April 2007

5 मई 2007 के तहलका के अंक में रविकान्त का आलेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर प्रकाशित हुआ है. प्रस्तुत है प्रकाशित आलेख अपने पूरे असंपादित रूप में:

LANGUAGE

The New Hindi Medium

The unease among Hindi veterans over the brave new world of Internet blogging is fast being swept aside by young pioneers who view their tongue not as a burden but as an opportunity. Ravikant explores the generation gap

The Hindi blogosphere, running into something like 500 blogs today, is reminiscent of the formative years of the language when it made the transition from the oral and handwritten mode to the print media. But the similarity between the two eras and the two technologies ends here. And, given the Hindi language's notoriously fraught relationship with technology in general and mass-media in particular, it is not surprising that the Hindi bloggers on the Internet are all young - mostly in their twenties and thirties.

It is almost a given to think of Hindi as an embattled language, but the fact remains that it has managed to erase its arch-rival Urdu, has almost devoured ‘its' various dialects and has pretty much made peace with the status of English as the post-colonial global language of this country. Hindiwallahs feel let down by the State, but they have always loathed Commerce equally.

Ironically, it is the content-hungry and numbers-driven media bazaar, in the form of print since the early-19th century; films from the 1930s onwards; followed by the radio; and later still, the television, that has given Hindi its unassailable contemporary status as potentially one of the world's major languages.

But there is a parallel world that lives on the fringes of this media market - a fragile unstable world of little magazines where high closure rates are balanced by an equally high number of launches. So this world of laghu patrikas carries on with its missionary zeal and self-proclaimed janpakshdhar attitude - its content almost exclusively literary and political.

The new mass media, called the Internet, comes to Hindi in this context.

If we compare those who created websites in the late-1990s and those who are blogging now, to those who are still quite satisfied with the print media, the generation gap is obvious. However, the blogs come at a time when some of the leading print journals and all the important newspapers are available on the Web.

Nurtured by those who glorified Hindi as the language of eternal struggle, the youth today is still having a tough time trying to convince the wider public that the Internet is not elitist, that embracing it does not amount to eating cake while the hungry millions go without bread. This is literally how the debate went recently when Manisha Kulshreshtha, a pioneer who set up the webportal, Hindinest, started writing in praise of the Net in her column in Naya Gyanoday.

Hasan Jamal, the editor of Shesh and a familiar name in socialist circles, charged her with elitism. This could have gone unnoticed a couple of years ago, but not anymore. Jamal saheb got a taste of his own medicine when he got furious responses from the readers of his magazine. One of the respondents, Ravi Ratlami, yes, sitting in Ratlam - another pioneer who has tirelessly worked at translating the free software desktops and other tools in Hindi under a voluntary effort called Indlinux - told Jamal to stop being a "frog in the well" and see his own works reach the far flung corners of the globe via Ratlami's freewheeling blogzine, Rachnakar. Shesh might not be available in Chhattisgarh but his article on Rachnakar certainly is. "Just try typing your name in Hindi on Google," Ratlami told Jamal.

So it would seem that the netters are now in a position to take on the old media, although they still have some way to go. There is still anxiety in some quarters about things - including generating unnecessary controversy in the Hindi blogosphere. This happened recently when discussions on Hindus and Muslims became too hot to handle for many.

Amidst the accusations and protestations that followed, the underlying sentiment favoured sheltering and protecting the new public domain from extreme expressions of identity-oriented narrow political debates. The creators of spaces like Narad, Sarvagya, Paricharcha, Hindini and others have invested much effort in providing the basic tools and healthy initial content for Hindi blogging, and they do not want anybody to ruin it. They do not want another Partition, as one blogger said. Sounds familiar.

To sum up, the Hindi blogosphere at the moment looks like a vibrant, if a bit cautious space. Bloggers are commenting on a range of things and it has become a space for innovation, discussion and sharing.

Collectively, they can be credited with achieving what the various language and technology departments run by the government have failed to do. And their language is refreshingly different from sarkari Hindi - like roadside mechanics, they have invented a whole new jargon to come to terms with a global technology and tech-inspired spaces that need to be tweaked locally. Toh aaiye chittha likhein, chtthakaar banein, kachcha chttha kholein, aur bedharak Tipiyaein.

Ravikant is a literary historian

May 05, 2007

(साभार, तहलका)


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(श्री जय प्रकाश मानस)

सृजन-गाथा के चिट्ठाकार श्री जयप्रकाश मानस को उनकी हिन्दी चिट्ठाकारिता के लिए माता सुंदरी फ़ाउंडेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

विस्तृत समाचार यहाँ देखें.

श्री जयप्रकाश मानस जी को ढेरों बधाईयाँ व शुभकामनाएँ.

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ऑफ़ीशियल गूगल ब्लॉग से आज ही यह खबर मिली कि गूगल डेस्कटॉप यंत्र 29 भाषाओं में, जिसमें हिन्दी भी सम्मिलित है, जारी किया गया है.

गूगल डेस्कटॉप में बहुत से अंतर्निर्मित गॅजेट्स तो हैं ही, इसका डेस्कटॉप सर्च फंक्शन भी लाजवाब है और इसमें हिन्दी में सर्च का समर्थन प्रारंभ से ही है. और अब तो इसका तमाम इंटरफ़ेस भी हिन्दी-मय हो गया है.

अपने डेस्कटॉप के लिए एक उपयोगी औजार. परंतु ये ध्यान रखें कि यह पृष्ठभूमि में आपके डेस्कटॉप पर ढूंढते रहता है और अपना डाटाबेस बनाता रहता है. कुछ समय के अंतराल में सर्च डाटाबेस 1-2 जीबी का आंकड़ा भी घेर लेता है. इसी लिए इसे किसी ऐसे फ़ालतू पार्टीशन में रखें जहाँ भरपूर जगह हो. वैसे, डिफ़ॉल्ट में यह आपके प्रोफ़ाइल फ़ोल्डर में ही स्थापित होता है.

इसके डाउनलोड पृष्ठ से लेकर संस्थापना प्रक्रिया तक और उसके पश्चात् कार्य व्यवहार में भी यह लगभग हिन्दी मय है. इसके डिफ़ॉल्ट आरएसएस फ़ीड में गीतायन का पृष्ठ जुड़ा है. इसे बड़ी शीघ्रता से मनमाफ़िक बनाया जा सकता है. समाचार भारतीय करने के बाद भी हिन्दी में नहीं आया- जबकि कुछ दिन पूर्व ही गूगल समाचार हिन्दी बीटा जारी किया जा चुका है. संभवतः इसके लिए कुछ अतिरिक्त सेटिंग आवश्यक होगी.

गूगल डेस्कटॉप 1.5 मेबा डाउनलोड है. इसे यहाँ से डाउनलोड करें.

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कहावत है कि आदमी तब तक ही ज्ञानी बना रह सकता है जब तक कि वह अपना मुँह न खोले. और, ये बात जानते हुए भी हम कई दफ़ा अपना मुँह जबरन और जबरदस्ती खोलते हैं जग हँसाई का पात्र बनते हैं.

बहरहाल, मैंने भी अपना मुंह खोला था और मुझे तत्काल मेरी अज्ञानता का अहसास दिलाया गया. मैंने प्रभु को याद किया - हे प्रभु! मुझे माफ़ करना क्योंकि मुझे खुद नहीं मालूम था कि मैंने ये क्या कह दिया था! प्रायश्चित और पश्चाताप् स्वरूप मैंने सोचा , कि चलिए, रोमन-हिन्दी चिट्ठों की संभावनाएँ तलाशी जाएँ...

और, ये क्या - यहाँ तो संभावनाओं के द्वार के द्वार दिखाई दिए...

मनीष ने जब बताया कि रोमन लिपि में लिखे उनके हिन्दी सामग्री पर हिन्दी यूनिकोड पन्नों से ज्यादा हिट मिलते हैं तो मेरा माथा ठनका था.

हमारे पास आज तमाम तरह के औजार हैं जिनसे हम हिन्दी को रोमन-हिन्दी तथा रोमन-हिन्दी को हिन्दी में बदल सकते हैं.

और, अब तो अपने पास भोमियो.कॉम ऑनलाइन औजार भी हैं जिनके जरिए अपना पूरा का पूरा जाल-पृष्ठ हिन्दी से रोमन-हिन्दी (आईट्रांस स्कीम में) परिवर्तित कर पढ़ सकते हैं. इसके उलट भी हो सकता है यानी रोमन-हिन्दी में लिखी सामग्री को हिन्दी लिपि में परिवर्तित कर पढ़ सकते हैं. यही नहीं, यदि आप चाहें तो मेरे हिन्दी चिट्ठे को अब आप हिन्दी, रोमन-हिन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं की 8 लिपियों मसलन गुजराती लिपि में भी पढ़ सकते हैं!

(बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें)

जी हाँ, यह सब कुछ संभव है - भोमियो.कॉम में. दरअसल इसकी सूचना भोमियो से मुझे बहुत पहले ही मिल चुकी थी, और मैंने अपने डिफ़ॉल्ट ब्राउज़र ऑपेरा में जांचा था और आरंभिक जांच में यह उसमें चला नहीं था तो मैंने इसे छोड़ दिया था. कल जब पुन: मनीष की बात पर भोमियो फिर से याद आया तो मैंने इसे इंटनरेट एक्सप्लोरर तथा फ़ॉयरफ़ॉक्स दोनों पर चलाकर देखा. इंटरनेट एक्सप्लोरर पर तथा फ़ॉयरफ़ॉक्स 2.0 पर यह बेधड़क और बढ़िया चलता है. संलग्न स्क्रीनशॉट इसके उदाहरण हैं.

भोमियो में आपके हिन्दी ब्लॉग (या समर्थित भारतीय भाषा के ब्लॉग और अन्य पृष्ठ) को निम्न भाषाओं की लिपि में आपस में अदल-बदल कर पढ़ा जा सकता है -

हिन्दी

रोमन(अंग्रेज़ी)

गुजराती

बंगाली

पंजाबी

तेलुगु

तमिल

मलयालम

सिंधी

कन्नड़

है न कमाल की बात? अब आपकी मुम्बइया भाषा में लिखे ब्लॉग पोस्टों को किसी मलयाली लिपि के जानकार द्वारा भी - जो हिन्दी लिपि से अनभिज्ञ है, परंतु हिन्दी भाषा बख़ूबी समझता है - आसानी से पढ़ा जा सकेगा. ट्रांसलिट्रेटेड सामग्री का कट पेस्ट कर आप आसानी से इसका इस्तेमाल अन्यत्र कर सकते हैं.

भोमियो हमारे ब्लॉग पृष्ठों को ट्रांसलिट्रेट करने के लिए स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करता है. यदि यह अलग से अपने पंजीकृत उपयोक्ताओं को प्रॉक्सी सर्वर जैसा कुछ साधन उपलब्ध करवा दे, जैसे कि मुझे मेरे हिन्दी ब्लॉग के परिवर्तित रूप रवि रतलामी का रोमन-हिन्दी ब्लॉग के लिए पृष्ठ - तो क्या ही उत्तम हो. मैंने इस हेतु उन्हें लिखा तो है - देखते हैं क्या जवाब आता है. मुझे लगता है कि आज नहीं तो कल ब्लॉगर में भारतीय भाषाओं के लिए यह सुविधा अंतर्निर्मित हो जाएगी. यानी कि आप भारतीय भाषाओं के किसी ब्लॉग में जाएँ, वहां अपनी पसंदीदा भाषा लिपि के टैब को दबाएँ और आप उस लिपि में पढ़ लें. भाषा कोई और हो. जैसे कि अभी मैं अपने मित्र की पंजाबी भाषा सुनकर समझ सकता हूँ, हिन्दी लिपि में पंजाबी पढ़ कर समझ सकता हूँ, परंतु मुझे पंजाबी लिपि नहीं आती. मेरे लिए तो यह एक वरदान सरीखा होगा.

तब तक के लिए, हम सभी के लिए एक नई संभावनाओं का द्वार तो खुला ही है...

पुनश्च: विवादों को हवा देने का मेरा उद्देश्य नहीं है और न ही प्रयोजन. मगर, मेरा मानना है कि सृजन शिल्पी के पृष्ठों पर नारद से जुड़े लोगों पर जिस तरह निम्नस्तरीय व्यक्तिगत आक्षेप लगाए गए हैं, वह भी इंटरनेटीय तकनॉलाजी की उनकी अपनी गहरी अनभिज्ञता के चलते, वह बहुत ही दुःखद है .

हे प्रभु, इन्हें माफ़ करना - क्योंकि ये नहीं जानते - ये सचमुच नहीं जानते कि ये क्या कह रहे हैं. संभवतः कल जब इन्हें ज्ञान की प्राप्ति होगी तब शायद ये प्रायश्चित करें, पश्चाताप करें...

(आप सभी पाठक बंधुओं से विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस संबंध में टिप्पणी नहीं करें. हाँ, ऊपर दी गई तकनॉलाज़ी के विषय में अगर कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत् है.)


वैसे, इस आलेख का शीर्षक ये भी हो सकता था - बिलकुल कैची - मोहल्ला अब मलयालम में भी!

क्या खयाल है आपका?


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(श्री जगदीप डांगी)

इससे पहले कि मैं आपसे दुआ मांगूं, थोड़ा सा प्राक्कथन.

इस दफ़ा की डिज़िट पत्रिका (अप्रैल 2007) के सॉफ़्टवेयर डीवीडी में जगदीप डांगी द्वारा तैयार किया गया, हिन्दी के दो सॉफ़्टवेयर संलग्न हैं.

1 - डांगी सॉफ़्ट हिन्दी अंग्रेज़ी डिक्शनरी तथा

2 - डांगी सॉफ़्ट ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर

ये दोनों ही सॉफ़्टवेयर विंडो विंडोज़ 98 तथा विंडोज़ एक्सपी के लिए अलग-अलग संस्थापक फ़ाइलों के साथ संलग्न है. यह इनका डेमो संस्करण है जिसे आप 30 दिनों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर की ख़ूबी यह है कि इसके जरिए आप विंडोज़ के किसी भी अनुप्रयोग में अंग्रेज़ी के शब्दों का हिन्दी अर्थ देख सकते हैं. बस आपको उस शब्द को दोहरा क्लिक करना होता है. परंतु ये फ़ॉयरफ़ॉक्स या ऑपेरा ब्राउज़र में नहीं चलता. हाँ, आप इसका इस्तेमाल इंटरनेट एक्सप्लोरर, एमएस वर्ड तथा यहाँ तक कि नोटपैड में भी काम में ले सकते हैं. अगर आप इंटरनेट एक्सप्लोरर का इस्तेमाल करते हैं और अंग्रेज़ी पृष्ठ पढ़ रहे हैं और किसी अंग्रेज़ी शब्द का अर्थ नहीं मालूम तो उस शब्द पर क्लिक करिए , आपके सामने उसका हिन्दी में अर्थ हाजिर हो जाएगा.

जांच के दौरान यह थोड़ा सा बगी लगा और डेमो संस्करण में संभवतः शब्द भंडार सीमित है.

इसी तरह, डांगी सॉफ़्ट हिन्दी अंग्रेज़ी डिक्शनरी भी अपने अलग स्वरूप में है. दरअसल इसका प्रारूप शब्दकोश का सा न होकर शब्दों के उचित प्रयोग करने हेतु वाक्यों तथा वाक्य विन्यास बताने जैसा है. यह अपने आप में एक अलग किस्म का अनुप्रयोग है - जिसमें आप हिन्दी से अंग्रेज़ी या अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दों के अर्थ व वाक्य विन्यास के बारे में जान सकते हैं.

ये दोनों ही सॉफ़्टवेयर यूनिकोड में नहीं हैं तथा ये कृतिदेव श्रेणी के फ़ॉन्ट इस्तेमाल करते हैं. अतः आप इन्हें इंटरनेट पर कट-पेस्ट हेतु इस्तेमाल नहीं कर सकते, परंतु शब्दों के अर्थ इत्यादि देखने के लिए इनका बख़ूबी इस्तेमाल किया जा सकता है.

इनके संपूर्ण संस्करण के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए इसके डेवलपर जगदीप डांगी से उनके ईमेल पता- dangijs@yahoo.com पर संपर्क कर सकते हैं. जगदीप डांगी ने इसके पूर्व हिन्दी ब्राउज़र भी बनाया था.


आइए, अब करते हैं दवा और दुआ की बातें...

दोस्तों, जिंदगी का कठिन दौर सबके साथ आता है.

ऐसे में, अगर आपकी दुआएं मिले तो वह दौर आसानी से भले ही निकल न पाए, मगर उससे सामना करने की शक्ति, ताकत, साहस और उत्साह तो मिलता ही है.

जी हाँ, अंतर्जाल के मेरे ये अत्यंत जहीन, उम्दा मित्र, जगदीप डांगी अभी ऐसे ही कठिन दौर से गुजर रहे हैं. इस सॉफ़्टवेयर को चलाने के दौरान कुछ समस्याएँ आईं तो मैंने उनसे संपर्क किया. उनसे प्राप्त इस व्यक्तिगत ईमेल का छोटा सा हिस्सा उनसे क्षमा याचना सहित प्रस्तुत कर रहा हूँ -

"नमस्कार, शायद कोई एक फोन्ट सही से इन्सटाल न हुआ हो आप विंडोज फ़ोन्ट्स फ़ोल्डर में जाकर सभी फ़ोन्ट्स रिफ़्रेश करके विंडोज को रिस्टार्ट कर दें तो वह ठीक से कार्य करने लगेगा. तकदीर ने हमारे साथ बहुत ही बेहूदा मजाक किया मेरा बचपन तो अस्पताल में ही गुजर गया और आज मैं बहुत ही खराब स्थिति में हूँ मेरी तवियत ठीक नहीं है मेरा इलाज भोपल मेमोरियल में चल रहा है मेरी दोनो किडनी खराब बताई हैं मुझे क्रोनिक रीनल फ़ैलर बताया है अब पता नहीं मैं रहूँगा या नहीं...."

आपका,

जगदीप डांगी

मैंने जवाब में उन्हें सांत्वना देने की कोशिश कुछ यूँ की -

जगदीप भाई,
आपकी कहानी सुनकर सचमुच दुख हुआ. आप जैसी परिस्थिति से मैं भी गुजर चुका हूँ. मेरी स्वयं की ये कहानी पढ़ें -

http://hindini.com/ravi/?p=15

मेरा मानना है कि आप हिम्मत न हारें. स्टीफ़न हाकिंस को डॉक्टरों ने कोई बीस साल पहले कह दिया था कि वो अब एक साल से अधिक जी नहीं सकता. परंतु हाकिंस उस भविष्यवाणी को अंगूठा दिखाता आज भी शान से जी रहा है - भले ही वह दवाइयों उपकरणों पर पूर्ण निर्भर है, मगर उसने जिजीविषा नहीं छोड़ी है. मैंने भी, सर्जन के लिखित स्टेटमेंट के बाद कि सर्जरी में जान का खतरा है, सर्जन के चाकू के नीचे जाना उचित समझा और आज मैं भी सांसें ले रहा हूं. विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है और आप भी अपनी पूरी जिंदगी जिएंगे. किडनी ट्रांसप्लांट के साथ साथ अब स्टैम सेल से भी इलाज संभव है. बस आपके धैर्य , जिजीविषा और मानसिक संबल की आवश्यकता है. उसे खोएं नहीं. वैसे भी आपने हिन्दी व हिन्दी कम्प्यूटिंग के लिए इतना कुछ निःस्वार्थ भाव से किया है, वह आपको अमर रखेगा.

उम्मीद है, आपकी भी दुआएं जगदीप जी को मिलेंगी. आप चाहें तो उन्हें dangijs@yahoo.com पर ईमेल भी कर सकते हैं.

ज्ञातव्य हो कि जगदीप डांगी को उनके कम्प्यूटर पर हिन्दी संबंधी कार्यों व सॉफ़्टवेयर विकास हेतु लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड से नवाजा जा चुका है तथा माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया में उनका साक्षात्कार भी प्रकाशित हो चुका है. उनके बारे में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें -

http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2006/11/061117_dangi_limcabook.shtml

http://bhashaindia.com/Patrons/SuccessStories/JagadishDangi.aspx?lang=en

http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/sakshatkar/jagdeep%20Dangi.htm

http://raviratlami.blogspot.com/2006/11/blog-post.html

http://raviratlami.blogspot.com/2004/12/blog-post_03.html

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कल ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ पृष्ठ के बारे में लिखते समय ध्यान आया कि ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी का पृष्ठ कौन सा है या कौन सा हो सकता है या किसे होना चाहिए?

तो, जिस तरह एक मां को उसका और सिर्फ उसका अपना ही बच्चा सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रिय होता है, वैसा ही एक ब्लॉगर को उसका और सिर्फ उसका अपना ही ब्लॉग पृष्ठ सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रिय होता है. दूसरे शब्दों में, हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ जाल-स्थल की पहचान तो हो ही गई थी, अब सर्वश्रेष्ठ पृष्ठ की पहचान बाकी थी.

इसी ऊहापोह के बीच ब्लॉगर डैशबोर्ड पर नजर पड़ी. अरे! यह क्या? यहां तो 299 का फेर चल रहा है. यानी कि अब तक मेरे इस चिट्ठे में 299 पोस्ट प्रकाशित हो चुके हैं और यह अगर प्रकाशित हो गया तो 300 वां पोस्ट होगा. (वैसे ये कोई तीर मारने वाली बात नहीं है चूंकि मेरा पन्ना का 600 वां पोस्ट बहुत पहले से प्रकाशित हो चुका है, और ताज़ा आंकड़ा 709 है!)

इस बीच हिंदिनी में कोई पंद्रह महीनों में छींटे और बौछारें में कोई 196 पोस्टें भी लिखी गईं, रचनाकार के शुरूआती दिनों में अधिकतर पोस्टें मेरे हाथों की टंकित की हुईं थी और आज उसका भी आंकड़ा 349 पर पहुँच रहा है. साथ ही साथ देसीटून्ज में भी शुरूआती कुछ महीनों में धुआंधार 60 से ऊपर टून्ज़...

इनमें से सर्वश्रेष्ठ को छांटना मुश्किल है. अब ये बात तो पाठक ही बताएं.

आप कहेंगे क्या बकवास कर रहे हैं - ये मुंह और मसूर की दाल! चलिए, मान लिया कि ये ब्लॉग ब्रह्माण्ड का हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ पृष्ठ किसी सूरत नहीं हो सकता. परंतु इस कड़ी पर जा देखें. ये मेरा दावा है - आप मान लेंगे कि ब्रह्माण्ड का हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ जाल पृष्ठ यही है, यही है.

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चौ-तरफ़ा हमलों के बाद, शुक्र है कि एक दफ़ा फिर मोहल्ले में शांति की बातें की जा रही हैं.

यूं तो मोहल्ले ने पहले भी एक दफ़ा सुर बदलने की कोशिशें की थीं. उम्मीद है, इस दफ़ा की ये शांति चिर-स्थायी रहेगी. आखिर, ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ पृष्ठ का भी यही कहना है.

उस स्थल के बारंबार-पूछे-जाने-वाले-सवाल पृष्ठ की एक प्रश्नोत्तरी का उदाहरण यहाँ देना अत्यंत समीचीन होगा -

प्रश्न : आप धर्म के बारे में कोई एक पृष्ठ क्यों नहीं लिखते? उन मूर्ख मूर्तिपूजकों, ईसाईयों, बुद्धिस्टों, नास्तिकों, मोरमॉनों, हिन्दुओं, मुसलमानों, यहूदियों के बारे में आपका क्या खयाल है? क्या आप यह समझते हैं कि वे सभी सचमुच के मूर्ख हैं?

उत्तर : नहीं, उन्हें शांति से रहने दें. मैं अपने वेब साइट पर दो उत्तेजक पैरा लिख कर किसी की मूल-भूत अवधारणाओं को बदल देने में यकीन नहीं करता. आप जिसमें विश्वास करते हैं उस पर करते रहिए और भगवान के लिए चुप रहिए. पूरा का पूरा अ-धार्मिक, अनास्तिक और अ-कुछ-भी अब चुक-सा गया है; अब कोई नई बात कहें. यदि आप पुराने फ़ैशन के, धर्म-संबंधी वाद-विवादों को चाहते हैं तो कहीं और तलाशें. मुझे विश्वास है, आपको बहुत से, 14 वर्षीय दिमाग के, स्वयंभू, सर्वज्ञानी इंटरनेट पर मिल जाएंगे जो आपको अपने धर्म संबंधी गू-मूत युक्त फ़िलॉसफ़ी बताने में, और ये भी कि क्यों आपके विश्वास और आपकी धारणाएं ग़लत हैं, बहुत खुशी महसूस करेंगे.

आमीन!

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बधाईयाँ! आपके मोबाइल फोन ने जीता है करोड़ों का पुरस्कार...

इंटरनेट पर धूम मचाने के बाद फ़िशरों ने अपने पाँव मोबाइल फ़ोनों की ओर मोड़ दिए हैं.

अब आपके मोबाइल फ़ोनों पर किसी भी समय कुछ इस तरह के एस एम एस संदेश आ सकते हैं -

"माइक्रोसॉफ़्ट से आधिकारिक घोषणा. बधाईयाँ. आपके मोबाइल फोन नंबर ने यूएस डॉलर 10 मिलियन का इनाम जीता है. कृपया अपना ईनाम प्राप्त करने के लिए कल सुबह आठ बजे इस नंबर पर फोन करें - XXXXXXXXXX . धन्यवाद. "

जाहिर है, ऐसे संदेशों से सावधान रहें व इन्हें तत्काल मिटा दें. यदि संभव हो तो बताए गए नंबर की रपट पास के थाने में दर्ज कराएँ.

एफ़-सीक्योर एंटीवायरस के एक चिट्ठे में एक ऐसे ही मोबाइल फ़िशिंग आक्रमण के बारे में मजेदार विवरण दिया गया है. वैसे, इसकी विधि कुछ ऐसे ही होगी जैसी कि आमतौर पर नाइजीरियन किस्म के फ़िशिंग हमलों में होता है - आपको ईनाम का या बड़ी रकम को ठिकाने लगाने का लालच दिया जाता है और फिर लिखा-पढ़ी के खर्चे इत्यादि के लिए रुपए ऐंठे जाते हैं.

अद्यतन - # रक्षकों को भी जरूरत होती है सुरक्षा की! - जी हां, एक मजेदार खबर के मुताबिक एक फ़िशिंग साइट ने जो पेपॉल का रूप धरा हुआ था, अपना ठिकाना एक ऐसी एजेंसी के सर्वर पर ही बना लिया था जो इंटरनेट सुरक्षा प्रदान करती है! :) खबर की कड़ी ये रही.

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भारत के सर्वकालिक-सर्वाधिक सफल (व्यावसायिक रूप से भी!) ब्लॉगर अमित अग्रवाल ने इंडिया ब्लॉग्स नाम से भारत और भारतीयों से संबंधित सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले ब्लॉगों की सूची हाल ही में जारी की है. सूची विषयवार है और सूची में हर विषय के बहुत से अच्छे चिट्ठे सम्मिलित हैं. मुझे कुछ ऐसे चिट्ठे मिले जिन्हें पढ़कर लगा कि ये तो मुझे पहले से पढ़ना चाहिए था.

इस सूची में, जाहिर है, इस चिट्ठे का भी नाम सम्मिलित है.

हिन्दी के अन्य चिट्ठे जो इस सूची में हैं वे हैं -

नुक्ता चीनी,

मेरा पन्ना,

कुछ बूंदें कुछ बिन्दु,

फ़ुरसतिया,

उड़न-तश्तरी,

ई-पंडित,

दुनिया मेरी नज़र से

पहले तो मुझे लगा कि ये सूची तो कुछ गलत सलत बना दी गई है. परंतु फिर देखा कि इस सूची में फ़ुरसतिया, ई-पंडित, उड़न-तश्तरी, मेरा-पन्ना, नुक्ताचीनी इत्यादि इत्यादि भी हैं तो लगा कि नहीं, ये सूची तो एकदम सही है. उड़न-तश्तरी को तो दो-दो ईनाम मिल चुके हैं, मेरा-पन्ना हिन्दी का सर्वाधिक पोस्ट-और-पाठक वाला सर्वविदित चिट्ठा है ही, ई-पंडित ने गिनती के चार महीने में ही हिन्दी ब्लॉगिंग की दिशा बदल दी है और जहाँ कहीं मैं ब्लॉग और हिन्दी ब्लॉग की चर्चा करता हूँ कि शायद कोई जानकार मेरे चिट्ठे को जानता-पढ़ता हो तो तब मेरी हवा निकल जाती है जब सामने वाला बोलता है - हाँ हिन्दी चिट्ठों के बारे में मैं जानता हूँ और पढ़ता भी हूं - मैं फ़ुरसतिया को पढ़ता हूँ....

मैं सोच रहा हूँ कि कहीं मेरे चिट्ठे का नाम कहीं ग़लती से तो नहीं जुड़ गया? अगर ऐसा है तो यह तो बड़ी अच्छी और खूबसूरत ग़लती है. :)

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टेलिविजन का जादू - इंटरनेट की अंतर्निर्मित शक्ति के साथ. जूस्ट आपको अपने टेलिविजन चैनलों का आनंद देने के लिए संपूर्ण नियंत्रण प्रदान करता है जिससे टेलिविजन की आपकी दुनिया बदल कर रह जाती है.

ये कुछ पंक्तियाँ आप पाएंगे जूस्ट के मुख पृष्ठ पर. यू-ट्यूब, ब्लिंक्स इत्यादि वीडियो आधारित वेब साइटों में जहाँ आप अपने पसंद के हर संभव वीडियो और टेलिविजन चैनलों के एपीसोड्ड ढूंढ ढांढ कर आराम से और आसानी से मुफ़्त में देख सकते हैं, जूस्ट में ऐसा नया क्या है?

जूस्ट की कल्पना आपको इंटरनेट के जरिए एक सामान्य टेलिविजन चैनल की सुविधा प्रदान करने की है. और, आरंभिक जांच परख में यह अपने काम में सफल प्रतीत होता है - बशर्ते आपके पास भरोसेमंद ब्रॉडबैण्ड सेवा हो - कम से कम 1 एमबीपीएस डाउनलोड सुविधा सहित.

कोई दो-तीन महीने पूर्व मैंने जूस्ट बीटा टेस्टिंग के लिए पंजीकरण किया था. कल उनका आमंत्रण प्राप्त हुआ तो कुछ जांच परख किया गया. मैंने रेंडमली एक चैनल पर एक एपीसोड चुना - वर्ल्ड ऑफ़ स्टुपिड. मेरे बीएसएनएल के ब्रॉडबैण्ड में जो कहने को तो 2 एमबीपीएस सेवा है, यह भयंकर रूप से अटक अटक कर चला. एक वर्कअराउण्ड है - आप इस एपिसोड को चलाकर जूस्ट को पॉज़ कर दें. फिर आराम से आधे घंटे बाद प्ले करें. तब तक यह आपके हार्ड डिस्क में अपेक्षित बफर मेमोरी बनाकर रखता है और फिर आप एपिसोड का आनंद ले सकते हैं.

जूस्ट की पिक्चर क्वालिटी यू-ट्यूब इत्यादि के बनिस्वत बहुत अच्छी है. जूस्ट का कहना है कि वे सीडी क्वालिटी की पिक्चर व साउंड देंगे. मेरे कम्प्यूटर में ब्रॉडबैण्ड के सही नहीं होने से इसकी सही जांच नहीं हो सकी फिर भी पिक्चर क्वालिटी अन्य ऑनलाइन वीडियो सेवाओं से तो कई गुना बेहतर रही.

जूस्ट का इस्तेमाल आसान है. इसका करीब 10 एमबी की संस्थापना फ़ाइल को कम्प्यूटर पर संस्थापित करना होता है बस. और फिर आप चालू हो जाएं दुनिया के तमाम टेलिविजन चैनलों का दर्शन करने. न किसी केबल की आवश्यकता, न केबल वाले की, न सेटटॉप बॉक्स की और न डिश एंटीना की. और ऊपर से यह किसी भी मासिक सब्सक्रिप्शन शुल्क से बिलकुल आजाद है यानी कि बिलकुल मुफ़्त. हाँ, आपको एक बार प्रारंभ में जूस्ट में पंजीकृत होना होता है ताकि आपकी पसंदगी इत्यादि जूस्ट पर सहेजी रखी जा सके.

जूस्ट विज्ञापन आधारित सेवा होगी - यानी कि टेलिविजन के चैनलों में आपको विज्ञापन इत्यादि देखने को मिलेंगे - और हो सकता है कि संदर्भित विज्ञापन भी. यानी कि किसी एपिसोड को दर्शक अमरीका में देख रहा है तो वहाँ उसे अमरीकी होटल का विज्ञापन दिखे और भारतीय दर्शक को भारतीय ढाबे का. और, चूंकि यह विज्ञापन आधारित सेवा है, इसीलिए यह बिलकुल मुफ़्त है. जूस्ट हालाकि मुफ़्त है, मगर यह प्रतिघंटा 350 एमबी डाउनलोड तथा 100 एमबी अपलोड बैंडविड्थ खाता है. अतः अगर आपके पास अनलिमिटेड खाता नहीं है, तो करीब दस घंटे जूस्ट देखने पर 1 जीबी की सीमा आसानी से पार हो सकती है.

जूस्ट की एक और बड़ी सुविधा है - आप अपने पसंदीदा चैनलों व एपिसोडों को कभी भी किसी भी समय देख सकते हैं - अपने पसंदीदा समय के अनुसार रीशेड्यूल कर सकते हैं और अपना मनचाहा चैनल बना सकते हैं जिसमें दर्जन-दो-दर्जन अलग अलग चैनलों के अलग अलग एपिसोडों का सम्मिश्रण भी हो सकता है - यानी संभावनाएँ अनंत हैं.

जूस्ट में अभी तो दर्जनों चैनल हैं, भविष्य में सैकड़ों होंगे. और, मेरे रतलाम में जहाँ कि ले देकर सड़े गले पचासेक चैनल हैं, और प्रियरंजन दास मुंशी के बाबुओं की नजर कभी एएक्सएन और कभी फैशन टीवी पर लगती रहती है, ऐसे में हॉट एण्ड वेट जैसा अमरीकी चैनल तो मेरे टेलिविजन देखने में आनंद भर ही देगा. लगता है, मात्र इस एक कारण से ही जूस्ट चल निकलेगा. मगर फिर, इस टीवी चैनल पर सरकारी बंदिशों की बात न होने लगे! जूस्ट ब्लॉग के मुताबिक अमरीकी सीबीएस टेलिविजन नेटवर्क से बातचीत जारी है - सीबीएस नेटवर्क के सारे चैनल जूस्ट पर उपलब्ध करवाने हेतु.

तो, जब तक कोई बंदिश लगे, आप भी जूस्टिया लें.

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तो क्या हम पिछले चार साल से तो भाड़ भूंज रहे थे?

गूगल ने अपने आधिकारिक ब्लॉग में लिखा है कि अब आप हिन्दी में ब्लॉग कर सकते हैं. शीर्षक और साथ में दिए लेख से तो लगता है कि अब तक हिन्दी में ब्लॉग ही संभव नहीं था. दरअसल ब्लॉगर में हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन औजार जोड़ने वाली बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बताने के लिए इस लेख को लिखा गया और उत्साहजन्य अतिरेक में तो अति हो गई.

अप्रैल 2004 में हिन्दी चिट्ठाजगत् की पहली पोस्टिंग नौ दो ग्यारह में आलोक द्वारा की गई और जून 2004 से मैंने हिन्दी में ब्लॉग लिखना शुरू किया. और ये सभी ब्लॉगर ब्लॉग में ही खोले गए थे!

गूगल जो तमाम दुनिया से सामग्री ढूंढ ढांढ कर लाता है - वहाँ ऐसी अज्ञानता युक्त अर्ध-सत्य बातें - भाई ये बात कुछ हज़म नहीं हुई!

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और, आपके लिए बिलकुल मुफ़्त.!

पीपल बीटा को एक नज़र में देखने पर इसमें एक अत्यंत उम्दा ऑनलाइन ऑफ़िस सूट बनने की पूरी संभावना दिखाई देती है. यह आम, व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए मुफ़्त है. इसमें पंजीकरण भी अत्यंत आसान है बस आपको उपयोक्ता-नाम तथा पासवर्ड भरना होता है और एक वैध ई-मेल खाता पुष्टिकरण के लिए आवश्यक होता है बस.

पीपल बीटा में शब्द संसाधक और एक्सेल जैसा प्रोग्राम तो है ही, ऑनलाइन केलकुलेटर भी है तथा उपयोक्ता के ऑनलाइन भंडारित फ़ाइलों के प्रबंधन के लिए फ़ाइल प्रबंधक भी है. यह गूगल के राइटली या ऐसे ही अन्य प्रोग्रामों की अपेक्षा तीव्र गति से चलता है तथा पीएचपी आधारित होने के बावजूद तीव्रता में एजेक्स आधारित अनुप्रयोगों जैसा कमाल दिखाता है.

इसमें हिन्दी (यानी यूनिकोड) का पूर्ण और बढ़िया समर्थन है. आप फ़ाइलों को हिन्दी नामों से भी ऑनलाइन सहेज सकते हैं तथा उनका प्रबंधन कर सकते हैं.

इसका शब्द संसाधक पीपल वेबराइटर तो लगभग पूर्ण है और सभी आवश्यक औजारों से युक्त है. परंतु इसका एक्सेल जैसा प्रोग्राम - पीपल वेबशीट बहुत ही साधारण किस्म का है और एक तरह से यह अनुपयोगी ही है क्योंकि इसमें आपको कक्षों में भरे गए सूत्रों को देखने का कोई विकल्प अभी नहीं दिखता. उम्मीद है इसके भविष्य के संस्करणों में इन्हें शामिल किया जाएगा. इसका पीपलकेल्कुलेटर भी बहुत ही साधारण किस्म का जोड़-घटाना-गुणा-भाग के लिए ही है वैज्ञानिक गणनाओं के फंक्शन इसमें नहीं हैं.


इस पोस्ट को इसी ऑनलाइन औजार से लिखकर पोस्ट किया जा रहा है. इसके जरिए आप पाठ को फ़ॉर्मेट कर सकते हैं, पाठ में रूप रंग भर सकते हैं और वह बढ़िया, साफ सुथरा कोड युक्त होता है. अनावश्यक फ़ॉर्मेटिंग के कोड न होने से आपका हिन्दी पाठ आकार में छोटा होता है और आपका पृष्ठ तेज गति से लोड होता है. यह फ़ॉयरफ़ॉक्स तथा इंटरनेट एक्सप्लोरर पर बढिया चलता है. यहाँ तक कि कनेक्शन के टूट जाने पर भी आप इसमें काम करते रह सकते हैं. हाँ, फ़ाइलों को सहेजने के लिए आपको ऑनलाइन होना आवश्यक है.


लगता है भविष्य में हम सभी ऑनलाइन अनुप्रयोगों पर अच्छे खासे निर्भर होने वाले हैं. और एमएस ऑफ़िस सूट जैसे भारी भरकम और महंगे डेस्कटॉप अनुप्रयोगों का कोई लेवाल नहीं रहेगा.


अद्यतन # पीपल के स्टीफ़न केली ने बताया है कि पीपल में पीएचपी तथा एजेक्स दोनों तकनॉलाजी का ख़ूबसूरती से प्रयोग किया गया है. साथ ही, जैसा कि मैंने अपने रीव्यू में लिखा है, स्प्रेड शीट पर काम जारी है और शीघ्र ही उसमें सूत्रों को दिखाने तथा अन्य विशेषताओं को शामिल किया जाएगा.

अद्यतन # पीपल बीटा का जाल स्थल यहाँ है



भोपाल में एक प्रेमी जोड़े ने आपस में अंतर्जातीय-अंतर्धर्मीय विवाह क्या कर लिया, सांप्रदायिक तत्वों ने, समाज के तथाकथित कर्णधारों ने जो मनुष्य को मनुष्यता की नहीं, धार्मिक चश्मे से, जाति और वर्ण से, ऊंच-नीच से देखते हैं, सांप्रदायिकता और सौहार्द्रता की बुझती हुई चिंगारी में घी के कनस्तर डाल दिए हैं.

इतना ही नहीं, समाज के वे अज्ञानी तत्व जो अपने कूप मंडूकों से निकलना ही नहीं चाहते, अपने समाज की लड़कियों में तालिबानी किस्म की बंदिशें लगाने की पहल कर रहे हैं - और जिसकी गूंज रतलाम जैसे छोटे से कस्बे में भी सुनाई दे रही है.

शुक्र इस बात का है कि इन तालिबानी निर्णयों पर विरोध के पुख्ता स्वर तमाम क्षेत्रों से निकल चले आ रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब मेरे शहर के मुहल्ले में मनुष्य, मनुष्य रहेगा, वो किसी जाति-धर्म-वर्ण का नहीं रहेगा.

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व्यंज़ल

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चंद दीवाने तो हैं मेरे मुहल्ले में भी

बातें बहुत हैं कुछ पड़ें पल्ले में भी


आखिर किस तरह आएगा इंकलाब

तुम तो चुपचाप बैठे हो हल्ले में भी


सच तो ये है मेरे यार मेरे दोस्त

इज्जत की दरकार है दल्ले में भी


कितने नासमझ हैं ये मुहल्ले वाले

धर्म ले आए प्यार के छल्ले में भी


इतना भी नादान न समझो रवि को

कुटिलता है उसके बल्ले-बल्ले में भी

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कल यह ई-मेल मुझे मिला तो लगा कि यह भी आम स्पॉम मेल ही है जिसमें किसी कड़ी पर जाकर कुछ करने-धरने के निर्देश होते हैं- जिसमें पाठकों को तमाम तरह से उल्लू बनाया जाता है.

परंतु फिर लगा कि यह जरा हटके है. थोड़ा ध्यान से पढ़ा तो कुछ नाम जेहन में आए. इस ईमेल की भाषा ने भी थोड़ा आकर्षित किया था. और फिर जब इस ईमेल की तह में गया तो लगा कि इसे तो हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए. फिर सोचा कि इसे अपने एड्रेस बुक में उपलब्ध सभी संपर्कों को अग्रेषित कर दूं - जैसा कि इस ईमेल में अनुरोध किया गया था.

परंतु लगा कि इससे बात बनेगी नहीं. एक तो यह मेरे विचारों के विरूद्ध काम होगा - आज तक मैंने कोई भी अवांछित मेल किसी को अग्रेषित नहीं किया है, तथा दूसरा - यह ईमेल आगे कहीं कुछ कड़ियों पर जाकर दब खप जाता, जबकि विषय जीवंत है - दृष्टि से भरपूर. इसीलिए विचार आया कि इसे सीधे इस चिट्ठे पर ही क्यों न उतार दूं.

यह ईमेल मूल अंग्रेज़ी में है. और बहुत लंबा है वैसे इसकी लंबाई बाद में अपडेट की गई तथ्यों के कारण है. अतः मूल ई-मेल जो कि संभवतः सबसे पहले भेजा गया होगा, उसका अनुवाद प्रस्तुत है. पढ़ें व सबको पढ़वाएं -

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एक जैसे विचारों वाले हम चार लोगों का एक छोटा सा समूह है -

1. गजराज राव - निर्देशक (कोड रेड फ़िल्म्स)

2. सुब्रत रे - निर्माता (कोड रेड फ़िल्म्स)

3. मनीष भट्ट - रचनात्मक निर्देशक (रिनोण्ड एड एजेंसी)

4. रघु भट्ट - रचनात्मक निर्देशक (रिनोण्ड एड एजेंसी)

इस वर्ष हमने अपने नियमित कारपोरेट ग्राहकों के लिए टेलिविजन के विज्ञापनों को बनाने के अलावा तीन मिनट की एक छोटी सी वीडियो म्यूज़िकल फ़िल्म भी बनाई है जिसका नाम है "हॉस्टल". यह फ़िल्म अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक सरोकार के लिए है.


आप आगे पढ़ें इससे पहले हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप नीचे दी गई कड़ी में जाकर यू-ट्यूब में यह फ़िल्म देखें.

http://www.youtube.com/watch?v=nhwIFbB5iuo


यदि आपको यह फ़िल्म सचमुच द्रवित करती है, तो नीचे दी गई कड़ी पर एक ऑनलाइन फ़ॉर्म भरने हेतु क्लिक करें.

http://www.ebai.org/html/eyepledgeform.asp

यदि संभव हो तो इस ईमेल को अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, परिचितों व सहकर्मियों को प्रेषित करें. आप अपने विचारों से हमें इस ईमेल पते पर अवगत करा सकते हैं- codered@coderedindia.com


अभी सिर्फ पाँच सप्ताह हुए हैं और,

1. अब तक एक लाख चालीस हजार से ज्यादा लोगों ने इस वीडियो को यू ट्यूब पर देखा है - (किसी भी भारतीय वीडियो को अधिकतम बार देखा जाने का पिछला रेकॉर्ड तीस हजार है)

2. इत्यादि इत्यादि....

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(यदि आप अंग्रेज़ी का पूरा ईमेल पढ़ना चाहें तो कृपया मुझे ईमेल करें) अद्यतन # पूरा ईमेल यहाँ पढ़ें

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आउटब्रेन - एक नो नॉनसेंस ब्लॉग रेटिंग सेवा आपके लिए अब पूरी तरह हिन्दी में अपनी सेवा लेकर आ गए हैं.

इसे अब आप अपने ब्लॉग पर लगाइए, और औरों की रेटिंग एक क्लिक पर पाइए. और, यदि आपको कहीं पर किसी चिट्ठे पर आउटब्रेन की रेटिंग लगी हुई दिखाई देती है, जैसे कि इस चिट्ठे पर, और उस पोस्ट से आपको नफ़रत है तो बजाए एक पेजी विवादित टिप्पणी लिखने के, बस एक चटखा वहां पर लगाइए जहाँ यह उभर कर आता है - मुझे इस पोस्ट से नफ़रत है...


और, आउटब्रेन को लगाना है अत्यंत आसान. इस साइट पर जाएँ, ब्लॉगर या वर्डप्रेस जो भी हो वो प्लेटफ़ॉर्म चुनें, हिन्दी भाषा चुनें, और अपने ब्लॉग का नाम चुनें. यदि आवश्यक हो तो उपयोक्ता नाम और पास वर्ड भरें, और इंस्टाल रेटिंग आन योर ब्लॉग पर क्लिक करें. बस हो गया.

इस पोस्ट पर अपने विचार अपनी टिप्पणियों से नहीं, यहाँ पर चमकते सितारों पर क्लिक करके दें तो उत्तम!

बताएँ कि आप इस पोस्ट से नफ़रत करते हैं या नहीं. या फिर ये पोस्ट बेकार है, उबाऊ है या फिर ठीक-ठाक?


चिट्ठों पर अब तमाम तरह की सामग्री मिलने लगी है - या फिर भविष्य में मिलने लगेगी - ऐसा अंदाजा लगाया जा सकता है. क्योंकि गूगल ने सिर्फ चिट्ठों में खोज के लिए ब्लॉग सर्च का बीटा संस्करण जारी किया है.

मैंने कुछ आम प्रचलित शब्दों मसलन आईना, अनुभूति, कहानी और हां, ‘रवि' की तलाश इस ब्लॉग खोजक बीटा के जरिए करने की कोशिश की.

अरे! मुझे तो बहुत से नए नवेले हिन्दी चिट्ठों का पता चला.

कुछ तो बहुत ही अच्छे हैं, जो अभी भी हिन्दी ब्लॉग जगत के गुमनामी के अंधेरों में हैं. कुछ कड़ियों पर आप भी भ्रमण कर सकते हैं. और हां, ब्लॉग सर्च बीटा के जरिए अन्वेषण कर आप भी हमें नया-2 बहुत कुछ बता सकते हैं.

http://meenuzpoem.blogspot.com/2007/03/blog-post_04.html

http://imthbst.blogspot.com/2007/03/thats-how-i-crack-mirrors.html

http://sudeep-swadesh.blogspot.com/index.html

http://shikha12.wordpress.com/

http://musafirpoetry.blogspot.com/index.html

http://protrude.blogspot.com/2007/02/blog-post.html

http://hallucinations-in-loveville.blogspot.com/2007/01/blog-post_30.html

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शास्त्रों में लिखा है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके भोजन पर निर्भर करता है - याने कि यदि व्यक्ति तामसी भोजन करता है तो वह तामसी विचारों का होगा, और यदि वह सादा भोजन करता है तो उसका जीवन भी सादा, स्वच्छ होगा. अब ये अलग बात है कि सादा-भोजन-उच्च-विचार में सादे और तामसी भोजन में किस हिसाब से कैसी भिन्नता मानें - अगर मेनका गांधी की मानें तो दुनिया में दूध से बड़ा मांसाहारी भोजन और कोई है ही नहीं!

मोबाइल फ़ोनों के बारे में आपके क्या विचार हैं? आप पूछेंगे कि मोबाइल फ़ोन और व्यक्ति के व्यक्तित्व में क्या समानता है? भई, समानता भले ही न हो, कुछ अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि आपके मोबाइल फ़ोन से आपके व्यक्तित्व का पता लगाया जा सकता है.

गणित साफ है. यदि आपका मोबाइल तामसी गुणों वाला होगा तो आपकी भी प्रवृत्ति तामसी होगी. आपका मोबाइल यदि राक्षसी गुणों युक्त होगा तो आपके भीतर भी राक्षसी गुण होंगे ही.

अब आप पूछेंगे कि ये तामसी और राक्षसी गुण मोबाइल फ़ोनों में कहाँ से आ गए. रुकिए. मामला अभी साफ किए देते हैं. परंतु पहले एक छोटी सी सच्ची कहानी -

कल ही की तो बात है. मैं चौराहे के फुटपाथिया बाजार पर कुछ खरीद रहा था. पास में ठेले में तमाम तरह की हरी-नीली-पीली सीडी और डीवीडी पर बेचने वाला नित्य की तरह खड़ा था. यदा कदा मैं भी पाइरेसी की बहती गंगा में हाथ धोता था चूंकि असली माल तो कहीं मिलता ही नहीं था. और कभी असली माल के बारे में दरियाफ़्त भी करता था तो लोग बाग़ कुछ यूं देखते थे जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से आए हुए प्राणी हों. वह सीडी वाला निराश परेशान हलाकान लग रहा था. आमतौर पर वह चहकता हुआ मिलता था और हर बार नई आई हुई सीडी के बारे में शौक से बताता था.

मैंने यूं ही उससे उसकी उदासी का कारण पूछा. वह उबल पडा. उसने बताया कि उसके सीडी के धंधे को निगोड़े मोबाइल फ़ोनों ने तबाह करके रख दिया है. मुझे उत्सुकता हुई - मैंने उससे पूछा भइए, सीडी के धंधे का मोबाइल फ़ोनों से क्या संबंध? वह बोला - अरे साहब आप बड़े भोले हो. आपको पता नहीं है. हमारा धंधा जो हरी-नीली सीडी से चकाचक चलता था अब वह मल्टीमीडिया युक्त मोबाइल फ़ोनों के कारण मंदा हो गया है. लोग अब सीडी नहीं खरीदते, बल्कि मोबाइल की दुकानों में जाकर सीधे ही ये फ़िल्में डाउनलोड करवा लेते हैं और उसमें ही ये फ़िल्में देखते हैं. पहले लोग गेम की सीडी ले जाते थे वो अब मोबाइलों में गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं. उसके मुंह से निकलते बोलों की कड़वाहट मुझ तक पहुँच रही थी. मुझे लगा कि यदि उसका बस चलता तो वह संपूर्ण संसार के मोबाइल फ़ोनों पर प्रतिबंध लगा देता.

मैंने उसे सांत्वना दी और कहा कि भई, ठीक है, चारों ओर प्रगति हो रही है. तुम भी तकनॉलाज़ी के साथ चलते क्यों नहीं? अचानक वह प्रसन्न हो गया. उसने बताया कि उसने भी एक दुकान देख लिया है और आवश्यक सामानों का आर्डर दे दिया है - उसकी भी मोबाइल डाउनलोड शॉप अगले हफ़्ते खुलने ही वाली है. फिर उसने मुझसे उसी प्रसन्नता से कहा - साब, अपनी दुकान पर आते रहना. आपको बढ़िया मोबाइल दिलवाएंगे और शुरू में महीने भर का अनलिमिटेड डाउनलोड बिलकुल मुफ़्त!

बाजार से घर वापस आते समय एक पुराने मित्र मिल गए. उनसे पुराने दिनों की बातें होने लगी. एक और पुराने मित्र की बात होने लगी. इस पर वे बिफर गए. बोले - तुम साले उसकी बात करते हो. बहुत गंदा आदमी है वह. उसने अपने मोबाइल में तमाम गंदे एसएमएस भर रखे हैं. अब उन मित्र ने यह नहीं बताया कि ये बात उन्हें कैसे पता चली.

तो, अब वापस आते हैं - आपके मोबाइल फ़ोनों पर - जो आपका व्यक्तित्व दर्शाते हैं. यदि आपके पास कोई स्मार्ट फ़ोन है तो भले ही आपको उसका पूरा फ़ंक्शन पता न हो, आप उन फ़ंक्शनों का उपयोग न कर पाएँ या आपके लिए वे अनावश्यक हों, आप उस स्मार्ट फ़ोन को हाथ में लेकर अपने आप को अच्छा खासा स्मार्ट महसूस करेंगे. और यदि यह काला बुख़ारा मोती जैसा कुछ हो तो क्या कहने! ये तो सौतनों का काम भी बख़ूबी करने लग गई हैं! यदि आपके पास O2 आइस जैसा मोबाइल फ़ोन हाथ में नहीं है तो आपको सबके सामने अपने मोबाइल को अपनी जेब या पर्स से बाहर निकाल कर बात करने में भी शर्म आती है. मोबाइलों को भी अब ड्रेस सेंस और फ़ैशन स्टेटमेंट में शामिल मान लिया गया है.

जब सारी दुनिया मोबाइल इस्तेमाल कर रही है और ऐसे में यदि आप मोबाइल फ़ोन ही इस्तेमाल नहीं करते हैं तब? तब तो आप रिचर्ड स्टालमैन हैं!


चित्र - साभार - देसी टून्ज़

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यह है गूगल समूह पर प्रवेश के लिए मजेदार खिड़की. यूँ तो पूरा पृष्ठ हिन्दी में ही है, परंतु आधी से ज्यादा प्रविष्टियाँ रोमन हिन्दी में हैं!

(बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें - अरे नहीं, चित्र पर "टिकटिकाएं" जैसा कि ऊपर गूगल के चित्र पर कहा गया है)

लगता है गूगल हर किस्म, हर उपाय से हिन्दी मय होने की तीव्रता और तत्परता में लगा हुआ है!

या फिर कहीं पर तो उसका हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन औजार काम कर गया और कहीं पर नहीं?

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मरफ़ी के कुछ अन्य नियम यहाँ देखें

  • यदि पानी गिर रहा है या कोहरा छाया है या दोनों ही एक साथ हो रहा है या दोनों एक साथ नहीं हो रहा है - कंडीशन कोई भी हो - बस देर से ही आएगी.
  • यदि आपको देर हो रही होती है तब बस और भी देरी से चलती है, और हर संभावित-असंभावित स्टॉप पर रुकती है.
  • यदि आप सोचते हैं कि आपको अपनी बस पकड़ने में बहुत समय बचा है तो या तो आपने कोई गलत समय सारिणी देख ली हुई होती है या फिर वह सारिणी पुरानी पड़ चुकी होती है.

  • यदि आप समय से जल्दी पहुँच जाते हैं तो बस लेट हो जाती है और यदि आप लेट होते हैं तो बस समय से पहले छूट चुकी होती है.
  • बस स्टॉप पर इंतजार में बिताए गए उस प्रत्येक पल में बस के पहुँचने की संभावना नगण्य ही होती है.
  • यदि किसी दिन आपके पास चिल्लर नहीं होता है तो उस दिन कंडक्टर के पास भी चिल्लर नहीं होता है.
  • बस का कंडक्टर किसी भी यात्री को बिना कोई सफाई दिए किसी भी समय कहीं पर भी उतार सकता है.

  • बस स्टॉप पर इंतजार करते समय एक ही स्थान के लिए दो बस एक साथ ही आ जाती हैं परंतु आपको जाना कहीं और होता है.
  • बस के सामने छपा हुआ गंतव्य स्थल सिर्फ बस की सजावट के लिए होता है - बस का गंतव्य नहीं.
  • बस के लिए बिताया गया इंतजार का समय बस में की जाने वाली यात्रा के कुल समय से बड़ा होता है.
  • जिस बस को आप पकड़ना चाहते हैं वह हमेशा ही आपके पहुँचने के पाँच मिनट पहले छूट चुकी होती है और जो बस आप अंततः पकड़ पाते हैं वह पहले ही दस मिनट की देरी से चल रही होती है.

  • अगर धूलभरी आंधी चल रही होगी तो बस में आपकी सीट की खिड़की का शीशा टूटा हुआ ही मिलेगा.
  • यदि आपको अपने रूट की अंतिम बस पकड़नी होती है तो वह बस आपके पहुँचने के ठीक पंद्रह सेकण्ड पहले छूट चुकी होती है.
  • जितनी दफ़ा आप कंडक्टर से यह पूछेंगे कि आपके गंतव्य पर बस कब पहुंचेगी, कंडक्टर द्वारा न बताने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी.
  • इंतजार करते करते जब आप थक हार कर सिगरेट सुलगाते हैं या पास के ठेले से चाय लेकर पहला घूँट भरते हैं कि बस आ जाती है.

  • यदि आप यह सोचकर कि बस जल्दी आएगी - सिगरेट सुलगाते हैं या चाय का आर्डर देते हैं तो बस देरी से ही आती है.
  • बस स्टॉप पर जब आप किसी खूबसूरत स्त्री (या स्मार्ट पुरूष) से जैसे ही बतियाना प्रारंभ करते हैं, नामालूम कहाँ से बस आ जाती है.

  • मनुष्य की अब तक की सबसे उत्कृष्ट, उज्जवल, चमकीली सर्जना जो उसकी काल्पनिकता की असीमितता को बख़ूबी दर्शाती है - बस की समय सारिणी है.

  • यदि आपको किसी दिन मजबूरी में बस में जाना होता है तो आपकी बस रोड जाम की वजह से सबसे लंबे रूट पर चलती है.

  • समय और रूट से परे, सिटी बसें हमेशा ही पहले से ज्यादा भरी हुई मिलती हैं.

  • बस का अंतिम यात्री हमेशा ही बस के आखिरी स्टॉप पर उतरता है.
  • जब आप लेट हो रहे होते हैं तो रुट पर मिलने वाले सभी ट्रैफ़िक सिगनल लाल ही मिलते हैं.
  • कंडक्टर हो या यात्री - बस में कभी भी किसी के पास भी उचित चिल्लर नहीं होता है.
  • खूबसूरत स्त्री (या स्मार्ट पुरूष) अगले ही स्टॉप पर उतर जाती(ता) है और जो बगल का बेवकूफ आपको फ़ोकट की कहानी सुनाता होता है बस से उतरता ही नहीं.

  • जब आप बस स्टॉप की ओर जा रहे होते हैं और बस के रास्ते की ओर देखते हुए जाते हैं कि बस आ रही है या नहीं तो बस नहीं आती है और जब आप नहीं देखते हैं तो बस आकर सामने से निकल जाती है.
  • जब आप इंतजार करके थक हार कर बस स्टॉप से जाने लगते हैं तभी बस आती है और आपके पास दौड़ कर बस पकड़ने का अवसर नहीं होता.
  • बस में आपके बगल की सीट में चाहे कोई भी आ जाए - वह अपने मोबाइल फोन से अपने हर संभव परिचितों से बतियाने लगता है.

(यह बस-स्टापिया पोस्ट यूनुस खान मुम्बई तथा आलोक कुमार सिन्हा जर्मनी को समर्पित, इस आग्रह और अनुरोध के साथ - हिन्दी ब्लॉग जगत को अपने अनुभवों से समृद्ध करें)

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