March 2007


राष्ट्रीय संगोष्ठी में, जिसका जिक्र इस चिट्ठे पर है, मैंने व जी. करूणाकर ने एक संयुक्त पर्चा पढ़ा था - अनुवादों व शब्दावलियों का विकास - मुक्त स्रोत के संदर्भ में जिसे अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं. इस पर्चे में कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों में इस्तेमाल में लिए जा रहे हिन्दी शब्दों पर एक छोटा-सा तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया है, जो कि निम्नानुसार है -

विंडोज़ एक्सपी हिंदी | शब्दावली आयोग | इंडलिनक्स

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Taskbar कार्य पट्टी |- |कार्यपट्टी

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Tip युक्ति |- |युक्ति, संकेत

Tools उपकरण |उपकरण |उपकरण

Un do पूर्ववत करें| -| पहले जैसा

Untitled अनामांकित| -| बेनाम,अनाम

Up ऊपर |- |ऊपर

Up one level एक स्तर ऊपर|- |एक स्तर ऊपर

Urgent अत्यावश्यक|- |अत्यावश्यक, तत्काल

User उपयोगकर्ता |उपयोगकर्ता, प्रयोक्ता |उपयोक्ता, प्रयोक्ता

View दृष्य |दृश्य |देखें, दिखाएँ, दर्शन, नजारा

Welcome सुस्वागतम| - |सुस्वागतम, स्वागतम्

Window विंडो |विंडो |विंडो

Zip संपीडित |संकुचित |संपीडित

Zoom जूम |जूम |जूम, छोटा-बडा करें

आप देखेंगे कि हमने इंडलिनक्स में अनुवादों को सरल बनाने की भरपूर कोशिश की है और प्रचलित शब्दों के क्लिष्ट अनुवादों को नहीं लिया है, बल्कि उन्हें वैसा ही रहने दिया है - उदाहरण के लिए फ़ाइल को फ़ाइल ही रहने दिया है - संचिका नहीं लिखा है. फ़ाइल को हर कोई फ़ाइल ही कहता है - संचिका नहीं. फ़ाइल शब्द हिन्दी में समाहित हो चुका है और वह अब हिन्दी शब्द है. भले ही विशुद्धतावादी इसे सिरे से नकारें, जब ब्रिटेन की अंग्रेज़ी की ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में आठ हजार भारतीय शब्द शामिल हो सकते हैं तो हिन्दी के शब्दकोशों में क्यों नहीं? इस बात पर संगोष्ठी में हमेशा की तरह गर्मा-गर्म बहसें भी हुईं, परंतु भाषा किसी नियम की मोहताज नहीं है - उसके इस्तेमाल करने वाले ही उसे रूप रंग आकार देते हैं - शब्दावली आयोगों के सदस्यों द्वारा गढ़े गए नए क्लिष्ट शब्दों से नहीं.


संगोष्ठी में पर्चे पढ़ने वालों को उपहार स्वरूप कुछ किताबें भी दी गईं. (चित्र सबसे ऊपर देखें) किताबें जाहिर है, संगोष्ठी के विषयानुरूप ही थीं. कम्प्यूटर शब्दकोश - इलस्ट्रेटिड नाम की एक किताब (लेखक: रितुरंजन सिन्हा, प्रकाशक: मलिक एंड कंपनी, जयपुर, पृष्ठ 375, मूल्य 160, आईएसबीएन नं. 81-7998-000-6) एक मित्र को मिली. किताब में कम्प्यूटर व इंटरनेट संबंधी 4000 अंग्रेज़ी शब्दों की परिभाषा हिन्दी में दी गई है. किताब बहुत ही औसत दर्जे की है, जिसमें बहुत सी जगह पर अपूर्ण-अस्पष्ट-असत्य परिभाषा भी दी गई है. उदाहरण के लिए-

फ़ाइल प्रोसेसिंग - फ़ाइल को व्यवस्थित या क्रमबद्ध करने की प्रक्रिया को फ़ाइल प्रोसेसिंग कहते हैं.

पाइरेसी - किसी ऑरिजिनल सॉफ़्टवेयर की दूसरी प्रति बनाना.

जाहिर है, ऐसी किताबें पाठकों का कोई बहुत भला नहीं करने वालीं.

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पिछले दिनों वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने सीडॅक मुंबई के तत्वावधान में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैंने भी भाग लिया था. विषय था - भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के भाषाई संसाधनों का निर्माण (क्रिएशन ऑफ़ लेक्सिकल रिसोर्सेज़ फ़ॉर इंडियन लेंगुएज कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग). वैसे, शुद्ध साहित्यिक भाषा में इसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं किया गया था -

भारतीय भाषी अभिकलन एवं प्रक्रमण के लिए शाब्दिक संसाधनों का सृजन

कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग की जगह अभिकलन एवं प्रक्रमण का इस्तेमाल किया गया था, जो कि न तो प्रचलित ही है और न ही सुग्राह्य. परंतु यह क्यों किया गया था या जा रहा है - इसकी कथा बाद में.

शब्दावली आयोग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. बिजय कुमार ने जब अपना प्रजेंटेशन देना प्रारंभ किया तो पावर-पाइंट में बनाए गए प्रजेंटेशन ने हिन्दी दिखाने से मना कर दिया. जाहिर है, यह प्रजेंटेशन प्रो. बिजय कुमार के कार्यालय-सहायकों ने तैयार किया था, और यूनिकोड में नहीं वरन् किसी अन्य फ़ॉन्ट में था, जो कि एलसीडी प्रोजेक्टर से जुड़े कम्प्यूटर में उस फ़ॉन्ट के संस्थापित नहीं होने से चला ही नहीं. प्रो. बिजय कुमार के साथ-साथ सभी ने कम्प्यूटरी हिन्दी की इस दुर्गति का रोना रोया और बहुत-कुछ असहनीय-सी हँसी मजाक के दौर भी चले. दरअसल, तकनॉलाजी से अभिज्ञ-अनभिज्ञ सहायकों द्वारा तैयार किए गए पॉवर-पाइंट के प्रजेन्टेशन के चलने-नहीं-चलने में कम्प्यूटरी हिन्दी का कोई दोष आज से दो-चार साल पहले भले रहा हो, अब तो नहीं ही है. खैर.

अब आइए, बातें करते हैं अभिकलन एवं प्रक्रमण जैसे क्लिष्ट संस्कृत-रुप शब्दों के इस्तेमाल के बारे में. यह तो हम सभी को पता है कि वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के अंतर्गत भाषाई विद्वानों द्वारा हिन्दी में दो खंडों की वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली तैयार की गई है. इसकी भाषागत लोकप्रियता और स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न उठते रहे हैं और एक तरह से इस शब्दावली के शब्दों को आमतौर पर इस्तेमाल में नहीं लिया जाता रहा था - यहाँ तक कि सरकारी एनसीईआरटी के प्रकाशनों में भी. इसी बीच किसी भाषाई संस्था ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर दी कि वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा जारी तकनीकी शब्दों को एनसीईआरटी के प्रकाशनों में अनिवार्य इस्तेमाल में लिए जाने हेतु निर्देश दिए जाएं. न्यायालय ने कई पक्षों की बात सुनकर यह निर्णय दिया कि चूंकि भारत सरकार द्वारा गठित आयोग के अंतर्गत ये शब्द तय किए गए हैं अतः इनका इस्तेमाल जरूरी है अन्यथा इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा. अब आप हिन्दी में इस तरह के कठिन, अप्रचलित, संस्कृतनिष्ठ शब्दों के इस्तेमाल की आदत बना लें नहीं तो, कल को हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश विस्तारित होकर चिट्ठों पर भी लागू हो जाए, और आप न्यायालय की अवमानना के आरोपी होकर जेल भेज दिए जाएं!

बहरहाल, संगोष्ठी के दौरान कुछ पल हमने भी चुराए और गुलमोहर रोड क्रास नं 9 की तिवारी जी की मिठाई की दुकान में, फिर नुक्कड़ पर चाय की चुस्कियों के साथ और फिर बाद में सीडॅक के आगंतुक कक्ष में कोई दो घंटे से ऊपर, जम-कर मुम्बईया चिट्ठाकार संगोष्ठी कर डाली.

चार चिट्ठाकारों की इस संगोष्ठी में मेरे अलावा शशि सिंह, कमल शर्मा, चन्द्रकांत जोशी सम्मिलित रहे. हिन्दी चिट्ठाकारी की दशा व दिशा पर तमाम तरह की बातें हुईं. लोकमंच को मिल रहे नित्य के आठ-हजार क्लिक्स के बारे में जानकर सुखद आश्चर्य हुआ. शशि जी जितने हँसमुख दिखाई देते हैं, साक्षात मिलन में उससे कहीं ज्यादा हैं. चन्द्रकांत जी का ज्ञानसागर बड़ा विस्तृत है - और वे हिन्दी चिट्ठाजगत के हर चिट्ठों पर अपनी पैनी निगाह रखते हैं. हिन्दी चिट्ठाजगत और फैले-फूले इस क्षेत्र में उनके प्रयास अपने स्तर पर जारी हैं. कमल जी ने तो एक तरह से यह तय कर रखा है कि हिन्दी चिट्ठाकारों को ऐन-कैन-प्रकारेण सोना जैसी चीजें खरीदवा-बिकवा कर धनवान बनवाएंगे ही.

(कमल, मैं, चंद्रकांत व शशि)

तिवारी मिठाईवाले के स्वादिष्ट समोसों और रबड़ी से चिट्ठाकार संगोष्ठी में और अधिक स्वाद आ गया. चिट्ठाकारी के बहुत से पहलुओं पर बात हुई जिनमें वर्तमान में विंडोज़ 98 में फंसे हुए गैर यूनिकोड हिन्दी के पाठकों को यूनिकोड पाठकों में कैसे तबदील किया जाए इस पर तो विशेष चर्चा हुई. निकट भविष्य में मुम्बई में एक विशाल हिन्दी-चिट्ठाकार सम्मेलन-सह-संगोष्ठी के आयोजन के संकल्प के साथ यह संगोष्ठी संपन्न हुई.

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मिलिए देबाशीष चक्रवर्ती से

"भारतीय कम्प्यूटिंग व भारतीय भाषाओं में सामग्री के विस्तार की संभावनाएँ."

पुणे निवासी, सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती को भारत के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में गिना जाता है. वे कई चिट्ठे (ब्लॉग) लिखते हैं जिनमें भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग से लेकर जावा प्रोग्रामिंग तक के विषयों पर सामग्रियाँ होती हैं. हाल ही में वे भारतीय चिट्ठा जगत में अच्छी खासी सक्रियता पैदा करने के कारण चर्चा में आए. उन्होंने इंडीब्लॉगीज़ नाम का एक पोर्टल संस्थापित किया है जो भारतीय चिट्ठाजगत के सभी भारतीय भाषाओं के सर्वोत्कृष्ट चिट्ठों को प्रशंसित और पुरस्कृत कर विश्व के सम्मुख लाने का कार्य करता है.

देबाशीष डीमॉज संपादक हैं, तथा भारतीय भाषाओं में चिट्ठों के बारे में जानकारियाँ देने वाला पोर्टल चिट्ठाविश्व भी संभालते हैं. देबाशीष ने न सिर्फ भारत का एकमात्र और पहला बहुभाषी चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ का भी शुभारंभ किया, बल्कि भारतीय ब्लॉग-दुनिया पर वे पैनी नजर भी रखते हैं. आपने बहुत सारे सॉफ़्टवेयर जैसे कि वर्डप्रेस, इंडिकजूमला, आई-जूमला, पेबल, स्कटल इत्यादि के स्थानीयकरण (सॉफ़्टवेयर इंटरफ़ेसों का हिन्दी में अनुवाद) का कार्य भी किया है. आपने ब्लॉग जगत में बहुत से नए विचारों को जन्म दिया जैसे कि बुनो-कहानी नाम का समूह चिट्ठा, जिसमें बहुत से चिट्ठाकार मिल जुल कर एक ही कहानी को अपने अंदाज से आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं तथा अनुगूंज जिसमें एक ही विषय पर तमाम चिट्ठाकार अपने विचारों को अपने अंदाज में लिखते हैं. वे नियमित रूप से हिन्दी विकिपीडिया, सर्वज्ञ तथा शून्य पर भी हिन्दी संदर्भित विषयों पर लिखते हैं. देबाशीष ने चिट्ठा-विश्व नाम का भारतीय भाषाओं का ब्लॉग एग्रीगेटर-सह-जानकारी स्थल भी बनाया था (तकनीकी कारणों से अभी कार्य नहीं कर रहा है) और वे निरंतर नाम के विश्व के पहले हिन्दी ब्लॉगज़ीन का संपादन-प्रकाशन-प्रबंधन भी करते हैं. देबाशीष के बारे में और जानकारी उनके चिट्ठे नुक्ता-चीनी तथा नल-पाइंटर में देखें

यह सचमुच प्रशंसनीय उपलब्धि है कि आपने अपने व्यक्तिगत संसाधनों के जरिए भारतीय भाषाओं के चिट्ठों को पिछले चार वर्षों से प्रोत्साहित कर रहे हैं. आपके इन सुंदर प्रयासों को नमन्. ये बताएँ कि आप तबदीली को कैसे अनुभव करते हैं? आपने कब से भारतीय भाषाओं के चिट्ठों पर ध्यान देना प्रारंभ किया और आप आज के भारतीय ब्लॉगजगत को किस श्रेणी में रखना चाहेंगे?

इंडीब्लॉगीज़ की प्रशंसा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. यह कहना तो गलत होगा कि अकेले इंडीब्लॉगीज़ ने ही भारतीय भाषाओं के चिट्ठों को प्रोत्साहित किया है. परंतु यह मैं मानता हूँ कि इंडीब्लॉगीज़ में भारतीय भाषाओं को शामिल करने से भारतीय भाषाओं के चिट्ठों को प्रकाश में आने में मदद मिली. इंडीब्लॉगीज़ के जरिए बहुतों को पता चला कि आज अपनी भारतीय मातृभाषा में ब्लॉग लिखना कितना आसान हो गया है और भारतीय भाषाओं के चिट्ठों में कितनी प्रचुर सामग्री उपलब्ध है. और लोगों ने इसमें दिलचस्पी दिखानी भी शुरू कर दी है.

इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों की दूसरी वर्षगांठ पर सन् 2004 में भारतीय भाषाओं को सम्मिलित किया गया. तब तक मैंने भी हिन्दी भाषा में अपना चिट्ठा लिखना प्रारंभ कर दिया था और तब तक मैं दूसरी भाषाओं यथा मराठी व बंगाली भाषाओं के चिट्ठाकारों के संपर्क में आ चुका था. और, तब तक मेरे मन में यह पक्की धारणा बन चुकी थी कि भारतीय भाषाओं के चिट्ठों में बड़ा भविष्य है.

आज भारतीय भाषाओं के चिट्ठे सशक्त और फल फूल रहे हैं तो इसके पीछे बहुत से समर्पित व्यक्तियों का भी हाथ है जिन्होंने आरंभिक आवश्यक औजार उपलब्ध किए, यूनिकोड के बारे में जागृति जगाई और इसके चहुँ-ओर सहयोगी समुदाय बनाया. इसी समुदाय ने ब्लॉग जगत् के इतर; ब्लॉगवेयर, सीएमएस तथा अन्य सॉफ़्टवेयर को स्थानीयकृत करने में सकारात्मक भूमिका तो निभाई ही, माइक्रोसॉफ़्ट, याहू तथा गूगल जैसी कंपनियों को इस क्षेत्र में निवेश हेतु सचेत भी किया.

इस मर्तबा कितनी भाषाओं में प्रतियोगिता हुई? चिट्ठों को नामांकित करने के क्या मानक थे? क्या आप अगली दफ़ा सभी ऑफ़ीशियल भाषाओं को सम्मिलित करेंगे?

अंग्रेज़ी के अलावा, इंडीब्लॉगीज़ में बंगाली, हिन्दी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ तथा मलयालम के लिए पुरस्कार थे. मैं उन निर्णायकों पर निर्भर था जो उस भाषा को जानते तो थे ही, पिछले लंबे समय से उस भाषा में चिट्ठाकारी कर रहे थे. यह एक कठिन प्रक्रिया थी चूंकि आमतौर पर भाषाई चिट्ठा समुदाय अपने अपने क्षेत्रों में सीमित हैं. उदाहरण के लिए, उचित निर्णायकों के अभाव में बंगाली तथा गुजराती चिट्ठे इस बार प्रतियोगिता में भाग ही नहीं ले पाए. सामुदायिक चिट्ठा एकत्रक जैसे कि देसीपंडित और चिट्ठा-चर्चा जैसी संकल्पनाएँ अपने अपने स्तर पर इन समुदायों को पास-पास लाने का कार्य कर रही हैं और उम्मीद है कि ये आवश्यक बोध जगाने में सफल होंगे. तो यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि इंडीब्लॉगीज़ में कितनी भाषाओं में पुरस्कार हैं - प्रश्न यह है कि उस भाषा में कितनी संख्या में अच्छे चिट्ठे लिखे जा रहे हैं और उनमें निर्णायक के रूप में भाग ले सकने वाले उत्साही चिट्ठाकार कितने हैं.

आपने इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के लिए प्रायोजकों का प्रबंधन कैसे किया?

प्रत्येक वर्ष मैं अनगिनत कंपनियों, जाल-स्थलों तथा प्रकाशकों को प्रतियोगिता-प्रायोजन के लिए लिखता हूँ. कुछ प्रत्युत्तर देते हैं परंतु ढेर सारा उत्साह-वर्धन उन उदार व्यक्तियों से मिलता है जो समुदायिक सहयोग को महसूस करते हैं. जब भी उन्हें इंडीब्लॉगीज के बारे में मालूम पड़ता है, वे सीधे ही मुझसे संपर्क करते हैं. इस वर्ष मैंने कुछ प्रेस वार्ताएँ भी जारी की जिससे कुछ कंपनियों जैसे कि सिनेप्स ने 12 लाख रुपए तक के पुरस्कार प्रायोजित किए. बहुत से चिट्ठाकार मित्रों ने प्रायोजकों से संपर्क किया और उन्हें इंडीब्लॉगीज़ तक लाया. कुछ चिट्ठाकारों ने स्वयं ही पुरस्कार प्रायोजित किए. मैं स्वयं पुरस्कारों के नकदी मूल्य को कोई खास महत्व नहीं देता - मेरे लिए पुरस्कारों का अर्थ है समुदाय को उसका कुछ हिस्सा वापस करना.

भारतीय भाषाओं के चिट्ठे तादाद में बढ़ रहे हैं और जिनके फलस्वरूप भारतीय भाषाओं को फ़ायदा हो रहा है. बहुत से भाषाओं के ब्लॉग एग्रीगेटर बख़ूबी अपना रोल निभा रहे हैं. आपके हिसाब से भारतीय भाषाओं में चिट्ठाकारी की गुंजाइशें कहां तक जाती हैं?

ये अंदाजा लगाना कतई कठिन नहीं है कि भारतीय भाषाओं के चिट्ठे भविष्य में खूब फलेंगे-फूलेंगे. प्रायः सभी भारतीय भाषाओं के ब्लॉग समुदायों के पास आज अपने ब्लॉग एग्रीगेटर हैं जिनसे उस भाषा के ब्लॉगों के बारे में जानकारियाँ सर्वत्र प्रसारित होने में मदद मिलती है. इक्का-दुक्का स्थानीय समाचार पत्रों ने भी ब्लॉगरों और ब्लॉग सामग्री की ओर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया है और वे ब्लॉगों को अपने तईं समर्थन भी दे रहे हैं. गूगल ने ब्लॉगर.कॉम के अपने ब्लॉग लेखन औजार में हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन के लिए खास अलग से एक बटन जोड़ा है. भारतीय भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरने का यह साफ संकेत है. माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में इंडिक आईएमई को शामिल किया है जो कि भारतीय भाषाओं में ब्लॉग लेखन को आसान बनाता है.

एमएसएन तथा याहू ने अपने भारतीय भाषाओं के संस्करण जारी कर दिए हैं. गूगल ने अभी अपने समाचार पृष्ठों में हिन्दी का खंड भी जोड़ दिया है - उन्हें पता है स्थानीय भाषा में सामग्री की आवश्यकता है और स्थानीय भाषाओं के समाचारों के लिए रुचि भी बढ़ रही है.

यह तो अभी सिर्फ कुछेक साल से ही भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग संभव हो पाया है, और इसके बावजूद भारतीय मीडिया में ब्लॉगों की सशक्त उपस्थिति दर्ज की गई है. वैसे तो भारतीय भाषाओं के लिए बहुत से ब्लॉग पुरस्कार हैं - जैसे कि एक है भाषाइंडिया. आपको इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार का विचार कैसे सूझा?

भारतीय भाषाओं के लिए "बहुत" से ब्लॉग पुरस्कार नहीं हैं. जहाँ तक मेरी जानकारी है, इंडीब्लॉगीज़ के अलावा सिर्फ भाषाइंडिया द्वारा ही पुरस्कारों की घोषणा की गई थी.

मुख्य धारा की मीडिया को ब्लॉगिंग से अनावश्यक भय हो रहा है और उनमें से कुछेक ने इसकी खासी आलोचना भी की है. चिट्ठाकारी के इस वैकल्पिक मीडिया से मुख्य धारा की मीडिया को जाने क्यों जान का भय सता रहा है - उन्हें लगता है कि असंपादित, अनियमित चिट्ठे जो कुछ भी, किसी भी विषय में लिख मारने को स्वतंत्र हैं, मुख्य धारा की मीडिया को उखाड़ फेंकेंगे. परंतु मुख्य धारा की मीडिया को चिट्ठाकारी की सामूहिक सोच की ताक़त को, त्वरित पारस्परिक सम्प्रेषण क्षमता को स्वीकारना और समझना होगा. नागरिक पत्रकारिता जैसी अवधारणा को चिट्ठाकारी के प्रचलन से पहले समझा ही नहीं गया था.

लोग आज हर संभव विषय पर लिख रहे हैं. व्यक्तिगत चिट्ठों को छोड़ दें तो चिट्ठाकार ऐसे धीर-गंभीर विषयों पर भी लिख रहे हैं जिन्हें मुख्य धारा की मीडिया तुच्छ मानती है और कोई तवज्जो नहीं देती. चिट्ठे तथाकथित टीआरपी पर नहीं चला करते हैं और इसीलिए वे महत्वपूर्ण विषयों पर अपना ध्यान लगा सकते हैं. आज स्थिति यह है कि तमाम विषयों पर तमाम चिट्ठे हैं और एक नियमित पाठक के लिए नित्य प्रकाशित चिट्ठों में से छांटना मुश्किल है कि वह क्या पढ़े और क्या छोड़े. इंडीब्लॉगीज़ ने एक तरह से इस मामले में मदद की है - महत्वपूर्ण चिट्ठों जिन पर आम पाठक की नजरें नहीं जा सकी होंगी उन्हें प्रकाश में लाने का. और इसी कारण से पुरस्कृत सूची के बजाए, मैं हर हमेशा, अंतिम दौर में पहुँची सूची को ज्यादा महत्व देता हूँ और इन्हें चिट्ठों की उपलब्धि समझता हूँ - चूंकि आप इन सूची में से बहुत से प्यारे और सचमुच विशिष्ट चिट्ठों के बारे में जान पाते हैं. इन सूची में शामिल होते हैं बहुत से अच्छे चिट्ठे जो अब तक आपकी नजरों में नहीं आ पाए होते हैं. यह सत्य इंडीब्लॉगीज़ के टैगलाइन में भी उद्धृत होता है - "सर्वोत्कृष्ट भारतीय चिट्ठाकारी का प्रदर्शन". और हम इनमें से सबसे अच्छे को पुरस्कृत करते हैं.

भारत में अंग्रेज़ी मीडिया के लिए बहुत बड़ा बाजार है. चिट्ठाकारी में भी मुख्य रूप से चिट्ठाकार अंग्रेज़ी में ही ध्यान लगाए हुए हैं. इसके विपरीत, पारंपरिक मीडिया भाषाई बाज़ार को पकड़े हुए है और उसने अंग्रेजी मीडिया को कई क्षेत्र में मात दे दी है. तो जैसे कि पारंपरिक मीडिया क्षेत्र में हुआ है, चिट्ठाकारी में भी क्या भाषाई बाजार अंग्रेज़ी से आगे निकल पाएगा?

मेरे नम्र विचार में तो आगे निकलने का प्रश्न ही पैदा नहीं होगा. किसी भी दिए गए समय में अंग्रेज़ी सामग्री हर हमेशा ज्यादा ही रहेगी. परंतु स्वस्थ प्रवृत्ति जो नजर में आने लगी है वह है ऑन लाइन मीडिया में भारतीय भाषाओं में सामग्री का प्रचुरता से आना. संभवतः यह भी एक कारण है कि दैनिक भास्कर जैसे मीडिया स्थलों ने जिन्होंने हिन्दी व गुजराती समाचार पत्रों के जरिए बेहतरीन काम कर दिखाया था, वे भी चिट्ठों पर निगाहें लगा चुके हैं.

कुछ अरसा पहले मेरे जैसे लोग सोचा करते थे कि भारतीय भाषाओं के अच्छे साइट जैसे कि हिन्दी की वेब दुनिया को यूनिकोड में परिवर्तित क्यों नहीं किया जाता. परंतु पद्मा जैसे एक्सटेंशनों के जरिए फ़ॉन्टों की अब वैसी कोई समस्या नहीं रही जो कि किसी भी फ़ॉन्ट को फ़ॉयरफ़ॉक्स ब्राउजर में चलते चलते ही यूनिकोड में परिवर्तित कर दिखाता है. मुझे लगता है कि ऐसी साइटें मेरी उम्मीद से जरा जल्दी ही यूनिकोड में बदल जाएंगी. आज ढेर सारे औजार भी हैं जिनसे सभी फ़ॉन्ट फ़ॉर्मेट को यूनिकोड में आसानी से बदला जा सकता है.

इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा आती है यह आती है - "मैं अपनी भाषा में कैसे टाइप कर सकता हूँ?" यदि आप देखें, तो यही प्रश्न नए नवेले अकसर पूछते दिखाई देते हैं. सामुदायिक विकी जैसे कि सर्वज्ञ ने यह रास्ता आसान बनाया है. अब आज आप सेकण्डों में अपनी भाषा में चिट्ठा बना सकते हैं. अंतर्निर्मित टाइपिंग तथा ट्रांसलिट्रेशन औजारों की बदौलत आने वाले समय में यह और आसान होगा. इंटरनेट पर बेहद आसान तरीके से प्रकाशन ने ही ब्लॉगिंग को इतना लोकप्रिय बनाया है और जब यह भारतीय भाषाओं के लिए भी आसान हो जाएगा, तो फिर इसे लोकप्रियता की तमाम सीढ़ियाँ चढ़ने से कोई रोक नहीं पाएगा.

चिट्ठों की मौजूदगी से ही भाषाई लेखक इंटरनेट पर चले आ रहे हैं. मलयालम में कोई एक हजार चिट्ठाकार हैं और तमिल में इससे भी ज्यादा. और यह संख्या प्रतिदिन बढ़ रही है. क्या यह स्थिति सॉफ़्टवेयर कंपनियों को उनके उत्पादों को स्थानीयकृत करने के लिए उकसाएंगी?

निश्चित रूप से, जैसे कि मैंने ऊपर गूगल का उदाहरण प्रस्तुत किया था. याहू ने मांग को देखते हुए विविध किस्म के प्रचुर भाषाई सामग्री को प्रस्तुत किया है. मोबाइल ऑपरेटरों ने अपने अनुप्रयोगों को कुछ समय से स्थानीयकृत करना प्रारंभ कर दिया है. आज आपको अपनी भाषा में शुभकामना संदेश के कार्ड आसानी से मिल जाते हैं - और ये सिर्फ एक प्रवृत्ति है जो चल निकली है.

बहुत से ब्रांड नामों या ब्लॉग-वेयरों के स्थानीयकरण में आपने महती भूमिका निभाई है. वर्तमान में बहुत सारे सॉफ़्टवेयर कंपनियों ने अपने स्थानीयकृत सॉफ़्टवेयरों के भारत की ओर साथ रूख किया है. माइक्रोसॉफ़्ट ऑपरेटिंग सिस्टम तथा ऑफ़िस सूट अब प्रमुख भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं. भारत में सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण को आप किस रूप में देखते हैं? भारत का सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण उद्योग किन कठिनाइयों से जूझ रहा है?

मैं सिर्फ कुछेक अनुप्रयोगों के स्थानीयकरण में सम्मिलित रहा था, पर मेरे मित्रों व मेरे अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि स्थानीयकरण, वह भी ओपन सोर्स हेतु - एक बड़ा ही थैंकलेस किस्म का कार्य है. बहुत ही कम संस्थाएँ - जैसे कि सराय हैं जिन्होंने इस तरह के प्रयासों को समर्थन व अवलंब दिया है. फिर भी हममें से प्रायः सभी अपनी भाषा के प्रति प्यार की वजह से ये कार्य करते रहे हैं व आगे भी करते रहेंगे. उन अनुप्रयोगों व औजारों की प्रशंसा की जानी चाहिए जो स्थानीयकरण की भावना व उस कार्य में मदद करने के विचारों को लेकर ही बनाए गए हैं - जैसे कि gettext. और मुझे उम्मीद है कि स्थानीयकरण उद्योग ऐसे कॉमन ओपन सोर्स तकनीक पर ध्यान देकर इनके बारंबार इस्तेमाल पर ध्यान देगा.

आपको पता होगा कि भाषाइंडिया ने अपने पोर्टल में और भी भाषाओं को अभी-अभी जोड़ा है. भारतीय भाषा के चिट्ठाकार होने के नाते व सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण से जुड़े होने के नाते, आप भाषाइंडिया के इन प्रयासों का किस तरह से मूल्यांकन करेंगे? क्या आपके कोई सुझाव हैं?

भाषाइंडिया ने उन लोगों को सामुदायिक तौर पर परस्पर जोड़ने का शानदार कार्य किया है जो अपनी भाषा को इंटरनेट पर देखना चाहते हैं. मेरा रुझान जावा तकनॉलाज़ी की ओर अधिक होने से मैं इसमें अधिकता से भाग नहीं ले पाया हूँ, परंतु यहाँ का फ़ोरम जीवंत है और सामग्री उत्तम.

(मूल अंग्रेज़ी साक्षात्कार से साभार, देबाशीष की अनुमति से अनुवाद)

अनुवाद व प्रस्तुति : रविशंकर श्रीवास्तव

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ब्लॉगर में मोबाइल से ब्लॉगिंग की सुविधा अमरीका में कुछ खास नेटवर्क के जरिए तो कुछ समय से उपलब्ध थी, परंतु भारत में ऐसी सरल सुविधा अब तक नहीं थी. जीपीआरएस एनेबल्ड मोबाइल फ़ोनों और स्मार्ट फ़ोनों के जरिए कुछ मोबाइल एप्स के जरिए तो यह संभव था, परंतु मेरे जैसे आम जनता को जिनके पास बहुत ही बेसिक किस्म का मोबाइल फ़ोन होता है, उससे ब्लॉगिंग संभव नहीं था.

अब इबिबो नाम के ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म में किसी भी मोबाइल के जरिए एसएमएस सेवा के इस्तेमाल से मोबाइल ब्लॉगिंग की सुविधा प्रदान की गई है. इबिबो वही सेवा है जो पिछले कुछ समय से भारतीय जनमानस में ब्लॉग लेखन के प्रति एक लहर पैदा करने की कोशिश कर रही है - ब्लॉगरों को करोड़ों रुपयों का इनाम देने का लालच देकर. परंतु इबिबो के इस प्रयास में खांटी किस्म के ब्लॉगरों ने कन्नी-सी काट रखी है.

मगर, एसएमएस के जरिए ब्लॉगिंग की इस सुविधा से इबिबो के उपयोक्ता आधार में बढ़ोत्तरी निश्चित ही संभव है. मोबाइल ब्लॉगिंग अत्यंत आसान है. पंजीकरण के पश्चात् सिर्फ एसएमएस करने जितना! आपको इबिबो में एक ब्लॉग खाता खोलना होगा, और अपने मोबाइल को इस खाते के लिए पंजीकृत करना होगा. पंजीकरण सुरक्षित है - यानी कि आपके मोबाइल नंबर पर एक एसएमएस के जरिए पासवर्ड भेजा जाएगा जिसे आपको मोबाइल पंजीकरण हेतु इबिबो साइट पर डालना होगा. बस फिर आप तैयार हो जाइए. आपको ब्लॉग लिखने के लिए सिर्फ दो एसएमएस करने होंगे - पहला ब्लॉग प्रविष्टि के लिए. इसके लिए Blog लिखकर स्पेस देकर अपनी ब्लॉग प्रविष्टि लिखें और उसे 676746 पर एसएमएस कर दें. थोड़ी ही देर में आपको एसएमएस के जरिए ब्लॉग का शीर्षक भेजने के लिए कहा जाएगा. इसके लिए आप Posttitle लिखकर स्पेस देकर अपने ब्लॉग का शीर्षक लिख कर 676746 पर एसएमएस कर दें. बस. आपका ब्लॉग तमाम दुनिया के पठन-पाठन हेतु इंटरनेट पर प्रकाशित हो गया. हालाकि इबिबो की यह सेवा मुफ़्त है, परंतु आपको एसएमएस करने के लिए अपने मोबाइल सेवा प्रदाता को तय दरों पर प्रति एसएमएस का भुगतान करना होगा.

मैंने इस सेवा में रिलायंस इंडिया मोबाइल (सीडीएमए) के जरिए एलजी मोबाइल फ़ोन के जरिए हिन्दी में ब्लॉग पोस्ट डालने की कोशिश की. नतीजा रहा ?????????? जो कि आप नीचे देख सकते हैं.

मतलब यह कि हिन्दी यूनिकोड इस बीच कहीं संचार माध्यमों के बीच खंडित हो गई. जबकि इबिबो में हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग न सिर्फ संभव है, बल्कि उसमें भारतीय भाषाओं में ऑनलाइन कुंजीपट का भी प्रावधान है. मैंने अपनी यह समस्या इबिबो में दर्ज तो कर दी है - देखते हैं यह बग कब फ़िक्स होता है. अंग्रेज़ी ब्लॉग पोस्ट में कोई समस्या नहीं आई, और अंग्रेज़ी में मोबाइल के जरिए ब्लॉग पोस्ट करना तो वाकई मजेदार अनुभव रहा - अगर लिखने की समस्या को छोड़ दें तो! मगर, फिर ऐसे स्मार्ट-फ़ोन जिनमें आपके हस्तलेख पहचानने की सुविधा हो और उनमें आप डिजिटल पेंसिल जैसी किसी चीज से लिख सकें तो फिर तो आगे मोबाइल ब्लॉगिंग का ही जमाना रहेगा. और, अच्छे कैमरे युक्त मोबाइल फ़ोनों से सीधे ही फ़ोटो ब्लॉगिंग की तो बात ही क्या!

तो, क्या आप तैयार हैं?

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यह आलेख कुछेक साल पहले लिखा गया था. परंतु यह आज भी समीचीन है. पढ़ें व मज़े लें. आपको दूर नहीं जाना है. इसी ब्लॉग के पृष्ठ पर कोई दो साल पहले प्रकाशित हुआ था -

एवरीथिंग ऑफ़ीशियल अबाउट क्रिकेट.

इस लेख के शीर्षक की प्रेरणा मिली थी - जब पिछले से पिछले विश्वकप क्रिकेट के लिए ऑफ़ीशियल ड्रिंक का प्रायोजन पेप्सी ने हथिया लिया था तो कोका-कोला ने एंटी कैंपेन किया - नथिंग ऑफ़ीशियल अबाउट इट! और जाहिर है, यह चल निकला था - ठीक वैसे ही जैसे विंडोज़ विस्टा ने कहा 'वॉव' तो मॅक ओएस ने कहा - वॉव तो हम पांच साल पहले कह चुके हैं!

साथ ही, क्रिकेट पर आज का देसीटून्ज यहाँ देखिए.

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भला मुझे इसमें क्या रूचि हो सकती है कि आप क्या कर रहे हैं! या, इसके उलट, मैं इस वक्त क्या कर रहा हूँ इसमें आपको कोई रूचि हो सकती है भला?

परंतु रुकिए, बिल गेट्स या अमिताभ बच्चन या ब्रिटनी स्पीयर्स इस समय क्या कर रहे होंगे? इसमें मुझे भी रूचि होगी और आपको भी. और, यदि आपका या मेरा रुतबा इनके जैसा हो तो हर किसी को यह रूचि होगी जानने में कि मैं या आप इस वक्त क्या कर रहे हैं! और, वैसे, मेरी इसमें भी रूचि है यह जानने में कि अभी फ़ुरसतिया अपने कम्प्यूटर में क्या लिख रहे हैं और उन्मुक्त किस चिट्ठे में पोस्ट कर रहे हैं और मोहल्ले में अविनाश क्या पका रहे हैं. मुझे सचमुच इसमें भी रूचि है कि प्रभासाक्षी और अभिव्यक्ति के संपादक अभी क्या कर रहे होंगे.

इसी धारणा, इसी विचार को मूर्त रूप दिया गया है वेब अनुप्रयोग ट्विटर में. यह विचार पहली नजर में आपको भले ही भद्दा, बेकार और बेमतलब सा लगे, परंतु यह भी अविश्वसनीय सत्य है कि ट्विटर की साप्ताहिक वृद्धि-दर वर्तमान में बीस प्रतिशत से अधिक चल रही है, और मात्र सात महीनों के दौरान इसके साठ हजार से अधिक पंजीकृत प्रयोक्ता हैं! और, इन पंक्तियों के लिखे जाते तक ट्विटर प्रयोक्ता दस-लाख संदेश प्रेषित कर चुके हैं कि वे संदेश प्रेषित करते समय क्या कर रहे थे.

ट्विटर को इवान विलियम्स की कंपनी ऑब्वियस ने प्रस्तुत किया है. इवान वही हैं जिन्होंने आज के सर्वाधिक प्रचलित ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म ब्लॉगर की स्थापना की थी, जिसे बाद में गूगल ने खरीद लिया था.

ट्विटर का साधारण सा उद्देश्य है - आप दुनिया को, दोस्तों को और चाहें तो दुश्मनों को भी, अंग्रेज़ी के 140 अक्षरों (हिंदी के लिए जाहिर है ये कम हो जाएंगे) में ये बताएँ कि आप क्या कर रहे हैं? इसके लिए ट्विटर में पंजीकृत होना होता है, जो कि पूर्णतः मुफ़्त है, फिर चाहें तो मिनट दर मिनट सारी दुनिया को बताते रहें कि आप उस वक्त क्या कर रहे हैं. आपका लिखा आपके ट्विटर घर पृष्ठ पर दर्ज होता रहेगा. आप ट्विटर मित्र जोड़ सकते हैं या आप ट्विटर मित्र बन सकते हैं. आप क्या कर रहे हैं यह प्रविष्टि चाहें तो व्यक्तिगत रूप से, सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु अवरूद्ध भी कर रख सकते हैं. आपके ट्विटर मित्रों के ट्विटर संदेश कि वे क्या कर रहे हैं आपके घर पृष्ठ पर भी दर्ज होता रहेगा जिसे आप सुविधानुसार देख-पढ़ सकते हैं.

यही नहीं, इन संदेशों को आप इंसटैंट मैसेंजर तथा मोबाइल फ़ोनों के जरिए एसएमएस के रूप में भी भेज सकते हैं - इसके लिए आपको ट्विटर खाते में इन्हें सक्रिय करना होगा.

आप ट्विटर में नकली नामों से भी पंजीकृत हो सकते हैं - जैसे कि कोई व्यक्ति बिलगेट्स तथा अमरीकी उपराष्ट्रपति अल गोरे के नाम से भी पंजीकृत है. पर, यह सिर्फ मजाक के रूप में ही है, क्योंकि आपके नकली संदेशों को फिर कोई गंभीरता से नहीं लेगा - जैसे कि नकली बिल क्लिंटन ने लिखा - अलगोरे ने ऑस्कर जीत लिया! व्हूपी डू! और असली रविरतलामी ने लिखा - ट्विटर के बारे में टिपिया रहा हूँ और क्या! - यानी कि हिन्दी यूनिकोड का पूरा समर्थन.

ट्विटर में और भी संभावित सेवाओं को भविष्य में जोड़े जाने की योजनाएँ हैं - परंतु इसके डेवलपर इसके उपयोक्ता आधार को समुचित स्तर तक बढ़ जाने का तथा ट्विटर के संसाधनों को बढ़ाने का इंतजार कर रहे हैं. और, इसका संसाधन दिन प्रतिदिन बढ़ाया जा रहा है. हाथ कंगन को आरसी क्या -

तो, अभी आप क्या कर रहे हैं? अगर कुछ खास नहीं, तो, आइए क्यों न ट्विटरियाएँ? दुनिया को बताएँ कि अभी हम कुछ नहीं कर रहे!

संदर्भ यह लेख, सहयोग देबाशीष

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माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया पर देबाशीष का साक्षात्कार पढ़ते पढ़ते माउस इधर उधर विचरने लगा. एक कड़ी दिखी जिसमें भाषाई नया पन था. बानगी आप भी देखें-

(बड़ा आकार देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें)

यह आंशिक पाठ कुछ इस तरह है -

कया आप कुछ अनुक्रमणिका बताएगें मलटिमीडिया के बारे में
जी हाँ, जरुर..। हम कई रखमों में अनुक्रमणिका बनवाए है। हमने कहानी में सराशं मे, दोहे में नाटक में, नोवल में, शिकशा मे, साफटवेर मे, परिचय मे, सेहत और कई रखमें में बनवये है। और प्रोडियुस किये है। और हमने सीखना सीखाना में भी प्रोडियुस किया जैसा के हिन्दी सें अंग्रेची पडना और अंग्रेची मे पडना आदी...। और हम कई ज्ञ्यादी भाष में भी आविशकार करने कि कोशिश कर हे।

आपका भविशय सोचना कया है और आपका इस मारकेट में किस हद तक जाने का समभावना है।
मै जब भी मलटिमीडिया के बारे में सोचता हुँ, तब मुझे बोहत अच्छी तरह यकीन होता है के इसमे भविशय तोहत अच्छा रहेंगा। कयों के आज मारकेट में मलटिमीडिया का जो मुखाम है, तो लोगों मे बडता जा रहा है। बस एक चीज हमें धयान में रखना है के हमारा दाम, काम, और माल सही तरह से और अचछी तरह से चले।

किस हाल में मलटिमीडिया बदलाव आयेगा भविशया में
आज हमें सीडी में कारटुन, अनिमेशन आदी बनाते है, उमीद बनाते है के भविशय में सब कुछ बदला जाएगा और सीडी का उपयोग कम होचाएगा यानी और नये नये अविशकार करेगे।
(आंशिक पाठ माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया से साभार)

भाषा इंडिया, ये कौन सी भाषा है? और, लोग-बाग़ हम हिन्दी-चिट्ठाकारों की भाषाओं पर सवालिया निशान लगाते रहते हैं!

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पिछले दिनों चिट्ठों के आचार संहिता बनने बनाने व उन्हें अपनाने पर खूब बहसें हुईं. इसी बीच चिट्ठाकारों के अनाम -बेनाम-कुनाम मुखौटों पर भी खूब जमकर चिट्ठाबाजी हुई.

इसी बात को मद्देनजर रखते हुए इस ‘अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता' की रचना की गई है. सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को इन्हें मानना व पालन करना घोर अनिवार्य है. अन्यथा उन्हें चिट्ठाकार बिरादरी से निकाल बाहर कर दिया जाएगा और उनका सार्वजनिक ‘चिट्ठा' बहिष्कार किया जाएगा.

  • चिट्ठे विवादास्पद मुद्दों पर ही लिखे जाएँ. मसलन धर्म, जाति, आरक्षण, दंगा-फ़साद इत्यादि. इससे हिन्दी चिट्ठों का ज्यादा प्रसार-प्रचार होगा. सीधे सादे सरल विषयों पर लिखे चिट्ठों को कोई पढ़ता भी है? अतः ऐसे सीधे-सरल विषयों पर लिख कर अपना व पाठकों का वक्त व नारद-ब्लॉगर-वर्डप्रेस का रिसोर्स फ़ालतू जाया न करें. इस तरह के सादे चिट्ठों की रपट ब्लॉगर और वर्ड प्रेस को एब्यूज के अंतर्गत कर दी जाएगी और उस पर बंदिश लगाने की सिफ़ॉरिश कर दी जाएगी.
  • अखबारी-साहित्यिक-संपादित तरह की तथाकथित ‘पवित्र' भाषा यहाँ प्रतिबंधित रहेगी. हर तरह का भाषा प्रयोग यहाँ न सिर्फ स्वीकृत बल्कि अनिवार्य होगा. फ़ूहड़, गाली-ग़लौज से भरे भाषाओं को चिट्ठा-चर्चा में विशेष तवज्जो दी जाएगी. अब ये अलग बात है कि चिट्ठा-चर्चा क्यों और किसलिए है ये कुछ चिट्ठाकारों को जल्दी से समझ नहीं आए. और ऐसे नासमझ चिट्ठाकारों को समझ आते तक दिन में दो बार चिट्ठा-चर्चा पढ़ना अनिवार्य होगा, और उन्हें अपने चिट्ठों पर ‘चिट्ठा-चर्चाओं' की नियमित ‘चर्चा' करना घोर अनिवार्य होगा.
  • चिट्ठों का स्वरूप है - अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता. चिट्ठाकार एक-दूसरे पर कीचड़-नुमा चिट्ठे उछालने को न सिर्फ स्वतंत्र हैं, बल्कि साल में ऐसे तीन चिट्ठापोस्ट करना अनिवार्य है जिसमें वे साथी चिट्ठाकारों की जमकर व्यक्तिगत भद पीटें. अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता को बनाए रखना हर चिट्ठाकार का न सिर्फ अधिकार है, बल्कि उसका कर्तव्य भी है.
  • अनाम-बेनाम-कुनाम चिट्ठाकारी प्रतिबंधित रहेगी. हर चिट्ठाकार को नाम रखना होगा - जे. एल. सोनारे - 001, जे. एल. सोनारे - 002 इत्यादि, इत्यादि. जिन चिट्ठाकारों ने प्रसिद्धि की चाह में अपने वास्तविक नाम रख छोड़े हैं उन्हें अपना वास्तविक नाम छः माह के भीतर हटाना होगा और नया नाम रखना होगा.
  • चिट्ठाकारों को पहचान हेतु फ़ोटो चिट्ठों के बाजू में प्रोफ़ाइल में लगाना अनिवार्य होगा. चिट्ठाकारों के खुद के फ़ोटो जरूरी नहीं हैं, बल्कि उन्हें अत्यंत अनावश्यक माना जाएगा. जिन चिट्ठों में चिट्ठाकारों के स्वयं के फ़ोटो लगे हैं उन्हें विज्ञापन माना जाएगा और उन्हें हटाने के लिए छः माह का समय दिया जाएगा. ऐसा न करने पर उन्हें दंडित किया जाएगा. पहचान हेतु कुछ इस तरह के या कुछ उस तरह के चित्रों की अनुशंसा की जाती है. वैसे, जगदीश भाटिया का चित्र भी लगाया जा सकता है (नंबर 001, 002 इत्यादि लगाकर), चूंकि हिन्दी चिट्ठा जगत् में एक अकेले वे ऐसे महापुरुष हैं जिनका चिट्ठा तो क्या, उनका फ़ोटो ही चोरी चला गया था , ऊपर से चोर कोई देसी नहीं, विदेसी बंधु था!
  • जिन चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में विज्ञापन भर रखे हैं उन्हें अपने चिट्ठे विज्ञापनों से खाली करने होंगे. ऐसे समस्त विज्ञापन उन चिट्ठों में रखना अनिवार्य होगा जिनके चिट्ठाकार विज्ञापनों से चिढ़ते हैं, खौफ़ खाते हैं. इंटरनेट इज ग्रेट लेवलर. इस तरह से, हिन्दी चिट्ठों का हिसाब बराबर किया जाएगा.
  • कुछ समय पहले चिट्ठा-चोर आया चिट्ठा-चोर आया का बड़ा हल्ला मचा था. इस तरह की समस्याओं का परमानेंट समाधान करने के लिए समस्त हिन्दी चिट्ठों पर मौलिक लेखन की तत्काल पाबंदी लगाई जाती है. अब चिट्ठों में जो भी लिखा जाएगा, वह चोरी की, कटपेस्ट और कॉपी पेस्ट सामग्री होगी. चोरी कर लिखी सामग्री की चोरी की फिर कोई चिंता नहीं होगी. जो चिट्ठाकार मौलिक सामग्री का प्रयोग करता पाया जाएगा, उस पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाएगा.
  • सौम्य भाषाओं में लिखी टिप्पणियाँ मॉडरेट कर दी जाएंगीं व उन्हें तत्काल कूड़ेदान में डाल दिया जाएगा. तल्ख़, उत्तेजक, गाली-गलौज से भरपूर टिप्पणियाँ लिखें, व्यक्तिगत छींटाकसी करती हुई टिप्पणियाँ लिखें. ऐसी टिप्पणी लिखें कि सामने वाले का ख़ून खौल उठे और वह भी उतनी ही उत्तेजक प्रति टिप्पणी लिखे और अन्य चिट्ठा लेखक-पाठक भी प्रति टिप्पणी या प्रति-चिट्ठापोस्ट लिखने को प्रेरित हों. पोस्ट को पढ़े बिना ही उसके असली पाठ के मतलब को समझे बिना ही टिप्पणी करने से भाषा में और तल्ख़ी आती है यह ध्यान रखें.

'अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता' की रचना लगातार जारी है. समयानुसार नियम बनते बिगड़ते रहेंगे. अपने उत्तम विचारों से अवश्य अवगत करावें ताकि इसे पूर्णता प्रदान की जा सके.

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अगर आज आपने ब्लॉगर पर होस्ट किए चिट्ठों (नए ब्लॉगर पर, पुराने क्लासिक टैंप्लेट वाले चिट्ठों पर नहीं) पर ध्यान से नज़र डाली होगी, तो यह सुखद बात पता चली होगी कि अब जब आप चिट्ठे के नए पुराने आलेखों को पढ़ने के लिए उसकी नेविगेशन कड़ियों को क्लिक कर रहे होंगे तो बजाय पूरा पेज फिर से लोड होने के, सिर्फ उस आलेख की सामग्री रिफ्रेश होती है वह भी डॉयनामिकली यानी चलते-चलते.

एजेक्स तकनीक के बेहतरीन उपयोग का एक और नमूना.

इससे न सिर्फ आपका पेज त्वरित गति से लोड होता है, पाठकों को भी सुखद अनुभूति होती है.

कुछ दिन पहले ही ब्लॉगर ने अपने ब्लॉग लिखने के औजार में हिन्दी ट्रांसलिट्रेशन बटन जोड़ा था. नए ब्लॉगर से तो हमें और भी उम्मीदें हैं... देखते हैं अब वह नया क्या देता है.

आज (शनिवार 17 मार्च 2007 का ई-पेपर देखें) के हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रथम पृष्ठ पर हिन्दी चिट्ठों के संबंध में एक छोटा सा लेख छपा है.

यह खबर, लगता है संपादन टेबल की कैंची की भेंट चढ़ गई, क्योंकि यही खबर दैनिक हिन्दुस्तान में थोड़ी बड़ी और ज्यादा अच्छी है!

मुख्य धारा की मीडिया में हिन्दी चिट्ठे हलचल तो पैदा कर रहे हैं, चाहे जैसे भी हो!

# अद्यतन - अंग्रेज़ी में पूरा आलेख यहाँ पढ़ें

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हम सभी को हिन्दी यूनिकोड अक्षरों को किसी भी पेंट प्रोग्राम में लिखने व उसका रूप-आकार सजाने संवारने में तमाम दिक्कतें आती हैं. आमतौर पर हाल फ़िलहाल अधिकतर पेंट प्रोग्रामों में यूनिकोड समर्थन नहीं है और कहीं कहीं है - जैसे कि ग़िम्प या फ़ोटोशॉप के नवीनतम संस्करण में, तो वहां भी समर्थन बस नाम का, आधारभूत जैसा ही है - यानी कि काम पूरा करने के लिए कई-कई चरणों में गुजरना होता है या फिर वांछित परिणाम प्राप्त नहीं होता - जैसा कि शुएब, जो कि पेशे से ग्राफ़िक डिजाइनर हैं, अपने इस पोस्ट में बता रहे हैं.

आपकी इस समस्या को बहुत हद तक यह मुफ़्त का प्रोग्राम हल करने की क्षमता रखता है. पेंट.नेट नाम का यह फ्रीवेयर प्रोग्राम एक कम क्षमता वाला फ़ोटोशॉप जैसा ही है, जिसमें फ़िल्टर भी हैं तो प्लगइन की सुविधा भी. लेयर तथा असीमित अन-डू, री-डू का भी समर्थन है. यदि आपने माइक्रोसॉफ़्ट पेंट या फ़ोटोशॉप में काम किया हुआ है तो इसपर काम करना आपके लिए आसान है क्योंकि यह ठीक वैसा ही डिजाइन किया गया है. आधुनिक पेंट प्रोग्रामों की सारी प्रमुख ख़ूबियाँ इसमें हैं ही. ऊपर से यह मात्र 5.5 मेबा डाउनलोड है. पर हाँ, इसके लिए आपके कम्प्यूटर पर डॉट नेट फ्रेमवर्क 2 संस्थापित होना आवश्यक है.

इस औजार से यूनिकोड हिन्दी में ‘कहानी' लिख कर उस पर कुछ त्वरित काम किया गया जो निम्न है. ऐसे असीमित प्रभाव हिन्दी पाठ पर डाला जा सकता है.

पेंट डॉट नेट यहाँ से डाउनलोड करें

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क्रिकेट का बुखार चहुँओर छाया है. आपका डेस्कटॉप क्यों अछूता रहे इससे? आइए, देखें कि आपके कम्प्यूटर को क्रिकेट बुखार से संक्रमित करने के क्या क्या तरीके हैं. एक तरीका यह है कि आप अपने कम्प्यूटर डेस्कटॉप में विश्वकप क्रिकेट का जीवंत स्कोर बोर्ड लगाएं. जब तक आप ऑनलाइन रहेंगे, ये स्कोरबोर्ड आपको ओवर-दर-ओवर जीवंत स्कोर कार्ड प्रस्तुत करते रहेंगे. आइए, कुछ विकल्पों की चर्चा करते हैं.

याह! विजेट आपके जीवन को कई प्रकार से आसान बनाते हैं. एक ऐसा ही याहू! विजेट है जो कि विश्वकप क्रिकेट के स्कोर को जीवंत रुप में आपके कम्प्यूटर डेस्कटॉप पर लाइव स्ट्रीम करता है.

इसके लिए, यदि आपने अभी तक आप याहू! विजेट इंजिन अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित नहीं किया हुआ है तो इसे यहाँ से डाउनलोड कर अपने विंडोज (या मॅक) कम्प्यूटर में संस्थापित करें.

फिर उसके बाद क्रिकेट विश्वकप लाइव स्कोर विजेट, जिसे सुमित राजगोपालन ने खास इस विश्वकप के लिए तैयार किया है, यहाँ से संस्थापित करें. (इस विजेट के बारे में और जानकारी यहां से लें)

आप इस विजेट को अपने कम्प्यूटर पर कहीं भी खींच कर रख छोड़ सकते हैं. इसे आप F8 कुंजी की सहायता से कभी भी छुपा/दिखा सकते हैं - खासकर जब आपके बॉस आसपास हों. वैसे, आपके बॉस भी इस विजेट को पसंद करेंगे .

यदि आप क्रिकेट लाइव स्कोर को हिन्दी में देखना चाहते हैं तो आप इस टूलबार को संस्थापित करें, जिसे जगदीश भाटिया ने बनाया है. इसके बारे में और जानकारी यहां से लें. और यदि आपके पास गूगल डेस्कटॉप पहले से ही संस्थापित है तो आप विश्वकप क्रिकेट स्कोर का यह गूगल विजेट संस्थापित कर सकते हैं.

तो, देर किस बात की? कर डालिए अपने कम्प्यूटर के स्क्रीन को क्रिकेटमय, आज-अभी ही!

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राइटली के गूगल द्वारा अधिग्रहण करने के साथ यह अंदेशा तो था ही कि एक संपूर्ण ऑनलाइन शब्द संसाधक बहुत-2 सी सुविधाओं के साथ हमें मिलने वाला है.

क्या आपको पता है कि गूगल डॉक्स में अब हिन्दी वर्तनी जाँच की पूरी सुविधा उपलब्ध है? जी हाँ, अब यह उपलब्ध है, और बढ़िया काम करता है. हिन्दी में गलत वर्तनी लिखने वालों को गरियाने के लिए एक और वजह. यह है हिन्दी पाठ की वर्तनी जाँच गूगल डॉक्स में:

और यह रही उसी पाठ की एमएस ऑफ़िस हिन्दी की वर्तनी जाँच :

संभवतः एक जैसा.

इसके लिए आपको कुछ नहीं करना है. जीमेल खाता अगर आपके पास है तो आप सीधे उसी खाते से गूगल डॉक्स में लागइन हो सकते हैं. हिन्दी पाठ आप सीधे लिख सकते हैं या कहीं से नकल-चिपका भी सकते हैं (उम्मीद करें कि ब्लॉगर जैसा ट्रांसलिट्रेशन बटन भी इसमें शीघ्र ही जुड़ेगा) और बस, नीचे दाएँ कोने में दिए वर्तनी जांच बटन को दबा कर हिन्दी चुनें.

आप हिन्दी वर्तनी जांच के लिए वैकल्पिक शब्दों को भी गलत वर्तनी वाले शब्द को क्लिक कर देख सकते हैं तथा अपने स्वयं के शब्द भंडार में नए शब्दों को जोड़ भी सकते हैं.

हां, यह सिर्फ ऑनलाइन काम करता है, और धीमे कनेक्शन में हिचकोले खाता है. पर फिर भी है यह बहुत काम का. हिन्दी पाठ एचटीएमएल में यह एमएस वर्ड जैसा अनावश्यक फ़ॉर्मेटिंग टैग भी नहीं डालता. और हाँ, अन्य तरीकों के अलावा, इसमें आप पीडीएफ़ के रूप में भी फ़ाइल को बदल कर सुरक्षित रख सकते हैं!

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(गूगल के तिकड़ी कार्यकारी - चित्र - साभार पीसी वर्ल्ड, गूगल)

टाइम पत्रिका ने इस वर्ष का अंतरजाल पुरुष "आपको" बनाया है - यानी कि इंटरनेट उपयोक्ता को. संभवतः प्रत्येक उपयोक्ता द्वारा इंटरनेट पर किसी न किसी रूप में सामग्री का योगदान करने की ख़ातिर. परंतु यह सच नहीं है. पीसी वर्ल्ड पत्रिका ने इंटरनेट के उन मौजूदा 50 व्यक्तियों की सूची जारी की है जिन्होंने अंतरजाल का आज का स्वरूप बनाने में खासा प्रभाव डाला है. सूची में प्रथम पाँच स्थान पर हैं -

1 - एरिक स्मिट, सेर्जेई ब्रिन एवं लैरी पैज - गूगल के कार्यकारी

2 - स्टीव जॉब्स - सीईओ एपल

3 - ब्रॉम कोहैन - बिट टोरेन्ट के सह-संस्थापक

4 - माइक मोरहैम - अध्यक्ष, बिजार्ड एंटरटेनमेंट (वर्ल्ड ऑफ़ वारक्रॉफ़्ट का नाम सुना है?)

5 - जिमी वेल्स - विकीपीडिया के संस्थापक

जाहिर है, पहली सूची में गूगल के संस्थापकों को तो आना ही था. पूरी सूची यहाँ पर देखें


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