ-दौ-ग्यारह, विस्फोट, आरंभ, उधेड़-बुन, बतंगड़, चवन्नी चैप, खंभा इत्यादि नामों में कोई चीज एक सी नजर आती है? जी हाँ, ये सभी हिन्दी ब्लॉगों के नाम हैं और इनमें से तो कई बेहद प्रसिद्ध और सर्वाधिक पढ़े जाने वाले हिन्दी ब्लॉगों में से हैं. उदाहरण के लिए, हिन्दी के पहले ब्लॉग का नाम ही है – नौ दो ग्यारह!

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सुबह 6 बजे अलार्म की घंटी बजी तो मजबूरन ठंड में ठिठुरते हुए उठना पड़ा. सुबह 6 बजे नल आता है. वह भी एक दिन छोड़कर. आज नल आने की बारी थी. और कभी तो ये भी होता है कि उठ कर नल को निहारते रहो... और वो आता नहीं. थोड़ी देर बाद नगर निगम का पोंगा चिल्लाता है - नल शाम को या दोपहर आएगा. और अपनी कमी छुपाने के लिए बहाने भी बनाता है - बिजली सप्लाई सही नहीं मिलने के कारण पानी की टंकिया पूरी भर नहीं पाईँ....

यूँ तो घर पर ट्यूबवेल भी है. पर, जब यह भवन बना था तबके भू-जल स्तर के अनुरूप इसे कोई 175 फीट गहरा किया गया था. आज स्थिति यह है कि 400 फीट में भी पानी नहीं है. लिहाजा फरवरी के बाद ट्यूबवेल सूखने लग जाता है और जब मई जून में वास्तविक में पानी की आवश्यकता होती है, तब यह मुँह चिढ़ाता पूरी तरह सूखा बना रहता है.

तो, बात सुबह की हो रही थी. जैसे ही जमीन में कोई दो फुट नीचे टंकी में लगा नल (उससे ऊपर तो ससुरा पानी का प्रेसर ही नहीं आता!) खोल कर उठना चाहा, टंकी का भारी भरकम लोहे का ढक्कन मेरे घुटने पर धाड़ से गिर पड़ा. दर्द की अनुगूंज सिर तक पहुँच गई और मेरा सिर चकरा गया. तब समझ में आया कि लोग-बाग "दिमाग घुटने में है" जैसे जुमलों का प्रयोग क्यों करते फिरते हैं.

और, अभी तो दिन की शुरूआत ही हुई थी. मेरे नए, परंतु सड़ेले लैपटॉप में समस्या बनी हुई थी तो उसे सुधरवाने इंदौर भेजा था और वह सुधर कर आया भी था, परंतु सुधरने में हालत और ज्यादा खराब थी तो उसे वापस इंदौर भेजा था. दिन के कोई दस बजे रेडिंगटन इंदौर से फोन आया और वहां के तकनीशियन ने एडमिनिस्ट्रेटिव पासवर्ड के लिए पूछा.

मैंने कहा कि भइए, यह तो किसी भी लाइव सीडी या डीवीडी से बूट ही नहीं हो रहा है तो इसके लिए ओएस के पासवर्ड की आवश्यकता क्या है? क्योंकि इसमें स्थापित विंडोज और लिनक्स के तीनों ऑपरेटिंग सिस्टमों में सीडी/डीवीडी पढ़ी ही नहीं जा रही थी. परंतु सामने वाले को समझ नहीं आया या मैं समझ नहीं पाया और बात तनातनी तक पहुँच गई और सामने वाले महोदय ने कहा कि आपने इसमें तीन-तीन पायरेटेड ओएस डाल रखे हैं. गोया कि लैपटीप में सीडी या डीवीडी के नहीं चलने से पायरेसी का सम्बन्ध है. मैंने उसे बताया कि भइए, मेरे एमएसडीएन सब्सक्रिप्शन के चलते उसमें डले विंडो जेनुइन हैं और लिनक्स में तो पाइरेसी जैसी कोई बात ही नहीं है. जाहिर है आधे घंटे की बहस का नतीजा नहीं निकला. अब देखते हैं कि वो लैपटॉप कब और किस हालत में वापस आता है. तब तक काम में खोटी तो होना ही है...

दोपहर को लाइब्रेरी की तरफ जा रहा था तो राम मंदिर ब्रिज पर भारी भीड़ दिखाई दी. नीचे से राम-धुन सुनाई दे रही थी. जाहिर था कि कोई बंदा सरक लिया था दुनिया से. पता चला कि श्री नारायण पहलवान जिन्हें "पहलवान" के नाम से ज्यादा जाना जाता था, स्वर्ग सिधार गए हैं और ये उनकी ही शवयात्रा है. वैसे तो पहलवान के ऊपर कई आपराधिक मामले दर्ज थे और लोगों का कहना था कि उनके कई कानूनी-गैरकानूनी अवैध धंधे थे, मगर उनकी शव यात्रा में हजारों लोगों की भीड़ - जिनमें निम्न आय वर्ग के लोगों की संख्या अच्छी खासी थी और जो स्वतः स्फूर्त होकर शामिल हुए थे. पहलवान ने भले ही सरकारी तौर पर गैरकानूनी काम किया हो, परंतु उसकी क्षत्रछाया में सैकड़ों हजारों की आजीविकाएँ भी चलती रही थीं और पहलवान को ईश्वर की तरह पूजने वाले भी सैकड़ों थे. सैलाना ब्रिज का सारा मार्केट शोक में बन्द था. लाइब्रेरी भी बन्द थी.

कम्प्यूटर पर कुछ फ़ीड पढ़ने बैठा. कुछ दिनों से फ़ीडों का पढ़ना रह गया था. सबसे पहले डिजिटल इंस्पिरेशन की इस पोस्ट पर नजर गई - गूगल एडसेंस अपने प्रयोक्ताओं को क्रिसमस उपहार दे रहा है. अमित को भी यह उपहार गूगल वालों ने भेजा था. परंतु धन्य है भारतीय डाक-तार विभाग. उन्होंने पैकिंग में से 2 जीबी यूएसबी कार्ड तो सफाई से निकाल लिया और खाली बधाई पत्र को रहने दिया. शायद डाकतार विभाग वाले इस बात में यकीन करते हैं कि ग्राहक, तू क्या लाया है और क्या ले जाएगा. और, क्रिसमस के बधाई का महत्व है. बधाई के साथ आए उपहार का क्या? वह तो मिट्टी ही है. अमित के डिजिटल इंस्पिरेशन को तमाम विश्व में लाखों लोग पढ़ते हैं. कोई सोलह हजार से अधिक नियमित ग्राहक हैं. भारतीय डाकतार विभाग का क्या बढ़िया चरित्र चित्रण हुआ होगा उनके मन में!

यह पढ़कर बहुत पहले का मेरा खुद का अनुभव याद आ गया. मेरे भांजे (अभी चेन्नई में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है) ने एक परीक्षा में बढ़िया नंबर लाए तो मैंने उसे यहां से रजिस्टर्ड पार्सल से एक वाकमैन भेजा था. पार्सल जब पहुँचा तो उसमें प्लास्टिक का खिलौना नुमा कैमरा निकला था. वो तो कोरियर कंपनियों का धन्यवाद नहीं तो मेरी सब्सक्रिप्शन वाली कई तकनीकी पत्रिकाएँ व सीडी हर दूसरे चौथे महीने गायब हो जाती थीं और मुझे प्रकाशकों को पत्र लिखकर दुबारा मंगाना पड़ता था.

मैंने यह अनुभव लिख कर कोई दो घंटा पहले पोस्ट करना चाहा था. परंतु इंटरनेट सुबह से लपझप कर रहा था और अभी तो वो पूरा बैठा हुआ था... और इससे पहले बिजली नहीं थी. इनवर्टर की बैटरी को भी कोई डेढ़ साल होने जा रहा था तो यह भी पंद्रह मिनट में सीटी बजाने लगती है और इससे पहले कि आप अपना लिखा समेट लें, यह भक्क से बंद हो जाती है. गनीमत यह रही कि ऑटोसेव सिस्टम में यह सारा लिखा हुआ बचा रहा...

अभी रात बाकी है... उससे निपटना है....


यूँ तो हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 के लिए मैंने कोई तीन-चार महीने से पंजीकरण करवाया हुआ था. माइक्रोसॉफ़्ट की साइट पर वादा किया गया था कि वो सीडी या डीवीडी पंजीकृत पते पर भेजेंगे. परंतु इंतजार करता रहा था – कब वो मिले और कब उसे जांचें-परखें. इससे पहले एमएस ऑफ़िस 2007 का अंग्रेज़ी संस्करण देख चुका था और, उसमें उसके ऊटपटांग किस्म के, कन्फ़्यूजिंग रिबन इंटरफेस के अलावा कोई नई चीज मेरे जैसे साधारण उपयोक्ता के लिए काम की नहीं मिली थी.

आलोक ने कुछ दिन पहले बताया कि अब हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 ऑनलाइन उपलब्ध है तो फिर से उत्सुकता जगी और सुखद आश्चर्य हुआ कि हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 डाउनलोड कर इवेल्यूएशन प्रयोग के लिए उपलब्ध है. इसका कोई 450 मेबा डाउनलोड उपलब्ध है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. परंतु हो सकता है कि आपको पहले यहाँ पर पंजीकरण करवाना पड़े.

इसकी संस्थापना आसान है और आरंभिक संस्थापना स्क्रीन से लेकर अंत तक हिन्दी में ही मेन्यू प्रकट होता है. पूर्व के संस्करणों (एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2003) की अपेक्षा इस नए संस्करण की खासियत यह है कि आप इसके इंटरफेस को हिन्दी या अंग्रेजी में जरूरत के अनुसार बदल सकते हैं, और उपयोक्ता सेटिंग के अनुसार भी सेट कर सकते हैं – यानी उपयोक्ता क के लिए अंग्रेजी तो उपयोक्ता ख के लिए हिन्दी.

हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 की सारी खूबियाँ वही हैं, जो ऑफ़िस 2007 के मूल अंग्रेजी संस्करण की हैं, और जिनके बारे में आप पहले ही बहुत बार पढ़ चुके हैं. बस, इसमें इंटरफेस व सहायता में हिन्दी भाषा को अतिरिक्त रूप से शामिल किया गया है. इसमें हिन्दी का वर्तनी जांचक भी है. परंतु इसका हिन्दी वर्तनी जांचक बहुत ही मूल किस्म का है, और एमएस ऑफिस हिन्दी 2003 जैसा ही है – उसमें कोई सुधार नहीं किया गया है. हिन्दी के कोई 30 प्रतिशत सही शब्दों की वर्तनी यह गलत बताते हुए लाल रंग से रेखांकित कर देता है. संयुक्ताक्षरों और संयुक्त शब्दों का शब्द भंडार इसके शब्दकोश में अब भी नहीं है. ऑफिस 2007 के इस नए संस्करण में हिन्दी वर्तनी जांच संबंधी ढेरों सुधार की गुंजाइशें थीं, मगर वह अब भी अधूरी ही प्रतीत होती है. कुल मिलाकर यदि हिन्दी वर्तनी जांच के नाम से इस अनुप्रयोग को देखा जाए तो यह पूरी तरह सफल नहीं है.


सार यह कि उपयोक्ता हिन्दी एमएस ऑफ़िस 2007 को क्या सिर्फ इसके हिन्दी इंटरफेस के लिए लेगा? संभवतः नहीं. मैं इसे खरीदने से पहले चाहूंगा कि इसमें हिन्दी विशिष्ट सुविधाएँ हों. जैसे कि हिन्दी वर्तनी की पूरी और परिशुद्ध जांच – जिसमें हिन्दी का विशाल शब्द भंडार हो.


हिन्दी ऑफ़िस 2007 में हिन्दी के कुछ फ़ॉन्ट भी संस्थापित हो जाते हैं. इसमें फ़ॉन्ट चयन बक्से में यूनिकोड हिन्दी फॉन्ट के सामने देवनागरी लिखा हुआ आता है इससे हिन्दी फ़ॉन्ट चयन करने में सुविधा होती है. जबकि पुराने हिन्दी आस्की फ़ॉन्ट को पहचानना मुश्किल होता है.

मेन्यू और इंटरफेस का कहीं कहीं पर अनुवाद अपूर्ण है जैसे कि वर्ड आर्ट और स्मार्ट आर्ट अंग्रेजी में ही प्रकट होते हैं.

एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2007 की मदद सामग्री सामग्री प्राय: पूरी तरह से हिन्दी में उपलब्ध है. परंतु हिन्दी कुछ कुछ एलियन (किसी दूसरे ग्रह से आई) प्रतीत होती है, और जो कहा जा रहा है उसे समझने में अच्छी खासी दिक्कतें आती हैं. एक उदाहरण-
वर्तनी की चेकर में नई सुविधाएँ निम्न है:

2007 Microsoft Office system प्रोग्राम में वर्तनी की चेकर को ओर अधिक स्थिर बनाना होगा. इस परिवर्तन के उदाहरण में शामिल है:

व‍िभिन्न वर्तनी की चेकर विकल्प अब वैश्विक है. यदि आप इनमें से किसी एक विकल्प को एक Office प्रोग्राम में परिवर्तित करते हैं तो यह विकल्प भी सभी Office प्रोग्रामों में परिवर्तित हो जाएगा. अधिक जानकारी के लिए, वर्तनी और व्याकरण जाँच कार्य का तरिका परिवर्तित करें देखें.

समान कस्टम शब्दकोश साझा करने के अतिरिक्त, सभी प्रोग्राम्स को समान संवाद बॉक्स का उपयोग कर मैनेज किया जा सकता है. अधिक जानकारी के लिए, वर्तनी की चेकर में शब्दो को जोड़ने के लिए कस्टम शब्दकोष का उपयोग करना देखें.

वर्तनी की चेकर! हुम्म – यह तो वाकई नया जुमला है – पूरा का पूरा वैश्विक! पर फिर, स्पेलिंग जांचक शायद ज्यादा अच्छा होता. इसकी तुक भी मिल रही है और राइम भी!

तो, यदि आप सिर्फ हिन्दी के नाम पर एमएस ऑफ़िस हिन्दी 2007 खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको खासी निराशा होगी. हाँ, यदि आपके पास पहले से ही एमएस ऑफ़िस 2007 है तो आप इसका हिन्दी मल्टीयूजर इंटरफ़ेस मुफ़्त डाउनलोड कर संस्थापित कर सकते हैं, जिसमें हिन्दी के लिए ये अतिरिक्त सामग्री आपको मिल जाएंगी. वैसे भी, हिन्दी भाषियों को अपने कम्प्यूटर में हिन्दी के वातावरण में काम करने का अनुभव सुखद तो होता ही है.



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