September 2007

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अंग्रेजी की किसी भी प्रविष्टि को आज आप कम्प्यूटर तकनॉलाजी के जरिए दर्जनों अन्य भाषाओं जिनमें चीनी और अरबी भी शामिल है, में त्वरित और तत्काल परिवर्तन (पढ़ें, अनुवाद), सिर्फ और सिर्फ एक क्लिक से कर सकते हैं. याहू के बेबल फिश और गूगल के औजार तो थे ही, माइक्रोसॉफ़्ट ने कुछ इसी तरह का एक नया लाइव ट्रांसलेटर औजार अभी हाल ही में जारी किया है. संभवतः निकट के कुछ वर्षों में ही हम अंग्रेजी से हिन्दी और हिन्दी से अंग्रेजी भाषा में सिर्फ एक क्लिक से संपूर्ण अनुवाद जैसी कम्यूटिंग सेवाओं की सहायता धड़ल्ले से लेने लगेंगे. जनसंचार की भाषाई दीवार को कम्प्यूटर तकनॉलाजी ने एक तरह से ध्वस्त कर दिया है.

भोमियो के जरिए हमारे ब्लॉगों को अंग्रेजी (रोमन) समेत आधे दर्जन से अधिक अन्य भारतीय भाषाओं की लिपि में पहले ही पढ़ा जा रहा था. चिट्ठाजगत् चिट्ठा संकलक ने इसमें एक और नया आयाम जोड़ा है.

चिट्ठाजगत्.कॉम के जरिए हिन्दी के समस्त चिट्ठे आसान, पठन-पाठन योग्य रोमन हिन्दी में पढ़े जा सकेंगे. इसका रोमन लिप्यांतरण भोमियो की तुलना में ज्यादा सरल और बेहतर प्रतीत होता है. अब आपके लिखे हिन्दी चिट्ठों को दुनिया के उन तमाम पाठकों तक पहुँचने की गारंटी हो गई है जो हिन्दी बोली को समझ तो लेते हैं, परंतु हिन्दी लिपि को पढ़ना उनके लिए असंभव सा कार्य होता है. कहने का अर्थ यही कि मेरा तेलुगु दोस्त जो मुम्बईया फ़िल्म के गाने व डायलॉग तो बखूबी समझ लेता है, परंतु उन्हें हिन्दी में पढ़ नहीं सकता, अब वो भी चिट्ठाजगत्.कॉम के जरिए, रोमन हिन्दी में आराम से पढ़ सकता है, और उनके मजे ले सकता है. अब ये बात जुदा है कि व्यक्तिगत तौर पर रोमन हिन्दी में लिखा मुझे बिलकुल नहीं सुहाता. परंतु फिर, यदि मैं तेलुगु भाषी होता तो संता बंता के हिन्दी चुटकुले रोमन हिन्दी में पढ़कर मजे अवश्य लेता. और शायद इसीलिए, करोड़ों हिन्दी एसएमएस की आज की सर्वाधिक प्रचलित भाषा रोमन हिन्दी ही है.

कुछ अतिरेकी विचारधारी लोगों को चिट्ठाजगत्.कॉम के इस महान कार्य से 180 अंश की असहमति हो सकती है, परंतु यकीन मानिए, इंटरनेट पर हिन्दी भाषा, हिन्दी सामग्री और हिन्दी चिट्ठाकारों की बेहतरी के लिए यह सुविधा एक और वरदान की तरह ही होगी. और, जैसा कि शास्त्री जी ने अपने चिट्ठे पर लिखा है – 80 प्रतिशत पाठक इस नए जरिए से पहुँचेंगे, तो संभवतः ये बात कुछ हद तक कटु-सत्य भी हो सकती है – जब तक कि हर उपलब्ध कम्प्यूटर पर बाइ डिफ़ॉल्ट देवनागरी हिन्दी की सुविधा मिल नहीं जाती.

चिट्ठाजगत्.कॉम के इस प्रयास का स्वागत और उनके नए नायाब प्रयासों को नमन्.

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winrar hindi support

यह तो आपको पता ही है कि यूनिकोड हिन्दी समर्थित कम्प्यूटरों में आप फ़ाइलनामों को हिन्दी में भी दे सकते हैं. उदाहरण के लिए अब अपनी किसी वर्ड फ़ाइल को  कहानी.doc नाम दे सकते हैं या चित्र का नाम रचनाकार.jpg दे सकते हैं. हालांकि विंडोज तंत्र में फ़ाइलनाम एक्सटेंशन के तीन अक्षर अनिवार्यतः अंग्रेजी में होना आवश्यक हैं. लिनक्स तंत्र में ऐसी बाध्यता नहीं है- यानी किसी वर्ड फ़ाइल का नाम लिनक्स में सिर्फ कहानी भी दिया जा सकता है.

समस्या तब आती है जब हम हिन्दी अक्षर नामधारी फ़ाइलों के साथ कुछ फ़ाइल प्रोसेसिंग का कार्य करते हैं. जैसे कि यदि हम नीरो के जरिए इन हिन्दी अक्षर युक्त फ़ाइलों का सीडी बैकअप बनाना चाहें, तो नीरो के यूनिकोड समर्थित नहीं होने के कारण ये फ़ाइलें नीरो के इंटरफ़ेस में नजर ही नहीं आतीं, और इन फ़ाइलों को आप सीडी पर सीधे बर्न नहीं कर सकते. हिन्दी अक्षरों में लिखी गई नाम वाली फ़ाइलों को इंटरनेट पर ईमेल संलग्नकों के जरिए भेजने में भी खासी असुविधाएँ आती हैं.

इसी तरह फ़ाइल संपीडन औजार – जैसे कि विनजिप इत्यादि में भी यूनिकोड का सही समर्थन नहीं होने के कारण हिन्दी अक्षर नामधारी फ़ाइलों को जिप नहीं कर सकते. यही नहीं, विंडोज के अंतर्निर्मित जिप औजार में भी समस्याएँ आती हैं.

विनरार का नया संस्करण आपको इन समस्याओं का हल दिलाता है. अब आप विनरार (मुफ़्त इस्तेमाल के लिए यहाँ से डाउनलोड करें) के जरिए हिन्दी अक्षर युक्त फ़ाइलों को आराम से जिप कर सकते हैं (जिप फ़ाइल का नाम अंग्रेजी में देना होगा) और फिर इस तरह जिप की गई फ़ाइलों को आप सीडी पर बैकअप ले सकते हैं और ईमेल के जरिए प्रेषित भी कर सकते हैं.

यदि आपकी जानकारी में हिन्दी अक्षर नामधारी फ़ाइलों को हैंडल करने वाले अन्य औजार मसलन सीडी बर्न यूटीलिटी, कोई अन्य बढ़िया जिप फ़ाइल यूटीलिटी, ईमेल क्लाएंट इत्यादि हों तो उन्हें यहाँ पर अवश्य साझा करें.

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cool mail dot com

यदि आपको,

रविरतलामी@भागमभाग.को.इन

या रविरतलामी@भांगड़ारॉक्स.इन

या रविरतलामी@गुल्लीडंडा.मोबी

या रविरतलामी@स्टूडेंटजिंदाबाद

जैसे नए, फंकी, भीड़ से अगल, उलटे-पुलटे दिखाई देने वाले ईमेल पतों की चाहत है तो तत्काल यहाँ चटखा लगाएँ. इससे पहले कि आपका पसंदीदा, धांसू, झकास, अलग-और-उलटा पुलटा दिखाई देनेवाला ईमेल पता कोई झटक ले, आप अपने लिए उसे आरक्षित कर लें.

वैसे, मैंने अपने लिए नया ईमेल खाता रविरतलामी@श्री420.इन बना लिया है.

आप सभी से आग्रह है कि मुझसे भविष्य में पत्राचार इसी पते पर करें.

पुनश्च: - वैसे, कुछ इस तरह के ईमेल पते तो वास्तव में मजेदार लगेंगे-

फुरसतिया@भागमभाग.इन

ईस्वामी@भांगड़ाराक्स.इन

ज्ञानदत्त@बुड़बक.इन

संजय.बेंगानी@बेधर्मी.को.इन

मैथिली@लंका.इन

बैरागी@अनुरागी.इन

.... कल्पनाएँ असीमित हैं...

(उल्लेखित नामधारी दोस्तों से क्षमा याचना सहित...)

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जाहिर है, आपका उत्तर होगा - पाठकों के द्वारा पढ़े जाने के लिए.

आप चाहते हैं कि आपका लिखा पाठक पढ़ें, और अपनी सुविधा से पढ़ें.

ऑनलाइन पढ़ें और मर्जी बन पड़े तो ऑफलाइन पढ़ें. ठीक?

तो फिर आप अपने चिट्ठे की पूरी फ़ीड उपलब्ध क्यों नहीं करते?

शुरुआत में, हो सकता है, आपको लगे कि इससे आपके चिट्ठे को मिलने वाले क्लिक की संख्या में थोड़ी सी कमी नजर आए, परंतु अंततः इस कदम से आपके चिट्ठे को लाभ ही होगा, और आपके चिट्ठे को ज्यादा लोग, और ज्यादा की संख्या में ज्यादा बार पढ़ेंगे.

और, ये बात कई मर्तबा सिद्ध की जा चुकी है, और एक बार और इस बात को पुख्ता किया गया है. मेरे स्वयं के सभी चिट्ठों की पूरी फ़ीड उपलब्ध है. हिन्दी के कुछ अच्छे-चर्चित चिट्ठे जिनकी पूरी फ़ीड उपलब्ध हैं, ये हैं –

और भी कई हैं, और इन्हें रेंडमली चुना गया है.

तो, सार यह है कि आप भी अपने चिट्ठे की पूरी फ़ीड प्रकाशित करें. अपने पाठकों को ये सुविधा दें कि वे आपके लिखे को अपने ईमेल क्लाएंट में, फ़ीड रीडर के जरिए ऑनलाइन या ऑफलाइन जैसे मर्जी बन पड़े पढ़ें. उसे आपके चिट्ठे पर आने के लिए मजबूर न करें. अपने नियमित पाठक की सहूलियत का ध्यान रखें.

हो सकता है आप पूछें कि फ़ीड क्या होता है हमें नहीं मालूम. तो ये कड़ी देखें या फिर यह दूसरी कड़ी. फिर भी, इसे ज्यादा समझने की कोशिश करने के बजाए अपने ब्लॉगर खाते में लॉगिन करें, डैशबोर्ड में जाएँ, सेटिंग्स पर क्लिक करें, फिर साइट फ़ीड पर क्लिक करें और एलाऊ ब्लॉग फ़ीड के सामने चयन बक्से में फुल चुनें. टैम्प्लेट सहेज लें. बस हो गया.

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वर्डप्रेस के लिए वर्डप्रेस में लॉगिन करें, डैशबोर्ड में ऑप्शन्स पर क्लिक करें, रीडिंग पर क्लिक करें, फिर नीचे सिंडिकेशन फ़ीड्स में फुल टैक्स्ट चुनें. अपने टैम्प्लेट को सहेजें. बस, हो गया.

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आपके चिट्ठे की पूरी फ़ीड देने के लिए आपको अग्रिम धन्यवाद. हो सकता है कि मैं आपका लिखा ऑफलाइन पढ़ रहा होऊँ, और टिप्पणी देने की स्थिति में नहीं होऊँ (या एडसेंस विज्ञापनों को क्लिक न कर पाऊँ,) मगर मेरे दिल में आपके लिखे के प्रति हजारों टिप्पणियों का भाव जगेगा, और जो दिली धन्यवाद दूंगा, वो दसियों एडसेंस क्लिकों के बराबर होगा. और मैं आपके चिट्ठे को (जिसकी पूरी फ़ीड मिलती है) अपने पसंदीदा रीडर में शामिल कर लूंगा (अधूरी फ़ीड को शामिल करने का क्या फ़ायदा जब मुझे आपके चिट्ठा स्थल पर ही जाकर पढ़ना होता है!, और इसीलिए कई दफा आपका धांसू लिखा मुझसे पढ़ने से रह जाता है! ! )

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(अंतर्देशीय दोस्त : शरद व सुधाकर)

एक दूसरे पर जान तक न्यौछावर कर देने की दोस्ती की मिसालें यूँ तो कई मिलेंगीं परंतु एक दूसरे पर पिछले तीस वर्षों से अंतर्देशीय पत्रों की नियमित, नित्य न्यौछावर करने की ऐसी मिसाल अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगी.

जी हां, यह मिसाल है दो दोस्तों सुधाकर जोशीशरद भारद्वाज की, जो पिछले तीस वर्षों से नित्य, नियमित, बिना ब्रेक किए, एक दूसरे को अंतर्देशीय पत्र लिखते चले आ रहे हैं.

इंदौर के अभ्यंकर क्लासेज में साथ-साथ पढ़ने वाले इन दो दोस्तों के बीच नित्य अंतर्देशीय पत्र लेखन सफर 1 जुलाई 1977 में प्रारंभ हुआ जब शरद भारद्वाज नौकरी के सिलसिले में भोपाल चले गए. रेडियो कॉलोनी इंदौर में सुधाकर जोशी के घर के सामने क्रिकेट से जुड़े ए. डब्ल्यू. कनमडीकर रहते थे. उनके घर नित्य पोस्टमैन आता और पत्रों का पुलिंदा लाता. सुधाकर को लगा कि मेरे घर पोस्टमैन क्यों नित्य नहीं आता? उसने अपने दोस्त शरद से बात की और इस तरह उनके बीच नित्य अंतर्देशीय पत्र लेखन का सिलसिला चल निकला.

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(श्री सुधाकर जोशी, अपनी धर्मपत्नी व पत्रों के पुलंदों के साथ)

सुधाकर बताते हैं कि शुरुआत में अंतर्देशीय पत्र 15 पैसे का आता था, जिसे अब डाक विभाग ने 2.50 रुपए का कर दिया है, और उसे प्रिंट भी नहीं करता. लिहाजा अब अपना स्वयं का जुगाड़ लगाकर उसे अंतर्देशीय पत्र का आकार देकर काम चलाना पड़ता है.

अब आप कहेंगे कि दो दोस्त आपस में रोज क्या बातें लिखते होंगे?

सुधाकर का कहना है कि आज भी जब वे पत्र लिखने बैठते हैं तो उन्हें पत्र में जगह की कमी पड़ जाती है और कुछ मसाला अगले दिन के लिए छोड़ना पड़ता है.

उन्होंने पत्राचार के जरिए अपने दोस्त को मराठी पढ़ना लिखना सिखाया, आपस में एक कूट भाषा बना डाली, उलटी हैंडराइटिंग से चिट्ठियाँ लिखते रहे, पहेलियाँ, चुटकुले, सवाल-जवाब अंतर्देशीय पत्रों के जरिए चलते रहे. कभी नीचे से ऊपर पत्र लिखा तो वाक्य अंत से आरंभ की ओर लिखा. कुल मिलाकर दोनों ने अपने पत्रों में रोचकता बनाए रखे आज भी सुधाकर को शरद के पत्र का बेसब्री से इंतजार रहता है और वे पोस्टमैन के आने की बाट जोहते रहते हैं. आज के मोबाइल इंटरनेट ईमेल युग में भी उनका अंतर्देशीय पत्र लेखन नित्य, नियमित जारी है. सुधाकर जोशी वर्तमान में स्टेटबैंक ऑफ इंडिया रतलाम में कार्यरत हैं और शरद भारद्वाज भोपाल में हैं.

साल के कोई दस-पंद्रह अंतर्देशीय पत्र जो डाक विभाग की लापरवाही के चलते खो जाते हैं, बाकी सारा का सारा पत्राचार – जो ग्यारह हजार से ऊपर की संख्या में है, सुधाकर के पास उपलब्ध हैं. और इतना ही शरद के पास भी. यह एक किस्म का दस्तावेज है जिसे दोस्ती की मिसाल के नाम पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए. सुधाकर ने इन्हें पैकिंग सामग्री के कार्टन में भर रखा है जिसके इसमें दीमक इत्यादि से खराब होने की संभावना है. इन पत्रों को सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है.

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विभिन्न प्रिंट मीडिया में इस बेमिसाल दोस्ती के चर्चे यदा कदा होते रहे हैं. डीडी1 में विनोद दुआ ने परख कार्यक्रम में इन पर एक कहानी भी प्रसारित किया था. लिम्का बुक ऑफ़ रेकार्ड में इनकी दोस्ती की मिसाल दर्ज है. गिनीज बुक के लिए इन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता है.

आइए, इनकी दोस्ती को नमन् करें एवं इनसे प्रेरणा लें.

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हाल ही में विश्व की नामी सॉफ़्टवेयर-हार्डवेयर कंपनी आईबीएम ने अपने एक नए नवेले ऑफ़िस सूट का बीटा संस्करण आम जनता के मुफ़्त इस्तेमाल हेतु जारी किया. आईबीएम लोटस सिंफनी नाम का यह ऑफिस सूट एक नजर में एक और मुफ़्त उपलब्ध और लोकप्रिय ऑफिस सूट - ओपन ऑफ़िस का प्रतिद्वंद्वी जान पड़ता है. सिंफनी में वर्ड, प्रजेंटेशन और स्प्रेडशीट प्रोग्रामों को एकीकृत किया गया है. स्टार ऑफ़िस को गूगल ने मुफ़्त इस्तेमाल के लिए हाल ही में जारी किया है. लगता है दुनिया मुफ़्त के लंच और मुफ़्त के बीयर की ओर तीव्र-गति से अग्रसर हो रही है.

आईबीएम लोटस सिंफनी को आप मुफ़्त डाउनलोड कर संस्थापित कर सकते हैं. परंतु इसकी डाउनलोड प्रक्रिया बहुत ही लंबी और उबाऊ है. डाउनलोड के लिए आपको इसके साइट पर पंजीकृत होना पड़ता है, जो दो-चरणों में होती है, और वो भी अनर्थक और उबाऊ होती है. आईबीएम की साइट पर दो बार पंजीकृत करने की मेरी कोशिश अधूरी रहने पर मैंने विकल्प की तलाश की.

आईबीएम के साइट पर लोटस सिंफनी की डाउनलोड कड़ी ढूंढने पर परिणाम शून्य नजर आया.

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लिहाजा डायरेक्ट डाउनलोड कड़ी के लिए मैंने गूगल की शरण ली. और मुझे सॉफ़्टपीडिया की कड़ी सहित कुछ और कड़ियाँ तो मिली हीं, बग मी नॉट जैसी सेवा का भी पता चला जो कि बायपास कम्पलसरी रजिस्ट्रेशन के दर्शन पर काम करता है. बग मी नॉट को आप स्वयं के रिस्क पर आजमाएँ. आईबीएम लोटस सिंफनी बीटा विंडोज की डायरेक्ट डाउनलोड कड़ी यह रही. लिनक्स तंत्र के लिए आईबीएम लोटस सिंफनी की डाउनलोड कड़ी के लिए थोड़ी सी खोज बीन करनी होगी.

मुझे इसका टैब्ड इंटरफ़ेस अच्छा लगा. आप कितने ही फ़ाइलों को एक साथ खोल कर रख सकते हैं तथा अलग अलग टैब में वर्ड, प्रजेन्टेशन और स्प्रेडशीट फ़ाइलों को भी खोल कर रख सकते हैं. इसका इंटरफ़ेस कुछ नया सा, बहु-स्तरीय है जिसे अपनाने में आपको कुछ समय लग सकता है.

आईबीएम लोटस सिंफनी के प्रेफ़रेंसेज़ संवाद से आप इसके आचार-व्यवहार को कई तरीके से बदल सकते हैं. मैंने शीघ्र ही इसकी हिन्दी सक्षमता के लिए कुछ जांच परख की.

प्रेफरेन्सेज़ संवाद में एशियाई तथा इंडिक कॉम्प्लेक्स टैक्स्ट लेआउट को सक्षम करने का विकल्प दिया गया है (बाइ डिफ़ॉल्ट यह सक्षम नहीं है). इसे सक्षम करने के उपरांत भी आईबीएम लोटस सिंफनी में हिन्दी इस्तेमाल में समस्याएँ आती रहीं.

वर्ड फ़ाइलों को खोलने पर इसमें रेंडरिंग (हिन्दी पाठ को सही रूप में दिखाना) की समस्याएँ आती रहीं. प्रेजेन्टेशन में एक छोटा सा हिन्दी प्रस्तुतिकरण बनाया गया तो प्रदर्शन के दौरान हिन्दी पाठ कुरूप हो गया.

 

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(वर्ड फ़ाइल में हिन्दी फ़ॉन्ट प्रदर्शन सही नहीं है)

 

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(प्रजेन्टेशन प्रोग्राम में हिन्दी कुछ इस तरह कट-फट जाती है)

 

वैसे, स्प्रेडशीट में हिन्दी का बढ़िया समर्थन दिखाई दिया. एक छोटे से डाटा को भर कर हिन्दी में सॉर्ट किया गया तो इसने बढ़िया परिणाम दिखाए.

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(स्प्रेडशीट में बिना छांटा डाटा, जिसे बढ़िया, अनुक्रम में छांटा गया)

प्रारंभ होने में आईबीएम लोटस सिंफनी अच्छा खासा समय लेता है, और कहीं कहीं यह धीमा चलता प्रतीत होता है. एमएसवर्ड से कोई डेढ़ गुना ज्यादा मेमोरी का इस्तेमाल आईबीएम लोटस सिंफनी करता पाया गया.

इसके हिन्दी फ़ॉन्ट प्रदर्शन की समस्या को दूर कर दिया जाए, व इसमें हिन्दी का कोई वर्तनी जांचक जोड़ दिया जाए, तब तो यह हमारे लिए एक बढ़िया विकल्प रहेगा, अन्यथा हाल-फिल-हाल यह हमारे किसी काम का नहीं.

 

लोटस सिंफनी बीटा की डायरेक्ट डाउनलोड कड़ी

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इस परियोजना को प्रारंभ होने में 145 साल लगे.

तो इसके पूरे होने में कितने साल लगेंगे?

इससे पहले कि आप कुछ भविष्यवाणी करें, कुछ फ़ैक्ट फ़ाइल के लिए यहाँ देखें.

MICROSOFT LIQUOR

माइक्रोसॉफ़्ट ने अब हार्डकोर लिकर बेचना प्रारंभ किया

microsoft blue monstor wine ठीक है, मान लिया, माइक्रोसॉफ़्ट के इस नए प्रकल्प – ब्लू मॉन्स्टर शराब बेचने के पीछे विंडोज़ विस्ता की सफलता-असफलता का कोई लेना देना भले ही न हो, मगर विंडोज़ विस्ता इस्तेमाल करने वाले मेरे जैसे फ्रस्टेटेड लोगों के लिए यह खबर बड़ी राहत देने वाली हो सकती है.

अब हम अपने विंडोज़-विस्ता अ-समर्थित हार्डवेयर-सॉफ़्टवेयर का ग़म ग़लत ब्लू मॉन्सटर मदिरा के जरिए तो कर ही सकते हैं!

और, यदि ब्लू मॉन्स्टर में जरा सा भी गुण विंडोज़ का आ गया तो दारूबाजों को इसका इस्तेमाल संभल कर करना चाहिए. उदाहरण के लिए, कभी भी आपका नशा क्रैश हो सकता है, इस दारू के साथ रतलामी नमकीन का कोई ब्रांड कम्पेटिबल नहीं होगा - यानी उसके साथ इस्तेमाल करने पर अव्वल तो नशा ही नहीं चढ़ेगा या चढ़ेगा तो दन्न से उतर जाएगा, इत्यादि इत्यादि...

(बाजू का चित्र - साभार टेकक्रन्च)

‘पचहत्तर सेकण्ड मात्र’ यदि एकदम सटीकता से कहें तो...

कोई सालेक भर पहले सहारा समय में मैं पहली मर्तबा टीवी कैमरे के रूबरू हुआ था. उस वक्त लाइव प्रोग्राम में मैं एक तरह से अपनी बात कहने में असफल ही रहा था. इस बार सीएनएन-आईबीएन के प्रोग्राम पर भी इसीलिए मैं ज्यादा उत्साहित नहीं था.

क्योंकि मेरा कुंजीपट भले ही थोड़ा सा धनी प्रतीत होता हो, परंतु वाणी पूरी कंगाल और फटेहाल है. और इसका जीवंत उदाहरण इससे बड़ा और क्या हो सकता है?

हालांकि देबाशीष ने अक्षरग्राम पर वीडियो पहले ही दिखा दिया था और नितिन व्यास ने इसकी कड़ी पहले ही उपलब्ध कर दी थी, मगर आधे घंटे के प्रसारित प्रोग्राम (इसे सीएनबीसी आवाज पर हिन्दी में डब कर टेलिकास्ट किया गया था, बाद में मेरे एक मित्र ने फोन कर मुझे बताया) में से रतलामी सेव को कवर करती डेढ़ मिनट की स्टोरी आप एक बार फिर से नीचे यू-ट्यूब के एम्बेडेड वीडियो कड़ी पर देख सकते हैं.

इस बीच, केडीई4 के हिन्दीकरण के लिए राजीवगांधी फ़ाउन्डेशन व सराय के संयुक्त तत्वावधान में मेरी (लगातार, चौथी) परियोजना स्वीकृत की गई है. छः महीने की इस परियोजना में कोई डेढ़ लाख से ऊपर हिन्दी वाक्यांशों का अनुवाद/पुनरीक्षण/संशोधन सम्मिलित है. तो इस बीच पाठकों को हिन्दी चिट्ठाकारी में यदा-कदा मेरी शीतनिष्क्रियता सी महसूस हो सकती है – खासकर टिप्पणी लेने-देने व पाठकों की टिप्पणियों के जवाब देने के मामले में – इस हेतु आप सभी से अग्रिम क्षमा.

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बीलेटेड हिन्दी दिवस पर लीजिए पेश है कुछ कबाड़ी, भड़ासी और भवानी टाइप-नामधारी हिन्दी चिट्ठे

 

भीड़ से अलग कुछ करने का, अलग कुछ दिखने का अपना अलग ही मजा है. इसी क्रम में कुछ नेगेटिव आइकन - कुछ ऋणात्मक प्रतीकों जोड़ दिया जाए तो बात और भी बन जाती है.

पिछले कुछ अरसे से हिन्दी चिट्ठों में ऐसे ही, ढेरों की संख्या में कबाड़ी और भड़ासी नामधारी चिट्ठों/चिट्ठाकारों का प्रादुर्भाव हुआ है. इसकी शुरूआत संभवत: पंगेबाज नाम के चिट्ठे/चिट्ठाकार से हुई थी.

अब ये बात जुदा है कि नाम में क्या रखा है और यथा-नाम-विपरीतो-गुणः की तर्ज पर चिट्ठों/चिट्ठाकारों के नाम से उसकी सामग्री का कोई लेना देना भले ही न हो.

आइए, ऐसे ही कुछ चिट्ठों/चिट्ठाकारों पर एक नजर डालते हैं. इनमें से बहुत से चिट्ठे टंबलर के जरिए स्वचालित ढूंढे गए हैं, और हो सकता है कि इनमें से कई अभी चिट्ठा-संकलकों पर दर्ज भी न हों.

  1. बाथरूम सिंगर शो
  2. यूजलेस मी
  3. हिलहिलेरियस.वर्डप्रेस.कॉम
  4. 2वेजिटेरियनिज्म
  5. चिट्ठाचोर (सिर्फ आमंत्रितों के लिए. इसे पढ़ने हेतु आपको इनका निमंत्रण आवश्यक होगा)
  6. शाई-टू-थिंक का डिमाइस-ऑव-लव
  7. नाम में क्या रखा है? तो इस चिट्ठे के नाम MBM 1983 PET 1 का क्या मतलब है?
  8. मेस्त्रोराइटर का माइंड्ज आई
  9. विंडएनर्जीमैन का मेरा दरबार
  10. द प्रिंस ऑफ वर्सिया का वर्जिनियर (मजेदार हास्य कविता की कड़ी – अवश्य पढ़ें)
  11. ब्लास्टटाइम्स
  12. इसेंट्रिक विजन का इन लव विद इंटेलेक्ट
  13. बेवजह
  14. डीमॉन का एटगूगल.ब्लॉगस्पॉट.कॉम
  15. एम्प्टीहेड का गालीनामा
  16. एक जिद्दी धुन
  17. डिसइल्यूजन्ड-मी
  18. नेटगुरू का पोएट्री-ग़ज़ल
  19. ऑनलाइनकचरा
  20. हरकारा का जनज्वार
  21. गत्यात्मकज्योतिष
  22. जानवर/आवारा का तेरेनाम...
  23. मेनइनब्लैक (एमआईबी) का ये क्या हो रहा है
  24. मास्टरक्राफ़्ट्समैन का सेंगुइन विस्ता

--- यूँ तो ऐसे और भी हैं, और इनमें से बहुतेरे हिन्दी के वन-पोस्ट-वंडर ही हैं, पर अभी के लिए सिर्फ इतना ही.

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कर्मा-फैन हमारे जैसे लोगों के लिए ही है. जो कर्म करते हैं तो लागत से दो-गुना, तीन गुना, कई-कई गुना फल की इच्छा पालते हैं.

 

कर्मा-फैन इंटरनेट पर बेहद उम्दा, नया और नायाब विचार है. कम से कम चिट्ठाकारों के लिये तो है ही.

 

वैसे तो यह दो तरफा  काम करता है, परंतु इसका टैग-लाइन है-

 

गेट सपोर्ट फ्रॉम योर फैन्स!

 

यानी अपने चिट्ठा फैनों से आप कर्मा-फैन के जरिए सहयोग व भरणपोषण स्वरूप नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं. जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें?

इस काम के लिए कर्मा-फैन चिट्ठाकारों व चिट्ठापाठकों के सहयोग के लिए तत्पर है. आप कर्मा-फैन से जुड़कर अपने चिट्ठे में अपने पाठकों से सहयोग प्राप्त तो कर ही सकते हैं, आप अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों को नकद राशि देकर उनका उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं.

तो, यदि आपको इस चिट्ठाकार को कुछ गिव-बैक, कुछ धन्यवाद स्वरूप वापस करना है तो कर्मा-फैन में अभी ही खाता बनाएँ. यदि आप चिट्ठाकार हैं और अपने पाठकों से कुछ आशीर्वाद (मात्र आशीर्वचन नहीं,) स्वरूप, प्रशंसा स्वरूप ‘नकद’ प्रसाद प्राप्त करना है तब तो कर्मा-फैन आपके लिए ही है.

बहुत से चिट्ठा-पोस्टों – खासकर अंग्रेजी भाषा के – में पे-पॉल की कड़ी लगी हुई होती है जिसमें लिखा होता है सपोर्ट दिस ब्लॉग. रचनाकार व इस चिट्ठे में मैंने भी बहुत दिनों तक यह ‘गहना’ लगा रखा था – परंतु जब एक सेंट का भी सपोर्ट कहीं से नहीं मिला तो दुःखी मन से इसे हटा दिया था.

 

कर्मा-फैन ने एक नई आशा तो जगाई है. अब इसका लिंक लगा देखते हैं कि हमारे पाठक ‘वास्तव’ में प्रशंसा करते हैं या फिर ‘ऊपरी’.

 

और अगर आप स्वयं चिट्ठाकार हैं तो फिर आप भी अपने पाठकों की असली प्रशंसा परख लीजिए...

 

(डिस्क्लेमर – कर्मा-फैन की जांचपड़ताल इस चिट्ठाकार द्वारा नहीं की गई है, व इस प्रविष्टि को मात्र हँसी-ठट्ठा के रूप में लिया जाए)

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जी हाँ, अब यह सुविधा विंडोज लाइव राइटर के नए संस्करण बीटा 3 में उपलब्ध है. अब आपको अपने चित्रों को ब्लॉगर पर अपलोड करने के लिए किसी अन्य तीसरे औजार की आवश्यकता ही नहीं है. बस चित्र को कॉपी पेस्ट कर उचित स्थान पर लाइव राइटर में पोस्ट पर चिपका दें और अपना पोस्ट पब्लिश कर दें. ठीक जैसा का तैसा वह ब्लॉगर पर प्रकाशित हो जाएगा.

रचनाकार पर यह ब्लॉग पोस्ट चित्र समेत विंडोज लाइव राइटर के जरिए ही किया गया है.

ब्लॉगिंग एक कदम और आसान बना दिया है लाइव राइटर ने.

विंडोज लाइव राइटर बीटा 3 (नया, ताजा तरीन संस्करण) संस्करण यहाँ से डाउनलोड करें

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क्या आपको चिट्ठा फैटीग्यू हो गया है? क्या आपको अपना चिट्ठा लिखने के लिए माल मसाला नहीं मिलता या माल-मसाले का भंडार है, परंतु उससे कोई नावां नहीं मिलता? क्या आप अपने चिट्ठे को धांसू पोस्टों से भर देना चाहते हैं? या आप चिट्ठा लिख-लिख कर एडसेंस की कमाई को भी मात देना चाहते हैं?

 

तो आपके लिए एक शानदार मौका है.

 

आज ही अपनाएँ ये  धांसू आइडिया. इसके लिए बस यहाँ चटका लगाएँ और अपनी तकदीर बदल कर रख दें.

 

और, यकीन मानिए, ये कड़ी किसी अंग्रेजी चिट्ठे की नहीं है.

 

(भाग 1 में आपने पढ़ा कि सीएमसी वेल्लोर में चिकित्सकीय परीक्षण के लिए आवश्यक राशि जमा करवाने के लिए हम टोकन लेकर काउन्टर पर इंतजार कर रहे थे...)

 

मैंने चारों ओर जरा बारीकी से निगाहें फिराईं. मेरे बाजू की कुर्सी पर एक सज्जन बैठे थे. वो बिहार से आए थे. मैंने जरा सी बात छेड़ी कि लाइन तो बहुत लंबी है. पता नहीं कब नंबर आएगा. बस फिर क्या था. वह तो जैसे भरे बैठे थे - फट पड़े.

उन्होंने बताया कि वे कोई पंद्रह दिन से वहां डेरा डाले बैठे हैं. उनकी पत्नी को किडनी स्टोन संबंधी कुछ जांच पड़ताल व चिकित्सा करवानी थी. इसके लिए वे कोई छटवीं दफा जांच फीस जमा करवाने के लिए लाइन में बैठे हैं. और हर बार कोई दो से पाँच घंटे की लाइन में उन्हें लगना पड़ा है. यही नहीं, परीक्षण केंद्रों की तो और भी बुरी गत है. एक-एक परीक्षण के लिए बहुत लंबी लाइन लगती है और वो भी बेहद उबाऊ और बीमार कर देने वाली होती है.

भीड़ में आधी से अधिक संख्या में बिहार, झारखंड और विशेष कर बंगाल के मरीज दिखाई दे रहे थे. बंगाली मरीजों की अधिकता के कारण अस्पताल में कई स्थानों पर अंग्रेजी, तमिल के साथ बंगाली भाषा में भी निर्देश दर्ज थे. बंगाल में पच्चीस वर्षों से राज कर रही साम्यवादी कम्युनिस्ट सरकार का नंगा चेहरा इन मरीजों के उदास, बीमार चेहरों से स्पष्ट झलकता दिखाई दे रहा था – वेल्लोर जैसी टक्कर का कोई हस्पताल सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में पूरे बंगाल में कहीं भी क्यों नहीं बन पाया अब तक? मप्र, बिहार और झारखंड की बात तो ख़ैर छोड़ ही दें.

कोई पाँच बजे मेरा टोकन नंबर प्रदर्शित हुआ तो लगा कि एक जंग जीत लिया हमने. काउंटर पर पैथॉलाजी, सीटी स्कैन, एन्डोस्कोपी इत्यादि के विभिन्न जाँचों के लिए कोई आधा दर्जन कम्प्यूटर जेनरेटेड पर्चियाँ हमें दी गई. कैश काउन्टर के बगल में ही पैथालॉजी के लिए जांच नमूने एकत्र करने का काउंटर था. वहां पहुँचे तो देखा कि यहाँ भी कोई डेढ़ सौ से ऊपर मरीज लाइन में लगे हैं – अपने रक्त इत्यादि के नमूने देने हेतु. लाइन के लिए बैंचें लगाई गई थी, जिसमें मरीज एक एक इंच कर आगे खिसकते जा रहे थे. मेरे ठीक पीछे एक बंगालन मरीज थी. वह भीड़, लाइन और लग रहे समय से ज्यादा ही परेशान हो रही थी. मैंने भीड़, लाइन और इसी लग रहे समय के कारण हो रहे अपने भीतर की परेशानी को छुपाते हुए उससे थोड़ा शांति बनाए रखने को कहा तो वह उबल पड़ी. उसने बताया कि पिछले दो दिनों में वह तीन बार यहाँ जाँच नमूने देने के लिए लाइन में लगी है, और उसे हर बार दो-तीन घंटे का समय लगा. सिस्टम नाम की कोई चीज ही नहीं है यहाँ. न तो प्रबंधन है, न भीड़ प्रबंधन. और ऊपर से स्टाफ सीधे मुंह बात ही नहीं करता. किसी से कुछ पूछो तो बस कहता है – वेट वेट वेट.

कोई दो घंटे बाद मेरा नंबर आया तो रक्त व मूत्र परीक्षण हेतु नमूने लिए गए तथा मुझसे कहा गया कि रक्त का एक नमूना खाली पेट लिया जाएगा उसके लिए अगले दिन सुबह आओ. पता चला कि ओपीडी में नमूने एकत्र करने का कार्य सुबह सात बजे से प्रारंभ होता है, परंतु इसके लिए लाइन सुबह पाँच बजे से ही लग जाती है. तौबा! भगवान बचाए, इस लाइन लगने की बीमारी से!

मैंने रेखा से कहा कि यहाँ जांच इत्यादि करवाने से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि मरीजों के समय का यहां किसी के पास कोई मूल्य ही नहीं है. यहाँ समय नष्ट करने का कोई फ़ायदा ही नहीं है. पर वह अडिग रही. उसने कहा कि इतनी दूर आ गए हैं, तो कुछ भी हो, जांच करवाकर ही चलेंगे. पर जाने क्यों मुझे लग रहा था कि यहाँ जांच के नतीजे सिफर ही रहेंगे...

चूंकि 29 अगस्त को जांच पूरी ही नहीं हो पाई थी, अतः अब हमें ईएनटी3 को दिखाने के लिए अगली ओपीडी 1 सितम्बर की तारीख मिली – यानी चौथे दिन – बीच के दिन आप अनावश्यक बिना काम के रुके रहें – भले ही आप बाहर से आए हैं, बाहर होटल में रुके हैं, पर उससे क्या? और अगली तारीख भी पक्की तब होगी जब आप इसके लिए विशेषज्ञ के एप्वाइंटमेंट की फीस काउंटर पर पहले से जमा कर दें.

तो बीच के दिन को हमने हृदय-रोग जांच के लिए लगाया. 30 अगस्त को दोपहर ढाई बजे का समय इकोकार्डियोग्राम जाँच के लिए दिया गया. वहां कार्डियोलॉजी में हम नंबर लगा कर इंतजार करने बैठ गए. दो-चार मरीज और उनके परिजन पहले ही चिल्ला रहे थे – हम सुबह से बैठे हैं, हमारा नंबर अब तक नहीं आया. न कोई टोकन न कोई नंबर सिस्टम, बस अंदर से एक मरीज को पुकारा जाता तो उस नाम का प्राणहीन मरीज अचानक चेतनावस्था को प्राप्त हो उछल बैठता और कॉरीडोर से लगभग दौड़ते हाँफते इको रूम की ओर चल पड़ता. क्षणांश को तो वह भूल भी जाता कि वह हृदय-रोगी है, और उसे दो कदम चलने में ही पसीना आता है और हाँफ छूटने लग जाता है.

कोई चार बजे मेरा नाम पुकारा गया. मेरे भीतर भी जान आई. हृदय जोरों से धड़कने लगा. चलो अपना नंबर तो आया.

मेरे इको के लिए जारी कम्प्यूटर जनित जांच पर्ची को पकड़े एक तकनीशियन अंदर इको लैब में थी. उसकी सूरत ही बता रही थी कि वो रोबॉटिक तरीके से सैकड़ों हजारों मरीजों के इको कर कर के निहायत ही बोर हो चुकी थी और आज उसका आइन्दा आगे कोई इरादा भी नहीं था. उसने मुझे कहा कि कल सुबह आठ बजे आओ. मैंने प्रतिवाद किया कि मैं दोपहर दो बजे से जांच के लिए बैठा हूँ, और मुझे अब बताया जा रहा है कि कल सुबह आओ. कल सुबह तो मेरा कार्डियोलॉजिस्ट के साथ एप्वाइंटमेंट है, जो इस जांच के बगैर कैसे संभव होगी?

उसने कुछ सुना ही नहीं और कहा कि कल सुबह आओ. और पर्ची में नया समय डाल कर मुझे पकड़ा दिया.

मेरा दिल डूब गया. कल सुबह फिर इंतजार करना होगा. साढ़े आठ बजे के नंबर के लिए आठ बजे आकर लाइन में बैठना होगा फिर एक अंतहीन इंतजार में लगना होगा – अपने कान लैब की ओर उठाए हुए – न जाने कब अपना नाम पुकार लिया जाए.

यह सारा सिलसिला मुझे बेहद उबाऊ, निरर्थक, कष्टप्रद, अस्वास्थ्यकर और न जाने क्या क्या प्रतीत हो रहा था. मेरा बस चलता तो मैं कब का भाग खड़ा होता वहाँ से. मगर मेरे स्वास्थ्य की चिंता मुझसे ज्यादा रेखा को है, और अगर मैं उसकी जगह होता तो भी वही करता जो वो कर रही थी. उसने कहा कि जाँच करवाकर ही चलेंगे, जब आ ही गए हैं. मैंने उसे लालच दिया कि चलो आसपास घूम लेते हैं – तिरूपति दर्शन कर लेते हैं – जो जांच का पैसा सीएमसी वेल्लोर के खाते में कम, और होटल में रहने में और भोजन में ज्यादा खर्च हो रहा है, उसे तिरुपति में दान कर देते हैं – भगवान की प्रतिदिन की करोड़ों की कमाई में कुछ रुपये और जोड़ देते हैं – परंतु उसने मेरे इस नायाब विचार को अनसुना कर दिया. रेखा, तू ने ये अच्छा नहीं किया. भगवान तिरूपति अवश्य तुझसे नाराज हो जाएंगे.

बहरहाल, अगले दिन, जबरन, लगभग खींचते हुए ही, रेखा मुझे कॉर्डियोलॉजी में ले गई. पर्ची लेकर मुझे फिर से इंतजार करने को कहा गया. कोई दस बजे मेरा नाम पुकारा गया. जब इको करने के लिए तकनीशियन ने पन्ने पलटे तो पुरानी रपटों में कॉम्प्लीकेटेड केस हिस्ट्री होने के कारण उसने किसी डॉक्टर को फोन किया. डॉक्टर कहीं व्यस्त था, अतः वह कोई आधा घंटे के अतिरिक्त इंतजार के बाद आया. उसके आने तक मुझे फिर से एक बार बाहर बिठा दिया गया. डॉक्टर मुखर्जी ने कोई बीस-पच्चीस मिनट इको टेस्ट किया. इस दौरान उन्होंने मुझसे पूछा कि मुझे कोई तकलीफ तो नहीं हो रही?

मैंने न में जवाब दिया. और फिर कहा कि हाँ, एक तकलीफ हो रही है. उन्होंने एकदम से पूछा क्या – उनके हँसमुख चेहरे पर अचानक गंभीरता झलकी. मैंने कहा – यहाँ का प्रबंधन, भीड़ प्रबंधन बहुत ही खराब है. हर किसी को अनावश्यक, अकारण इंतजार करना होता है. जांच के लिए तो बात समझ में आती है, पर यहाँ तो जांच फीस जमा करने के लिए भी मरीजों को पाँच पाँच घंटे तक इंतजार करना होता है. यह तो बहुत ही कष्टकारी है. उनके चेहरे पर व्यंग्यात्मक स्मित की लहर क्षणांश को झलकी – हाँ, ये तो है – हर तरफ केओस (chaos) जैसी सिचुएशन है. भीड़ बहुत ज्यादा है. कैपेसिटी से कई-कई गुना ज्यादा.

मेरे पेसमेकर टेस्ट के लिए पेसमेकर मिनिलैब में परीक्षण के लिए भी पर्ची दी गई थी. पेसमेकर मिनिलेब को ढूंढने में ही काफ़ी वक्त जाया हो गया. रिसेप्शनिष्ट से लेकर हेल्प डेस्क और समाज सेवक – हर किसी ने अलग-अलग मुकाम बताया. बाद में पता चला कि यह तो ट्रेड-मिल स्ट्रेस टेस्ट वाले कमरे में है! मेरा पेसमेकर सीमेन्स का पेस-सेटर ब्रांड का था. उसे जांचने के लिए चेन्नई से तकनीशियन को दूसरे दिन बुलाने की बात की गई. मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था सिवाय इसके कि हाँ कहूं. दूसरे दिन पता चला कि वो तकनीशियन नहीं आ पा रहा है.

बहरहाल, इको जाँच के बाद हम कार्डियोलॉजी ओपीडी में कार्डियोलॉजिस्ट के पास उनकी राय लेने के लिए पहुँचे, जिसके लिए हम पहले ही एक और बार लाइन में लगकर एप्वाइंटमेंट की राशि जमा कर चुके थे. पता चला कि विशेषज्ञ आज थोड़ा देर से आएंगे. वैसे तो पर्ची में सुबह 10-30 बजे का समय लिखा था.

हम फिर वहाँ इंतजार करते बैठ गए. अपना नाम पुकारे जाने के इंतजार में. इतने दिनों से इंतजार करने की आदत सी पड़ गई थी हर कहीं, अत: हम कोई आधा दर्जन पत्र पत्रिका साथ लेकर बैठ गए इंतजार कक्ष में. शाम कोई छः बजे मेरा नाम पुकारा गया.
यानी सुबह साढ़े आठ बजे से हम हस्पताल में थे और कार्डियोलॉजिस्ट के लिए सुबह ग्यारह बजे से इंतजार में थे. कोई हृदय-रोगी जिसे दिल का दौरा पड़ा हो तो सोचिए कि इतनी देर में वो कहाँ से कहाँ पहुंच जाएगा.

ई-एन-टी में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही. तमाम परीक्षणोंपरांत हमें विशेषज्ञ की राय जानने के लिए उससे मिलने के लिए फिर से एप्वाइंटमेंट फीस काउन्टर पर नंबर लगा कर अदा करनी पड़ी. हमें सुबह 10.30 का समय दिया गया था – कम्प्यूटर-जेनरेटेड पर्ची से जिसमें मरीज को लगने वाले प्रत्याशित समय को ध्यान में रख कर समय दिया जाता है – परंतु हमारा नंबर लगा 2.30 बजे.

ऐसा नहीं था कि इस तरह की स्थिति हर जगह पाई गई हो. कैट स्कैन पर तथा ऑडियो टेस्ट लैब में स्थिति ठीक-ठाक थी. तकनीशियन, जो समय दिया गया था, उस पर ध्यान दे रहे थे, और बाकायदा उसके बाद लगने वाले संभावित समय के बारे में बताकर आपसे इंतजार करने का आग्रह कर रहे थे. मिसाल के तौर पर ऑडियो टैस्ट लैब में तकनीशियन ने मुझसे कहा कि आप दोपहर का खाना खाकर ठीक 1.30 बजे आइए. और जब मैं ठीक 1.30 पर वहाँ पहुंचा तो वो फिर पूछी – खाना खा लिया? मेरे हाँ कहने पर उसने कहा कि सिर्फ 5 मिनट और इंतजार करिए, आपको बुलाते हैं – और फिर पाँच मिनट में ही मेरा नाम पुकारा गया.

परंतु स्थिति कहीं पर ज्यादा ही दारुण थी. जब मेरा इको टेस्ट लिया जा रहा था तो कोई सीनियर डॉक्टर, जिसके जिम्मे संभवत: प्रबंधन भी था – वह आया. थोड़ी देर उसने स्क्रीन पर डॉ. मुखर्जी को इको करते देखा जो कि इन सीनियर डॉक्टर के आने पर इज्जत से एक पल के लिए खड़े भी हुए थे, और कहा – गुड लेफ़्ट वेंट्रिकुलर फंक्शन. और फिर बाजू में खड़े एक सीनियर तकनीशियन को बड़े रूआब और रूखे तरीके से डांटने लगे – यू सीनियर्स आर नाट डूइंग योर ड्यूटीज़. और जब मैं इको लैब से बाहर आया तो पाया कि ये सीनियर तकनीशियन महोदय ‘उतारा’ कर रहे थे – वे मरीजों को चमका-चमका कर लाइन से लगा रहे थे, परिजनों को डांटकर वहाँ से भगा रहे थे...

वेल्लोर में चिकित्सकीय परीक्षणों में मेरे हृदय व पेसमेकर की स्थिति अच्छी पाई गई. ये बात अलग है कि डॉक्टर  ने रिपोर्ट लेने के लिए जो पर्ची दी थी उसे मैंने वहीं फाड़ दिया - क्योंकि उसके लिए अलग से 50 रुपए जमा करवाने थे - और जी हाँ, लाइन में लगकर! इस बात के लिए रेखा बहुत देर तक मुझसे नाराज रही - उसने कहा कि रिपोर्ट की तुम्हें न सही, मुझे जरूरत है - कल को इसकी आवश्यकता पड़ सकती है.  कान की समस्या एलर्जी के कारण हो रहे राइनाइटिस की संभावना के कारण बताई गई – जो कि जाहिरा तौर पर सही ही लगती है – रतलाम की धूल-धुँआ भरी सड़कों पर यदि मैं दस-पंद्रह मिनट भी ड्राइव करता हूँ तो मुझे खांसी आने लगती है, और सांस रुकने लग जाती है.

फिर भी, मैं, एक मरीज, वेल्लोर से एक 'बड़ा मरीज' बन कर लौटा. नामी संस्थान की मेरे मन में बैठी छवि ध्वस्त हो गई. मैं यह कसम खाकर वहाँ से लौटा – यदि मैं मरता भी होऊँ तो उस संस्थान में दुबारा नहीं जाऊंगा. चार दिनों में मैंने वहाँ चार करोड़ मौतें देख जो लीं – इंतजार का एक एक पल हजार मौतों के बराबर होता है भिड़ू, तुझे मालूम नईं क्या?

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मैं पिछले दिनों देश के पहले नंबर के चिकित्सा संस्थान क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर जो कि सीएमसी वेल्लोर के नाम से जाना जाता है, की चिकित्सा यात्रा (मेडिकल टूरिज़्म) पर था.

मेरे लिए तो यह चिकित्सा यात्रा ही थी. मैं कोई छत्तीस घंटे की अनवरत रेल यात्रा कर अपनी चिकित्सकीय जाँच करवाने देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पहुँचा जो था.

दरअसल मुझे कुछ समय से – बल्कि कहिए कि कुछ वर्षों से अपने दोनों कान में कुछ भारी-पन सा महसूस होता आ रहा है और खासकर तब जब मैं करवट लेकर सोता हूं. और यदा कदा कान में दर्द भी होता है. स्थानीय नाक-कान-गला रोग चिकित्सक तो दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाई देने के अलावा ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे थे तो कोई तीन साल पहले इंदौर के विशेषज्ञ को भी दिखाया था. वहाँ पर सीटी स्कैन के जरिए भी ‘कुछ’ नहीं निकला. परंतु अभी कुछ दिनों से परेशानी इतनी ज्यादा हो रही थी कि मुझे एलीवेटेड बैड का सहारा लेना पड़ रहा था.

इसी बीच मेरे एक मित्र ने बताया कि सीएमसी वेल्लोर का ईएनटी विभाग बहुत अच्छा है. उन्होंने अपने स्वयं के अनुभव भी बताए. और, उनसे वार्तालाप खत्म होने के पहले ही मैंने अपने आपको सीएमसी वेल्लोर के जालस्थल पर पाया.

सीएमसी वेल्लोर के जालस्थल पर और भी तमाम जानकारियों के अलावा एक बात प्रमुखता से दर्ज की गई है – वह यह कि आउटलुक तथा इंडियाटुडे के सर्वे के अनुसार सीएमसी वेल्लोर भारत का अग्रणी चिकित्सा-सेवा संस्थान है.

जाल-स्थल में विभिन्न विभागों के ई-मेल पते भी दिए गए हैं. मैंने तत्काल ही भारत के पहले नंबर के चिकित्सा संस्थान – सीएमसी वेल्लोर के ईएनटी विभाग 1 को एक ई-मेल अपनी समस्या दर्शाते हुए चिकित्सा हेतु अप्वाइंटमेंट की तारीख तय करने के लिए भेजा. साथ ही हृदय-रोग विभाग को भी एक ई-मेल अप्वाइंटमेंट की तारीख तय करने के लिए भेजा – मेरे हृदय की शल्य चिकित्सा तथा पेसमेकर इम्प्लांट को कोई 12 साल पूरे हो रहे थे तो इनका वार्षिक परीक्षण भी लगेहाथ करवा लेने की योजना थी.

एक दो दिन तो ई-मेल के प्रत्युत्तर के इंतजार में बीते. मगर जब कोई सप्ताह भर बीतने के बाद भी सीएमसी से कोई जवाब नहीं आया तो मैंने एक और ई-मेल ईएनटी1 को किया और इस दफा ईएनटी2 तथा ईएनटी3 को भी इसकी प्रतिलिपि भेजी. इस बार ईएनटी3 से प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ जिसमें जांच की तारीख 29 अगस्त दी गई थी. ईएनटी1 तथा 2 से व कार्डियोलॉजी विभाग से अंत तक कोई जवाब नहीं आया.

हम (मैं, मेरी पत्नी व हमारी बिटिया) निर्धारित तिथि पर सुबह 4 बजे वेल्लोर रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म क्र. 1 पर उतरे. ठीक सामने 24 घंटे सेवारत सीएमसी हेल्प डेस्क दिखाई दिया, जिसे देख कर मन प्रसन्न हो गया. हेल्पडेस्क में बताया गया कि नए मरीजों को एक पंजीकरण फ़ॉर्म भरना होता है और ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने के लिए निर्धारित शुल्क जमा करना होता है. वहाँ से एक फ़ॉर्म भी दिया गया. हेल्पडेस्क में बताया गया कि ओपीडी सुबह सात बजे खुल जाता है.

हम निर्धारित समय पर ओपीडी में पहुँचे तो पता चला कि नए मरीजों के लिए पैसा जमा करने के कोई पांच काउन्टर हैं, और वहां टोकन लेकर ही पैसा जमा किया जा सकता है क्योंकि बहुत भीड़ हो रही थी. बहरहाल हमने भी टोकन लिया और अपने टोकन क्रमांक के प्रदर्शित होने का इंतजार करने लगे.

कोई एक घंटे बाद हमारे टोकन का नंबर प्रदर्शित हुआ तो डॉक्टर की फीस जो इस इंतजार के बदले में बहुत ही मामूली सी थी, जमा किया गया, जिसके जरिए डाक्टर से मिलने के लिए कम्प्यूटर जनरेटेड पर्ची निकाल कर हमें दिया गया. साथ ही हाथ में बांधने हेतु हैंड बैंडेज दिया गया जिसे हाथों में पहना देख कर ही गार्ड ऊपर के माले में, जहाँ जांच होती थी, लोगों को जाने देता था.

हमें हेल्प-डेस्क पर बताया गया था कि जनरल एप्वाइंटमेंट लेने पर जूनियर डॉक्टर देखते हैं और प्राइवेट एप्वाइंटमेंट लेने से सीनियर डॉक्टर देखते हैं. हमने प्राइवेट एप्वाइंटमेंट लिया था. हमारी पर्ची को देखकर प्राइवेट मेडिकल रेकार्ड ऑफिस में हमें बताया गया कि चूंकि आप पहली दफ़ा यहाँ आए हैं अत: आपको पहले जूनियर डॉक्टर ही देखेंगे फिर आपको विशेषज्ञ देखेंगे. हमारी पर्ची लेकर वहां कमरा नं 4 के सामने इंतजार करने को कहा गया.

चारों तरफ़ भीड़ बढ़ने लगी थी. कमरा नं 4 के सामने कोई बीस-पच्चीस कुर्सियाँ थीं, जो सभी भर चुकी थीं. लिहाजा हम कॉरीडोर में खड़े हो गये. इतने में सिक्यूरिटी गार्ड ने बताया कि उधर वेटिंग रूम है, वहां बैठकर इंतजार करें, वहां स्पीकर के जरिए आपको आवाज दी जाएगी.

वेटिंग रूम में कोई सौ के लगभग कुर्सियाँ लगी हुई थीं जो लगभग भरी हुई थीं. हमें दो-एक खाली कुर्सी मिली तो हम भी जम गए – अपने नाम पुकारे जाने के इंतजार में. सामने टीवी चल रहा था. बे-आवाज. कोई सड़ा सा चैनल लगा था और केबल की खराबी के कारण पिक्चर क्वालिटी भी बहुत घटिया थी. लगा कि अपनी बारी का इंतजार करते मरीजों के बीच यह भी बीमार हो बैठा है.

कोई दो घंटे बाद मेरा नाम पुकारा गया. जूनियर डॉक्टर ने मेरा आरंभिक परीक्षण किया. डॉक्टर अपने काम में दक्ष प्रतीत होता था और उसने बिना किसी हड़बड़ी के तमाम परीक्षण किए. और, जैसा कि जाहिरा तौर पर हर स्वास्थ्य सेवा केंद्र में होता है, बताया कि कुछ अतिरिक्त परीक्षण करने होंगे जिसके परिणाम प्राप्त होने के उपरांत आपको विशेषज्ञ डॉक्टर देखेंगे. उन्होंने कुछ किस्म की रक्त जांच, एंडोस्कोपी, ध्वनि-श्रवण परीक्षण और सीटी स्कैन के लिए पर्चियाँ पकड़ा दीं और बताया कि इनके पैसे जमा करवा कर जाँच करवा लें. यदि जाँच परीक्षण आज शाम 4 बजे से पहले मिल जाता है तो विशेषज्ञ डॉक्टर आज देखेंगे नहीं तो अगले ओपीडी दिन का एप्वाइंटमेंट लेना होगा. और अगले ओपीडी दिन के एप्वाइंटमेंट से मतलब था – दो दिन छोड़कर, क्योंकि ईएनटी3 का ओपीडी हफ़्ते में सिर्फ दो दिन होता है.

ये तो लग ही गया था कि ये सारी जाँचें आज तो संभव ही नहीं होंगी और यदि हो भी गईं तो रपट शाम तक तो मिलेंगी भी नहीं. और हम इसके लिए तैयार भी थे. पर्ची लेकर उसी माले में बने कैश काउन्टर पर पैसा जमा करवाने गए तो देखा कि वहाँ तो बहुत ही लंबी लाइन लगी हुई है और लाइन की रफ़्तार देख कर लगा कि कोई दो घंटे तक तो अपना नंबर ही नहीं आने वाला.

हम नीचे चले गए जहाँ कैश काउन्टर पर टोकन के जरिए पैसा जमा किया जा सकता था. कोई बारह बज रहे थे. काउन्टर पर लाल एलईडी में 190 नंबर चमक रहा था. हमें मिला टोकन नं 451. थोड़ी देर इधर उधर टहलते हुए हमने सोचा कि इस बीच दोपहर का भोजन निपटा लिया जाए. क्योंकि यहाँ भी भले ही पाँच कैश काउन्टर थे, परंतु सारा सिस्टम बहुत ही ऊटपटांग होने के कारण काउन्टर पर प्रत्येक व्यक्ति का बहुत अधिक समय जाया हो रहा था.

हम सीएमसी के कैंटीन में पहुंचे. वायडब्ल्यूसीए (यंग वीमन्स क्रिश्चियन असोशिएसन) द्वारा संचालित कैंटीन विशाल था और जाहिर है, यहाँ भी भीड़ लगी हुई थी. फिर भी वैसी मारा-मारी नजर नहीं आ रही थी. कोई पाँच मिनट लाइन में लगने पर वांछित भोजन की पर्ची मिल गई जिसे भोजन काउंटर पर देकर भोजन प्राप्त किया जा सकता था. काउंटर पर चूंकि दोपहर के भोजन का समय था इसलिए यहाँ भी भीड़ थी, परंतु वो मैनेजेबल थी, और हमें कोई पंद्रह मिनट इंतजार करना पड़ा.

भोजन के उपरांत जब वापस काउंटर पर आए तो एलईडी पर टोकन नं. 259 मुँह चिढ़ा रहा था. दोपहर के दो बज रहे थे. इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं था. कोई दस काउंटरों के सामने कुर्सियाँ लगी हुईं थीं और बीमार-तीमारदार सभी बेहद लंबे, उबाऊ, अकारण इंतजार में बैठे थे – अपने टोकन नं के प्रकट होने के इंतजार में. और इंतजार था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था...

लग रहा था कि जांच तो दूर की बात है, आज जांच हेतु पैसे ही जमा हो जाएँ वही बड़ी बात होगी...

(शेष अगले पोस्ट में जारी...)

(डॉ. गुरदयाल प्रदीप व डॉ. जगदीश व्योम)

शारजाह, 15 अगस्त 2005 को अभिव्यक्ति (www.abhivyakti-hindi.org) के सात वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में "सहयोग पुरस्कार" प्रदान करने का निश्चय लिया गया। ये पुरस्कार पिछले वर्षों में अभिव्यक्ति के लिए निरंतर सहयोग देने वाले लेखकों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं का सम्मान करने के लिए प्रदान किए गए हैं.

श्रेष्ठ स्तंभकार पुरस्कार के लिए दो नामों को चुना गया है। प्रौद्योगिकी के लेखक रविशंकर श्रीवास्तव तथा विज्ञान वार्ता के लेखक डॉ गुरुदयाल प्रदीप। निरंतर सहयोग पुरस्कार के लिए डॉ जगदीश व्योम को चुना गया है जो साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनेक प्रकार से अभिव्यक्ति व अनुभूति के लिए सहयोग करते रहे हैं। ये सभी रचनाकार अपने अपने विषय के जाने माने विशेषज्ञ हैं और विश्वजाल की दुनिया में अपने अमूल्य योगदान के लिए पहचाने जाते हैं।

पुरस्कार में 25,000 भारतीय रुपए नकद, स्मृतिचिह्न तथा प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाएगा। अभिव्यक्ति के लेखकों की सूची में इन लेखकों के नाम गतिमान नक्षत्र से तारांकित किए गए हैं।
ये पुरस्कार हर वर्ष प्रदान किए जाएँगे।

(समाचार स्रोत - अभिव्यक्ति)


आमतौर पर बैंकिंग संस्थाओं के जाल-स्थलों पर सुरक्षा के हर संभव उपाय किए जाते हैं और उनमें अत्यंत सुरक्षित – वेरीसाइन जैसी सेवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इसके बावजूद जाल-स्थल के लुटेरे अच्छी खासी सुरक्षित साइटों में भी सेंध लगाने में यदा कदा सफल हो ही जाते हैं.

कुछ समय पहले हिन्दी-ब्लॉग्स.ऑर्ग को हैक कर लिया गया था, और हाल ही में मॉनस्टर.कॉम की साइट को हैक कर लिया गया था और उसमें पंजीकृत उपयोक्ताओं के डाटा चुरा लिए गए थे. जब मॉनस्टर.कॉम और बैंक ऑफ इंडिया जैसी साइटें हैक हो सकती हैं तो हिन्दी-ब्लॉग्स.ऑर्ग की क्या बिसात?

कम्प्यूटर सुरक्षा सेवा एफ़-सेक्यूर के अनुसार, बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य पन्ने पर एक अदृश्य आई-फ्रेम घुसा दिया गया था जो कि उपयोक्ता के कम्प्यूटर पर किसी अन्य जाल-स्थल के यूआरएल को स्वचालित लोड कर लेता था. यह यूआरएल फिर तीन अन्य यूआरएल को लोड कर लेता था. इन्हीं में से एक जाल-स्थल से एक जावा-स्क्रिप्ट फ़ाइल loader.exe आपके कम्प्यूटर पर स्वचालित डाउनलोड किया जाता था जो कि आपके कम्प्यूटर पर कोई दो-दर्जन से अधिक अतिरिक्त मालवेयर व ट्रोजन फ़ाइलों को - जो आपके उपयोक्ता नाम व पासवर्ड को आसानी से चुरा सकने की काबिलियत रखते हैं - को डाउनलोड करता था. यह सब उपयोक्ता की जानकारी के बगैर होता था. बैंक ऑफ इंडिया को तो ख़ैर इसकी हवा भी नहीं थी.

ताज़ा समाचार के अनुसार बैंक ऑफ़ इंडिया की साइट दुरुस्त कर ली गयी है.

ऑनलाइन जिंदगी में तमाम ओर खतरे बिखरे पड़े हैं – चलियो जरा संभल के!

(स्क्रीनशॉट - एफ़सेक्यूर वेबलॉग)

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